महिला एवं बाल विकास विभाग

महिला एवं बाल विकास विभाग

www.mpwedmis.gov.in उषा किरण योजना

परिवार में महिलाओं एवं उनके बच्चों के विरुद्ध घर में या सार्वजनिक स्थान पर हिंसा (शारीरिक, यौन, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक) धमकियां जबरदस्ती या मनमाने तरीके से स्वतंत्रता का हनन आदि से संरक्षण एवं सहायता के लिये प्रदेश सरकार ने उषा किरण योजना प्रारम्भ की है।

घरेलू हिंसा के विरुद्ध संरक्षण एवं सहायता प्रदान करना घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 का क्रियान्वयन घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाएं एवं बच्चे (18 साल से कम उम्र के) ।

करवाना। पात्रता की शर्त

योजना के संबंध में परियोजना अधिकारी (संरक्षण अधिकारी), कार्यालय एकीकृत बाल विकास

परियोजना समस्त एवं जिले में संचालित वन स्टॉप सेंटर पर सम्पर्क किया जा सकता है।

आई.सी.डी.एस. (समेकित बाल विकास योजना)

0 से 6 वर्ष तक के बच्चों एवं गर्भवती/धात्राओं/किशोरी बालिकाओं को आई.सी.डी.एस. योजना के अन्तर्गत आगनबाड़ी केन्द्रों के माध्यम से 6 सेवाओं जैसे शाला पूर्व शिक्षा, टीकाकरण पूरक पोषण आहार, सन्दर्भ सेवा, स्वास्थ्य एवं आहार एवं स्वास्थ्यलाभान्वित किया जाता है। प्रदेश के सभी 0-6 वर्ष के मध्ये महिलाएं एवं किशोरी बालिकाएं जिनका पंजीयन आंगनवाड़ी केन्द्र में किया गया है, इस योजना के मात्र है।

ताडली लक्ष्मी योजना

www.ladlilaxmi.mp.gov.in

उद्देश्य बालिका जन्म के प्रति जनता में सकारात्मक सोच लिंग अनुपात में सुधार, बालिकाओं के शैक्षणिक स्तर तथा स्वास्थ्था की स्थिति में सुधार बेटा और बेटी के बीच के भेदभाव को मिटाना तथा उनके अच्छे भविष्य की आधारशिला रखने के उद्देश्य से मध्यप्रदेश में 01 अप्रैल 2007 से लाडली लागी योजना लागू की गई थी। इस योजनान्तर्गत बालिका का ऑनलाइन पंजीयन उपरांत 1.18.000/- का प्रमाण पत्र दिया जाएगा इसके अतिरिक्त बालिका को कक्षा हवी में प्रवेश पर 2000/- कक्षा 9 वी में प्रवेश पर 4000/-की 11वी में प्रदेश पर 6000/- एवं कक्षा 12वीं में प्रवेश पर 6000/- की छात्रवृत्ति दी जायेंगी।

पात्रता की शर्तें

१. जिनके माता-पिता मध्य प्रदेश के मूल निवासी हो,

  1. आयकर दाता न हो,
  2. द्वितीय बालिका के प्रकरण में आवेदन करने से पूर्व माता या पिता ने परिवार नियोजन अपना

लिया हो।

आवेदक आवश्यक दस्तावेजो के साथ आवेदन सीधे अथवा आंगनबाडी कार्यकर्ता के माध्यम से परियोजना कार्यालय / लोक सेवा केंद्र में स्वीकृति हेतु समस्त दस्तावेजो के साथ जमा कराना होगा। परीक्षण परियोजना कार्यालय से कराया जायेगा, तत्पश्चात प्रकरण स्वीकृत अथवा अस्वीकृत किया जा सकेगा। ट्रेजरी द्वारा सीधे हितग्राही के बैंक खाते में राशि अंतरित की जायेगी। आवश्यक दस्तावेज

  1. बालिका का माता पिता के साथ फोटो।
  2. मूल निवासी / स्थानीय / माता या पिता मतदाता पहचान पत्र / परिवार का राशनकार्ड का प्रमाण

पत्र।

  1. बालिका का जन्म प्रमाण पत्र। 4. बालिका का टीकाकरण कार्ड।

लाडली लक्ष्मी योजना 20 ‘आत्म निर्भर लाड़ली

इस योजना के माध्यम से उच्च शिक्षा का सपना देखने वाली प्रदेश की लाड़लियों की मेडिकल, आईआईटी, आईआईएम या किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने पर लावली लक्ष्मी की पूरी फीस राज्य सरकार वहन करेगी। इसके साथ ही 12वी पास कर कॉलेज में प्रवेश लेने वाली लाडली लक्ष्मयों को 25 हजार रुपये दो किस्तों में अलग से दिए जाएंगे।

बेटियां सीधे मुख्यमंत्री से संवाद कर सके इसलिए लाडली ई-संवाद ऐप भी बनाया गया है। इसके अलावा जिस पंचायत में लाडलियों का सम्मान होगा, जहां एक भी बाल विवाह नहीं होगा, शालाओं में लाडलियों का शत-प्रतिशत प्रवेश होगा, कोई लाडली कुपोषित नहीं होगी और किसी भी बालिका के साथ अपराध घटित नहीं होगा, ऐसी ग्राम पंचायतों को लाडली लक्ष्मी पंचायत भी घोषित किया जाएगा।

मुख्यमंत्री महिला सशक्तिकरण योजना योजना के तहत विपत्तिग्रस्त व पीड़ित कठिन परिस्थितियों निवास कर रही महिलाओं के आर्थिक/सामाजिक उन्नयन हेतु स्थायी प्रशिक्षण प्रदान किया जायेगा ताकि रोजगार प्राप्त कर सके। इस प्रशिक्षण हेतु जारी किये जाने वाली डिग्री / प्रमाणपत्र, शासकीय / अशासकीय सेवाओं में मान्यहोगी।


प्राण पर होने वाला पूर्ण व्यय (प्रशिक्षण शुल्क, आवासीय व्यवस्था शुल्क) शासन द्वारा वहन किया हितबाही लक्षित समूह अनुसार पीड़ित की श्रेणी में आती हो। 2. समूह अनुसार आवेदिका / उसके परिवार का मुखिया गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन

करता हो। महिला द्वारा आवेदन जिला कार्यक्रम अधिकारी के कार्यालय में डाक या स्वयं

होकर प्रस्तुत किया जायेगा।

प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY) प्रदेश के समस्त जिलो में जनवरी 2017 से लागू की गई है।

पत्र-परिवार में प्रथम जीवित बच्चे के लिए गर्भवती महिलाओ एवं धात्री माताएं योजना की

होगी। गर्भवती महिलाओं के प्रथम बच्चे के प्रसव के पूर्व एव पश्चात् पर्याप्त आराम मिल सके।

  1. गर्भवती महिलाओ एवं धात्री माताओं के स्वास्थ्य संबंधी व्यवहारों में सुधार लाना।
  2. गर्भवती होने के बाद जितनी जल्दी हो सके, आगनबाडी केंद्र में अपना पंजीयन कराये
  3. बैंक या डाकघर में अपना बचत खाता खोले एवं उसे अपने आधार नम्बर से जोड़े / लिंक करे 5. आगनबाडी कार्यकर्ता अथवा ए.एन.एम. द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की माग करें। 6. आगनवाडी केंद्र में आयोजित होने वाले मंगल दिवस (गोद भराई, अन्नप्राशन एवं सुपोषण

दिवस) कार्यक्रमों में नियमित भागीदारी कर पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां प्राप्त करे। 7. सुनिश्चित करे की आपको दी गई सेवाओं एवं सलाह को मातृ शिशु सुरक्षा कार्ड (MCP

card) में दर्ज करायें। राशि भुगतान की प्रक्रिया पात्र हितग्राही को मजदूरी हानि की आशिक क्षतिपूर्ति के रूप में मातृत्व

लाभ की राशि का भुगतान DBT स्कीम के माध्यम से हितग्राही के आधार से जुडेलिक बैंक या

डाकघर खाते में सीधे जमा की जावेगी।

प्रथम किश्त राशि- 1000 रु. 1. हितग्राही का आंगनबाड़ी केंद्र में पंजीयन

  1. हितग्राही द्वारा स्वयं एवं पति के आधार कार्ड का विवरण। 3. हितग्राही द्वारा लिखित सहमति उपलब्ध कराना।
  2. हितग्राही द्वारा स्वयं / पति / पारिवारिक सदस्य का मोबाइल नम्बर 5. हितग्राही द्वारा स्वयं के बैंक या डाकघर खाते का विवरण। द्वितीय किश्त राशि 2000 रू. गर्भावस्था के 06 माह के अन्दर कम से कम एक बार प्रसव पूर्व जाँच

होने पर तृतीय किश्त राशि 2000 रु. 01- बच्चे के जन्म का पंजीकरण होना। 02- बच्चे के प्रथमचक्र का टीकाकरण पूर्ण होने पर बीसीजी, ओपीव्ही, डीपीटी एवं हेपिटाईटस-बी अथवा समतुल्य) बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

योजना का मुख्य उद्देश्य लक्ष्य बालिकाओं का जन्मोत्सव मनाना एवं उनको शिक्षित करना है। 1. सामाजिक लिंग (जेंडर) आधारित लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना

  1. बालिका की उत्तर जीविता तथा संरक्षण सुनिश्चित करना। 3. बालिका की शिक्षा एवं सहभागिता सुनिश्चित करना।

शौर्यादल

राज्य में महिलाओं के प्रति अनुकूल वातावरण निर्माण करने व उन्हें आत्मनिर्भर और सक्षम बनाने के उद्देश्य से प्रत्येक आंगनवाड़ी स्तर पर मूल्यांकन के आधार पर शौर्यादल का गठन किया गया है। शौर्यादल का गठन एक निरन्तर प्रक्रिया होगी। यह दल पंचायत स्तर पर समुदाय को महिलाओं एवं बालिकाओं के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास आवश्यक सहयोग तथा सहायता प्रदान करेगा। शौर्यादल का स्वरुप शौर्यादल में 10 सदस्य होंगे, इस दल में ग्राम / पार्ड के संवेदनशील तथा जन समुदाय में स्वीकार्यता

रखने वाले 6 महिला व पुरूष को चुना जाता है जो प्रकृति, समाज तथा अपने गाँव व मोहल्ले के

लिये संवेदनशील व स्वेच्छापूर्वक सामाजिक कार्य के लिये तत्पर हो।
किया

शौर्यादल के मुख्य कार्य एवं भूमिकाएं

• किसी भी हिंसा से पीड़ित महिला जैसे हिंसा, बीमारी, लैगिक पत्यादिको सहायता दिलाने के लिये उपयुक्त शासकीय अधिकारी से सम्पर्क करना, बाल विवाह न करने के लिये समाज में जागरूकता लाना।

• “शौचालय नहीं तो शादी नहीं के तर्ज पर घर-घर से शौचालय बनाने व उपयोग करने हेतु ग्रामीणों तथा रहवासियों को जागरूक करना। • लालिमा अभियान के अंतर्गत रक्ताल्पता (एनीमिया) अर्थात शरीर में खून की कमी सुधार लाने हेतु ग्राम स्वास्थ्य एवं पोषण दिवस (VHND) तथा आंगनवाड़ी केन्द्रों के माध्यम से समुदाय को जागरूक करना।

. प्रत्येक परिवार में तथा सामुदायिक व सरकारी खुले स्थानों पर वृक्षारोपण, किचन गार्डन इत्यादि में पंचवटी से पोषण के लिये सम्पूर्ण ग्राम की कार्ययोजना तैयार करना। कार्ययोजना ग्रामवासियों, महिला एवं बाल विकास विभाग, उद्यानिकी विभाग, वन विभाग, कृषि विभाग आदि के जमीनी अमले के साथ मिलकर बनाई जाये।

प्रथम एवं द्वितीय वर्ष में क्रियान्वयन हेतु गतिविधियां सुनिश्चित करना। ये गतिविधियां उद्देश्यों के अनुरूप स्पष्ट व परिणाम मूलक हो, जिनके परिणामों के स्पष्टमापक निर्धारित हो। शौर्यादल कार्यों के साथ-साथ कुपोषण कम करना, एनीमिया, विटामिन सी की प्रोत्साहन, स्वच्छता सस्टेनेबिलिटी सेनिटरी नेपकिन, शिक्षण, पंचायतीराज, सुखी परिवार, नशामुक्ति आदि के संबंध में जागरूकता फैलाना।

पोषण अभियान (राष्ट्रीय पोषण निशन) ‘सही पोषण देश रोशन

भारत सरकार द्वारा कुपोषण को दूर करने के लिए जीवनचक्र एप्रोच अपनाकर चरणबद्ध ढंग से पोषण अभियान चलाया जा रहा है। भारत सरकार द्वारा 0 से 06 वर्ष तक के बच्चा, गर्भवती एवं धात्री माताओं के स्वास्थ्य व पोषण स्तर में समयबद्ध तरीके से सुधार हेतु महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय पोषण मिशन का गठन किया गया है। इसके अन्तर्गत कुपोषण को चरणबद्ध तरीके से दूर करने के लिए 03 वर्षों के लक्ष्य

निर्धारित किए गए हैं।

उद्देश्य एवं लक्ष्य

1-0 से 6 वर्ष के बच्चों में ठिगनेपन से बचाव एवं इसमें कुल 6 प्रतिशत् प्रतिवर्ष 2 प्रतिशत की दर से

कमी लाना।

2-0 से 6 वर्ष के बच्चों का अल्प पोषण से बचाव एवं इसमें कुल 6 प्रतिशत, प्रतिवर्ष 2प्रतिशत की दर से 36 से 50 माह के बच्चों में एनीमिया के प्रसार में कुल 9 प्रतिशत, प्रतिवर्ष 3प्रतिशत की दर से कमी

कमी लाना।

लाना।

15 से 49 वर्ष की किशोरियों, गर्भवती एवं पात्री माताओं में एनीमिया के प्रसार में कुल 9प्रतिशत, प्रतिवर्ष उप्रतिशत की दर से कमी लाना। 5-कम वजन के साथ जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में कुल प्रतिशत प्रतिवर्ष 2प्रतिशत की दर से कमी लाना।

पोषण आहार योजना

मध्य प्रदेश में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों में 06 माह से 06 वर्ष तक के बच्चों, गर्भवती/धात्री माताओं एवं अति कम वजन के बच्चों को प्रति हितग्राही प्रतिदिन घूरक पोषण आहार से लाभान्वित किया जा रहा है। इसके अन्तर्गत 06 माह से 06 वर्ष तक के बच्चों को प्रतिदिन 12-15 ग्राम प्रोटीन एवं 500 कैलोरी, अति कम वजन के बच्चों को प्रतिदिन 20-25 ग्राम

57

स्वयं

की

CP
प्रोटीन एवं 80 कैलोरी गर्भवती/धात्री माताओं व किशोरी बालिकाओं को प्रतिदिन 18-20 ग्राम प्रोटीन एवं 000 कैलोरी के बराबर रोषण आहार दिए जाने का प्रावधान है।

आगनबाड़ी केंद्रों में 06 माह से 03 वर्ष तक के बच्ची गर्भवती/धात्री माताओं को सप्ताह में अलग अलग दिवसों में मे गोवा मर्फी मिमिक्स, आटा बेसन लडडू मिक्स हलुआ मिमिक्स, बाल आहार मिक्स एवं खिचड़ी दी जाती है। 3 वर्ष से 06 वर्ष तक के बच्चों को सांझा चूल्हा के माध्यम से सुबह का मारता एवं दोपहर का भोजन सप्ताह के अलग अलग दिनों के मेनू अनुसार दिया जाता है।

नाश्ते में मीठी लगी पोष्टिक खिचड़ी, दलिया, उपमा दिया जाता है। दोपहर के भोजन में रोटी, सब्जी, दाल, वीर पुसी गवाही आलू टमाटर की सब्जी पुलाव कढ़ी पकोड़ा, चावल सामर दिया जाता है। 06 माह से वर्ष तक के अति कम वजन के बच्चों को बर्ड मील के रूप में सप्ताह में तीन दिन दोपहर के भोजन अनुसार एवं सोन दिन मारते मैनू अनुसार दिए जाने का प्रावधान है।

केंदों में बच्चों के पोषण स्तर में सुधार लाने के लिए मध्यप्रदेश में सभी आगनवारी/उप आंगनबाड़ी केंद्रों में मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम अंतर्गत 03 से 06 वर्ष तक के बच्चों को मीठा सुगंधित स्किम्ड मिल्क सप्ताह के तीन दिन दिया जाता है। आगनबाड़ी केंद्रों में पूरक पोषण आहार की व्यवस्था हेतु व्यय की जाने कली राशि से 50 प्रतिशत की राशि भारत सरकार महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा उपलब्ध कराई जाती है।

किशोर न्याय बालकों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम 2015

किसी भी राष्ट्र का निर्माण और राष्ट्र का भविष्य उस राष्ट्र के बच्चों पर निर्भर होता है यदि बच्चों के भविष्य को सुरक्षित नहीं किया गया तब राष्ट्र का भविष्य भी असुरक्षित हो जाएगा। समय और परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जो कम आयु में ही अपराध कर बैठते हैं।

कानून की भाषा में अपराध की ओर प्रवृत्त बालकों को विधि विरोधी किशोर कहा गया है। भारत में ऐसे किशोरों के लिए ककिशोर न्याय बालको को देखरेख और संरक्षण अधिनियम 2015 पारित किया गया है। इस अधिनियम के सन् 2021 में संशोधन किया गया।

लोकसभा में किशोर न्याय बच्चों की देखभाल और संरक्षण संशोधन विधेयक 2021 पारित किया गया है जो बच्चों की सुरक्षा और उन्हें गोद लेने के प्रावधानों को मजबूत करने और कारगर बनाने का प्रयास करता है। यह वियक किशोर न्याय बच्चों की देखभाल और संरक्षण अधिनियम 2015 Juvenile

Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015) में संशोधन करता है। इस विधेयक

में उन बच्चों से संबंधित प्रावधान है जिन्होंने कानूनन कोई अपराध किया हो और जिन्हें देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता हो। विधेयक में बाल संरक्षण को मजबूती प्रदान करने के उपाय किये गए हैं। इस नए अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य विधि विरोधी किशोरों की देखभाल और संरक्षण की व्यवस्था एवं उनके सर्वोत्तम हित में अधिनियम के तहत विभिन्न संस्थानों के माध्यम से उनके पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

ऐसे बालकों को जेल कचहरी आदि के वातावरण तथा पेशेवर अपराधियों से दूर रखकर उन्हें पारिवारिक माहौल उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। जिससे ये बड़े होकर आपराधिक जगत् के रे वातावरण से दूर रहकर समाज में सम्मानित जीवन व्यतीत कर

किशोर अथवा बालक इस अधिनियम अन्तर्गत किशोर या बालक शब्द से आराय ऐसे व्यक्ति से है जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी न की हो। यह परिभाषा 18 वर्ष की आयु से कम किशोर अवस्था के सभी व्यक्तियों के प्रति लागू होती है चाहे वह लड़का हो या लड़की।

इस अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके अन्तर्गत अपराध कारित करने वाले किशोर को अपराधी या अपचारी किशोर संबोधित न करते हुए विधि विरोधी किशोर कहा गया है। विधेयक में प्रमुख संशोधन-

• गंभीर अपराध गंभीर अपराधों में वे अपराध भी शामिल होंगे जिनके लिये सात वर्ष से अधिक के कारावास का प्रावधान है तथा न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं की गई है।


प्रोटीन एवं 80 कैलोरी गर्भवती/धात्री माताओं व किशोरी बालिकाओं को प्रतिदिन 18-20 ग्राम प्रोटीन एवं 000 कैलोरी के बराबर रोषण आहार दिए जाने का प्रावधान है।

आगनबाड़ी केंद्रों में 06 माह से 03 वर्ष तक के बच्ची गर्भवती/धात्री माताओं को सप्ताह में अलग अलग दिवसों में मे गोवा मर्फी मिमिक्स, आटा बेसन लडडू मिक्स हलुआ मिमिक्स, बाल आहार मिक्स एवं खिचड़ी दी जाती है।

3 वर्ष से 06 वर्ष तक के बच्चों को सांझा चूल्हा के माध्यम से सुबह का मारता एवं दोपहर का भोजन सप्ताह के अलग अलग दिनों के मेनू अनुसार दिया जाता है। नाश्ते में मीठी लगी पोष्टिक खिचड़ी, दलिया, उपमा दिया जाता है। दोपहर के भोजन में रोटी, सब्जी, दाल, वीर पुसी गवाही आलू टमाटर की सब्जी पुलाव कढ़ी पकोड़ा, चावल सामर दिया जाता है।

06 माह से वर्ष तक के अति कम वजन के बच्चों को बर्ड मील के रूप में सप्ताह में तीन दिन दोपहर के भोजन अनुसार एवं सोन दिन मारते मैनू अनुसार दिए जाने का प्रावधान है।

केंदों में बच्चों के पोषण स्तर में सुधार लाने के लिए मध्यप्रदेश में सभी आगनवारी/उप आंगनबाड़ी केंद्रों में मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम अंतर्गत 03 से 06 वर्ष तक के बच्चों को मीठा सुगंधित स्किम्ड मिल्क सप्ताह के तीन दिन दिया जाता है। आगनबाड़ी केंद्रों में पूरक पोषण आहार की व्यवस्था हेतु व्यय की जाने कली राशि से 50 प्रतिशत की राशि भारत सरकार महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा उपलब्ध कराई जाती है।

किशोर न्याय बालकों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम 2015

किसी भी राष्ट्र का निर्माण और राष्ट्र का भविष्य उस राष्ट्र के बच्चों पर निर्भर होता है यदि बच्चों के भविष्य को सुरक्षित नहीं किया गया तब राष्ट्र का भविष्य भी असुरक्षित हो जाएगा। समय और परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती चली जा रही है जो कम आयु में ही अपराध कर बैठते हैं।

कानून की भाषा में अपराध की ओर प्रवृत्त बालकों को विधि विरोधी किशोर कहा गया है। भारत में ऐसे किशोरों के लिए ककिशोर न्याय बालको को देखरेख और संरक्षण अधिनियम 2015 पारित किया गया है। इस अधिनियम के सन् 2021 में संशोधन किया गया।

लोकसभा में किशोर न्याय बच्चों की देखभाल और संरक्षण संशोधन विधेयक 2021 पारित किया गया है जो बच्चों की सुरक्षा और उन्हें गोद लेने के प्रावधानों को मजबूत करने और कारगर बनाने का प्रयास करता है। यह वियक किशोर न्याय बच्चों की देखभाल और संरक्षण अधिनियम 2015 Juvenile

Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015) में संशोधन करता है। इस विधेयक

में उन बच्चों से संबंधित प्रावधान है जिन्होंने कानूनन कोई अपराध किया हो और जिन्हें देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता हो। विधेयक में बाल संरक्षण को मजबूती प्रदान करने के उपाय किये गए हैं। इस नए अधिनियम का प्रमुख उद्देश्य विधि विरोधी किशोरों की देखभाल और संरक्षण की व्यवस्था एवं उनके सर्वोत्तम हित में अधिनियम के तहत विभिन्न संस्थानों के माध्यम से उनके पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित करना है।

ऐसे बालकों को जेल कचहरी आदि के वातावरण तथा पेशेवर अपराधियों से दूर रखकर उन्हें पारिवारिक माहौल उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। जिससे ये बड़े होकर आपराधिक जगत् के रे वातावरण से दूर रहकर समाज में सम्मानित जीवन व्यतीत कर

किशोर अथवा बालक इस अधिनियम अन्तर्गत किशोर या बालक शब्द से आराय ऐसे व्यक्ति से है जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी न की हो। यह परिभाषा 18 वर्ष की आयु से कम किशोर अवस्था के सभी व्यक्तियों के प्रति लागू होती है चाहे वह लड़का हो या लड़की।

इस अधिनियम की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके अन्तर्गत अपराध कारित करने वाले किशोर को अपराधी या अपचारी किशोर संबोधित न करते हुए विधि विरोधी किशोर कहा गया है। विधेयक में प्रमुख संशोधन-

• गंभीर अपराध गंभीर अपराधों में वे अपराध भी शामिल होंगे जिनके लिये सात वर्ष से अधिक के कारावास का प्रावधान है तथा न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं की गई है।


समीर अपराध वे हैं जिनके लिये भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य कानून के तहत सजा तथा तीन से सात वर्ष के कारावास का प्रावधान है। किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) उस बच्चे की छानबीन करेगा जिस पर

गंभीर अपराध का आरोप है। गैर संज्ञेय अपराध –एक्ट में प्रावधान है कि जिस अपराध के लिये तीन से सात वर्ष की जेल की सजा होए वह संज्ञेय: जिसमें वॉरंट के बिना गिरफ्तारी की अनुमति होती है और गैर जमानती होगा।

विधेयक इसमें संशोधन करता है और प्रावधान करता है कि ऐसे अपराध गैरह • गोद लेना / एडॉप्शन

एक्ट में भारत और किसी दूसरे देश के संभावित दत्तक (एण्टिय) माता पिता द्वारा बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया निर्दिष्ट की गई है। समावित दसक माता पिता द्वारा बच्चे को स्वीकार करने के बाद एडॉप्शन एजेंसी सिविल अदालत में एडॉप्शन के आदेश प्राप्त करने के लिये आवेदन करती है।

अदालत के आदेश से यह स्थापित होता है कि बच्चा एडाप्ट माता पिता का है। बिल में प्रावधान किया गया है कि अदालत के स्थान पर जिला मजिस्ट्रेट (अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट सहित) एडॉप्शन का आदेश जारी करेगा।

• अपील- विधेयक में प्रावधान किया गया है कि जिला मजिस्ट्रेट द्वारा पारित गोद लेने एडॉप्शन के आदेश से असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति इस तरह के आदेश के पारित होने की तारीख से 30 दिनों के भीतर संभागीय आयुक्त के समक्ष अपील दायर कर सकता है। इस प्रकार की अपीलों को दायर करने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर निपटाया जाना चाहिये।

जिला मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त कार्यों में शामिल है: (1) जिला बाल संरक्षण इकाई की निगरानी करना (ii) बाल कल्याण समिति के कामकाज की अमासिक समीक्षा करना। • अधिकृत न्यायालय अधिनियम के तहत सभी अपराधी को बाल न्यायालय के अंतर्गत शामिल

किया जाए। लैगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012

कानून बच्चों के साथ होने वाले सभी प्रकार के यौन पोषण व यौन व्यवहार कानूनी अपराध है। इस कानून में बनाई गई सभी प्रक्रियाएं संवेदनषीलता को अहमियत देता है ताकि बच्चे पर किसी भी

प्रकार का विपरीत असर न पड़े। • किस तरह के अपराध बाल यौन शोषण की श्रेणी में आते है।

(1) बच्चों के यौन अंगों में प्रवेश से जुड़े अपराध ( 2 ) शारीरिक संपर्क से जुड़े अपराध ( 3 ) बिना शारीरिक संपर्क बनाए यौन उत्पीड़न ( 4 ) बच्चों को यौन कार्यों में शामिल करना, जैसे उनकी फोटो उतारना, उसे बांटना और उससे फायदे उठाना (5) अपराध करने के लिए उकसाना या प्रयास करना(6)बच्चों के प्रति कानूनी जिम्मेदारी नहीं निभाने से जुड़े अपराध( 7 ) फौजदारी कानून से जुड़े अपराध

• कानून किस के लिए 18 साल व कम उम्र के सभी बच्चे इस कानून की मदद ले सकते है चाहे वे किसी भी जेर व लिंग के हो

● किसकी सहायता ली जा सकती है विशेष किशोर पुलिस यूनिट, बच्चा के विश्वासी व्यक्ति या सहायक व्यक्ति, विशेष सरकारी वकील, विशेष शिक्षक दुभाषिया बाल कल्याण समिति (सी. डब्ल्यू सी.). राष्ट्रीय और राज्य बाल संरक्षण आयोग आंगनबाडी कार्यकर्ता सरपंच बाल विकास परियोजना अधिकारी (CDPO) पुलिस संरक्षण अधिकारी महिला समूह महिला हेल्पलाईन बाल विवाह रोकथाम अधिकारी अल्पावास गृह जिला अस्पताल

क्या सहायता ले सकते है शिकायत कर सकते हैं सलाह ले सकते है. सुरक्षा की मांग कर सकते है, योजना की जानकारी ले

सकते हैं, कानून की जानकारी ले सकते है कानूनी प्रक्रिया की मदद ले सकते है मुसीबत में सहयोग


ले सकते है, कम समय के लिए रुकने का सहारा ले सकते हैं. मुफ्त इलाज की मांग कर सकते है।

• सजा का प्रावधान अपराध के प्रकार व गंभीरता के आधार पर इस कानून में सजा का प्रावधान है

जी साल से उम्र आर्थिक दंड हो सकता है।

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें

महिला व बाल विकास विभाग व विशेष पुलिस यूनिट

बच्चों के अधिकार

बाल अधिकार की आवश्यकता

कई बार मन में प्रश्न उठता है कि बच्चों के लिए अलग से बाल अधिकारों के प्रावधान की क्या आवश्यकता है। क्या मानवाधिकार बालकों के लिए पर्याप्त नहीं है पर समाज में फैली वस्तविकता ते हम सभी परिचित है, ऐसा देखा गया है कि आए दिन 5 से 6 साल की बच्चियों के साथ रेप जैसे घिनौने अपराध की खबरे 10 साल तक के बच्चों को होटलों की मट्टियों पर देखकर लगता है कि आज भी बच्चों की सुरक्षा पर समाज में जागरुकता का आभव है।

बाल अधिकार और संरक्षण आयोग भी इसीलिए बनाए गये है ताकि बालकों के बचपन को तबाह होने से रोका जाए। बाल अधिकारों के तहत जीवन का अधिकार पहचान, भोजन, पोषण और स्वास्थ्य, विकास, शिक्षा और मनोरंजन नाम और राष्ट्रीयता परिवार और पारिवारिक पर्यावरण, उपेक्षा से सुरक्षा, बदसलूकी, दुर्व्यवहारए बच्चों का गैर कानूनी व्यापार इत्यादि को सम्मिलित किया गया है।

बाल अधिकार बालकों को श्रम में लगाने तथा उनके साथ अमानवीय दुर्व्यवहार आदि का खंडन करता है. ये बालक को बेहतर बालपन शिक्षा व विकास को सुलभ अधिकार प्रदान करता है, घरलू हिंसा व बाल तस्करी की समाप्त कर बच्चों को अच्छी शिक्षा, मनोरंजन, खुशी देने के प्रयत्न करता है।

बाल अधिकार क्या है

बाल अधिकार संरक्षण आयोग कानून 2005 के अनुसार बाल अधिकार में बालक-बालिकाओं के थे समस्त अधिकार शामिल है जो 20 नवम्बर 1989 को संयुक्त राष्ट्र संघ के बाल अधिकार अधिवेशन द्वारा स्वीकार किये गये थे तथा जिन पर भारत सरकार ने 11 दिसंबर 1992 में सहमती प्रदान की थी। बाल अधिकारों के उद्देश्य

18 वर्ष से कम आयु के बालक के समुचित विकास तथा उसके बाधक तत्वों के सम्बन्ध में अनभिज्ञ अभिभावकों को अवगत कराना।

• निम्न आर्थिक स्तर के बालक के लिए नई नीति तथा सुनहरे भविष्य के लिए राह आसान बनाना।

• बालकों के प्रति बढ़ती हिंसा को समाप्त कर उन्हें सामाजिक व विधिक स्तर पर गैर कानूनी घोषित करना

विभिन्न देशों तथा राज्यों में बालकों की स्थिति के सम्बन्ध में शोध करना

बालकों के प्रति बढ़ते यौन अपराधों को रोकने के लिए जागरूकता फैलाना

बाल अधिकार कौन कौन से है

• प्रत्येक बालक को जीने का अधिकार है।

• अभिभावकों को अपने बालक को अच्छा खिलाने व उसकी देखभाल का अधिकार देता है।

• प्रत्येक बालक बालिका को अपने परिवार के साथ रहने का अधिकार है

• उन्हें समस्त प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने का अधिकार हैं। • शिक्षा पाने का अधिकार

• अपनी बात को रखने का अधिकार

• अपनी पसंद व मांग को माता पिता के समक्ष रखने का अधिकार ● स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छा के खेल तथा गतिविधियों में सम्मिलित होने का अधिकार

• बच्चों को सभा करने या संगठन बनाने का अधिकार है
• अपने प्रति हो रहे आर्थिक सामाजिक शोषण के विरुद्ध आवाज उठा सकते हैं शिकायत कर

सकते है

• बालक को अपने निजी जीवन की बाते व्यवहार आदि में बाहरी हस्तक्षेप से रक्षा का अधिकार है

• किसी आपदा के समय पहले मदद पाने का अधिकार • अपने अधिकार व भलाई के लिए सुखा का अधिकार बाल अधिकारी में आते है संयुक्त राष्ट्र संघ बाल अधिकार समझौते के तहत बधकों को दिए गये अधिकारी को चार प्रकार की

अधिकारों में वर्गीकृत किया गया है • जीने का अधिकार. बच्चों के जीने का अधिकार उनके जन्म के पूर्व ही आरम्भ हो जाता है जीने के अधिकार में दुनिया में आने का अधिकार न्यूनतम स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करने भोजन

आवास वस्त्र पाने का अधिकार तथा सम्मान के साथ जीने का अधिकार शामिल है। • विकास का अधिकार- बच्चों को भावनात्मक मानसिक तथा शारीरिक सभी प्रकार के विकास का अधिकार हैवनात्मक विकास तब संभव होता है।

जब अभिभावक संरक्षक समाज विद्यालय और सरकार सभी बच्चों की सही देखभाल कर और प्रेम दे मानसिक विकास उचित शिक्षा और सीखने द्वारा तथा शारीरिक विकास मनोरंजन खेलकूद तथा पोषण द्वारा संभव होता है।

• संरक्षण का अधिकार बच्चे को घर तथा अन्यत्र उपेक्षाए शोषण हिंसा तथा उत्पीड़न से संरक्षण का अधिकार है। विकलांग बच्चे विशेष संरक्षण के पात्र है। प्राकृतिक आपदा की स्थिति

में बच्चों को सबसे पहले सुरक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। भागीदारी का अधिकार- बच्चों को ऐसे फैसले या विषय में भागीदारी करने का अधिकार है जो •

उसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है बच्चों की आयु व परिपक्वता के अनुसार इस भागीदारी में अनेक स्तर हो सकते हैं। बालकों की उपेक्षा करने से समाज को ही नुकसान है भविष्य में सुखद समाज के लिए बच्चों के अधिकारों की रक्षा करना अति आवश्यक है। इस कारण प्रगतिशील समाज बालकों के

विकास एवं उनके अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा जागरुक रहता संयुक्त राष्ट्र संघ एवं भारत

सरकार ने बच्चों के अधिकार एवं नीतियों का निर्धारण किया है।

किशोरियों के कानूनी अधिकार

किशोरियों को उनके अधिकारों और विभिन्न कानूनों के बारे में जानकारी प्रदान करना जो उनके संरक्षण

के लिए कार्यान्वित किए जा रहे हैं

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

• हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति को संरक्षित रखने का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को, धर्म, मत जाति अथवा भाषा के आधार पर बिना किसी भेदभाव के किसी भी सरकारी अथवा सरकार समर्थित शिक्षा संस्थान में दाखिला लेने का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है।

हमारा संविधान, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी इच्छा के शैक्षिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है।

• हमारा संविधान 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग में सभी बच्चों के लिए निःशुलक और अनिवार्य

प्रारम्भिक शिक्षा का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है।

समानता का अधिकार • हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि कानून में सभी नागरिक समान हैं। चाहे उनका धर्म, मत, जाति, लिंग अथवा जन्म स्थान कुछ भी हो।

• हमारा संविधान, सभी नागरिकों को सरकार के अधीन रोजगार में समान अवसर का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है।

आजादी का अधिकार हमारा संविधान आजादी के निम्नलिखित अधिकार प्रदान करता है


भाषण और अभिव्यक्ति की अधिकार

शान्तिपूर्वक और बिना शस्त्रों के इकट्ठा होने का अधिकार

• एसोसिएशन और यूनियन बनाने का अधिकार

• संपूर्ण भारत में आजादी के साथ घूमने का अधिकार

• कोई भी पेशा या व्यवसायाने या कोई भी व्यापार और व्यवसाय आयोजित करने का अधिकार

जीवन और व्यक्तिगत आजादी का अधिकार

• हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को गिरफ्तारी और नजरबंदी से संरक्षण का मूलभूत अधिकार प्रदान करता है।

• मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन करने के लिए आप उच्चतम नायालय अथवा उच्च न्यायालय में याचिका फाइल कर सकते हैं। ● भारत का प्रत्येक नागरिक, जिसकी उम्र 18 वर्ष अथवा उससे अधिक है, चुनावों में मतदान कार

सकता है।

• यदि आपका नाम मतदाता के रूप में पंजीकृत नहीं है अथवा आप नए स्थान पर चले गए हैं तो

आप अपना नाम पंजीकृत कराने के लिए मतदाता पंजीकरण अधिकारी को आवेदन कर सकते

बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम वर्ष 2006

बाल विवाह यह विवाह है जहाँ या तो लड़की 18 वर्ष से कम आयु की हो अथवा लडका 21 वर्ष से कम आयु का हो। कोई व्यक्ति जिसकी आयु 21 वर्ष से अधिक है और जो 18 वर्ष से कम आयु की लड़की से विवाह करता है. दो वर्ष तक की सजा और अथवा एक लाख रुपये तक के जुर्माने के साथ कानून अन्तर्गत दण्डनीय है।

इसके लिए व्यक्ति के खिलाफ पुलिस में एफ आई आर दर्ज कराई जा सकती है। यदि लड़की के माता-पिता अथवा अभिनायकों ने ऐसा विवाह आयोजित किया है अथवा अनुमति दी है, अथवा उसे रोकने में असमर्थ रहे हैं और यदि अन्य व्यक्ति के किसी पुरोहित ने ऐसा विवाह सम्पन्न कराने में सहायता प्रदान की है, तो उन्हें भी दण्ड दिया जा सकता है। ऐसे विवाह में भाग लेने वाले किसी अन्य व्यक्ति को भी दण्ड दिया जा सकता है।

एक लड़की विवाह के समय ऊपर वर्णित आयु से छोटी है और यदि वह चाहे तो परिवार न्यायालय (अथवा जिलान्यायालय) से अपने विवाह को अवैध घोषित करने के लिए कह सकती है, जिसका अर्थ है कि उसका विवाह कभी नहीं हुआ। यदि वह फिर भी 18 वर्ष से कम हो, वह ऐसा अपने माता-पिता अथवा अभिभावकों के माध्यम से भी करा सकती हैं।

ऐसा वह 20 वर्ष की आयु होने तक करा सकती है। यदि वह ऐसा करती है तो उसे अपने लिए और किसी बच्चे के लिए कभी उस व्यक्ति से जिससे उसने शादी की थी अथवा उसके माता-पिता से यदि उसकी आयु 18 वर्ष से कम है, मरण पोषण भत्ता पाने का अधिकार होगा। कोई भी बच्चा, जो पैदा हुआ है, उसे विवाह से पैदा हुए बैच बच्चे के रूप में समझा जाएगा।

कोई भी व्यक्ति बाल विवाह को रोकने के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के जिला मजिस्ट्रेट (अथवा मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट मेट्रो पुलिस के मामले में) को शिकायत कर सकता है। राज्य सरकारों ने इस प्रयोजनार्थ बाल विवाह निवारक अधिकारी नियुक्त किए है और उनसे भी सम्पर्क किया जा सकता है।

बाल श्रम अधिनियम

14 वर्ष से कम आयु के बच्चों की नियुक्ति 13 व्यवसायों में और 57 प्रक्रियाओं में निषिद्ध है तथा निषिद्ध व्यवसायों / प्रक्रियाओं में बच्चों को नियुक्त करने वाले व्यक्ति को कानून द्वारा तीन महीने से एक वर्ष तक की सजा और / या 10,000/- रुपये से 20,000/- रुपये के बीच जुर्माने का दण्ड दिया जा सकता है।

जिन रोजगारों में बच्चों की नियुक्ति निषिद्ध नहीं है उनकी कार्य स्थितियों उन्हें संरक्षण प्रदान करने के लिए कानून के अन्तर्गत विनियमित किया जाता है। कोई बच्चा एक दिन में छः घन्टे से ज्यादा काम नहीं कर सकता. कार्य के लिए प्रतीक्षा में बिताए गए समय सहित तथा उसे तीन घण्ट तक कार्य करने के बाद कम से कम एक घण्टे का विश्राम दिया जाना चाहिए। कोई भी बच्चा शाम को


7 बजे और सुबह 8 बजे के बीच कार्य नहीं कर सकता नियुक्त प्रत्येक बच्चे को प्रति सप्ताह एक दिन का अवकाश दिया जाना चाहिए इन शर्तों का पालन करने में असमर्थ रहने पर एक महीने की सजा और अथवा 10.000 /- रुपये तक का जुर्माने का दिया जा सकता है।

किसी अथवा पुलिस अथवा किसी श्रम निरीक्षक द्वारा न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (अथवा मेट्रोपॉलिटन मजीस्ट्रेट, मेट्रोपुलिस के मामले में) के न्यायालय में शिकायत दर्ज कराए जाने के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है। बच्चों को ऐसे खतरनाक व्यवसायों में नियत नहीं किया जाना चाहिए जिनसे बच्चे के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य को खतरा हो।

अनैतिक व्यापार (निवारक) अधिनियम

• इस कानून के अन्तर्गत, किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए प्राप्त करना, अभिप्रेरित करना, लेना, भर्ती करना, परिवहन,हस्तान्तरण करना, पनाह देना अथवा प्राप्त करना दण्डनीय है।

• कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति के बारे में जिससे मजिस्ट्रेट (जिसे जिला कलेक्टर अच्चवा उपायुक्त भी कहा जाता है) अथवा प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट को (मेट्रीपुलिस के मामले में एक मोट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट) सूचित कर सकता है। मजिस्ट्रेट को पुलिस अधिकारी को ऐसे वेश्यालय में प्रवेश करने के लिए निर्देश देने और ऐसे व्यक्ति को हटाने और उसे उसके समक्ष प्रस्तुत करने की शक्ति प्राप्त है जिसके बाद मजिस्ट्रेट उसकी सुरक्षित अभिरक्षा के लिए आदेश दे सकता है।

घरेलू हिंसा अधिनियम

• यह कानून, घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को संरक्षण प्रदान करने और राहत प्रदान करने के लिए है। ऐसी कोई भी महिला प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (अथवा मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, मेट्रोपुलिस के मामले में) के न्यायालय में शिकायत दर्ज कर सकती है। कानून निम्नलिखित के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है:

• नुकसान की धमकी अथवा वास्तविक नुकसान, घोट, अथवा उसके स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन, अंग,

मानसिक अथवा शारीरिक कल्याण लिप्त खतरा, शारीरिक सेक्सुअल, मौखिक, गावात्मक अथवा

आर्थिक दुरुपयोग सहित, और वास्तविक उत्पीडन, नुकसान, चोट अथवा उसे अथवा उसके

रिश्तेदारों को दहेज अथवा अन्य सम्पत्ति की मांग पूरी करने के लिए बाध्य करने का खतरा । • उपरोक्त, उसे बदनाम, गालियां देने अथवा अपमान अथवा नीचा दिखाने के विरुद्ध, विशेष रूप से बच्चा पैदा न कर सकने अथवा लड़का पैदा न करने के लिए संरक्षण प्रदान करता है।

इसके अन्तर्गत किसी व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाने के लिए विरुद्ध भी, जिसमें उसकी रुचि हो, संरक्षण शामिल है। इसके अन्तर्गत, आवश्यक संसाधन छीनने अथवा देने अथवा उनके उपयोग से रोकने के विरुद्ध संरक्षण सम्मलिति है जिनमें घरेलू जरूरत की चीजें, स्त्रीधन, सम्पत्ति, मकान किराए और भरण-पोषण की अदायगी शामिल है। न्यायालय निम्नलिखित के संबंध में आदेश दे सकता है:

• शिकायत कर्ता को जिसके विरुद्ध शिकायत की गई है, संरक्षण प्रदान करना

घर में अथवा रिहायश के ऐसे ही स्थान पर लगातार रहना सुनिश्चित करना,

• उसके खुद के लिए तथा उसके बच्चे के भरण-पोषण, मेडिकल खर्च, आय की हानि, गुम हुई अथवा क्षतिग्रस्त सम्पत्ति की क्षतिपूर्ति के लिए उसे राशि की अदायगी • उसे बच्चों की अस्थाई अभिरक्षा प्रदान करना।

• विवाहित महिलाओं के अलावा, जो महिलाएं विवाह की तरह के संबंध में रही हैं. संरक्षण की मांग कर सकती हैं। विवाहित महिलाएं पति के किसी रिश्तेदार के विरुद्ध भी संरक्षण की मांग कर सकती है।

दहेज निषेध अधिनियम

• दहेज देना और लेना कानून के अन्र्गत दण्डनीय है। • दहेज की मांग करना अथवा देने लेने में मदद करना भी कानून के अन्तर्गत दण्डनीय है।
• सजा के तात पाच वर्ष तक की जेल और 15,000/- रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।

• दहेज की मानकर को की जा सकती है आहे विवाह सम्पन्न नहीं हुआ हो।

गर्म-पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम ● का निर्धारण कानून के अन्तर्गत है जिसके लिए तीन वर्ष तक

और 100.000/-रुपये का जुर्माना किया जा सकता है।

• परिवार का कोई सदस्य पिता और सहित किए जा सकते हैं

यदि कानून की कोशिश करें ● कलिंग निर्धारण रिपोर्ट लीक करे उसे भी दण्डित किया जा सकता है। • कानून का न करने के लिए प्रत्येक राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने एक उपयुक्त प्राधिकारी”

नियुक्त किया है जो • इस कानून को तोड़ने वाले व्यक्तियों के खिलाफ न्यायालयों में शिकायत फाइल कर सकता है। कोई अन्य भी केन्यायिक मजिस्ट्रेट (अथवा मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट,

पुलिस के मामले में) के न्यायालय में शिकायत • फाइल कर सकता है। तथापि ऐसा करने से पहले उसे ऐसी शिकायत फाइल करने के अपने इरादे का न्यायालय के पास शिकायत फाइल करने से कम से कम 30 दिन पहले उपयुक्त प्राधिकारी को एक लिखित नोटिस देना चाहिए।

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 46 में उप धारा 4 अपवादात्मक परिस्थितियों को छोड़कर किसी भी स्त्री को सूर्य अस्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जाएगा तथा जहाँ ऐसी अपवादात्मक परिस्थितिया हो।

महिला पुलिस अधिकारी एक लिखित शिकायत करके, प्रथम श्रेणी के उस न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति प्राप्त करेगी। जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत अपराध किया गया है अथवा गिरफ्तारी की जानी है। दण्ड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत गिरफ्तारी के संबंध में कानून

महिला को पुलिस द्वारा सामान्यतः सूर्यास्त और सूर्योदय के बीच गिरफ्तार नहीं किया जा

सकता। यदि पुलिस इस अवधि के दौरान किसी महिला को गिरफ्तार करना चाहे तो उसे प्रथम श्रेणी

के न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति प्राप्त करनी होगी और गिरफ्तारी केवल महिला पुलिस अधिकारी

द्वारा ही की जा सकती है।

Scroll to Top