गेहूं



 
 मध्य प्रदेश कम लागत से अधिक उत्पादन लेने हेतु नवीनतम  गेहूँ उत्पादन तकनीक 
 राष्ट्रीय तथा प्रादेशिक परिदृश्य-   क्षेत्रफल (मि.हे.) उत्पादन (मि.टन) उत्पादकता (क्विं/हे.) भारत 29.7 93.5 31.5 मध्य प्रदेश 5.3 13.3 5.3 प्रदेश की भागीदार   18% 14% 18% 
 प्रदेश में गेहूँ  उत्पादकता से सम्बन्धित समस्याये  
 (अ) असिंचित / सीमित सिंचाई क्षेत्रों से सम्बन्धित- विगत सात वर्षों का तापक्रम औसत विवरण निम्न हैं। 
          निम्न तापक्रम में वृद्धि 2 – 30 सें 
          उच्च तापक्रम में वृद्धि 3 – 50 सें
नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक तापक्रम में अधिक उतार – चढ़ाव वास्तविक उच्च ताप प्रतिरोधि किस्मों का अभाव जो बदलते परिवेश में सामंजस्य कर सके अंकुरण के समय नमी का क्षरण तथा दाना भरते समय उच्च तापक्रम असिंचित क्षेत्रों में रूट राट (Root Rot) (जड़ सड़न) की समस्या सोयाबीन – गेहूँ फसल प्रणाली में असिंचित/अर्धसिंचित गेहूँ  की देरी से बोवाई (प्रचलित किस्में लम्बी अवधि की है) प्रचलित किस्मों की कम ‘‘जल उपयोग‘‘ तथा ‘‘पोषक तत्व उपयोग‘‘ क्षमता (ब.) सिंचित क्षेत्रों से सम्बन्धित रबी मौसम में ठण्ड की अवधि कम Short winter अनिश्चित मौसम कल्ले निकलने के समय तथा परागण के समय तापक्रम में वृद्धि जिससे समय से पूर्व फसल में परिपक्वता आती है परिणाम स्वरूप दानों का भराव कम उच्च तापक्रम के कारण भूमि से वाष्पन अधिक जिससे सिंचाई की संख्या तथा सिंचाई के पानी की मात्रा में वृद्धि कमाण्ड क्षेत्रों में भी समय पर सिंचाई के लिए पानी की अनुपलब्धता सिंचित क्षेत्रों में Seepage  तथा जल भराव की समस्या बहु फसल प्रणाली के कारण देरी से बुवाई का अधिक रकबा
 
 प्रदेश में गेहूँ की काश्त का बदलता स्वरूप  
 (अ)  पूर्व के वर्षों में असिंचित रकबा अधिक अब पूर्ण रूप से असिंचित रकबे में उल्लेखनीय कमी संचित नमी (Conserved Moisture)  में खेती लगभग समाप्त स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति ने इस परिदृष्य को बदला लगभग पूरे प्रदेश में कम से कम एक सिंचाई का उपयोग अतः पूर्णतः असिंचित रकबा लगभग समाप्त (ब) सिंचित गेहूँ क्षेत्र में वास्तविक परिदृष्टि में सीमित सिंचाई उपलब्धता  सिंचित शब्द से आभास होता है कि 5 -6 सिंचाई की उपलब्धता है  वास्तविक रूप में पूरे प्रदेश में 5 – 6 सिंचाई अनुपलब्धता  यहाँ तक कि समय से बोये गये गेहूँ में भी अधिकांश क्षेत्रों में मात्र 3 सिंचाई उपलब्धता  देरी से बुवाई की स्थिति में मात्र दो सिंचाई उपलब्धता 
 उत्पादन तकनीक 
 खेत की तैयारी ग्रीष्मकालीन जुताईतीन वर्षों में एक बार गहरी जुताईकाली भारी मिट्टी को भुरभुरा (Fine Tilth) बनाना कठिनरोटावेटर का प्रयोग उपयुक्त डिस्क हैरो का भी प्रयोग उपयुक्त बुवाई का उचित समयअसिंचित: मध्य अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तकअर्धसिंचित: नवम्बर माह का प्रथम पखवाड़ासिंचित (समय से): नवम्बर माह का द्वितीय पखवाड़ासिंचित (देरी से): दिसंबर माह का द्वितीय सप्ताह से 
 उपयुक्त किस्मों का चयन  
 (अ) मालवा अंचल: रतलाम, मन्दसौर,इन्दौर,उज्जैन,शाजापुर,राजगढ़,सीहोर,धार,देवास तथा गुना का दक्षिणी भाग 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 750 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: भारी काली मिट्टी
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 17, 
जे.डब्ल्यू. 3269, 
जे.डब्ल्यू. 3288, 
एच.आई. 1500, 
एच.आई. 1531, 
एच.डी. 4672 (कठिया) जे.डब्ल्यू. 1201, 
जे.डब्ल्यू. 322, 
जे.डब्ल्यू. 273, 
एच.आई. 1544, 
एच.आई. 8498 (कठिया), 
एम.पी.ओ. 1215 जे.डब्ल्यू. 1203, 
एम.पी. 4010, 
एच.डी. 2864, 
एच.आई. 1454 (ब) निमाड अंचल: खण्डवा, खरगोन, धार एवं झाबुआ का भाग 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 500 से 1000 मि.मी. 
मिट्टी: हल्की काली मिट्टी
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 3020, 
जे.डब्ल्यू. 3173, 
एच.आई. 1500, 
जे.डब्ल्यू. 3269 जे.डब्ल्यू. 1142, 
जे.डब्ल्यू. 1201, 
जी.डब्ल्यू. 366, 
एच.आई. 1418 इस क्षेत्र में देरी से बुआई से बचें समय से बुआई को प्राथमिकता क्योंकि पकने के समय पानी की कमी। 
किस्में: जे.डब्ल्यू. 1202, 
एच.आई. 1454 (स) विन्ध्य पठार: रायसेन, विदिशा, सागर, गुना का भाग 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1120 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: मध्य से भारी काली जमीन
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 17, 
जे.डब्ल्यू. 3173, 
जे.डब्ल्यू. 3211, 
जे.डब्ल्यू. 3288, 
एच.आई. 1531, 
एच.आई. 8627(कठिया) जे.डब्ल्यू. 1142, 
जे.डब्ल्यू. 1201, 
एच.आई. 1544, 
जी.डब्ल्यू. 273, 
जे.डब्ल्यू. 1106 (कठिया), 
एच.आई. 8498 (कठिया), 
एम.पी.ओ. 1215 (कठिया), जे.डब्ल्यू. 1202, 
जे.डब्ल्यू. 1203, 
एम.पी. 4010, 
एच.डी. 2864, 
डी.एल. 788- 2 (द) नर्मदा घाटी: जबलपुर, नरसिंहपुर, होषंगाबाद, हरदा 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1000 से 1500 मि.मी.
मिट्टी: भारी काली एवं जलोढ मिट्टी
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 17, 
जे.डब्ल्यू. 3288, 
एच.आई. 1531, 
जे.डब्ल्यू. 3211,
एच.डी. 4672 (कठिया) जे.डब्ल्यू. 1142, 
जी.डब्ल्यू. 322, जे.डब्ल्यू. 1201, एच.आई. 1544, जे.डब्ल्यू. 1106, एच.आई. 8498, जे.डब्ल्यू. 1215 जे.डब्ल्यू. 1202, 
जे.डब्ल्यू. 1203, 
एम.पी. 4010, 
एच.डी. 2932, 
  (य) बैनगंगा घाटी:  बालाघाट एवं सिवनी 
क्षेत्र की औसत वर्षा:  1250मि.मी.
मिट्टी:  जलोढ मिट्टी
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 3269, 
जे.डब्ल्यू. 3211, 
जे.डब्ल्यू. 3288,
एच.आई. 1544, जे.डब्ल्यू. 1201, 
जी.डब्ल्यू. 366,
एच.आई. 1544, 
राज 3067 जे.डब्ल्यू. 1202, 
एच.डी. 2932, 
डी.एल. 788- 2
  (र) हवेली क्षेत्र: रीवा, जबलपुर का भाग, नरसिंहपुर का भाग 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1000 से 1375 मि.मी.
मिट्टी: हल्की कंकड़युक्त मिट्टी 
वर्षा के पानी को बंधान के द्वारा खेत में रोका जाता है।
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 3020, 
जे.डब्ल्यू. 3173, 
जे.डब्ल्यू. 3269,
जे.डब्ल्यू. 17,
एच.आई. 1500, जे.डब्ल्यू. 1142, 
जे.डब्ल्यू. 1201, 
जे.डब्ल्यू. 1106,
जी.डब्ल्यू. 322, 
एच.आई. 1544, जे.डब्ल्यू. 1202, 
जे.डब्ल्यू. 1203, 
एच.डी. 2864, 
एच.डी. 2932, 
  ल. सतपुड़ा पठार: छिंदवाड़ा एवं बैतूल 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1000 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: हल्की कंकड़युक्त मिट्टी
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 17, 
जे.डब्ल्यू. 3173, 
जे.डब्ल्यू. 3211,
जे.डब्ल्यू. 3288,
एच.आई. 1531, एच.आई. 1418,
जे.डब्ल्यू. 1201, 
जे.डब्ल्यू. 1215,
जी.डब्ल्यू. 366, एच.डी. 2864, 
एम.पी. 4010, 
जे.डब्ल्यू. 1202, 
जे.डब्ल्यू. 1203,
  (व) गिर्द क्षेत्र: ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना एवं दतिया का भाग 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 750 से 1000 मि.मी.
मिट्टी: जलोढ़ एवं हल्की संरचना वाली जमीनें
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 3288, 
जे.डब्ल्यू. 3211, 
जे.डब्ल्यू. 17,
एच.आई. 1531, 
जे.डब्ल्यू. 3269,
एच.डी. 4672 एच.आई. 1544,
जी.डब्ल्यू. 273, 
जी.डब्ल्यू. 322, 
जे.डब्ल्यू. 1201, 
जे.डब्ल्यू. 1106,
जे.डब्ल्यू. 1215,
एच.आई. 8498 एम.पी. 4010,
जे.डब्ल्यू. 1203, 
एच.डी. 2932,
एच.डी. 2864
  (ह) बुन्देलखण्ड क्षेत्र: दतिया, शिवपुरी, गुना का भाग टीकमगढ़,छतरपुर एवं पन्ना का भाग 
क्षेत्र की औसत वर्षा: 1120 से 1250 मि.मी.
मिट्टी: लाल एवं काली मिश्रित जमीन
असिंचित/अर्धसिंचित सिंचित(समय से) सिंचित(देरी से) जे.डब्ल्यू. 3288, 
जे.डब्ल्यू. 3211, 
जे.डब्ल्यू. 17,
एच.आई. 1500, 
एच.आई. 153 जे.डब्ल्यू. 1201, 
जी.डब्ल्यू. 366, 
राज 3067,
एम.पी.ओ. 1215,
एच.आई. 8498 एम.पी. 4010,
एच.डी. 2864
 
 
 विशेष : सभी क्षेत्रों में अत्यन्त देरी से बुवाई की स्थिति में किस्में: एच.डी. 2404, एम.पी. 1202   
 जी डब्लू 173 लोक 1 एम पी 4010 एम पी 1202 एम पी 1203 एच डी 2864 मध्य प्रदेश  राज्य वर्ष 2003 से कठिया गेहूँ कृषि निर्यात जोन चिन्हित किया गया है। प्रदेश के गेहू उत्पादन में कठिया किस्मों का 8 से 10 प्रतिशत  योगदान है। 
 उन्नत कठिया किस्म 
 एच डी 8713 (पूसा मंगल) ,एच आई 8381 (मालवश्री) ,एच आई 8498 (मालवशक्ति) ,एच आई 8663 (पोषण),एम पी ओ 1106 (सुधा),एम पी ओ 1215, एच डी 4672(मालवरत्न) ,एच आई 8627 (मालवर्कीति)  जे डब्लू 3211 जे डब्लू 3173 
 बीज की मात्रा  
 औसत रूप में 100 कि.ग्रा./हे. (हजार दाने का वजन 40 ग्राम तक है)हजार दाने का वजन 1 ग्राम बढ़ने पर (40 ग्राम के उपर), 2.5 कि.ग्रा. प्रति/हे. बढ़ाते जायेंअसिंचित / अर्धसिंचित दशा में कतार से कतार की दूरी 25 से.मी.सिंचित (समय से) बुवाई की स्थिति में 23 से.मी.बीज को उर्वरक के साथ न मिलायेमिलाने पर 32 प्रतिशत  अंकुरण की कमी (5 वर्षो के अनुसंधान आँकड़े)क्योंक गेहूँ  की फसल में अनुकूल मौसम होने पर प्रत्येक अवस्था में क्षतिपूर्ति रखने की क्षमता है।अतः बीज कम फर्टिलाइजर ड्रिल का प्रयोग करें। 
 बीजोपचार   
 बुवाई से पूर्व बीजों को उपचारित कर ही बोयें, बीजोपचार के लिये कार्बाक्सिन 75%, wp/कार्बनडाजिम 50% wp 2.5-3.0 ग्राम दवा/किलो बीज के लिए पर्याप्त होती है।टेबूकोनोजाल 1 ग्राम/किलो बीज से उरापचारित करने पर कण्डवा रोग से बचाव होता है।पी एस बी कल्चर 5 ग्राम/किलो बीज से उपचारित करने पर फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ती है। 
 पोषक तत्वों का प्रयोग  
 मिट्टी परीक्षण अवश्य करायेंपरीक्षण के आधार पर नत्रजन, फास्फेट एवं पोटाश की मात्रा का निर्धारण अनुशंसा -प्रदेश में लगभग सभी जिलों में सूक्ष्म तत्वों की कमी25 कि.ग्रा./हे. की दर से जिंक सल्फेट का प्रयोगजिंक सल्फेट का प्रयोग 3 फसल के उपरांत (न की प्रत्येक वर्ष)   नत्रजन फास्फोरस  पोटाष असिंचित 40 20 0 कि.ग्रा./हे. अर्धसिंचित 60 30 15 कि.ग्रा./हे. सिंचित 120 60 30 कि.ग्रा./हे. देरी से 80 40 20 कि.ग्रा./हे. सिंचाई – जहाँ तक सम्भव हो स्प्रिंकलर का उपयोग करें विश्वविद्यालय  से विकसित नयी किस्मों में 5 – 6 सिंचाई की आवश्यकता  नहीं 3 – 4 सिंचाई पर्याप्त (55 – 60क्विंटल उपज) एक सिंचाई: 40 – 45 दिनों बाद दो सिंचाई: किरीट अवस्था, फूल निकलने के बाद तीन सिंचाई: किरीट अवस्था, पूरे कल्ले निकलने पर, दाना बनने के समय चार सिंचाई: किरीट अवस्था, पूरे कल्ले निकलने पर, फूल आने पर, दूधिया अवस्था 
 लागत में कमी (नयी तकनीक) 

मेड़ – नाली पद्धति
बीज एवं उर्वरक में महंगे आदान इन्हें कम करने के लिये मेड़ – नाली पद्धति (FIRB)अपनाये बीज दर 30 – 35 प्रतिशत तक कम किया जा सकता हैउर्वरक की खपत में कमीनींदा नियंत्रण आसानसिंचाई में पानी की कम मात्रा
अधिक गेहूँ  उत्पादन के विभिन्न तकनीकें
जीरो टिलेज तकनीक:- 
धान की पछेती फसल की कटाई के उपरांत खेत में समय पर गेहूँ की बोनी के लिय समय नहीं बचता और खेत ,खाली छोड़ने के अलावा किसान के पास विकल्प नहीं बचता ऐसी दशा में एक विशेष प्रकार से बनायी गयी बीज एवं खाद ड्रिल मशीन से गेहूँ  की बुवाई की जा सकती है। 
जिसमें खेत में जुताई की आवश्यकता नहीं पड़ती धान की कटाई के उपरांत बिना जुताई किए मशीन द्वारा गेहूँ  की सीधी बुवाई करने की विधि को जीरो टिलेज कहा जाता है। इस विधि को अपनाकर गेहूँ  की बुवाई देर से होने पर होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है एवं खेत को तैयारी पर होने वाले खर्च को भी कम किया जा सकता है। 
इस तकनीक को चिकनी मिट्टी के अलावा सभी प्रकार की भूमियों में किया जा सकता है। जीरो टिलेज मशीन साधारण ड्रिल की तरह ही है इसमें  टाइन चाकू की तरह है यह टाइन्स मिट्टी में नाली जैसी आकार की दरार बनाता है जिससे खाद एवं बीज उचित मात्रा एवं गहराई पर पहुँचता है। इस विधि के निम्न लाभ है।:- जीरो टिलेज तकनीक के लाभ :- इस मशीन द्वारा बुवाई करने से 85-90 प्रतिशत इंधन, उर्जा एवं समय की बचत की जा सकती है।इस विधि को अपनाने से खरपतवारों का जमाव कम होता है।इस मशीन के द्वारा 1-1.5 एकड़ भूमि की बुवाई 1 घंटे में की जा सकती हैं यह कम उर्जा की खपत तकनीक है अतः समय से बुवाई की दशा में इससे खेत तैयार करने की लागत 2000-2500 रू. प्रति हेक्टर की बचत होती है।समय से बुवाई एवं 10-15 दिन खेत की तैयारी के समय को बचा कर बुवाई करने से अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।बुवाई शुरू करने से पहले मशीन का अंशशोधन कर ले जिससे खाद एवं बीज की उचित मात्रा डाली जा सके।इस मशीन में सिर्फ दानेदार खाद का ही प्रयोग करें जिससे पाइपों में अवरोध उत्पन्न न हो।मशीन के पीछे पाटा कभी न लगाएँ। फरो इरीगेशन रेज्ड बेड (फर्व) मेड़ पर बुवाई तकनीक:- मेड़ पर बुवाई तकनीक किसानों में प्रचलित कतार में बोनी या छिड़ककर बोनी से सर्वथा भिन्न है इस तकनीक में गेहूँ को ट्रेक्टर चलित रोजर कम ड्रिल से मेड़ों पर दो या तीन कतारों में बीज बोते है। इस तकनीक से खाद एवं बीज की बचत होती है। एवं उत्पादन भी प्रभावित नहीं होता है। इस तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाला अधिक बीज उत्पादन किया जा सकता है। मेड़ पर (फर्व) फसल लेने से लाभ बीज, खाद एवं पानी की मात्रा में कमी एवं बचत, मेडों में संरक्षित नमी लम्बे समय तक फसल को उपलब्ध रहती है एवं पौधों का विकास अच्छा होता है।गेहूँ उत्पादन लागत में कमी।गेहूँ की खेती नालियों एवं मेड़ पर की जाती इससे फसल गिरने की समस्या नहीं होती। मेड पर फसल होने से जड़ों की वृद्धि अच्छी होती है एवं जड़ें गहराई से नमी एवं पोषक तत्व अवशोषित करते हैं।इस विधि से गेहूँ उत्पादन में नालियो का प्रयोग सिंचाई के लिये किया जाता है यही नालियाँ अतिरिक्त पानी की निकासी में भी सहायक होती हैं।दलहनी एवं तिलहनी फसलों की उत्पादकता में वृद्धि होती है।मशीनो द्वारा निंदाई गुड़ाई भी की जा सकती है।अवांछित पौधों को निकालने में आसानी रहती है।
वैष्विक उष्णता
एक शताब्दी के मौसम आँकड़ों से स्पष्ट है कि 2009 – 10 में तापमान (निम्न) 10 सें. अधिक तथा उच्च तापमान 20 सें. अधिक रहाजवाहरलाल नेहरू कृषि  विश्वविद्यालय द्वारा जे.डब्ल्यू. 1142, जे.डव्ल्यू. 1201, जे.डब्ल्यू. 3211 एवं जे.डब्ल्यू. 3288 किस्में विकसित की गई उच्च ताप पर भी अधिक उत्पादन देने की क्षमता है। 
जल तथा पोषक तत्व उपयोग क्षमता
निरंतर सिंचाई जल का भूमि में क्षरण तथा सिंचाई जल की कमी से फसल प्रभावितअधिक ‘‘जल उपयोग क्षमता‘‘ एवं ‘‘पोषक तत्व उपयोग क्षमता‘‘ वाली किस्मों का विकास किया गया किस्म अवस्था (उपज क्विंटल /हे.) असिंचित एक सिंचाई दो सिंचाई जे.डब्ल्यू. 17 18-20 30-32 – जे.डब्ल्यू. 3020 18-20 32-34 40-42 जे.डब्ल्यू. 3173 18-20 34-36 40-42 जे.डब्ल्यू. 3211 18-20 37-39 43-45 जे.डब्ल्यू. 3269 18-20 37-39 43-45  
काले गेरूआ के नये प्रभेद का प्रकोप (UG 99) 
मध्य प्रदेश काला गेरूआ के प्रकोप के लिये सबसे अनुकूलगेरूआरोधी किस्मों के विकास के कारण नियंत्रण जवाहरलाल नेहरू कृषि  विश्वविद्यालय द्वारा एम पी ओ 1215, एम पी 3336, एम पी 4010 किस्में विकसित की इन किस्मों को ‘‘कीनिया‘‘में परीक्षण किया गया। सभी किस्में भन्ह 99 के प्रतिरोधी एवं अधिक उत्पादन देने की क्षमता है।
गुणों का संकलन (Value addition)
म.प्र. का गेहूँ देश में गुणवत्ता में सर्वश्रेष्ठ दानों की चमक तथा दानों का वजन अधिकदूसरे राज्यों की तुलना में प्रोटीन की मात्रा 1 प्रतिशत  अधिकअभी तक प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने का प्रयास किया गयावर्तमान में विकसित किस्में सूक्ष्म तत्वों से भरपूर है।विश्वविद्यालय से विकसित किस्में जे.डब्ल्यू. 1202 एवं जे.डब्ल्यू. 1203 में, देश में विकसित अन्य किस्मों की अपेक्षा सबसे अधिक प्रोटीनवर्तमान में  विश्वविद्यालय विकसित किस्मों में सबसे अधिक ‘‘विटामिन ए‘‘सबसे अधिक लोहा, जिंक तथा मैगनीज
ज.ने.कृ.वि.वि. द्वारा विकसित किस्मों में गुणवत्ता का समादेश
ट्रेंट किस्म जे.डब्ल्यू1201 जे.डब्ल्यू1203 जी.डब्ल्यू. 173 डी.एल. 788-2  एम.पी.4010 प्रोटीन प्रतिशत   12.64 13.50 12.20 12.4 12.43 सेडीमेंटशन वेल्यू 43 38 38 40 41 एक्सटेªक्षन रेट 70.6 70.9 70.4 69.5 69.9 ग्लूटेन इंडेक्स 63 52 51 56 48 बी – केरोटीन 3.10 3.77 2.19 2.61 2.81 लोहा (पी.पी.एम.) 42.2 33.9 37.0 37.1 40.5 जिंक (पी.पी.एम.) 41.9 35.3 33.9 33.6 34.4 मैंग्नीज (पी.पी.एम.) 51.9 49.7 41.3 50.8 43.5
म.प्र. का सकारात्मक पक्ष 
असिंचित क्षेत्र में कमीसिंचाई की सुविधाऐं बढ़ीस्प्रिंकलर पद्धति का उपयोगउर्वरक की खपत बढ़ीसूक्ष्म तत्वों का भी उपयोग बढ़ानये किस्मों के विकास की गति एवं उपलब्धता संतोषजनकअच्छी गुणवत्ता के बीजों की उपलब्धताउदाहरण के रूप में  विश्वविद्यालय ‘‘बीज उत्पादन‘‘ में देश  में प्रथमकठिया गेहूँ में ‘‘करनाल बन्ट, यलोबेरी, कालाधब्बा‘‘ आदि के प्रकोप से मुक्तअतः निर्यात की सम्भावना बढ़ी
खरपतवार नियंत्राण
खरपतवारों द्वारा 25-35 प्रतिशत  तक उपज में कमी आने की संभावना बनी रहती है। यह कमी फसल में खरपतवारों की सघनता पर निर्भर करती है उत्पादन में कमी के अलावा फसल को दिये गये पोषक तत्व, जल, प्रकाश एवं स्थान आदि का उपयोग खरपतवार के पौधों के स्वयं के द्वारा करने के कारण होती है  गेहूँ  में नीदाँ नियंत्रण उपायों को मुख्यतः तीन विधियों से किया जा सकता है। 
गेहूँ की फसल में होने वाले खरपतवार मुख्यतः दो भागों में बांटे जाते है। चौड़ी पत्ती – बथुआ, सेंजी, दूधी, कासनी, जंगली पालक अकरी, जंगली मटर, कृष्णनील, सत्यानाषी हिरनखुरी आदि। सकरी पत्ती – मोथा, कांस, जंगली जई, चिरैया बाजरा एवं अन्य घासें।
रासायनिक विधि:-
रासायनिक विधि से नींदा तक को प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि इससे समय की बचत होती है। रूप से भी लाभप्रद रहता है। इस विधि से नींदा नियंत्रण निम्न प्रकार करते हैं – नींदनाशक रसायनों की मात्रा एवं प्रयोग समय:- नींदानाशक खरपतवार दर/हे. प्रयोग का समय पेण्डीमिथेलीन  संकरी एवं चौड़ी 1.0 किग्रा. बुवाई के तुरन्त बाद सल्फोसल्फूरान  संकरी एवं चौड़ी 33.5 ग्रा. बुवाई के 35 दिन तक मेट्रीब्यूजिन  संकरी एवं चौड़ी 250 ग्रा. बुवाई के 35 दिन तक 2, 4 – डी  चौड़ी पत्तिया 0.4 – 0.5 किग्रा. बुवाई के 35 दिन तक आइसोप्रोपयूरान संकर पत्तिया 750 ग्रा. बुवाई के 20 दिन तक आइसोप्रोपयूरान +2, 4 – डी चौड़ी पत्तिया एवं संकरी पत्तिया 750 ग्रा +750 ग्रा. बुवाई के 35 दिन तक
गेहूँ के विपुल उत्पादन के लिए मुख्य आवश्यक बातें:-
  उद्यानिकी फसलें अदरक सामान्य परिचय ‘अदरक‘ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के स्ट्रिंगावेरा से हुई, जिसका अर्थ होता है, एक ऐसा  सींग या बारहा सिंधा के जैसा शरीर ।अदरक मुख्य रूप से उष्ण क्षेत्र  की फसल है । संभवत: इसकी उत्पत्ति दक्षिणी और पूर्व एशिया में भारत या चीन में हुई । भारत की अन्य भाषाओं में अदरक को विभिन्न नामो से जाना जाता है जैसे- आदू (गुजराती), अले (मराठी), आदा (बंगाली), इल्लाम (तमिल), आल्लायु (तेलगू), अल्ला (कन्नड.) तथा अदरक (हिन्दी, पंजाबी) आदि । अदरक का प्रयोग प्रचीन काल से ही मसाले, ताजी सब्जी और औषधी के रूप मे चला आ रहा है । अब अदरक का प्रयोग सजावटी पौधों के रूप में भी उपयोग किया जाने लगा है । अदरक के कन्द विभिन्न रंग के होते हैं । जमाइका की अदरक का रंग हल्का गुलाबी, अफ्रीकन अदरक (हल्की हरी) होती है । वानस्पातिक परिचय अदरक (Ginger) का वानस्पतिक नाम जिनजिबेर ओफिसिनेल (Zingiber officinale) है जो जनजीबेरेसी (Zingiberace)परिवार से सम्बंध रखती है । अदरक की करीब 150 प्रजातियाँ उष्ण- एवॅ उप उष्ण एशिया और पूर्व एशिया तक पाई जाती हैं । जिनजीबेरेसी परिवार का महत्व इसलिऐ अधिक है क्योंकि इसको “मसाल परिवार“ भी कहा जाता है । जिसमें अदरक के अलावा इस परिवार में अन्य मसाले फसले जैसे – हल्दी, इलायची, बड़ी इलायची आदि बड़ी महत्वपूर्ण मसाला फसलें सम्मिलित है । इसी परिवार की कुछ जगंली प्रजातियाँ भी पाई जाती है जिनको अलपाइना (Alpinia) अमोनम (Amomum) में रखा गया है। वितरण भारत में अदरक की खेती का क्षेत्रफल 136 हजार हेक्टर है जो उत्पादित अन्य मसालों में प्रमुख हैं । भारत को विदेशी मुद्रा प्राप्त का एक प्रमुख स्त्रोत हैं । भरत विश्व में उत्पादित अदरक का आधा भाग पूरा करता हैं । भारत में हल्की अदरक की खेती मुख्यत: केरल, उडीसा, आसाम, उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, आंध्रप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा उत्तराँचल प्रदेशों में मुख्य व्यवसायिक फसल के रूप में की जाती है । केरल देश में अदरक उत्पादन में प्रथम स्थान पर हैं । भारत में अदरक का क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता वर्ष  क्षेत्रफल (हेक्ट.)000 उत्पादन (मैट्रिक टन) उत्पादकता (मैट्रिक टन/हेक्ट.) 2009-2010 107.5 585.5 2.6 2010-2011 149.1 702.0 4.7 2011-2012 155.0 756.0 4.9 2012-2013 136.0 683.0 5.0 म.प्र. में अदरक का क्षेत्रफल उत्पादन एवं उत्पादकता वर्ष  क्षेत्रफल (हेक्ट.)000 उत्पादन (मैट्रिक टन) उत्पादकता (मैट्रिक टन/हेक्ट.) 2011-2012 9.00 15.00 166 2012-2013 9.00 15.00 166 उपयोगिता अदरक का प्रयोग मसाले, औषधिया तथा सौन्र्दय सामग्री के रूप में हमारे दैनिक जीवन में वैदिक काल से चला आ रहा हैं । खुशबू पैदा करने के लिये आचारो, चाय के अलावा कई व्यजंनो में अदरक का प्रयोग किया जाता हैं । सर्दियों में खाँसी जुकाम आदि में किया जाता हैं । अदरक का सोंठ कें रूप में इस्तमाल किया जाता हैं । अदरक का टेल, चूर्ण तथा एग्लिओरजिन भी औषधियो में उपयोग किया जाता हैं 

औषधियों के रूप में- सर्दी-जुकाम, खाँसी ,खून की कमी, पथरी, लीवर वृद्धि, पीलिया, पेट के रोग, वाबासीर, अमाशय तथा वायु रोगीयों के लिये दवाओ के बनाने में प्रयोग की जाती हैं । 

मसाले के रूप में- चटनी, जैली, सब्जियो, शर्बत, लडडू, चाट आदि में कच्ची तथा सूखी अदरक का उपयोग किया जाता हैं । 
सौंदर्य प्रसाधन में- अदरक का तेल, पेस्ट, पाउडर तथा क्रीम को बनाने में किया जाता हैं । उत्पादन तकनीक जलवायु:- अदरक की खेती गर्म और आर्द्रता वाले स्थानों में की जाती है । मध्यम वर्षा बुवाई के समय अदरक की गाँठों (राइजोम) के जमाने के लिये आवश्यक होती है । इसके बाद थोडा ज्यादा वर्षा पौधों को वृद्धि के लिये तथा इसकी खुदाई के एक माह पूर्व सूखे मौसम की आवश्यकता होती हैं । अगेती वुवाई या रोपण अदरक की सफल खेती के लिये अति आवश्यक हैं । 1500-1800 मि .मी .वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में इसकी खेती अच्छी उपज के साथ की जा सकती हैं । परन्तु उचित जल निकास रहित स्थानों पर खेती को भारी नुकसान होता हैं । औसत तापमान 25 डिग्री सेन्टीग्रेड, गर्मीयों में 35 डिग्रीसेन्टीग्रेड तापमान वाले स्थानो पर इसकी खेती बागों में अन्तरवर्तीय फसल के रूप मे की जा सकती हैं । 
भूमि:- अदरक की खेती बलुई दोमट जिसमें अधिक मात्रा में जीवाशं या कार्बनिक पदार्थ की मात्रा हो वो भूमि सबसे ज्यादा उपयुक्त रहती है । मृदा का पी.एस.मान 5-6 ये 6 .5 अच्छे जल निकास वाली भूमि सबसे अच्छी अदरक की अधिक उपज के लिऐ रहती हैं । एक ही भूमि पर बार-बार फसल लेने से भूमि जनित रोग एवं कीटों में वृद्धि होती हैं । इसलिये फसल चक्र अपनाना चाहिये । उचित जल निकास ना होने से कन्दों का विकास अच्छे से नही होता । 
खेती की तैयारी:- मार्च – अप्रैल में खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद खेत को खुला धूप लगने के लिये छोड़ देते हैं । मई के महीने में डिस्क हैरो या रोटावेटर से जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बना लेते हैं । अनुशंसित मात्रा में गोवर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट और नीम की खली का सामान रूप से खेत में डालकर पुन% कल्टीवेटर या देशी हल से 2-3 बार आड़ी-तिरछी जुताई करके पाटा चला कर खेत को समतल कर लेना चाहिये । सिचाई की सुविधा एवं बोने की विधि के अनुसार तैयार खेत को छोटी-छोटी क्यारियों में बाँट लेना चाहिये । अंतिम जुताई के समय उर्वरकों को अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करना चाहिये । शेष उर्वरकों को खड़ी फसल में देने के लिये बचा लेना चाहिये । 
बीज (कन्द)की मात्रा:- अदरक के कन्दों का चयन बीज हेतु 6-8 माह की अवधि वाली फसल में पौधों को चिन्हित करके काट लेना चाहिये अच्छे प्रकन्द के 2 .5-5 सेमी .लम्बे कन्द जिनका वजन 20-25 गा्रम तथा जिनमें कम से कम तीन गाँठे हो प्रवर्धन हेतु कर लेना चाहिये। बीज उपचार मैंकोजेव फफूँदी से करने के बाद हीप्रर्वधन हेतु उपयोग करना चाहिये। बुवाई के समय:- अदरक की बुबाई दक्षिण भारत में मानसून फसल के रूप में अप्रैल – मई में की जाती जो दिसम्बर में परिपक्क होती है । जबकि मध्य एवं उत्तर भारत में अदरक एक शुष्क क्षेत्र फसल है । जो अप्रैल से जून माह तक वुवाई योग्य समय हैं । सबसे उपयुक्त समय 15 मई से 30 मई हैं । 15 जून के बाद वुवाई करने पर कंद सड़ने लगते हैं और अंकुरण पर प्रभाव बुरा पड़ता हैं । केरल में अप्रैल के प्रथम समूह पर वुवाई करने पर उपज 200% तक अधिक पाई जाती हैं । वही सिचाई क्षेत्रों में वुवाई का सवसे अधिक उपज फरवरी के मध्य बोने से प्राप्त हुई पायी गयी तथा कन्दों के जमाने में 80% की वृद्धि आँकी गयी । पहाड़ी क्षेत्रो में 15 मार्चके आस-पास वुवाई की जाने वाली अदरक में सबसे अच्छा उत्पादन प्राप्त हुआ 
बीज (कन्द)की मात्रा:- अदरक के कन्दों का चयन बीज हेतु 6-8 माह की अवधि वाली फसल में पौधों को चिन्हित करके काट लेना चाहिये अच्छे प्रकन्द के 2 .5-5 सेमी .लम्बे कन्द जिनका वनज 20-25 गा्रम तथा जिनमें कम से कम तीन गाँठे हो प्रवर्धन हेतु कर लेना चाहिये । बीज उपचार मैंकोजेव फफूँदी से करने के बाद ही प्रर्वधन हेतु उपयोग करना चाहिये । अदरक 20-25 कुंटल प्रकन्द/है. बीज दर उपयुक्त रहता हैं । तथा पौधों की संख्या 140000./है. पर्याप्त मानी जाती हैं । मैदानी भागो में 15 -18 कु ./है. बीजों की मात्रा का चुनाव किया जा सकता हैं । क्योंकि अदरक की लागत का 40-46: भाग बीज में लग जाता इसलिये वीज की मात्रा का चुनाव, प्रजाति, क्षेत्र एवं प्रकन्दों के आकार के अनुसार ही करना चाहिये । बोने की विधि एवं बीज व क्यारी अन्तराल प्रकन्दों को 40 सेमी .के अन्तराल पर बोना चाहिये । मेड़ या कूड़ विधि से बुवाई करनी चाहिये । प्रकन्दों को 5 सेमी .की गहराई पर बोना चाहिये । बाद में अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद या मिट्टी से ढक देना चाहिये । यदि रोपण करना है तो कतार से कतार 30 सेमी .और पौध से पौध 20 सेमी .पर करे । अदरक की रोपाई 15*15, 20*40 या 25*30 सेमी .पर भी कर सकते हैं । भूमि की दशा या जल वायु के प्रकार के अनुसार समतल कच्ची क्यारी, मेड-नाली आदि विधि से अदरक की वुवाई या रोपण किया जाता है ।

(क) समतल विधि:- हल्की एवं ढालू भूमि में समतल विधि द्वारा रोपण या वुवाई की जाती हैं । खेती में जल निकास के लिये कुदाली या देशी हल से 5-6 सेमी .गहरी नाली बनाई जाती है जो जल के निकास में सहायक होती हैं । इन नालियों में कन्दों को 15-20 सेमी .की दूरी अनुसार रोपण किया जाता हैं । तथा रोपण के दो माह बाद पौधो पर मिट्टी चढ़ाकर मेडनाली विधि बनाना लाभदायक रहता हैं । 
(ख) ऊँची क्यारी विधि:- इस विधि में 1*3 मी. आकार की क्यारीयों को जमीन से 20 सेमी .ऊची बनाकर प्रत्येक क्यारी में 50 सेमी .चैड़ी नाली जल निकास के लिये बनाई जाती हैं । बरसात के बाद यही नाली सिचाई के कसम में असती हैं । इन उथली क्यारियों में 30ग20 सेमी .की दूरी पर 5-6 सेमी .गहराई पर कन्दों की वुवाई करते हैं । भारी भूमि के लिये यह विधि अच्छी है। 
(ग) मेड़ नाली विधि:- इस विधि का प्रयोग सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती हैं । तैयार खेत में 60 या 40 सेमी .की दूरी पर मेड़ नाली का निर्माण हल या फावडे से काट के किया जा सकता हैं । बीज की गहराई 5-6 सेमी .रखी जाती हैं । रोपण हेतु नर्सरी तैयार करना:- यदि पानी की उपलब्धता नही या कम है तो अदरक की नर्सरी तैयार करते हैं । पौधशाला में एक माह अंकुरण के लिये रखा जाता । अदरक की नर्सरी तैयार करने हेतु उपस्थित बीजो या कन्दों को गोबर की सड़ी खाद और रेत (50:50) के मिश्रण से तैयार बीज शैया पर फैलाकर उसी मिश्रण से ठक देना चाहिए तथा सुबह-शाम पानी का छिड़काव करते रहना चाहिये । कन्दों के अंकुरित होने एवं जड़ो से जमाव शुरू होने पर उसे मुख्य खेत में मानसून की बारिश के साथ रोपण कर देना चाहिये ।  बीज उपचार :- प्रकन्द बीजों को खेत में वुबाई, रोपण एवं भण्डारण के समय उपचारित करना आवश्यक हैं । बीज उपचारित करने के लिये (मैंकोजेब .मैटालैक्जिल) या कार्बोन्डाजिम की 3 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर के पानी के हिसाब से घोल बनाकर कन्दों को 30 मिनट तक डुवो कर रखना चाहिये । साथ ही स्ट्रप्टोसाइकिलन ध् प्लान्टो माइसिन भी 5 ग्राम की मात्रा 20 लीटर पानी के हिसाब से मिला लेते है जिससे जीवाणु जनित रोगों की रोकथाम की जा सके । पानी की मात्रा घोल में उपचारित करते समय कम होने पर उसी अनुपात में मिलाते जाय और फिर से दवा की मात्रा भी । चार बार के उपचार करने के बाद फिर से नया घोल वनायें । उपचारित करने के बाद बीज कों थोडी देर उपरांत वोनी करें । अछाया का प्रभाव :- अदरक को हल्की छाया देने से खुला में बोई गयी अदरक से 25 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होती है । तथा कन्दों की गुणवत्ता में भी उचित वृद्धि पायी गयी हैं । फसल प्रणाली:- अदरक की फसल को रोग एवं कीटों में कमी लाने एवं मृदा के पोषक तत्वो के बीच सन्तुलन रखने हेतु । अदरक को सिंचित भूमि में पान, हल्दी, प्याज, लहसुन, मिर्च अन्य सब्जियों, गन्ना, मक्का और मूँगफली के साथ फसल को उगाया जा सकता है । वर्षा अधिक सिंचित वातावरण में 3-4 साल में एकबार आलू, रतालू, मिर्च, धनियाॅ के साथ या अकेले ही फसल चक्र में आसकती हैं । अदरक की फसल को पुराने बागों में अन्तरवर्तीय फसल के रूप में उगा सकते हैं । मक्का या उर्द के साथ अन्तरावर्ती फसल लेने में मक्का 5-6 किग्रा / एकड़ .उर्द 10-15 किग्रा / एकड़ बीज की आवश्यकता होती हैं । मक्का और उर्द  अदरक की फसल को छाया प्रदान करती हैं । तथा मक्का 6-7 कु / एकड़ और उर्द 2 कु / एकड़ । छाया का प्रभाव :- अदरक को हल्की छाया देने से खुला में बोई गयी अदरक से 25 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होती है । तथा कन्दों कीी गुणवत्ता में भी उचित वृद्धि पायी गयी हैं । फसल प्रणाली:- अदरक की फसल को रोग एवं कीटों में कमी लाने एवं मृदा के पोषक तत्वो के बीच सन्तुलन रखने हेतु । अदरक को सिंचित भूमि में पान, हल्दी, प्याज, लहसुन, मिर्च अन्य सब्जियों, गन्ना, मक्का और मूँगफली  ी के साथ फसल को उगाया जा सकता है । वर्षा अधिक सिंचित वातावरण में 3-4 साल में एकबार आलू, रतालू, मिर्च, धनियाॅ के साथ या अकेले ही फसल चक्र में आसकती हैं । अदरक की फसल को पुराने बागों में अन्तरवर्तीय फसल के रूप में उगा सकते हैं । मक्का या उर्द के साथ अन्तरावर्ती फसल लेने में मक्का 5-6 किग्रा / एकड़ .उर्द 10-15 किग्रा / एकड़ बीज की आवश्यकता होती हैं । मक्का और उर्द  अदरक की फसल को छाया प्रदान करती हैं । तथा मक्का 6-7 कु / एकड़ और उर्द 2 कु / एकड़ ।मक्का या उर्द के साथ अन्तरावर्ती फसल लेने में मक्का 5-6 किग्रा / एकड़ .उर्द 10-15 किग्रा / एकड़ बीज की आवश्यकता होती हैं । मक्का और उर्द  अदरक की फसल को छाया प्रदान करती हैं । तथा मक्का 6-7 कु / एकड़ और उर्द 2 कु / एकड़ । पलवार:- अदरक की फसल में पलवार विछाना बहुत ही लाभदायक होता हैं । रोपण के समय इससे भूमि का तापक्रम एवं नमी का सामंजस्य बना रहता है । जिससे अंकुरण अच्छा होता है । खरपतवार भी नही निकलते और वर्षा होने पर भूमि का क्षरण भी नही होने पाता है । रोपण के तुरन्त बाद हरी पत्तियाँ या लम्बी घास पलवार के लिये ढाक, आम, शीशम, केला या गन्ने के ट्रेस का भी उपयोग किया जा सकता हैं । 10-12 टन या सूखी पत्तियाँ 5-6 टन/है. बिछाना चाहिये । दुबारा इसकी आधी मात्रा को रोपण के 40 दिन और 90 दिन के बाद विछाते हैं , पलवार विछाने के लिए उपलब्धतानुसार गोवर की सड़ी खाद एवं पत्तियाँ, धान का पूरा प्रयोग किया जा सकता हैं । काली पाॅलीथीन को भी खेत में बिछा कर पलवार का काम लिया जा सकता हैं । निदाई, गुडाई और मिट्टी चढाने का भी उपज पर अच्छा असंर पडाता हैं । ये सारे कार्य एक साथ करने चाहिये । निदाई, गुडाई तथा मिट्टी चढ़ाना:- पलवार के कारण खेत में खरपतवार नही उगते अगर उगे हो तो उन्हें निकाल देना चाहिये, दो बार निदाई 4-5 माह बाद करनी चाहिये । साथ ही मिट्टी भी चढाना चाहिऐ । जब पौधे 20-25 सेमी .ऊँचीी हो जाये तो उनकी जड़ो पर मिट्टी चढाना आवश्यक होता हैं । इससे मिट्टी भुरभुरी हो जाती है । तथा प्रकंद का आकार बड़ा होता है, एवं भूमि में वायु आगमन अच्छा होता हैं । अदरक के कंद बनने लगते है तो जड़ों के पास कुछ कल्ले निकलते हैं । इन्हे खुरपी से काट देना चाहिऐ, ऐसा करने से कंद बड़े आकार के हो पाते हैं । पोषक तत्व प्रबन्धन अदरक एक लम्बी अवधि की फसल हैं । जिसे अधिक पोषक तत्चों की आवश्यकता होती है । उर्वरकों का उपयोग मिट्टी परीक्षण के बाद करना चाहिए । खेत तैयार करते समय 250-300 कुन्टल हेक्टेयर के हिसाब से सड़ी हई गोबर या कम्पोस्ट की खाद खेत में सामन्य रूप से फैलाकर मिला देना चाहिए। प्रकन्द रोपण के समय 20 कुन्टल /है. मी पर से नीम की खली डालने से प्रकन्द गलब एवं सूत्रि कृमि या भूमि शक्ति रोगों की समस्याँ कम हो जाती हैं । रासायनीक उर्वरकों की मात्रा को 20 कम कर देना चाहिए यदि गोबर की खाद या कम्पोस्ट डाला गया है तो । संन्तुष्ट उर्वरको की मात्रा 75 किग्रा. नत्रजन, किग्रा. कम्पोस्टस और 50 किग्रा .पोटाश /है. हैं । इन उर्वरकों को विघटित मात्रा में डालना चाहिऐ (तालिका) प्रत्येक बार उर्वरक डालने के बाद उसके ऊपर मिट्टी में 6 किग्रा .जिंक/है. (30 किग्रा .जिंक सल्फेट) डालने से उपज अच्छी प्राप्त होती हैं । अदरक की खेती के लिये उर्वरको का विवरण (प्रति हेक्टयर) उर्वरक आधारीय उपयोग 40 दिन बाद 90 दिन बाद नत्रजन –  – 37.5 किग्रा. 37.5 किग. फास्फोरस     50 किग्रा  – – पोटाश 149.1       4.7 कमपोस्ट गोबर की खाद 250 300 कु. 25 किग्रा . नीम की खली 2 टन – – उन्नतशील प्रजातियों का चयन भारत के विभिन्न प्रदेशो में  उगाई जाने वाली प्रजातियाँ क्र. राज्य प्रजातियों के नाम विशेषता 1. आसाम बेला अदा, मोरन अदा, जातिया अदा छोटे आकार के कन्द तथा औषधिय उपयोग के लिये प्रयुक्त 2. अरूणाचल प्रदेश केकी, बाजार स्थानीय नागा सिंह, थिंगिपुरी अधिक रेशा एवं सुगन्ध 3. मणिपुर नागा सिंह, थिंगिपुरी   अधिक रेशा एवं सुगन्ध 4. नागालैण्ड विची, नाडिया सोठ एवं सुखी अदरक हेतु 5. मेघालय  सिह बोई, सिंह भुकीर,काशी  औषधिय उत्तम अदरक 6. मेजोरम स्थानीय,तुरा,थिंग पुदम, थिगंगिराव    रेशा रहित तथा बहुत चरपरी अदरक 7. सिक्किम      भैसी   अधिक उपज उपज, रेशा तथा सूखी अदरक के आधार पर विभिन्न प्रजातियाँ क्र. प्रमुख प्रजातियाँ औसत उत्पादन (किग्रा/हे.) रेशा(%) सूखी अदरक(%) 1. रियो-डे-जिनेरियो 29350 5.19 16.25 2. चाइना 25150  3.43 15.00 3. मारन 23225 10.04  22.10 4. थिंगपुरी 24475 7.09  20.00 5. नाडिया 23900 8.13 20.40 6. नारास्सपट्टानम 18521 4.64 21.90 7. वायनाड 17447 4.32 17.81 8. कारकल 12190 7.78 23.12 9. वेनगार 10277 4.63 25.00 10 आर्नड मनजार 12074 2.43 21.25 11 वारडावान 14439 2.22 21.90 ताजा अदरक, ओरेजिन,तेल, रेशा, सूखा अदरक एवं परिपक्क अवधि के अनुसार प्रमुख प्रजातियाॅ प्रजाति प्रजातियो के नाम परिपक्क अवधि (दिन) ओले ओरेजिन (%) तेल(%) रेशा(%) सूखी अदरक(%) आई.आई. एस. आर .(रजाता) 23.2 300 300 1.7 3.3 23 महिमा 22.4 200 200 2.4 4.0 19 वर्धा (आई आई.एस.आर ) 22.6 200 6.7 1.8 4.5 20.7 सुप्रभा 16.6 229 8.9 1.9 4.4  20.5 सुरभि 17.5 225 10.2 2.1 4.0 23.5 सुरूचि 11.6 218 10.0 2.0 3.8 23.5 हिमिगिरी   13.5 230 4.5 1.6 6.4 20.6 रियो-डे-जिनेरियो     17.6 190 10.5 2.3 5.6 20.0 महिमा (आई.एस.आर.)    22.4 200 19.0 6.0 2.36 9.0 विभिन्न उपयोग के आधार पर प्रजातियाँ के नाम क्र. प्रयोग प्रजातियो के नाम 1. सूखी अदरक हेतु   कारकल, नाडीया, मारन, रियो-डी-जेनेरियो 2. तेल हेतु      स्लिवा, नारास्सापट्टाम, वरूआसागर, वासी स्थानीय, अनीड चेन्नाडी 3. ओलेरिजिन हेतु  इरनाड, चेरनाड, चाइना, रियो-डी-जिनेरियो 4. कच्ची अदरक हेतु रियो-डे-जिनेरियो, चाइना, वायानाड स्थानीय, मारन, वर्धा कीट अवरोधी.ध् सहनशील प्रजातियाँ क्र. कीटो के प्रति लक्षण  प्रजाति लक्षण 1. तना भेदक  रियो-डे-जिनेरियो   सहनशील 2. कन्द स्केल वाइल्ड-21, अनामिका कम प्रभावित 3. भण्डारण कीट वर्धा,   एसीसी न. 215, 212    प्रतिरोधी 4. स्ूत्रिकृमि (अदरक) वालयूवानाड, तुरा और एस.पी.एसीसी न. 36, 59 और 221   कम प्रभावित प्रतिरोधी अदरककेहानिकारक रोग हेतु उपयोगी रासायनिक, फुफुंद नाशी की मात्रा क्र. रोग का नाम फफुंद नाशी प्रबन्धन 1. पर्णदाग          मैंकोजेव 2 मिली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करे । 2. उकठा या पीलिया मैंकोजेव + मैटालैक्जिल      3मिली. प्रति लीटर पानी में घोलकर कन्दो को उपचारित करके वुवाई करे या खडी फसल में ड्रेनिचिंग करे । 3. कन्द गलन मैंकोजेव + मैटालैक्जिल      3मिली. प्रति लीटर पानी में घोलकर कन्दरो उपचारित करके वुवाई करे या खडी फसल में ड्रेनिचिंग करे । 4. जीवाणु उकठा स्ट्रेप्पोसाइकिलिन    200 पी. पी.एन के घोल को कन्दों को उपचारित करे । अदरक के हानिकारक कीटों हेतु उपयोगी रासायनिक, कीटनाशकों की मात्रा क्र. कीट का नाम कीटनाशक प्रबन्धन 1. केले की माहुँ क्लोरोपाइरिफॉस  2 मिली. प्रति लीटर पानी 2. चइनीज गुलाब भृंग क्लोरोपाइरिफॉस  (5%)  धूल  25किग्रा/हे. वुवाई के खेत में डाले 3. अदरक का घुन क्लोरोपाइरिफॉस  (5%)धूल 25किग्रा/हे. वुवाई के खेत में डाले 4. हल्दी कन्द शल्क        क्लोरोपाइरिफॉस  (5%) 25किग्रा/हे. वुवाई के खेत में डाले 5. नाइजर शल्क   क्विनालफॉस  धूल 20 मिनट तक कन्दों को वोने और भण्डारन के पहले उपचारित करे 6. इलायची थ्रिप्स        डाइमेथोएट  2 मिली /ली. पानी के साथ छिडकाव करें 7. तना छेदक      डाइमेथोएट 2 मिली / ली. पानी के साथ छिडकाव करें 8. पत्ती मोडक       डाइमेथोएट 2 मिली / ली. पानी के साथ छिडकाव करें खुदाई:- अदरक की खुदाई लगभग 8-9 महीने रोपण के बाद कर लेना चाहिये जब पत्तियाँ धीरे-धीरे पीली होकर सूखने लगे । खुदाई से देरी करने पर प्रकन्दों की गुणवत्ता और भण्डारण क्षमता में गिरावट आ जाती है, तथा भण्डारण के समय प्रकन्दों का अंकुरण होने लगता हैं । खुदाई कुदाली या फावडे की सहायता से की जा सकती है । बहुत शुष्क और नमी वाले वातावरण में खुदाई करने पर उपज को क्षति पहुॅचती है जिससे ऐसे समय में खुदाई नहीं करना चाहिऐ । खुदाई करने के बाद प्रकन्दों से पत्तीयो, मिट्टी तथा अदरक में लगी मिट्टी को साफ कर देना चाहिये । यदि अदरक का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाना है तो खुदाई रोपण के 6 महीने के अन्दर खुदाई किया जाना चाहिऐ । प्रकन्दों को पानी से धुलकर एक दिन तक धूप में सूखा लेना चाहिये । सूखी अदरक के प्रयोग हेतु 8 महीने बाद खोदी गई है, 6-7 घन्टे तक पानी में डुबोकर रखें इसके बाद नारियल के रेशे या मुलायम व्रश आदि से रगड़कर साफ कर लेना चाहिये । धुलाई के बाद अदरक को सोडियम हाइड्रोक्लोरोइड के 100 पी पी एम के घोल में 10 मिनट के लिये डुबोना चाहिऐ । जिससे सूक्ष्मे जीवों के आक्रमण से बचाव के साथ-साथ भण्डारण क्षमता भी बड़ती है।अधिक देर तक धूप ताजी अदरक (कम रेशे वाली) को 170-180 दिन बाद खुदाई करके नमकीन अदरक तैयार की जा सकती है । मुलायम अदरक को धुलाई के बाद 30 प्रतिशतनमक के घोल जिसमें 1% सिट्रीक अम्ल में डुबो कर तैयार किया जाता हैं । जिसे 14 दिनों के बाद प्रयोग और भण्डारण के योग हो जाती है । भण्डारण- ताजा उत्पाद बनाने और उसका भण्डारण करने के लिये जब अदरक कडी, कम कडवाहट और कम रेशे वाली हो, ये अवस्था परिपक्व होने के पहले आती है। सूखे मसाले और तेल के लिए अदरक को पूण परिपक्व होने पर खुदाई करना चाहिऐ अगर परिपक्व अवस्था के वाद कन्दो को भूमि में पडा रहने दे तो उसमें तेल की मात्रा और तिखापन कम हो जाऐगा तथा रेशो की अधिकता हो जायेगी । तेल एवं सौठं बनाने के लिये 150-170 दिन के बाद भूमि से खोद लेना चाहिये । अदरक की परिपक्वता का समय भूमि की प्रकार एवं प्रजातियो पर निर्भर करता है । गर्मीयों में ताजा प्रयोग हेतु 5 महिने में, भण्डारण हेतु 5-7 महिने में सूखे ,तेल प्रयोग हेतु 8-9 महिने में बुवाई के बाद खोद लेना चहिये ।बीज उपयोग हेतु जबतक उपरी भाग पत्तीयो सहित पूरा न सूख जाये तब तक भूमि से नही खोदना चाहिये क्योकि सूखी हुयी पत्तियाॅ एक तरह से पलवार का काम करती है । अथवा भूमि से निकाल कर कवक नाशी एवं कीट नाशीयों से उपचारित करके छाया में सूखा कर एक गडडे में दवा कर ऊपर से बालू से ढक देना चाहिये। उपज- ताजा हरे अदरक के रूप में 100-150 कु. उपज/हे. प्राप्त हो जाती है । जो सूखाने के बाद 20-25 कु. तक आ जाती हैं । उन्नत किस्मो के प्रयोग एवं अच्छे प्रबंधन द्वारा औसत उपज 300कु./हे. तक प्राप्त की जा सकती है।इसके लिये अदरक को खेत में 3-4 सप्ताह तक अधिक छोड़ना पडता है जिससे कन्दों की ऊपरी परत पक जाती है । और मोटी भी हो जाती हैं।   अनार अनार उत्पादन तकनीक भारत में अनार की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र में की जाती है। राजस्थान, उत्तरप्रदेश, आन्द्रप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, गुजरात में छोटे स्तर में इसके बगीचें देखे जा सकते हैं। इसका रस स्वादिष्ट तथा औषधिय गुणों से भरपूर होता है। भारत में अनार का क्षेत्रफल 113.2 हजार हेक्टेयर, उत्पादन 745 हजार मेट्रिक टन एवं उत्पादकता 6.60 मेट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। (2012-13) जलवायु अनार उपोष्ण जलवायु का पौधा है। यह अर्द्ध शुष्क जलवायु में अच्छी तरह उगाया जा सकता है। फलों के विकास एवं पकने के समय गर्म एवं शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। लम्बे समय तक उच्च तापमान रहने से फलों में मिठास बढ़ती है। आर्द्र जलवायु से फलों की गुणवत्ता प्रभावित होती है।एवं फफूँद जनक रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है। इसकी खेती समुद्रतल से 500 मीटर सें अधिक उँचे स्थानो पर की जा सकती है। मृदा अनार विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। परन्तु अच्छे जल विकास वाली रेतीली दोमट मिट्टी सर्वोतम होती है। फलों की गुणवत्ता एवं रंग भारी मृदाओं की अपेक्षा हल्की मृदाओं में अच्छा होता है। अनार मृदा लवणीयता 9.00 ई.सी./मि.ली. एवं क्षारीयता 6.78 ई.एस.पी. तक सहन कर सकता है। किस्में गणेश- यह किस्म डॉ. जी.एस.चीमा द्धारा गणेश रिवण्ड फल अनुसंधान केन्द्र, पूना से 1936 में आलंदी किस्म के वरण से विकसित की। इस किस्म के फल मध्यम आकार के बीज कोमल तथा गुलाबी रंग के होते हैं। यह महाराष्ट्र की मशहूर किस्म है।ज्योति- यह किस्म बेसिन एवं ढ़ोलका के संकरण की संतति से चयन के द्धारा विकसित की गई हैं। फल मध्यम से बडे आकार के चिकनी सतह एवं पीलापन लिए हुए लाल रंग के होते हैं। एरिल गुलाबी रंग की बीज मुलायम बहुत मीठे होते हैं।प्रति पौधा 8-10 कि.ग्रा. उपज प्राप्त की जा सकती है।मृदुला- यह किस्म गणेश एवं गुल-ए-शाहू किस्म के संकरण की एफ-1 संतति से चयन के द्धारा महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी, महाराष्ट्र से विकसित की गई है। फल मध्यम आकार के चिकनी सतह वाले गहरे लाल रंग के होते हैं। एरिल गहरे लाल रंग की बीज मुलायम , रसदार एवं मीठे होते हैं। इस किस्म के फलों का औसत वजन 250-300 ग्राम होता है।भगवा- इस किस्म के फल बड़े आकार के भगवा रंग के चिकने चमकदार होते हैं। एरिल आकर्षक लाल रंग की एवं बीज मुलायम होते हैं। उच्च प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 30.38 कि.ग्रा. उपज प्राप्त की जा सकती है।अरक्ता- यह किस्म महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी, महाराष्ट्र से विकसित की गई है।यह एक अधिक उपज देने वाली किस्म है। फल बड़े आकार के, मीठे, मुलायम बीजों वाले होते हैं। एरिल लाल रंग की एवं छिल्का आकर्षक लाल रंग का होता है। उच्च प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 25-30 कि.ग्रा. उपज प्राप्त की जा सकती है प्रवर्धन  कलम द्धारा- एक वर्ष पुरानी शाखाओं से 20-30 से.मी.लम्बी कलमें काटकर पौध शाला में लगा दी जाती हैं। इन्डोल ब्यूटारिक अम्ल (आई.बी.ए.) 3000 पी.पी.एम. से कलमों को उपचारित करने से जडें शीघ्र एवं अधिक संख्या में निकलती हैं।गूटी द्धारा– अनार का व्यावसायिक प्रर्वधन गूटीद्धारा किया जाता है। इस विधि में जुलाई-अगस्त में एक वर्ष पुरानी पेन्सिल समान मोटाई वाली स्वस्थ, ओजस्वी, परिपक्व, 45-60 से.मी. लम्बाई की शाखा का चयन करें । चुनी गई शाखा से कलिका के नीचे 3 से.मी. चौड़ी गोलाई में छाल पूर्णरूप से अलग कर दें। छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आई. बी. ए. 10,000 पी.पी.एम. का लेप लगाकर नमी युक्त स्फेगनम मास चारों और लगाकर पॉलीथान शीट से ढ़ॅंककर सुतली से बॉध दें। जब पालीथीन से जड़े दिखाई देने लगे उस समय शाखा को स्केटियर से काटकर क्यारी या गमलो में लगा दें। रोपण पौध रोपण की आपसी दूरी मृदा का प्रकार एवं जलवायु पर निर्भर करती है। सामान्यतः 4-5 मीटर की दूरी पर अनार का रोपण किया जाता है। सघन रोपण पद्धति में 5 ग 2 मीटर (1,000 पौधें/हें.), 5 ग 3 मीटर (666 पौधें/हें.), 4.5 ग 3 (740 पौधें/हें.) की आपसी अन्तराल पर रोपण किया जा सकता है। पौध रोपण के एक माह पूर्व 60 ग 60 ग 60 सेमी. (लम्बाईं ग चौडाई ग गहराई.) आकार के गड्ढे खोद कर 15 दिनों के लिए खुला छोड दें। तत्पश्चात गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में 20 किग्रा.पकी हुई गोबर की खाद . 1 किग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट . 50 ग्राम क्लोरो पायरीफास चूर्ण मिट्टी में मिलाकर गड्डों को सतह से 15 सेमी. ऊचाई तक भर दे। गड्ढे भरने के बाद सिचाई करें ताकि मिट्टी अच्छी तरह से जम जाए तदुपरान्त पौधों का रोपण करें एवं रोपण पश्चात तुरन्त सिचाई करें। खाद एवं उर्वरक 1. पत्ते गिरने के एक सप्ताह बाद या 80-85 प्रतिशत पत्तियों के गिरने के बाद पौधों की आयु खाद एवं उर्वरक को पौधों की आयु के अनुसार कार्बनिक खाद एवं नाइट्रोजन,फॉ्स्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। पकी हुई गोबर की खाद नाइट्रोजन, फॉ्स्फोरस तथा पोटाश की दर को मृदा परीक्षण तथा पत्ती विश्लेषण के आधार पर उपयोग करें। खाद एवं उर्वरकों का उपयोग केनोपी के नीचे चारों ओर 8-10 सेमी. गहरी खाई बनाकर देना चाहिए। rkfydk&[kkn ,oa moZjd dh larqfyr ek=k izfr ikS/kk izfr o”kZ वृक्ष की आयु (वर्ष में) पकी हुई गोबर की खाद (कि.ग्रा.) नाइट्रोजन (ग्राम) फॉ्स्फोरस (ग्राम) पोटाश (ग्राम) 1 10 250 125 125 2 20 250 125 125 3 30 500 125 125 4 40 500 125 250 5 या अधिक 50 625 250 250  नाइट्रोजन एवं पोटाश युक्त उर्वरकों को तीन हिस्सों में बांट कर पहली खुराक सिंचाई के समय या बहार प्रबंधन के बाद और दूसरी खुराक पहली खुराक के 3-4 सप्ताह बाद दें, फॉ्स्फोरस की पूरी खाद को पहली सिंचाई के समय दें। नत्रजन की आपूर्ति के लिए काली मिट्टी में यूरिया एवं लाल मिट्टी में कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग करें, फॉ्स्फोरस की आपूर्ति के लिए सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटाश की आपूर्ति के लिए म्यूरेट आफ पोटाश का प्रयोग करें।नत्रजन की आपूर्ति के लिए काली मिट्टी में यूरिया एवं लाल मिट्टी में कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट का प्रयोग करें, फॉ्स्फोरस की आपूर्ति के लिए सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटाश की आपूर्ति के लिए म्यूरेट आफ पोटाश का प्रयोग करें। जिंक, आयरन, मेगनीज तथा बोरान की 25 ग्राम की मात्रा प्रति पौधे में पकी गोबर की खाद के साथ मिलाकर डाले, सूक्ष्म पोषक तत्व की मात्रा का निर्धारण मृदा तथा पत्ती परीक्षण द्वारा करें।जब पौधों पर पुष्प आना शुरू हो जाएं तो उसमें नत्रजनः फास्फोरस : पोटाश 12:61:00 को 8 किलो/हेक्टेयर की दर से एक दिन के अंतराल पर एक महिने तक दें।जब पौधों में फल लगने शुरू हो जायें तो नत्रजन  : फास्फोरस : पोटाश 19:19:19 को ड्रिप की सहायता से 8 कि.ग्रा./हैक्टेयर की दर से एक दिन के अंतराल पर एक महीने तक दें।जब पौधों पर शत प्रतिशत फल आ जाऐ तो नत्रजनः फास्फोरस : पोटाश00:52:34 या मोनोपोटैशियम फास्फेट 2.5 किलो/हेक्टेयर की मात्रा को एक दिन के अन्तराल पर एक महीने तक दें।फल की तुड़ाई के एक महीने पहले कैल्शियम नाइट्रेट की 12.5 किलो ग्राम/हेक्टेयर की मात्रा ड्रिप की सहायता से 15 दिनों के अंतराल पर दो बार दें। सिंचाई अनार के पौधे सूखा सहनशील होते हैं। परन्तु अच्छे उत्पादन के लिए सिंचाई आवश्यक है। मृग बहार की फसल लेने के लिए सिंचाई मई के मध्य से शुरू करके मानसून आने तक नियमित रूप से करना चाहिए। वर्षा ऋतु के बाद फलों के अच्छे विकास हेतु नियमित सिंचाई 10-12 दिन के अन्तराल पर करना चाहिए। ड्रिप सिंचाई अनार के लिए उपयोगी साबित हुई है। इसमें 43 प्रतिशत पानी की बचत एवं 30-35 प्रतिशत उपज में वृद्धि पाई गई है। ड्रिप द्वारा सिंचाई विभिन्न मौसम में उनकी आवश्यकता के अनुसार करें। तालिका-2 मौसम के अनुसार अनार के पौधों की जल की आवश्यकता बहार माह प्रत्येक पौधे की प्रति दिन पानी की आवश्यकता (लीटर) अम्बे जनवरी 17 फरवरी 18 मार्च 31 अप्रेल 40 मई 44 मृग जून 30 जुलाई 22 अगस्त 20 हस्त सितम्बर 20 अक्टूबर 19 नवम्बर 17 दिसम्बर 16 सिंचाई अनार मे सधाई का बहुत महत्व है। अनार की दो प्रकार से सधाई की जा सकती है। एक तना पद्धति- इस पद्धति में एक तने को छोडकर बाकी सभी बाहरी टहनियों को काट दिया जाता हैं। इस पद्धति में जमीन की सतह से अधिक सकर निकलते हैं।जिससे पौधा झाडीनुमा हो जाता है। इस विधि में तना छेदक का अधिक प्रकोप होता है। यह पद्धति व्यावसायिक उत्पादन के लिए उपयुक्त नही हैं। बहु तना पद्धति. इस पद्धति में अनार को इस प्रकार साधा जाता है कि इसमे तीन से चार तने छूटे हों,बाकी टहनियो को काट दिया जाता है। इस तरह साधे हुए तने में प्रकाष अच्छी तरह से पहुँचता है। जिससे फूल व फल अच्छी तरह आते हैं। कॉट-छाट ऐसे बगीचे जहाँ पर ऑइली स्पाट का प्रकोप ज्यादा दिखाई दे रहा हो वहाँ पर फल की तुड़ाई के तुरन्त बाद गहरी छँटाई करनी चाहिए तथा ऑइल स्पाट संक्रमित सभी शाखों को काट देना चाहिए।संक्रमित भाग के 2 इंच नीचे तक छँटाई करें तथा तनों पर बने सभी कैंकर को गहराई से छिल कर निकाल देना चाहिए। छँटाई के बाद 10 प्रतिशत बोर्डो पेस्ट को कटे हुऐ भाग पर लागायें। बारिश के समय में छँटाई के बाद तेल युक्त कॉपर ऑक्सीक्लोराइड ;500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड + 1 लीटर अलसी का तेलद्ध का उपयोग करें।अतिसंक्रमित पौधों को जड़ से उखाड़ कर जला दें और उनकी जगह नये स्वस्थ पौधों का रोपण करें या संक्रमित पौधों को जमीन से 2-3 इंच छोड़कर काट दें तथा उसके उपरान्त आए फुटानों को प्रबन्धित करें।रोगमुक्त बगीचे में सिथिल अवस्था के बाद जरूरत के अनुसार छँटाई करें।छँटाई के तुरन्त बाद बोर्डो मिश्रण (1 प्रतिशत ) का छिड़काव करें।रेस्ट पीरियड के बाद पौधों से पत्तों को गिराने के लिए इथरैल (39 प्रतिशत एस.सी.) 2-2.5 मि.ली./लीटर की दर से मृदा में नमी के आधार पर उपयोग करें।गिरे हुए पत्तों को इकठ्ठा करके जला दें। ब्लीचिंग पावडर के घोल (25 कि.ग्रा./1000 लीटर/हेक्टेयर) से पौधे के नीचे की मृदा को तर कर दें। बहार नियंत्रण अनार में वर्ष मे तीन बार जून-जुलाई (मृग बहार), सितम्बर-अक्टूबर (हस्त बहार) एवं जनवरी-फरवरी (अम्बे बहार) में फूल आते हैं। व्यवसायिक रूप से केवल एक बार की फसल ली जाती है। और इसका निर्धारण पानी की उपलब्धता एवं बाजार की माँग के अनुसार किया जाता है। जिन क्षेत्रों मे सिंचाई की सुविधा नही होती है, वहाँ मृग बहार से फल लिये जाते हैं। तथा जिन क्षेत्रो में सिचाई की सुविधा होती है वहाँ फल अम्बें बहार से लिए जाते हैं। बहार नियंत्रण के लिए जिस बहार से फल लेने हो उसके फूल आने से दो माह पूर्व सिचाई बन्द कर देनी चाहिये। तुड़ाई अनार नान-क्लामेट्रिक फल है जब फल पूर्ण रूप से पक जाये तभी पौंधे से तोड़ना चाहिए। पौधों में फल सेट होने के बाद 120-130 दिन बाद तुड़ाई के तैयार हो जाते हैं। पके फल पीलापन लिए लाल हो जाते हैं। उपज पौधे रोपण के 2-3 वर्ष पश्चात फलना प्रारम्भ कर देते हैं। लेकिन व्यावसायिक रूप से उत्पादन रोपण के 4-5 वर्षों बाद ही लेना चाहिए। अच्छी तरह से विकसित पौधा 60-80 फल प्रति वर्ष 25-30 वर्षो तक देता है। श्रैणीकरण अनार के फलों के वजन , आकार एवं बाहरी रंग के आधार पर निम्नलिखित श्रेणियों मे रखा जाता है। (1) सुपर साईज- इस श्रेणी में चमकदार लाल रंग के बिना धब्बे वाले फल जिनका भार 750 ग्राम से अधिक हो आते हैं। (2) किंग साईज- इस श्रेणी में आर्कषक लाल रंग के बिना धब्बे वाले फल जिनका भार 500 से 750 ग्राम हो आते हैं। (3) क्वीन साईज- इस श्रेणी में चमकदार लाल रंग के बिना धब्बे वाले फल जिनका भार 400-500 ग्राम हो आते हैं। (4) प्रिंन्स साईज- पूर्ण पके हुए लाल रंग के 300 से 400 ग्राम के फल इस श्रेणी में आते हैं। शेष बचे हुए फल दो श्रेणीयों 12-ए. एवं 12-बी. के अंर्तगत आते हैं। 12-बी. के अंर्तगत 250-300 ग्राम भार वाले फल जिनमें कुछ धब्बे हो जाते हैं। भंड़ारण शीत गृह में 5 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 2 माह तक भण्डारित किया जा सकता है। पौंध संरक्षण एकीकृत कीट प्रबंधन अनार की तितली- इस कीट का वैज्ञानिक नाम ड्यूड़ोरिक्स आईसोके्रट्स है यह अनार का सबसे गंभीर कीट है। इसके द्धारा 20-80 प्रतिशत हानि की जाती है। प्रौढ तितली फूलों पर तथा छोटे फलों पर अण्डे देती है। जिनसे इल्ली निकलकर फलों के अन्दर प्रवेश  कर जाती है तथा बीजों को खाती है। प्रकोपित फल सड़ जाते है और असमय झड़ जाते है प्रबंधन प्रभावित फलों को इकट्ठा करके नष्ट कर दें। खेत को खरपतवारों से मुक्त रखें । स्पाइनोसेड (एस.पी.) की 0.5 ग्राम मात्रा या इण्डोक्साकार्व (14.5 एस.पी.) 1 मिली. मात्रा या ट्रायजोफास (40 ई.सी.) की 1 किलो मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर प्रथम छिडकाव फूल आते समय एवं द्वितीय छिडकाव 15 दिन बाद करें। फलों को बाहर पेपर से ढॅक दें।  तना छेदक- इस कीट का वैज्ञानिक नाम जाइलोबोरस स्पी. है। इस कीट की इल्लियॉ शाखाओं में छेद बनाकर अंदर ही अंदर खाकर खोखला करती है शाखाएँ पीली पड़कर सूख जाती हैं। प्रबंधन क्षतिग्रस्त शाखाओं को काट कर इल्लियों सहित नष्ट कर देना चाहिए। पूर्ण रूप से प्रभावित पौधौं कों जड़ सहित उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए। कीट के प्रकोप की अवस्था में मुख्य तने के आस-पास क्लोरोपायरीफास 2.5 मिली./लीटर पानी़ट्राईडेमार्फ 1 मिली./ लीटर पानी में घोलकर टोआ ( ड्रेन्चिग ) दें। अधिक प्रकोप की अवस्था में तने के छेद में न्यूवान (डी.डी.वी.पी.) की 2-3 मिली. मात्रा छेद में डालकर छेद को गीली मिट्टी से बंद कर दें। माहू- इस कीट का वैज्ञानिक नाम एफिस पुनेकी है। यह कीट नई शाखाओं, पुष्पों से रस चुसते हैं। परिणाम स्वरूप पत्तियाँ सिकुड जाती हैं। साथ ही पत्तियों पर मधु सा्रव स्त्रावित करने से सूटी मोल्ड नामक फफूँद विकसित हो जाती है। जिससे प्रकाश संष्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है। प्रबंधन प्रारम्भिक प्रकोप होने पर प्रोफेनाफास-50 या डायमिथोएट-30की 2 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। वर्षा ऋतु के दिनों में घोल में स्टीकर 1मिली./लीटर पानी में मिलाएं।अधिक प्रकोप होने पर इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एस.एल.) 0.3 मिली./लीटर या थायामिथोग्जाम (25 डब्लू.जी.) 0.25 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।  मकड़ी- इस कीट का वैज्ञानिक नाम ओलीगोनाइचस पुनेकी है। इस कीट के प्रौढ एवं शिशु पत्तियों की निचली सतह से रस चुसते हैं। परिणाम स्वरूप पत्तियाँ सिकुड़कर सुख जाती हैं। प्रबंधन प्रारम्भिक अवस्था में डायकोफाल 2.5 मि.ली./लीटर . स्टीकर 1 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें । अधिक प्रकोप की अवस्था फेन्जावक्वीन (10 ई.सी.) 2 मिली./लीटर या अबामेक्टीन (1.9 ई.सी.) 0.5 मिली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। मिलीबग- इस कीट का वैज्ञानिक नाम फैर्रिसिया विरगाटा है ये कीट कोमल पत्तों तथा फलों पर सफेद मोमी कपास जैसा दिखाई देता है एवं कोमल पत्तों तथा शाखाओं, फलों से रस चूसता है। प्रबंधन कीट की प्रारम्भिक अवस्था में प्रोफेनोफास-50 या डायमिथोएट (30 ई.सी.) 2 मिली./पानी में घोलकर छिड़काव करें। अधिक प्रकोप की अवस्था में इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एस.एल.) 0.3 मिली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। एकीकृत रोग प्रबंधन  सरकोस्पोरा फल धब्बा- यह रोग सरकोस्पोरा स्पी. नामक फफूँद से होता है। इस रोग में फलों पर अनियमित आकार में छोटे काले रंग के धब्बे बन जाते हैं जो बाद बढ़े धब्बों में परिवर्तित हो जाते हैं। प्रबंधन प्रभावित फलों को तोड़कर अलग कर नष्ट कर दें। रोग की प्रारम्भिक अवस्था मेंमैन्कोजेब (75 डब्लू.पी.) 2.5 ग्राम/लीटर या क्लोरोथायलोनिल (75 डब्लू.पी.) 2 ग्राम/लीटर पानी में घोलकर 2-3 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें।  अधिक प्रकोप की अवस्था में हेक्साकोनाजोल (5 ई.सी.) 1 मिली./लीटर या डाईफनकोनाजोल (25 ई.सी.) 0.5 मिली./प्रति लीटर पानी में घोलकर 30-40 के अन्तराल पर छिड़काव करें।  फल सड़न- यह रोग एस्परजिलस फोइटिडस नामक फफूँद से होता है। इस रोग में गोलाकार काले धब्बे फल एवं पुष्पीय डंठल पर बन जाते हैं। काले धब्बे पुष्पीय पत्तिया से शुरू होकर पूरे फल पर फैल जाते हैं। प्रबंधन कार्बेन्डाजिम (50 डब्लू.पी.) 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर 10-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें। जीवाणु पत्ती झुलसा- यह रोग जेन्थोमोनास एक्सोनोपोड़िस पी. व्ही. पुनेकी नामक जीवाणु से होता है। इस रोग में छोटे अनियमित आकार के पनीले धब्बे पत्तियों पर बन जाते हैं। यह धब्बे हल्के भूरे से गहरे भूरे रंग के होते हैं। बाद में फल भी गल जाते है। प्रबंधन रोग रहित रोपण सामग्री का चुनाव करें।  पेडो से गिरी हुई पत्तियों एवं शाखाओं को इकट्ठा करके नष्ट कर देना चाहिए। बोर्डो मिश्रण 1 प्रतिशत का छिड़काव करें या स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 0.2 ग्राम/लीटर + कॉपर आक्सीक्लोराईड 2.5ग्राम/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। उकटाः- इस रोग में पत्तियों का पीला पड़ना, जड़ों तथा तनों की नीचले भाग को बीच से चीरने पर अंदर की लकड़ी हल्के भूरे/काले विवर्णन दर्षाना सीरेटोसिस्टीस फिम्ब्रीयाटा का संक्रमण दिखाता है और यदि सिर्फ जायलम का रंग भूरा दिखता है तो फ्यूजेरियम स्पीसीज का संक्रमण सिद्ध होता है। प्रबंधन उकटा रोग से पूर्णतः प्रभावित पौधों को बगीचे से उखाड़कर जला दें उखाड़ते समय संक्रमित पौधों की जड़ों और उसके आस-पास की मृदा को बोरे या पालीथीन बैग में भरकर बाहर फेंक दें।रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेन्डाजिम (50 डब्लू.पी.) 2 ग्राम/लीटर या ट्राईडिमोर्फ (80 ई.सी.) 1 मिली./लीटर पानी में घोलकर पौधों के नीचे की मृदा को तर कर दें। कार्यिकी विकृति  फल फटना- अनार में फलो का फटना एक गंभीर समस्या है। यह समस्या शुष्क क्षेत्रों में अधिक तीव्र होती है। इस विकृति में फल फट जाते हैं। जिससे फलों की भंडारण क्षमता कम हो जाती है। फटी हुए स्थान पर फल पर फफूँदो के आक्रमण के कारण जल्दी सड़ जाते है एवं बाजार भाव कम मिलते हैं। कारण मृदा में बोरान की कमी के कारण। भूमि में नमी का असंतुलन। प्रबंधन नियमित रूप से सिचाई करें। जिब्रलिक एसिड़ (जी.ए.3) 15 पी.पी.एम. का छिड़काव करें। बोरान 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें |   प्याज परिचयः प्याज एक महत्वपूर्ण सब्जी एवं मसाला फसल है इसमें प्रोटीन एवं कुछ बिटामिन भी अल्प मात्रा में रहते है प्याज में बहुत से औसधीय गुण पाये जाते है। प्याज का सूप, अचार एवं सलाद के रूप में उपयोग किया जाता है।भारत के प्याज उत्पादक राज्यो में महाराष्ट्र, गुजरात, उ.प्र., उड़ीसा, कर्नाटक, तमिलनाडू, म.प्र., आन्ध्रप्रदेश एवं बिहार प्रमुख हैं। मध्य प्रदेश भारत का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक प्रदेश है। म.प्र. में प्याज की खेती खंण्डवा, शाजापुर, रतलाम छिंन्दवाडा सागर एवं इन्दौर में मुख्य रूप से की जाती हैसामान्य रूप में सभी जिलो में प्याज की खेती की जाती है।भारत से प्याज का निर्यातमलेसिया, यू.ए.ई. कनाड़ा , जापान, लेबनान एवं कुबेत में निर्यात किया जाता है। जलवायु: यद्यपि प्याज ठण्डे मौसम की फसल हैं, लेकिन इसे खरीफ में भी उगाया जा सकता हैं। कंद निर्माण के पूर्व प्याज की फसल के लिए लगभग 210से. ग्रे. तापक्रम उपयुक्त माना जाता है। जबकि शल्क कंदों में विकास के लिए 150 से. ग्रे. से 250 से. ग्रे. का तापक्रम उत्तम रहता हैं। मृदा: प्याज की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं में की जा सकती है,प्याज की खेती के लिए उचित जलनिकास एवं जीवांषयुक्त उपजाऊ दोमट तथा वलूई दोमट भूमिजिसका पी.एच. मान 6.5-7.5 के मध्य हो सर्वोत्तम होती है, प्याज को अधिक क्षारीय या दलदली मृदाओं में नही उगाना चाहिए। उन्नत किस्में: म.प्र में खरीफ प्याज की प्रमुख उन्नत किस्में निम्नलिखित हैं- 1. एग्री फाउण्ड डार्क रेड: यह किस्म भारत में सभी क्षैत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसके शल्क कन्द गोलाकार, 4-6 सेमी. आकार वाले, परिपक्वता अवधि 95-110, औसत उपज 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर । यह किस्म खरीफ प्याज(वर्षात की प्याज ) उगाने के लिए अनुसंशित है। 2. एन-53 : भारत के सभी क्षेत्रों में उगाया जा सकता है, इसकी परिपक्वता अवधि 140 दिन, औसत उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, इसे खरीफ प्याज (वर्षातकी प्याज) उगाने हेतु अनुसंशित किस्म हैं।   3. भीमा सुपर: यह किस्म भी खरीफ एवं पिछेती खरीफ के लिये उपयुक्त है। यह किस्म 110-115 दिन में तैयार हो जाती है तथा प्रति हेक्टेयर 250-300 किवंटल तक उपज देती है। भूमि की तैयारी: प्याज के सफल उत्पादन में भूमि की तैयारी का विशेष महत्व हैं। खेत की प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करना चाहिए। इसके उपरान्त 2 से 3 जुताई कल्टीवेटर या हैरा से करें, प्रत्येक जुताई के पश्चात् पाटा अवश्य लगाऐं जिससे नमी सुरक्षित रहें तथा साथ ही मिट्टी भुर-भुरी हो जाऐ। भूमि को सतह से 15 से.मी. उंचाई पर 1.2 मीटर चैड़ी पट्टी पर रोपाई की जाती है अतः खेत को रेज्ड-बेड सिस्टम से तैयार किया जाना चाहिए। खाद एवं उर्वरक: प्याज की फसल को अधिक मात्रा में पोषक तत्वो की आवश्यकता होती है प्याज की फसल में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना चाहिए। गोबर की सड़ी खाद 20-25 टन/हेक्टेयर रोपाई से एक-दो माह पूर्व खेत में डालना चाहिए। इसके अतिरिक्त नत्रजन 100 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर, स्फुर 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर तथा पोटाश 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर देने की अनुसंशा की जाती हैं। इसके अतिरिक्त सल्फर 25 कि.ग्रा.एवं जिंक 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर प्याज की गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक होते हैं पौध तैयार करना: पौध शाला के लिए चुनी हुई जगह की पहले जुताई करें इसके पश्चात् उसमें पर्याप्त मात्रा में गोबर की सड़ी खाद या कम्पोस्ट डालना चाहिए। पौधशाला का आकार 3 मीटर ग 0.75 मीटर रखा जाता हैं और दो क्यारियों के बीच 60-70 सेमी. की दूरी रखी जाती हैं जिससे कृषि कार्य आसानी से किये जा सके। पौधशाला के लिए रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती हैं, पौध शैय्या लगभग 15 सेमी. जमीन से ऊँचाई पर बनाना चाहिए बुवाई के बाद शैय्या में बीजों को 2-3 सेमी. मोटी सतह जिसमें छनी हुई महीन मृदा एवं सड़ी गोबर की खाद या कम्पोस्ट खाद से ढंक देना चाहिए। बुवाई से पूर्व शैय्या को 250 गेज पालीथीन द्वारा सौर्यकरण उपचारित कर ले। बीजों को हमेशा पंक्तियों में बोना चाहिए। खरीफ मौसम की फसल के लिए 5-7 सेमी. लाइन से लाइन की दूरी रखते हैं। इसके पश्चात् क्यारियों पर कम्पोस्ट, सूखी घास की पलवार(मल्चिंग) बिछा देते हैं जिससे भूमि में नमी संरक्षण हो सकें। पौधशाला में अंकुरण हो जाने के बाद पलवार हटा देना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाये कि पौधशाला की सिंचाई पहले फब्बारें से करना चाहिए। पौधों को अधिक वर्षा से बचाने के लिए पौधशाला या रोपणी को पॉलिटेनल में उगाना उपयुक्त होगा। बीज की मात्रा: खरीफ मौसम के लिए 15-20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती हैं। पौधशाला शैय्या पर बीज की बुवाई एवं रोपाई का समय: खरीफ मौसम हेतु पौधशाला शैय्या पर बीजों की पंक्तियों में बुवाई 1-15 जून तक कर देना चाहिए, जब पौध 45 दिन की हो जाऐ तो उसकी रोपाई कर देना उत्तम माना जाता हैं। पौध की रोपाई कूड़ शैय्या पद्धिति से तैयार खेतों पर करना चाहिए, इसमें 1.2 मीटर चैड़ी शैय्या एवं लगभग 30 से.मी. चैड़ी नाली तैयार की जाती हैं। खरपतवार नियंत्रण: फसल को खरपतवारों से मुक्त रखने के लिए कुल 3 से 4 निराई-गुडाई की आवश्यकता होती है। प्याज के पौधे एक-दूसरे के नजदीक लगाये जाते है तथा इनकी जडे भी उथली रहती है अतः खरपतवार नष्ट करने के लिए रासायनिक पदार्थो का उपयोग किया जाना उचित होता है। इसके लिए पैन्डीमैथेलिन 2.5 से 3.5 लीटर/हेक्टेयर अथवा आॅक्सीफ्लोरोफेन 600-1000 मिली/हेक्टेयर खरपतवार नाशक पौध की रोपाई के 3 दिन पश्चात 750 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना बहुत प्रभावी और उपयुक्त पाये गये हैं। सिंचाई एवं जलनिकास: खरीफ मौसम की फसल में रोपण के तुरन्त बाद सिंचाई करना चाहिए अन्यथा सिंचाई में देरी से पौधे मरने की संभावना बढ़ जाती हैं। खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली प्याज की फसल को जब मानसून चला जाता हैं उस समय सिंचाईयाँ आवश्यकतानुसार करना चाहिए। इस बात का ध्यान रखा जाऐ कि शल्ककन्द निर्माण के समय पानी की कमी नहीं होना चाहिए क्योंकि यह प्याज फसल की क्रान्तिक अवस्था होती हैं क्योंकि इस अवस्था में पानी की कमी के कारण उपज में भारी कमी हो जाती हैं, जबकि अधिक मात्रा में पानी बैंगनी धब्बा(पर्पिल ब्लाच) रोग को आमंत्रित करता हैं। काफी लम्बे समय तक खेत को सूखा नहीं रखना चाहिए अन्यथा शल्ककंद फट जाऐगंे एवं फसल जल्दी आ जाऐगी, परिणामस्वरूप उत्पादन कम प्राप्त होगा। अतः आवश्यकतानुसार 8-10 दिन के अंतराल से हल्की सिंचाई करना चाहिए। यदि अधिक वर्षा या अन्य कारण से खेत में पानी रूक जाऐ तो उसे शीघ्र निकालने की व्यवस्था करना चाहिए अन्यथा फसल में फफूंदी जनित रोेग लगने की संभावना बढ़ जाती हैं। कंदों की खुदाई: खरीफ प्याज की फसल लगभग 5 माह में नवम्बर-दिसम्बर माह में खुदाई के लिए तैयार हो जाती है। जैसे ही प्याज की गाँठ अपना पूरा आकर ले लेती है और पत्तियां सूखने लगे तो लगभग 10-15 दिन पूर्व सिंचाई बंद कर देना चाहिए और प्याज के पौधों के शीर्ष को पैर की मदद से कुचल देना चाहिए। इससे कंद ठोस हो जाते हैं और उनकी वृद्धि रूक जाती है। इसके बाद कंदों को खोदकर खेत में ही कतारों में ही रखकर सुखाते है। फसल सुरक्षा:- 1. थ्रिप्स: ये कीट पत्तियों का रस चूसते हैं जिसके कारण पत्तियों पर चमकीली चांदी जैसी धारियां या भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। ये बहुत छोटे पीले या सफेद रंग के कीट होते हैं जो मुख्य रूप से पत्तियों के आधार या पत्तियों के मध्य में घूमते हैं। इसके नियंत्रण हेतु नीम तेल आधारित कीटनाशियों का छिड़काव करें या इमीडाक्लोप्रि कीटनाशी 17.8 एस.एल. दवा की मात्रा 125 मिली./हे. 500-600 लीटर पानी मंे मिलाकर छिड़काव करें। माइट: इस कीट के प्रकोप के कारण पत्तियों पर धब्बों का निर्माण हो जाता हैं और पौधे बौने रह जाते हैं। इसके नियंत्रण हेतु 0.05ः डाइमेथोएट दवा का छिड़काव करें। बैंगनी धब्बा (परपल ब्लाॅच): यह एक फफूंदी जनित रोग हैं, इस रोग का प्रकोप दो परिस्थितियों में अधिक होता हैं पहला अधिक वर्षा के कारण दूसरा पौधों को अधिक समीप रोपने से पत्तियों पर बैंगनी रंग के धब्बे बन जाते हैं। परिणामस्वरूप पोधों की बढ़वार एवं विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं। इसके लक्षण दिखाई देने पर मेनकोजेब (2.5 ग्रा./ली. पानी) का 10 दिन के अन्तराल से छिड़काव करें। इन फफूंदनाशी दवाओं में चिपकने वाले पदार्थ जैसे सैन्उो विट, ट्राइटोन या साधारण गोंद अवश्य मिला दें जिससे घोल पत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण हेतु चिपक सकें। उपज: खरीफ प्याज की प्रति हेक्टेयर उपज 250-300 क्विंटल तक मिल जाती हैं। खरीफ प्याज की खेती में होने वाले आय-व्यय का अनुमानित विवरण (प्रति हेक्टेयर) विवरण खेती पर व्यय
(रू.)
खेत की तैयारी   जुताई 2 बार,6 घण्टे प्रति जुताई /400/- प्रति घण्टा कल्टीवेटर एक बार, 6 घण्टे प्रति जूताई /400/- प्रति घण्टा खेत का समतलीकरण. क्यारियाॅ. सिंचाई लालियाॅ और मेड बनाना 4800.00 2400.00 2000.00 खाद और उर्वरक   गोबर की खाद/कम्पोस्ट 20 टन, / 2500/- प्रति टन रासायनिक उर्वरक बीज 15 किग्रा. / 650 प्रति किग्रा. बीज बोना, पौधे तैयार करना, रोपाई 30 मजदूर /200/- प्रति मजदूर खरपतवार नियंत्रण, सिचाई 20 / 200 प्रति मजदूर निराई-गुडाई दो-दो बार, 30 मजदूर प्रति / 200/-मजदूर पौघ संरक्षण उपाय, दवायें एवं मजदूरी कंद छॅटाई, सफाई, भण्डारण, बोरे एवं भराई विक्रय हेतू खेतों से बाजार तक परिवहन लागत अन्य व्यय 50000.00 5200.00 9750.00 6000.00 4000.00 12000.00 5000.00 4000.00 5000.00 4000.00 5000.00 कुल लागत 1,19,150.00 उत्पादन 225 क्विं/हेक्टेयर, विक्रय मूल्य 1600/- प्रति क्विंटल 3,60,000.00 लाभ लागत अनुपात 1:3.02   संतरा परिचय मध्यप्रदेश  में संतरे की बागवानी मुख्यतः छिंदवाड़ा, बैतूल, होशंगाबाद, शाजापुर, उज्जैन, भोपाल, नीमच,रतलाम तथा मंसौर जिले मे की जाती है । प्रदेश  में संतरे की बागवानी 43000 हैक्टेयर क्षेत्र में होती है जिसमें से 23000 हैक्टेयर क्षेत्र छिंदवाड़ा जिले में है । वर्तमान में संतरे की उत्पादकता से बारह टन प्रति हैक्टेयर है जो कि विकसित देशो की तुलना मे अत्यंत कम है । कम उत्पादकता के कारको में बागवानी हेतु गुणवत्तापूर्ण पौधे (कलमे का अभाव तथा रख-रखाव की गलत पत्तियाँ प्रमुख है । मध्यप्रदेश  में संतरे की किस्म नागपुर संतरा प्रचलित है। 1.भूमि का चुनाव- संतरे की बागवानी हेतु मिट्टी की उपरी तथा नीचे की सतह की संरचना और गुणो पर ध्यान देने की आवश्यकता है बगीचा लगाने से पहले मिट्टी परिक्षण कर भविष्य में आने वाली समस्याओं का निदान कर बगीचे के उत्पादन व बगीचे की आयु में वृद्धि की जा सकती है । संतरा बागवानी हेतु मिट्टी के आवश्यक  गुण – मिट्टी के अवयव मिट्टी की गहराई से. मी.   0.15      15.30 पी. एच. 7.6.-7.8 7.9-8.0 इ.सी.  0.12.0.24               0.21.0.28 मुक्त चुना %  11.4 18.2 यांत्रिक अवयव     रेती      20.8.40.1   19.0.32.7 सील्ट     26.8.30.4  11.2.26.8 चीकनी मिट्टी  42.8.48.8     54.2.56.1 जलघुलषील घनायन मि.ली. ली.     कैलशियम   168.31.182.3 192.50.212.45 मैग्नेशियम    39.4.42.7    32.20.42.10 सोडियम  0.98.1.1   0.68.1.23 पोटैशियम  1.2.2.8  11.40.12.80 वीनीमय घनायन (सेंटी मोल किलो     कैलशियम   31.9.32.3       38.1.41.2 मैग्नेशियम 8.5.10.1         9.2.10.0 सोडियम  0.68.1.23   0.8.1.1 पोटैशियम 3.2.4.1 4.5.4.6 2.संतरे के पौधे कलम खरीदने में सावधानिया संतरे के रोगमुक्त पौधे संरक्षित पौधशाला  से ही लिये जाने चाहिए। यह पौधे मफाइटोप्थारा फंफूद व विषाणु रोग से मुक्त होते है । रंगपुर लाईम या जम्बेरी मूलवन्त तैयार कलमे किये हुए पौधे लिये चाहिए । कल मे रोगमुक्त तथा सीधी बढी होना चाहिए जिनकी उचाई लगभग 60 से. मी. हो तथा मूलवंत पर जमीन की सतह से बडिंग 25 से.मी उचाई पर की हो । इन कलमो में भरपूर तन्तूमूल जडे होना चाहिए , जमीन से निकालने में जडे टूटनी नही चाहिए तथा जडो पर कोई जख्म नही होना चाहिए । 3.बगीचे की स्थापनाः संतरे के पौधे लगाने के लिये 2 रेखांकन पदति का उपयोग होता है – वर्गाकार तथा षटभुजाकार पदति । षटभुजाकार पदति में 15 प्रतिशत  पौधे वर्गाकार पदति की तुलना में अधिक लगाये जा सकते है । गढढे का आकार 75 X 75 X 75 से. मी. तथा पौधे को 6 X 6मी. दूरी पर लगाना चाहिए । इस प्रकार एक हैक्टेयर में 277 पौधे लगाये जा सकते है हल्की भूमि में 5.5 ग 5.5 मी. अथवा 5 X 5.मी. अंतर पर 300 से 400 पौधे लगाये जा सकते है । गढढे भरने के लिये मिट्टी के साथ प्रति गढढा 20 किलो सडी हुई गोबर की खाद के साथ 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 500 ग्राम नीम खली तथा 10 ग्राम कार्बेन्डाजिम का उपयोग करे । 4.पौधो को लगाने के पूर्व उपचार व सावधानियाः पौधे की जडो को मेटालेक्जील एम जेड 72,2 2.75 ग्राम के साथ कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से पौधा लगाने के पहले 10-15 मिनट तक डूबोना चाहिए । पौधे लगाने के लिए जूलाई  से सितंबर माह का समय उपयुक्त है ध्यान रखे कि कली का जोड जमीन की सतह से 25 से.मी. उपर रहे । जमीन से 2.5 से 3 फीट तक आवांछित शाखाओं को समय समय पर काटते रहे । बगीचो में अंतर फसले – संतरे के बगीचो में 6 साल के पश्चात्  व्यवसायिक स्तर पर फसल ली जाती है । इस समय तक 6 ग 6 मीटर की काफी जगह खाली रह जाती है अतः कुछ उपयुक्त अंतरवर्ती दलहन फसले ली जा सकती है । कपास जैसी फसले जमीन से अधिक पोषक तत्व लेती है । 5.उर्वरको का उपयोगः नत्रजनयुक्त उर्वरक की मात्रा को तीन बराबर भागों में जनवरी, जूलाई एवं नवम्बर माह में देना चाहिए । जबकि फास्फोरसयुक्त उर्वरक को दो बराबर भागों में जनवरी एवं जूलाई माह में तथा पोटाश युक्त उर्वरक को एक ही बार जनवरी माह में देना चाहिए । उर्वरको की मात्रा ( ग्राम / पेड / वर्ष  ) पौधो की आयु उर्वरक  1 वर्ष      2 वर्ष     3 वर्ष    4 वर्ष एवं अधिक नाइटोजन 1500 300 450 600 फास्फोरस    50 100 150 200 पोटाश् 25 50 75 100   पोश क तत्व   कमी के लक्षण   उपचार नत्रजन    पुरे पौधों की हरी पत्तियों पर एवं शिराओं  पर हल्कापीलापन दिखाई देता है। 1-2 प्रतिशत  युरिया का छिड़काव या यूरिया 600-1200 ग्राम पौधा भूमि में डाले फास्फोरस  पत्तियाँ  छोटी सिकुडकर लम्बी एवं भूरे कलर की हो जाती है।पील मोटा और बीच में पोंचा होकर फल में रस की मात्रा कम होजाती है। फास्फेटी उर्वरक जैसे सिंगल सुपर फास्फेट 500-2000 ग्राम प्रति पौधा वर्ष   न्यूटरल से अल्कालाईन भूमी मे डालेया रॉक फॉस्फेट     500-1000 ग्राम प्रति पौधा वर्ष   अम्लीय भूमी में डाले। पोटाश फल छोटे होकर छिल्का मोटा होता है। तथा फल गोलाई कीअपेक्षा लम्बे होते है। पोटेशियम  नाइट्रेट (1-3प्रतिशत) छिडकाव या म्यूरेटापोटाश   (180-500 ग्राम) पौधा/वर्ष   भूमि में उपयोग करें। मैग्नीशियम पत्तियाँ की शिराओं के बीच में क्लोरेटिक हरे धब्बे दिखाई देते हैं।    डोलोमाईट 1-1.50 किलो /पौधों /वर्ष   भूमि में डाले विशेषत  इसका उपयोग अम्लीय भूमि में करें। आयरन पत्तियाँ कागजी प्रतित होतीं हैं तथा बाद में शिराओं के बीच काक्षेत्र पीला होकर पत्तियाँ सुखकर नीचे गिर जाती है। फेरस सल्फेट (0.5 प्रतिशत)  का छिड़काव करें या फेरस सस्फेट 200-250 ग्राम/पौधा/वर्ष   भूमि में उपयोग करें। मेंगनीज पत्तियों के षिराजाल पत्तियों के रंग से अपेक्षाकृत अधिक हरा तथापीलापन लिये होता है। मेंगनीज सस्फेट 0.25 प्रतिशत  का छिड़काव करें या 200-300 ग्राम/पौधा/वर्ष   मेंग्नीज सस्फेट का भूमि में डाले झींक  पत्तियाँ  छोटी नुकीली गुच्छेनुमा तथा शिराओं का पीला होनाअपरीपक्व अवस्था में पत्तियों का झड़ना, पत्तियों की ऊँपरी सतहसफेद धारिया बनना अथवा पीली धारिया सफेद पृष्ठ लियेअनियमित आकार में शिराओं तथा मध्य शिराओं  को घेरे हुयेदिखता है।   झींक सस्फेट 0.5 प्रतिशत  का छीड़काव करें। या झींकसस्फेट 200-300 ग्राम/पौधा/वर्ष   भूमी मे डालें। मोलिब्डेनम पत्तियों के शिराओं के मध्य पीले धब्बे तथा बडे भूरे अनियमितआकार के धब्बे के साथ पीलापन तथा पत्तियों के बीच का अंतरकम हो जाता है।     अमोनियम मोलिब्डेनम  0.4-0.5 प्रतिशत  का छिड़कावकरें। या 22-50 ग्राम /पौधा/वर्ष   भूमी में डालें। बोरान    नई पत्तियों पर जलषोषित धब्बे और परीपक्व पत्तियों पर अर्ध पारदर्शी धब्बों के साथ मध्य एवं अन्य षिराये टुटती हुई दिखाईदेती है।  सोडियम बोरेट 0.1-0.2 प्रतिशत  का छिड़काव या बोरेक्स25-50 ग्राम/पौधा/वर्ष   भूमी मे उपयोग करें कॉपर फलों के छिल्के पर भूरापन लिये हूये क्षेत्र /दाग दिखाई देता है तथा फल हरा होकर कड़ा हो जाता है। ऊपर की शाखाएं सूखने लगती है। कॉपर  सल्फेट 0.25 प्रतिशत का छिड़काव करें या 100-250 ग्राम/पौधा/वर्ष   भूमी में उपयोंग करें। 6. जलप्रबंधनः अधिक सिचाई से अधिक उत्पादन जैसी धारना सही नही है पटपानी (Flood Irrigation) से बगीचे को नुकसान होता है । गर्मी के मौसम में सिचाई 4 से 7 दिन तथा ठंड के मौसम में 10 से 15 दिन के अंतर में करना चाहिए । सिंचाई का पानी पेड के तने को नही लगना चाहिए । इसके लिए सिंचाई की डबल रिंग प़दति का उपयोग करना चाहिए । टपक सिंचाई उत्तम विधि है इससे से पानी की 40 से 50 प्रतिशत बचत होती है तथा खरपतवार भी 40 से 65 प्रतिशत तक कम उगते है । पेडो की वृद्धि व फलो की गुणवत्ता अच्छी होती है तथा मजदूरो की बचत भी होती है । अंबिया और मृग बहार लेने के लिए सतह सिंचाई अंतराल एवं मृदा आदृता तान अवधि सिंचाई अंतराल (दिन) बहार लेने हेतु आवष्यक बाते हलकी जमीन भारी जमीन   ग्रीष्मकाल शीतकाल ग्रीष्मकाल शीतकाल   5-7   12-15    7-10  15-21 अंबिया बहार 
तान-नवंबर दिसंबर, तान समाप्ती- जनवरी का दूसरा पखवाडा, तान अवधि 15 से 60 दिन सिंचाई-वर्षा शुरू होने तक देना, 5-7    12-15     7-10   15-21 मृग बहार
तान -मई,तान समाप्ती -जून, वर्षा के अभाव मे सिंचाई करे,तान अवधि – 20 से 45 दिन 7.खरपतवार नियंत्रणः एक बीजपत्रीय खरपतवार मे मोथा , दूबघास तथा कुश  एवं द्वीबीजपत्री में चैलाई बथुआ,दूधी,कांग्रेस, घास मुख्यतः पाये जाते है खरपतवार निकलने से पहले -डायूरान 3 कि. ग्रा या सीमाजीन 4 किग्रा. सक्रिय तत्व के आधार पर प्रति हेक्टर के दर से जून महीने के पहले सप्ताह में मिट्टी पर प्रथम छिडकाव और 120 दिन के बाद सितंबर माह में दूसरा छिडकाव करने से बगीचा लगभग 10 माह तक खरपतवारहित रखा जा सकता है खरपतवार निकलने के पश्चात्  – ग्लायफोसेट 4 लीटर या पेराक्वाट 2 लीटर 500 से 600 लीटर पानी मे मिलाकर प्रति हैक्टर से उपयोग करे । जहा तक संभव हो खरपतवारनाशक फूल निकलने से पहले उपयोग करे । खरपतवारनाशक का प्रयोग मुख्य पौधो पर नही करना चाहिए । 8.बहार उपचार (तान देना) पेडो में फूल धारणा सूखने करने हेतु फूल आने की अवस्था में बहार उपचार किया जाता है । इस हेतु मृदा के प्रकार के अनुसार बगीचे में 1 से 2 माह पूर्व सिंचाई बंद कर देते है । इससे कार्बर्न नत्रजन अनुपात में सुधार आता है (नत्रजन कम होकर कार्बन की मात्रा बढ जाती है) कभी कभी सिंचाई बंद करने के बाद भी पेडो में फूल की अवस्था नही आती ऐसी अवस्था में वृद्धि अवरोधक रसायन सी.सी.सी. 1500 – 2000 पी.पी.एम. या प्लेक्लोबुटराझाल (कलटार) का छिडकाव किया जाना चाहिए । 9.फल गलनः फलो का गिरना वर्ष में दो या तीन बार में होता है- प्रथम फल गोली के आकार से थोडा बडा होने पर तथा दूसरा फल पूर्ण विकसित होने या फल रंग परिवर्तन के समय । फल तुडाई के कुछ दिन पहले फल गलन अम्बिया बहार की काफी गंभीर समस्या है । फल गलन की रोकथाम हेतु फूल आने के समय जिबे्रलिक अम्ल 10 पी.पी.एम. यूरिया 1 प्रतिशत का छिडकाव करे । फल लगने के बाद फलो का आकर 8 से 10 मि.मी. 2, 4-डी 15 पी.पी.एम. बिनामिल तथा कार्बेन्डाजिम 1000 पी.पी.एम. यूरिया 1 प्रतिशत का छिडकाव करे । फल 18 से 20 मि.मी. आकरमान के होने के बाद जिब्रेलिक अम्ल 10 पी.पी.एम. पोटेशियम नाइट्रेट 1 प्रतिशत छिडकाव करे । सितंबर माह में 2, 4 – डी 15 पी.पी.एम. बिनामिल या कार्बेन्डाजिम 1000 पी.पी.एम. और यूरिया 1 प्रतिशत का छिडकाव करे । अक्टूबर महीने में जिब्रेलिक अम्ल 10 पी.पी.एम. पोटेशियम नाइट्रेट 1 प्रतिशत का छिडकाव करे । 2,4 – डी या जिब्रेलिक अम्ल 30 मिली. अल्कोहल या एसिटोन में घोले व बाद में पानी मिलाए । मृग बहार की फसल के लिए भी उपरोक्त रोकथाम के उपाय करे । 10.संतरा बागानों में कीट प्रबंधनः संतरे का सायला कीट 
(1) प्रौढ़ एवं अरभक क्षतिकारक अवस्थाये 
(2) कीट समूह में रहकर नाजुक पत्तियों से तथा फूल कलियों से रस शोषण करते है परिणामतः नई कलियां तथा फलों की गलन होती है। 

नियंत्रण:- 
(1) जनवरी-फरवरी, जून-जूलाई  तथा अक्टूबर – नवम्बर में नीम तेल (3-5 मि.ली. / लीटर) या इमिडाक्लोप्रिड अथवा मोनोक्रोटफॉस का छिड़काव करें।  पर्ण सुरंगक कीट 
(1) नर्सरी तथा छोटे पौधों पर अधिक प्रकोप होता है, जिससे वृद्धि रूक जाती है। यह कीट मिलीबग तथा कैंकर रोग के संवाहक है। 
(2) जीवन क्रम 20 से 60 दिन तथा वर्ष  में 9 से 13 पीढि़यां 
(3) प्रकोप संपूर्ण वर्ष   भर परंतु जूलाई -अक्टूबर तथा फरवरी-मार्च में अधिक। 

नियंत्रण:- 
(1) नर्सरी में कीट ग्रसित पत्तियों को छिड़काव पूर्व तोड़कर नष्ट करें। 
(2) क्विनालफॉस 25 ई.सी. का 2.0 मि.ली. अथवा फोसोलान 1.5 मि.ली./लीटर  नीबू की तितली 
(1) कीट प्रकोप वर्ष   भर परंतु जूलाई – अगस्त में सर्वाधिक 
(2) वर्ष में 4-5 पीढि़या 
(3) इल्लियों की पत्तियां खाने की क्षमता बहुत अधिक होती है। 
(4) इल्लियों का रंग कत्थई, काला होता है। विकसित इल्ली पर सफेद चित्तीयां होती है जिससे चिडि़यों की बीट के समान प्रतीत होती है। 

नियंत्रण:- 
(1) डायपेल (बी.टी.) 0.05 प्रतिशत या सायपरमेथ्रिन 1 मि.ली./लीटर अथवा क्विनालफॉस 25 ई.सी. का 2.0 मि.ली. /लीटर  छाल खाने वाली इल्ली्र्र 
(1) इल्लियां रात्रिचर – तने से बाहर आकर रात में छाल का भक्षण करती है। 
(2) तने में अधिकतम 17 छिद्र देखे गये है। 

नियंत्रण :- ग्रसित भाग के जाले हटाकर डायक्लोरहॉस 1 प्रतिशत घोल छिद्र में डालकर छिद्र कपास से बंद करें। 11.संतरा बागानों में रोग प्रबंधनः 1. फायटोफ्थोरा बीमारी के लक्षण  : फायटोफ्थोरा रोग से नर्सरी में पौधे पीले पड़ जाते है, बढ़वार रूक जाती है तथा जड़ो की सडन होती है। इस फफूंद के कारण जमीन के ऊपर तने पर दो फीट तक काले धब्बे पड़ जाते है जिसके कारण छाल सूख जाती है। इन धब्बो से गोंद नुमा पदार्थ निकलता है। पेडो के जडो पर भी इस फफूंद से क्श ति होती है। प्रभावित पौधे धीरे धीरे सूख जाते है।  2. रोग का उद्गम : फायटोफ्थोरा फफूंद के रोगाणु गीली जमीन से बहुत फफूँद बढ़ जाते है। इसके बीजाणू वर्षा पूर्व 25 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर बढकर थैली नुमा आकार के हो जाते है जो पानी के साथ तैरकर जड़ो की नोक तथा जड़ो की जख्म के संपर्क में आकार बीमारी का प्रसार करते है। इन बीजाणुओ से धागेनुमा फफूंद का विकास होता है जो बाद में कोशिकाओं में प्रवेश  कर फफूंद का पुनः निर्माण करते है। फायटोफ्थोरा फफूँद पूरे वर्ष   भर नर्सरी तथा बगीचो की नमी में सक्रिय रहती है।  3. रोग के फैलाव के प्रमुख कारण: 
1. फायटोफ्थोरा के लिए अप्रतिरोधक मातृवृक्ष (रूटस्टाक) का उपयोग।
2. बगीचे में पट पानी देना तथा क्यारियों में अधिक समय तक पानी का रूकना।
3. गलत पदति से सिंचाई द्वारा प्रसार।
4. जमीन से 9 इंच से कम ऊचाई पर कलम बांधना।
5. एक ही जगह पर बार बार नर्सरी उगाना। 
6. रोग प्रभावित बगीचो के पास नर्सरी तैयार करना। 4. प्रबंधन: 
अ) पौधशाला  में फायटोफ्थोरा रोग का प्रबंधन 
1. बोनी के पूर्व फफूंद नाशक से बीजोपचार करना चाहिए। 
2. पौधो को पौधशाला सें सीधे बगीचे में नही ले जाना चाहिए। जड़ो का अच्छी तरह धोकर, मेटालेक्जिल एम. जेड 2.75 ग्राम प्रति लिटर के साथ कार्बिनडाजिम/ग्राम प्रति लिटर घोल से 10 मिनट तक उपचारित करना चाहिए। 
3. जमीन से लगभग 9 इंच के ऊपर कलम बंधना चाहिए। 
5. पौधशाला में प्लास्टिक ट्रे एवं निर्जिवीकृत (सुक्ष्मजीव रहित) मिट्टी का उपयोग करना चाहिए। 
6. पौधशाला  हेतु पुराने बगीचों से दूर अच्छी जल निकासी वाली जमीन का चयन करना चाहिए।  (ब) बागानों में फायटोफ्थोरा रोग का प्रबंधन रोकथाम के उपाय:
1. अच्छी जल निकासी वाली जमीन का चुनाव करे। 
2. अच्छी प्रतिरोधकता वाली मूलवृन्त का चुनाव करे। 
3. अधिक सिंचाई और जड़ो के टुटने से बचाना चाहिए। 
4. पौध रोपण के समय कलम जमीन की सतह से लगभग 6 से 9 इंच ऊचाई  पर होना चाहिए। 
5. तने को नमी से बचाने के लिए डबल रिंग सिंचाई पदति का उपयोग करना चाहिए। 
6. वर्षा के पहले और बाद में तने पर बोर्डेक्स पेस्ट लगाना चाहिए।  रोग नियंत्रण के उपाय: 
1. तने के रोग ग्रस्त भाग को चाकू से छिलकर मेटालेक्जिल एम जेड़ 72 का पेस्ट लगावे। छिले हुए भाग को जलाकर नष्ट करना चाहिए। 
2. मेटालेक्जिल एम जेड 72 डब्लू पी 2.75 ग्राम प्रति लीटर या फोस्टिल ए.एल 2.5 ग्राम प्रति लीटर की दर से रोग ग्रस्त पौधो पर अच्छी तरह छिड़काव करें। 
3. प्रतिरोधी मूलवृन्त जैसे रंगपूर लाइम पर फायटोफ्थोरा का आक्रमण कम होता है।     आम आम की खेती:- 2012-13 क्षेत्रफल (000 हे.) उत्पादकता (000 मै.टन) भारत 2312.3    1.044     म.प्र. 15026.8 1.255     प्रदेश में अधिकतर बाग अवैज्ञानिक तरीके से लगाये गये हैं वैज्ञानिक विधि अपनाकर,योजनाबद्ध तरीके से प्रबंधन किया जाय तो आम के फल उत्पादन में निष्चय ही बृद्धी की जा सकती है भूमि :- अच्छी जल धारण क्षमता वाली गहरी, बलुई दोमट सबसे उपयुक्त मानी जाती है। भूमि का पी.एच. मान 5.5-7.5 तक इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। जलवायु :- आम उष्णकटिबन्धीय पौधों वाला फल है फिर भी इसे उपोष्ण क्षेत्र में सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता है 25-27वब् तापमान तक इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। मानसून के दौरान 125 से. मी. वर्षा होती है जो इसके लिए उपयुक्त है। आम की उपयुक्त किस्में एवं उनका विवरण: किश्म का नाम पौधा कुल वनज ग्राम पल्प प्रतिषत टी.एस.एस. उत्पादन कीलो प्रति खास गुण आम्रपाली 200-300 73.75 23.5 40  नियमित फलन साघनवागवानी हेतु उपयुक्त दशाहरी 150-200 76.75 24.6 80 उत्तम स्वाद, छोटी गुठली लंगड़ा 200-250 76.75 22.5 75 रेशा रहित गूधा छोटी गुठली सुंदरजा 300-350 75.95 22.5 65 मनमोहक सुगंध-मीण मल्लिका 200-350 72.20 22.20 65 नियमित फलन पौधे तैयार करने का तरीका :- वानस्पतिक प्रसारण की नई विधियों जैसे भेंटए कलमए चष्मा चढा़ना वीनियर कलम इत्यादि है। विनियर ग्राफिटंग व्यापारिक स्तर पर आम के पौधें तैयार करने की आसान व कम खर्चीली विधि है इस विधि में मातृ पौधे से बाहर सांकुर डाली काटकर नर्सरी में लगे बीजू पौधों पर बाँधकर नया पौधा ;कलमीद्ध तैयार किया जाता है। कुछ दिन बाद डंठल जब गिर जाये और शीर्ष कलि में उभार में आ जाय तो ये टहनियां कलम बांधने के लिए प्रयोग में लाना चाहिए। 1 वर्ष पुराने बीजू पौधे को मूलबृन्त के रूप में उपयोग करें। पौध रोपण :- आम के पौधों को 10*10 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है, किन्तु सघन बागवानी में इसे 2.5 से 4 मीटर की दूरी पर लगाते हैं पौधे लगाने के लिए 1*1*1 मीटर का गढ्ढा खोदते हैं वर्षा प्रारंभ होने के पूर्व जून के माह में 20-30 कि. ग्रा. वर्मीकम्पोस्ट 2 कि.ग्रा. नीम की खली 1 कि. ग्रा. हड्डी का चूरा अथवा सिंगल सुपर फास्फेट एवं 100 ग्राम थीमेट (दीमक हेतु) 10 जी. को खेत की उपरी सतह की मिट्टी के साथ मिलाकर गड्ढ़े को अच्छी तरह भर देना चाहिए । पौधे की देख-रेख :- आम के पौधे की देखरेख उसके समुचित फलन एवं पूर्ण उत्पादन हेतु आवष्यक है पौधे को लगाने के बाद जब तक पौधा पूर्ण रूप से स्थापित न हो जाय, पानी देते रहना चाहिए। शुरूआत के दो तीन वर्षों तक आम के पौधों को विषेष देखरेख की आवष्यकता होती है। जाड़े मंे पाले से बचाने के लिए एवं गर्मी में लू से बचाने के लिए सिंचाई का प्रबंधन करना चाहिए। जमीन से 80 से. मी. तक की शाखाओं को निकाल देना चाहिए। फल वृक्षों को पोषण :- आम के पौधों में खाद एवं उर्वरक निम्नानुसार देना चाहिए- वर्ष गोबर की खाद (कि. ग्रा.) यूरिया (ग्राम) सिंगल सुपर फास्फेट (ग्राम) म्यूरेट आफ पोटाष (ग्राम) 1.3   2.5   200 150 150 4.10 10.00 900 800 600 10 वर्ष बाद 75.00 2000 1500 800 सिंचाई :- आम के छोटे पौधों को गर्मियों में 4-7 दिन के अन्तर से तथा ठंड में 10-12 दिन के अन्तर से सिंचाई करनी चाहिए लेकिन फल वाले पेड़ों की अक्टूबर से जनवरी तक सिंचाई नही करनी चाहिए क्योंकि कि अक्टूबर के बाद यदि भूमि में नमी अधिक रहती है तो फल कम आते हैं, तथा नई शाखाएं ज्यादा आ जाती है। पूरक पौधे एवं अन्तराषस्यन :- आम के वृक्ष को पूर्ण रूप से तैयार होेने में 10-12 वर्ष का समय लगता है, आरंभ में 3-4 वर्षों में जब पेड़ छोटे रहते हैं, उनके बीच खाली जगह में, खरीफ में जई, मूंग, लोबिया, रबी में मटर, चना, मसूर या फ्रेंचबिन तथा गर्मियों में लोबिया मिर्ची या भिण्डी की फसलं लेकर आम फसल प्राप्त की जा सकती है अन्तराषस्य फसलों से अतिरिक्त आय प्राप्त होती है, साथ ही भूमि की उर्वराषक्ति भी बढ़ती है। पुराने फल वृक्षों का जीर्णोद्धार :- हम जानते हैं, कि आम के पौधे का जीवन काल 50 साल या इससे भी अधिक का होता है आम के पौधे में जैसे जैसे वह पुराना होता जाता है इसके मुख्य तना में खोखलापन आने लगता है, तथा षाखाएं आपस में मिल जाती हैं, तथ बहुत सघन हो जाती हैं आम के ऐसे पौधों में बारिष का पानी खोखली जगह में भर जाता है ।जिससे सड़न व गलन कि समस्या उत्पन्न होती है तथा, पौधे कमजोर हो जाते हैं और थोड़ी सी हवा में टूट जाते हैं, ऐसे मे उपचार के लिए सबसे पहले सभी अनुत्पादक शाखाओं को हटा देना चाहिए 100 कि.ग्रा. अच्छी पकी हुई गोबर की खाद तथा 2.5 कि.ग्रा. नीम की खली प्रति पौधा देना चाहिए। जिससे अगले सीजन में लगी शाखाओं में वृद्धि होती है। पुष्पन एवं फलन :- आम की 6-8 माह पुरानी शाखाओं मे फरवरी माह में फूल पूर्ण रूप से विकसित होकर खिल जाते हैं कीट एवं रोग नियंत्रण :- कीट का नाम      लक्षण   नियंत्रण मैंगो हापर फरवरी मार्च में कीट आक्रमण करता है। जिससे फूल-फल झाड़ जाते है एवं फफूँद पैदा होती है।   क्विीनालाफास का एक एम.एल दवा एक लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। मिलीबग    फरवरी में कीट टहनियों एवं बौरों से रस चूसते हैं जिससे फूल फल झाड़ जाते है।   क्लोरपायरीफास का 200 ग्राम धूल प्रति पौधा भुरकाव करें। मालफारर्मेषन पौधों की पत्तियां गुच्छे का रूप धारण करती है एवं फूल में नर फूलों की संख्या बड़ पाती है। प्रभावित फूल को काटकर दो एम.एल. नेप्थलीन ऐसटिक एसिड का छिड़काव 15 दिन के अंतर से 2 बार करें। मैंगो मालफारर्मेषन (बंधा रोग) :- इस रोग में छोटे पौधों की पत्तियां छोटी होकर गुच्छे का रूप धारण कर लेती हैंे एवं बड़े पौधों में पुष्पों के सभी अंग मोटे हो जाते हैं पुष्पक्रम की बढ़वार कम हो जाती है तथा उसमें नर फूलों की संख्या बढ़ जाती है, पुष्पक्रम के फूल बड़े आकार के हो जाते हैं एवं पुष्पक्रम गुच्छे का रूप धारण कर लेता है, उन पर फल नहीं बनते व कुछ समय बाद पुष्पक्रम मुड़ जाता है। नियंत्रण समस्त प्रभावित पुश्पक्रम को 15 से. मी. पीछे से काटकर नष्ट करें एवं अक्टूबर माह में 2 एम. जी. नेप्थलीन ऐसिटिक एसिड हार्माेन का छिड़काव 15 दिन के अंतर से 2 से 3 बार करें एवं क्वीनालफास का 0.05 प्रतिषत का छिड़काव करें। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में आम से होने वाली आय एक हेक्टयर क्षेत्रफल में 10 * 10 मीटर में रोपण हेतु 100 पौधों की जरूरत पड़ती है जिसमें पौध रोपण हेतु निम्न साारणी अनुसार आय-व्यय होने की संभावना है। कुल व्यय        क्र. कार्य विवरण आदान   व्यय रु. में 1. पौध रोपाई फेन्सिंग, गड्ढा खुदाई, खाद एवं पौध रोपाई 55000.005000.00 2. वार्षिक रख रखाव सिंचाई, निदाई, गुड़ाई एवं पौध संरक्षण 35000.00/वर्ष     कुल खर्च      90,000.00 कुल आय कुल उपज (क्विं /हे.) कुल आय (रु.) शुद्ध आय (रु.). 80 2,40,000.00 1,50,000.00   भिण्डी भिंडी की कृषि कार्यमाला :- :- भिंडी । Abelmoschus esculentus (L.) Moench एक लोकप्रिय सब्जी है। सब्जियों में भिंडी का प्रमुख स्थान है जिसे लोग लेडीज फिंगर या ओकरा के नाम से भी जानते हैं। भिंडी की अगेती फसल लगाकर किसान भाई अधिक लाभ अर्जित कर सकते है। मुख्य रुप से भिंडी में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज लवणों जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस के अतिरिक्त विटामिन ‘ए’, बी, ‘सी’, थाईमीन एवं रिबोफ्लेविन भी पाया जाता है। इसमें विटामिन ए तथा सी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते है। भिंडी के फल में आयोडीन की मात्रा अधिक होती है। भिंडी का फल कब्ज रोगी के लिए विशेष गुणकारी होता है। म. प्र. में लगभग 23500 हे. में इसकी खेती होती है। प्रदेश के सभी जिलों में इसकी खेती की जा सकती हैं। अधिक उत्पादन तथा मौसम की भिंडी की उपज प्राप्त करने के लिए संकर भिंडी की किस्मों का विकास कृषि वैज्ञानिकों द्वारा किया गया हैं। ये किस्में येलो वेन मोजैक वाइरस रोग को सहन करने की अधिक क्षमता रखती हैं। इसलिए वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर उच्च गुणवत्ता का उत्पादन कर सकते हैं। भूमि व खेत की तैयारी :- भिंडी के लिये दीर्घ अवधि का गर्म व नम वातावरण श्रेष्ठ माना जाता है। बीज उगने के लिये 27-30 डिग्री से०ग्रे० तापमान उपयुक्त होता है तथा 17 डिग्री से०ग्रे० से कम पर बीज अंकुरित नहीं होते। यह फसल ग्रीष्म तथा खरीफ, दोनों ही ऋतुओं में उगाई जाती है। भिंडी को उत्तम जल निकास वाली सभी तरह की भूमियों में उगाया जा सकता है। भूमि का पी0 एच० मान 7.0 से 7.8 होना उपयुक्त रहता है। भूमि की दो-तीन बार जुताई कर भुरभुरी कर तथा पाटा चलाकर समतल कर लेना चाहिए। उत्तम किस्में :- पूसा ए -4 : यह भिंडी की एक उन्नत किस्म है।यह प्रजाति 1995 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान,नई दिल्ली द्वारा निकाली गई हैं।यह एफिड तथा जैसिड के प्रति सहनशील हैं।यह पीतरोग यैलो वेन मोजैक विषाणु रोधी है।फल मध्यम आकार के गहरे, कम लस वाले, 12-15 सेमी लंबे तथा आकर्षक होते है।बोने के लगभग 15 दिन बाद से फल आना शुरू हो जाते है तथा पहली तुडाई 45 दिनों बाद शुरू हो जाती हैं।इसकी औसत पैदावार ग्रीष्म में 10 टन व खरीफ में 15 टन प्रति है० है। परभनी क्रांति: यह किस्म पीत-रोगरोधी है।यह प्रजाति 1985 में मराठवाडा कृषि विश्वविद्यालय, परभनी द्वारा निकाली गई हैं।फल बुआई के लगभग 50 दिन बाद आना शुरू हो जाते है।फल गहरे हरे एवं 15-18 सें०मी० लम्बे होते है।इसकी पैदावार 9-12 टन प्रति है० है। पंजाब -7 : यह किस्म भी पीतरोग रोधी है। यह प्रजाति पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा निकाली गई हैं। फल हरे एवं मध्यम आकार के होते है। बुआई के लगभग 55 दिन बाद फल आने शुरू हो जाते है। इसकी पैदावार 8-12 टन प्रति है० है। अर्का अभय : यह प्रजाति भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा निकाली गई हैं।यह प्रजाति येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी है।इसके पौधे ऊँचे 120-150 सेमी सीधे तथा अच्छी शाखा युक्त होते हैं। अर्का अनामिका: यह प्रजाति भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा निकाली गई हैं।यह प्रजाति येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी है।इसके पौधे ऊँचे 120-150 सेमी सीधे व अच्छी शाखा युक्त होते हैं।फल रोमरहित मुलायम गहरे हरे तथा 5-6 धारियों वाले होते हैं।फलों का डंठल लम्बा होने के कारण तोड़ने में सुविधा होती हैं।यह प्रजाति दोनों ऋतुओं में उगाईं जा सकती हैं।पैदावार 12-15 टन प्रति है० हो जाती हैं। वर्षा उपहार: यह प्रजाति चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा निकाली गई हैं।यह प्रजाति येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी है।पौधे मध्यम ऊँचाई 90-120 सेमी तथा इंटरनोड़ पासपास होते हैं।पौधे में 2-3 शाखाएं प्रत्येक नोड़ से निकलती हैं।पत्तियों का रंग गहरा हरा, निचली पत्तियां चौड़ी व छोटे छोटे लोब्स वाली एवं ऊपरी पत्तियां बडे लोब्स वाली होती हैं।वर्षा ऋतु में 40 दिनों में फूल निकलना शुरू हो जाते हैं व फल 7 दिनों बाद तोड़े जा सकते हैं।फल चौथी पांचवी गठियों से पैदा होते हैं। औसत पैदावार 9-10 टन प्रति है० होती हैं।इसकी खेती ग्रीष्म ऋतु में भी कर सकते हैं। हिसार उन्नत: यह प्रजाति चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा निकाली गई हैं।पौधे मध्यम ऊँचाई 90-120 सेमी तथा इंटरनोड़ पासपास होते हैं।पौधे में 3-4 शाखाएं प्रत्येक नोड़ से निकलती हैं। पत्तियों का रंग हरा हो ता हैं।पहली तुड़ाई 46-47 दिनों बाद शुरू हो जाती हैं।औसत पैदावार 12-13 टन प्रति है० होती हैं।फल 15-16 सें०मी० लम्बे हरे तथा आकर्षक होते है।यह प्रजाति वर्षा तथा गर्मियों दोनों समय में उगाईं जाती हैं। वी.आर.ओ. -6: इस किस्म को काशी प्रगति के नाम से भी जाना जाता है।यह प्रजाति भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान,वाराणसी द्वारा 2003 में निकाली गई हैं।यह प्रजाति येलोवेन मोजेक विषाणु रोग रोधी है।पौधे की औसतन ऊँचाई वर्षा ऋतु में 175 सेमी तथा गर्मी में 130 सेमी होती है।इंटरनोड़ पासपास होते हैं।औसतन 38 वें दिन फूल निकलना शुरू हो जाते हैं ।गर्मी में इसकी औसत पैदावार 13.5 टन एवं बरसात में 18.0 टन प्रति है० तक ली जा सकती है। बीज की मात्रा व बुआई का तरीका – सिंचित अवस्था में 2.5 से 3 कि०ग्रा० तथा असिंचित दशा में 5-7 कि०ग्रा० प्रति हेक्टेअर की आवश्यकता होती है। संकर किस्मों के लिए 5 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर की बीजदर पर्याप्त होती है। भिंडी के बीज सीधे खेत में ही बोये जाते है। बीज बोने से पहले खेत को तैयार करने के लिये 2-3 बार जुताई करनी चाहिए। वर्षाकालीन भिंडी के लिए कतार से कतार दूरी 40-45 सें.मी. एवं कतारों में पौधे की बीच 25-30 सें.मी. का अंतर रखना उचित रहता है। ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुवाई कतारों में करनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 25-30 सें.मी. एवं कतार में पौधे से पौधे के मध्य दूरी 15-20 से.मी. रखनी चाहिए। बीज की 2 से 3 सें०मी० गहरी बुवाई करनी चाहिए। बुवाई के पूर्व भिंडी के बीजों को 3 ग्राम मेन्कोजेब कार्बेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। पूरे खेत को उचित आकार की पट्टियों में बांट लें जिससे कि सिंचाई करने में सुविधा हो। वर्षा ऋतु में जल भराव से बचाव हेतु उठी हुई क्यारियों में भिण्डी की बुवाई करना उचित रहता है। बुआई का समय :- ग्रीष्मकालीन भिंडी की बुवाई फरवरी-मार्च में तथा वर्षाकालीन भिंडी की बुवाई जून-जुलाई में की जाती है। यदि भिंडी की फसल लगातार लेनी है तो तीन सप्ताह के अंतराल पर फरवरी से जुलाई के मध्य अलग-अलग खेतों में भिंडी की बुवाई की जा सकती है। खाद और उर्वरक – भिंडी की फसल में अच्छा उत्पादन लेने हेतु प्रति हेक्टेर क्षेत्र में लगभग 15-20 टन गोबर की खाद एवं नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश की क्रमशः 80 कि.ग्रा., 60 कि.ग्रा. एवं 60 कि.ग्रा. प्रति हेक्टर की दर से मिट्टी में देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के पूर्व भूमि में देना चाहिए। नत्रजन की शेष मात्रा को दो भागों में 30-40 दिनों के अंतराल पर देना चाहिए। निराई व गुडाई :- नियमित निंदाई-गुडाई कर खेत को खरपतवार मुक्त रखना चाहिए। बोने के 15-20 दिन बाद प्रथम निंदाई-गुडाई करना जरुरी रहता है। खरपतवार नियंत्रण हेतु रासायनिक नींदानाशकों का भी प्रयोग किया जा सकता है। खरपतवारनाशी फ्ल्यूक्लरेलिन की 1.0 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व मात्रा को प्रति हेक्टर की दर से पर्याप्त नम खेत में बीज बोने के पूर्व मिलाने से प्रभावी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। सिंचाई :- सिंचाई मार्च में 10-12 दिन, अप्रैल में 7-8 दिन और मई-जून मे 4-5 दिन के अन्तर पर करें। बरसात में यदि बराबर वर्षा होती है तो सिंचाई की आवश्यकता नहीं पडती है । पौध संरक्षण :- भिंडी के रोगो में यलो वेन मोजैक वाइरस एवं चूर्णिल आसिता तथा कीटों में मोयला, हरा तेला, सफेद मक्खी, प्ररोहे एवं फल छेदक कीट, रेड स्पाइडर माइट मुख्य है।   रोग का नाम लक्षण नियंत्रण के उपाय पीत शिरा रोग (यलो वेन मोजैक वाइरस) पत्तियों की शिराएं पीली पडने लगती है। पूरी पत्तियाँ एवं फल भी पीले रंग के हो जाते है पौधे की बढवार रुक जाती है। आक्सी मिथाइल डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा डाइमिथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली प्रति लीटर पानी में अथवा इमिडाइक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस.एल. अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस. पी. की 5 मिली./ग्राम मात्रा प्रति 15 लीटर पानी चूर्णिल आसिता इस रोग में भिंडी की पुरानी निचली पत्तियों पर सफेद चूर्ण युक्त हल्के पीले धब्बे पडने लगते है। ये सफेद चूर्ण वाले धब्बे काफी तेजी से फैलते है। इस रोग का नियंत्रण न करने पर पैदावार 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है। इस रोग के नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम मात्रा अथवा हेक्साकोनोजोल 5 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर 2 या 3 बार 12-15 दिनों के अंतराल पर छिडकाव करना चाहिए। कीट का नाम लक्षण नियंत्रण के उपाय , प्ररोह एवं फल छेदक इस कीट का प्रकोप वर्षा ऋतु में अधिक होता है। प्रारंभिक अवस्था में इल्ली कोमल तने में छेद करती है जिससे तना सूख जाता है। फूलों पर इसके आक्रमण से फल लगने के पूर्व फूल गिर जाते है। फल लगने पर इल्ली छेदकर उनको खाती है जिससे फल मुड जाते हैं एवं खाने योग्य नहीं रहते है। रोकथाम हेतु क्विनॉलफॉस 25 प्रतिशत ई.सी., क्लोरपाइरोफॉस 20 प्रतिशत ई.सी. अथवा प्रोफेनफॉस 50 प्रतिशत ई.सी. की 2.5 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी के मान से छिडकाव करें तथा आवयकतानुसार छिडकाव को दोहराएं। हरा तेला, मोयला एवं सफेद मक्खी ये सूक्ष्म आकार के कीट पत्तियों, कोमल तने एवं फल से रस चूसकर नुकसान पहुंचाते है। रोकथाम हेतु आक्सी मिथाइल डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा डाइमिथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में अथवा इमिडाइक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस.एल. अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस. पी. की 5 मिली./ग्राम मात्रा प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें एवं आवश्यकतानुसार छिडकाव को दोहराए । रेड स्पाइडर माइट यह माइट पौधे की पत्तियों की निचली सतह पर भारी संख्या में कॉलोनी बनाकर रहता हैं। यह अपने मुखांग से पत्तियों की कोशिकाओं में छिद्र करता हैं । इसके फलस्वरुप जो द्रव निकलता है उसे माइट चूसता हैं। क्षतिग्रस्त पत्तियां पीली पडकर टेढ़ी मेढ़ी हो जाती हैं। अधिक प्रकोप हो ने पर संपूर्ण पौधे सूख कर नष्ट हो जाता हैं। इसकी रोकथाम हेतु डाइकोफॉल 18.5 ई. सी. की 2.0 मिली मात्रा प्रति लीटर अथवा घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें एवं आवश्यकतानुसार छिडकाव को दोहराए । कटाई व उपज :- भिन्डी की फली तुडाई हेतु सी. आई. ए. ई., भोपाल द्धारा विकसीत ओकरा पॉड पिकर यन्त्र का प्रयोग करें। किस्म की गुणता के अनुसार 45-60 दिनों में फलों की तुडाई प्रारंभ की जाती है एवं 4 से 5 दिनों के अंतराल पर नियमित तुडाई की जानी चाहिए। ग्रीष्मकालीन भिंडी फसल में उत्पादन 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टर तक होता है। भिंडी की तुडाई हर तीसरे या चौथे दिन आवश्यक हो जाती है। तोड़ने में थोड़ा भी अधिक समय हो जाने पर फल कडा हो जाता है। फल को फूल खिलने के 5-7 दिन के भीतर अवश्य तोड़ लेना चाहिए। उचित देखरेख, उचित किस्म व खाद- उर्वरकों के प्रयोग से प्रति हेक्टेअर 130-150 कुन्तल हरी फलियाँ प्राप्त हो जाती हैं। भिंडी की खेती का आर्थिक विश्लेषण :- क्र. विवरण मात्रा एवं दर प्रति इकाई लागत (रु) 1.  भूमि की तैयारी     क जुताई की संख्या – 03 / 400 / 400रु/घंटा, 2 घंटा /हेक्टर 2400 2. खाद और उर्वरक     क उर्वरक गोबर की खाद 20 टन/हे./ 400रु/टन 8000 8000 अ नत्रजन 80 * 12.5 1000 ब फॉस्फोरस 60 * 32.5 1950 स पोटाश 60 * 20 1200 ख मजदूरों की संख्या 2 पर 250रु/मजदूर 500 3. बीज एवं बुआई        क  बीज की मात्रा 5 किग्रा / 1000रु/किग्रा   5000 ख   बीज उपचार           अ   थायरम   3 ग्राम/किग्रा 15 ब  राइजोबियम 50 ग्राम/किग्रा 10 स पी.एस .बी.  50 ग्राम/किग्रा 10 ग  बुआई का खर्च  2 घंटा / हेक्टर / 400रु/ घंटा 800 घ   मजदूरों की संख्या 4 पर 250रु / मजदूर 1000 4. निंदाई/खरपतवार     क बसालीन 1 लीटर 900 ख निंदाई – मजदूरी 25 / 200 रु/ मजदूर  5000 5. फसल सुरक्षा          क  डाइमिथोएट (2 बार)   750 मिली/हेक्टर (1.5 लीटर) 525 ख    इमिडाइक्लोप्रिड  (2 ) 150 मिली/हेक्टर (300 मिली) 1200 ग   क्विनॉलफॉस (2 बार) 1250 मिली/हेक्टर ( 2.5 लीटर)  1000 घ डाइकोफॉल  1.0 लीटर/ हेक्टर 500 ड. घुलनशील गंधक(2 बार) 1250 ग्राम/हेक्टर ( 2.5 किग्रा) 1000 6.  सिंचाई       क मजदूरों की संख्या 14 सिंचाई / 750रु/ मजदूर 10500 ख विद्युत खर्च 100 रु/हेक्टर 1400 7. तुडाई 7   क मजदूरों की संख्या 105 मजदूर / 100रु/ मजदूर   10500 8.  कटाई व मडाई         क    मजदूरों की संख्या  20 मजदूर / 200रु/ मजदूर 4000 9.   कुल खर्च   58410 10  उपज  145 क्विंटल  हेक्टर / 10रु/ किग्रा  145000 11.         शुद्ध लाभ     86590         धनिया धनिया उत्पादन की उन्नत तकनीक प्राचीन काल से ही विश्व में भारत देश को ‘‘मसालों की भूमि‘‘ के नाम से जाना जाता है। धनिया के बीज एवं पत्तियां भोजन को सुगंधित एवं स्वादिष्ट बनाने के काम आते है। धनिया बीज में बहुत अधिक औषधीय गुण होने के कारण कुलिनरी के रूप में, कार्मिनेटीव और डायरेटिक के रूप में उपयोग में आते है । धनिया अम्बेली फेरी या गाजर कुल का एक वर्षीय मसाला फसल है । इसका हरा धनिया सिलेन्ट्रो या चाइनीज पर्सले कहलाता है । मध्यप्रदेश में धनिया की खेती 1,16,607 हे. में होती है जिससे लगभग 1,84,702 टन उत्पादन प्राप्त होता है। औसत उपज 428 किग्रा./हे. है। म.प्र. के गुना, मंदसौर, शाजापुर, राजगढ, विदिशा, छिंदवाडा आदि प्रमुख धनिया उत्पादक जिले है। उपयोग एवं महत्व: धनिया एक बहुमूल्य बहुउपयोगी मसाले वाली आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी फसल है। धनिया के बीज एवं पत्तियां भोजन को सुगंधित एवं स्वादिष्ट बनाने के काम आते है। धनिया बीज में बहुत अधिक औषधीय गुण होने के कारण कुलिनरी के रूप में, कार्मिनेटीव और डायरेटिक के रूप में उपयोग में आते है भारत धनिया का प्रमुख निर्यातक देश है । धनिया के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित की जाती है । जलवायु शुष्क व ठंडा मौसम अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिये अनुकूल होता है । बीजों के अंकुरण के लिय 25 से 26 से.ग्रे. तापमान अच्छा होता है । धनिया शीतोष्ण जलवायु की फसल होने के कारण फूल एवं दाना बनने की अवस्था पर पाला रहित मौसम की आवश्यकता होती है । धनिया को पाले से बहुत नुकसान होता है । धनिया बीज की उच्च गुणवत्ता एवं अधिक वाष्पशील तेल के लिये ठंडी जलवायु, अधिक समय के लिये तेज धूप, समुद्र से अधिक ऊंचाई एवं ऊंचहन भूमि की आवश्यकता होती है । भूमि का चुनाव एवं उसकी तैयारी धनिया की सिंचित फसल के लिये अच्छा जल निकास वाली अच्छी दोमट भूमि सबसे अधिक उपयुक्त होती है और असिंचित फसल के लिये काली भारी भूमि अच्छी होती है । धनिया क्षारीय एवं लवणीय भूमि को सहन नही करता है । अच्छे जल निकास एवं उर्वरा शक्ति वाली दोमट या मटियार दोमट भूमि उपयुक्त होती है । मिट्टी का पी.एच. 6.5 से 7.5 होना चाहिए । सिंचित क्षेत्र में अगर जुताई के समय भूमि में पर्याप्त जल न हो तो भूमि की तैयारी पलेवा देकर करनी चाहिए । जिससे जमीन में जुताई के समय ढेले भी नही बनेगें तथा खरपतवार के बीज अंकुरित होने के बाद जुताई के समय नष्ट हो जाऐगे । बारानी फसल के लिये खरीफ फसल की कटाई के बाद दो बार आड़ी-खड़ी जुताई करके तुरन्त पाटा लगा देना चाहिए उपयुक्त उन्नत किस्में धनिया का अधिकतम उत्पादन लेने हेतु उन्नत किस्मों का चयन करना चाहिये। किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म हिसार सुगंध 120-125 19-20 दाना मध्यम आकार का,अच्छी सुगंध, पौधे मध्यम ऊंचाई , उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक आर सी आर 41 130-140 9-10 दाने छोटे,टाल वैरायटी, गुलाबी फूल,उकठा एवं स्टेमगाल प्रतिरोधक,भभूतिया सहनशील, पत्तियों के लिए उपयुक्त, 0.25 प्रतिशत तेल कुंभराज 115-120 14-15 दाने छोटे सफेद फूल, उकठा ,स्अेमगाल, भभूतिया सहनशील, पौधे मध्यम ऊंचाई किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म आर सी आर 435 110-130 11-12 दाने बड़े, जल्दी पकने वाली किस्म, पौधों की झाड़ीनुमा वृद्धि, उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील आर सी आर 436 90-100 11-12 दाने बड़े, शीघ्र पकने वाली किस्म, उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील आर सी आर 446 110-130 12-13 दाने मध्यम आकार के , शाखायें सीधी, पौधें मध्यम ऊंचाई के, अधिक पत्ती वाले , हरी पत्तियों के लिए उपयुक्त, उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील, असिंचित के लिए उपयुक्त   किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म जी सी 2 (गुजरात धनिया 2) 110-115 15-16 दाने मध्यम आकार के, मध्यम ऊंचाई के पौधें, अध्र्दसीमित शाखायें, गहरी हरी पत्तियां, उकठा स्टेमगाल ,भभूतिया सहनशील, हरी पत्तियों के लिये उपयुक्त आरसीआर 684 110-120 13-14 दाने बड़े, अण्डाकार, भूसा कलर, बोनी किस्म, उकठा स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील, माहू प्रतिरोधक पंत हरितमा 120-125 15-20 दाने गोल, मध्यम आकार के, पौधे मध्यम ऊंचाई के , उकठा, स्टेमगाल,भभूतिया प्रतिरोधक, बीज एवं पत्तियों के लिए उपयुक्त   किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म सिम्पो एस 33 140-150 18-20 दाने बड़े, अण्डाकार, पौधे मध्यम ऊंचाई के, उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक, भभूतिया सहनशील, बीज के लिये उपयुक्त जे डी-1 120-125 15-16 दाने गोल,मध्यम आकार के, पौधे मध्यम ऊंचाई के,उकठा निरोधक, स्टेमगाल,भभूतिया सहनशील, सिंचित एवं असिंचित के लिए उपयुक्तढ ए सी आर 1 110-115 13-14 ददाने छोटे,गोल,पौधे मध्यम ऊंचाई के, उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक, भभूतिया सहनशील, पत्तियों के लिये उपयुक्त   किस्म पकने की अवधि (दिन) उपज क्षमता (क्विं./हे.) विशेष गुण धर्म सी एस 6 115-120 12-14 दाने गोल, मध्यम आकार के, पौधे मध्यम
ऊंचाई के, उकठा, स्टेमगाल प्रतिरोधक, भभूतिया सहनशील जे डी-1 120-125 15-16 दाने गोल, मध्यम आकार के पौधे मध्यम ऊंचाई के, उकठा निरोधक, स्टेमगाल, भभूतिया सहनशील, सिंचित एवं असिंचित के लिए उपयुक्त आर सी आर 480 120-125 13-14 दाने मध्यम आकार के, पौधे मध्यम ऊंचाई के उकठा, स्टेमगाल, भभूतिया निरोधक, सिंचित के लिये उपयुक्त आर सी आर 728 125-130 14-15 दाने छोटे,गोल, सफेद फूल, भभूतिया सहनशील, उकठा, स्टेमगाल निरोधक, सिंचित, असिंचित एवं हरी पत्तियों के लिये उपयुक्त बोनी का समय धनिया की फसल रबी मौसम में बोई जाती है । धनिया बोने का सबसे उपयुक्त समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर है । धनिया की सामयिक बोनी लाभदायक है। दानों के लिये धनिया की बुआई का उपयुक्त समय नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा हैं । हरे पत्तों की फसल के लिये अक्टूबर से दिसम्बर का समय बिजाई के लिये उपयुक्त हंै। पाले से बचाव के लिये धनिया को नवम्बर के द्वितीय सप्ताह मे बोना उपयुक्त होता है। बीज दर: सिंचित अवस्था में 15-20 कि.ग्रा./हे. बीज तथा असिंचित में 25-30 कि.ग्रा./हे. बीज की आवश्यकता होती है। बीजोपचार भूमि एवं बीज जनित रोगो से बचाव के लिये बीज को कार्बंेन्डाजिम$थाइरम (2:1) 3 ग्रा./कि.ग्रा. या कार्बोक्जिन 37.5 प्रतिशत + थाइरम 37.5 प्रतिशत 3 ग्रा./कि.ग्रा. + ट्राइकोडर्मा विरिडी 5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें । बीज जनित रोगों से बचाव के लिये बीज को स्टेªप्टोमाईसिन 500 पीपीएम से उपचारित करना लाभदायक है । खाद एवं उर्वरक असिंचित धनिया की अच्छी पैदावार लेने के लिए गोबर खाद 20 टन/हे. के साथ 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से तथा 60 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. स्फुर, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचित फसल के लिये उपयोग करें ।     उर्वरक देने की विधि एवं समय असिंचित अवस्था में उर्वरको की संपूर्ण मात्रा आधार रूप में देना चाहिए। सिंचित अवस्था में नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस, पोटाश एवं जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा बोने के पहले अंतिम जुताई के समय देना चाहिए । नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा खड़ी फसल में टाप  ड्रेसिंग के रूप में प्रथम सिंचाई के बाद देना चाहिए । खाद हमेशा बीज के नीचे देवें । खाद और बीज को मिलाकर नही देवें। धनिया की फसल में एजेटोबेक्टर एवं पीएसबी कल्चर का उपयोग 5 कि.ग्रा./हे. केहिसाब से 50 कि.ग्रा. गोबर खाद मे मिलाकर बोने के पहले डालना लाभदायक है । बोने की विधि बोने के पहले धनिया बीज को सावधानीपूर्वक हल्का रगड़कर बीजो को दो भागो में तोड़ कर दाल बनावें । धनिया की बोनी सीड ड्रील से कतारों में करें । कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दूरी 10-15 से. मी. रखें । भारी भूमि या अधिक उर्वरा भूमि में कतारों की दूरी 40 से.मी. रखना चाहिए । धनिया की बुवाई पंक्तियों मे करना अधिक लाभदायक है । कूड में बीज की गहराई 2-4 से.मी. तक होना चाहिए । बीज को अधिक गहराई पर बोने से अंकुरण कम प्राप्त होता है । अंतर्वर्तीय फसलें चना + धनिया, (10:2), अलसी$धनिया (6:2), कुसुम$धनिया (6:2), धनिया + गेहूँ (8:3) आदि अंतर्वर्तीय फसल पद्धतियां उपयुक्त पाई गई है । गन्ना + धनिया (1:3) अंतर्वर्तीय फसल पद्धति भी लाभदायक पाई गई है । फसल चक्र धनिया-मूंग ,धनिया-भिण्डी, धनिया-सोयाबीन , धनिया-मक्का आदि फसल चक्र लाभ दायक पाये गये है । सिंचाई प्रबंधन   धनिया  में पहली सिंचाई 30-35 दिन बाद (पत्ति बनने की अवस्था), दूसरी सिंचाई 50-60 दिन बाद (शाखा निकलने की अवस्था), तीसरी सिंचाई 70-80 दिन बाद (फूल आने की अवस्था) तथा चैथी सिंचाई 90-100 दिन बाद (बीज बनने की अवस्था ) करना चाहिऐ। हल्की जमीन  में पांचवी सिंचाई 105-110 दिन बाद (दाना पकने की अवस्था) करना लाभदायक है । खरपतवार प्रवंधन धनिया में फसल-खरपतवार प्रतिस्पर्धा की क्रांतिक अवधि 35-40 दिन है । इस अवधि में खरपतवारों की निंदाई नहीं करते है तो धनिया की उपज 40-45 प्रतिशत कम हो जाती है । धनिया में खरपतवरों की अधिकता या सघनता व आवश्यकता पड़ने पर निम्न में से किसी एक खरपतवानाशी दवा का प्रयोग कर सकते है । खरपतवार नाशी का तकनीकी नाम खरपतवार नाशी का व्यपारिक नाम दर सक्रिय तत्व (ग्राम/हे.) खरपतवार नाशी की कुल मात्रा मि.ली /हे. पानी मात्रा ली/ ह. उपयोग का समय (दिन) पेडिमिथलीन स्टाम्प 30 ई.सी 1000 3000 600-700 0-2 पेडिमिथलीन स्टाम्प एक्स्ट्रा 38.7 सी.एस. 900 2000 600-700 0-2 क्विजोलोफॉप इथाईल टरगासुपर 5 ई.सी. 50 100 600-700 15-20 कीट प्रबंधन माहू /चेपा (एफिड) : धनिया में मुख्यतः माहू/चेपा रसचूसक कीट का प्रकोप होता है । इस कीटे के हपत के हरें रंग वाले शिशु व प्रौढ़ दोनो ही पौधे के तनों, फूलों एवं बनते हुए बीजों जैसे कोमल अंगो का रस चूसते हैं। चेपा की रोकथाम के लिए निम्न कीटनाशी दवाईयों का प्रयोग करें । रासायनिक नाम दवा की मात्रा (एम एल/ली.) पानी की मात्रा
(ली./हे.)
आक्सीडेमेटानमिथाइल 25 ईसी
डायमेथियोट 35 ईसी 
इमिडाक्लोप्रिड 17.8ईसी 0.03: (1.5 एम एल/ली.)
0.20: (2.0 एम एल/ली.)
0.025 : (0.25एम एल/ली.) 500-600
500-600
500-600 रोग प्रबंधन उकठा उगरा विल्ट/रोग: उकठा रोग फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम एवं फ्यूजेरियम कोरिएनड्री कवक के द्वारा फैलता है । इस रोग के कारण पौधे मुरझा जाते है और पौधे सूख जाते है । ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं ।बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें ।बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डिजम 50 डब्ल्यू पी 3 ग्रा./कि.ग्रा. या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें ।उकठा के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 2.0 ग्रा./ली. याउकठा के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 2.0 ग्रा./ली. या हेक्जाकोनोजाॅल 5 ईसी 2 एमएल/ली. या मेटालेक्जिल 35 प्रतिशत 1 ग्रा./ली या मेटालेक्जिल$मेंकोजेब 72 एम जेड 2 ग्रा./ली. दवा का छिड़काव कर जमीन को तर करें ।
  तनाव्रण/तना सूजन/तना पिटिका (स्टेमगाॅल) यह रोग प्रोटामाइसेस मेक्रोस्पोरस कवक के द्वारा फैलता है । रोग के कारण फसल को अत्यधिक क्षति होती है । पौधो के तनों पर सूजन हो जाती है । तनों, फूल वाली टहनियों एवं अन्य भागों पर गांठें बन जाती है । बीजों में भी विकृतिया आ जाती है इस रोग का प्रबंधन के निम्न उपाय है । ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं ।बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें ।बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 3 ग्रा./कि.ग्रा. या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्रा./कि. ग्रा.बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें ।. रोग के लक्षण दिखाई देने पर स्टेªप्टोमाइसिन 0.04 प्रतिशत (0.4 ग्रा./ली.) का 20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें । चूर्णिलआसिता /भभूतिया/धौरिया (पावडरी मिल् यह रोग इरीसिफी पॉलीगॉन कवक के द्वारा फैलत रोग की प्रारंभिक अवस्था में पत्तियों एवं शाखा सफेद चूर्ण की परत जम जाती है। अधिक पत्तियों पीली पड़कर सूख जाती है । इस रोग का प्रबंधन निम्न प्रकार से करें । ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें एवं उचित फसल चक्र अपनाएं ।बीज की बुवाई नवम्बर के प्रथम से द्वितीय सप्ताह में करें ।बुवाई के पूर्व बीजों को कार्बेन्डाजिम 50 डब्ल्यू पी 3 ग्रा./कि.ग्रा. या ट्रायकोडरमा विरडी 5 ग्रा./कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें ।कार्बेन्डाजिम 2.0 एमएल/ली. या एजाॅक्सिस्ट्रोबिन 23 एस सी 1.0 ग्रा./ली. या हेक्जाकोनोजाॅल 5 ईसी 2.0एम एल/ ली. या मेटालेक्जिल$मेंकोजेब 72 एम जेड 2.0 ग्रा./ली. की दर से घोल बनाकर 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें । पाले (तुषार) से बचाव के उपाय सर्दी के मौसम में जब ताममान शून्य डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे गिर जाता है तो हवा मे उपस्थित नमी ओस की छोटी-छोटी बूंदें बर्फ के छोटे-छोटे कणों में बदल जाती है और ये कण पौधों पर जम जाते है । इसे ही पाला या तुषार कहते है । पाला ज्यादातर दिसम्बर या जनवरी माह में पड़ता है । पाले से बचाव के निम्न उपाय अपनायें । पाला अधिकतर दिसम्बर-जनवरी माह में पड़ता हइसलिये फसल की बुवाई में 10-20 नवंबर के बीच में करें यदि पाला पड़ने की संभावना हो तो फसल की सिंचाई तुरंत कर देना चाहिए ।जब भी पाला पड़ने की संभावना दिखाई दे, तो आधी रात के बाद खेत के चारो ओर कूड़ा-करकट जलाकर धुआॅ कर देना चाहिए।पाला पड़ने की संभावना होने पर फसल पर गंधक अम्ल 0.1 प्रतिशत (1.0 एम एल/ली.) का छिड़काव शाम को करें ।जब पाला पड़ने की पूरी संभावना दिखाई दे तो डाइमिथाइल सल्फोआक्साईड (डीएमएसओ) नामक रसायन 75ग्रा./1000ली. का 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में 10-15 दिन कें अंतराल पर करने से फसल पर पाले का प्रभाव नही पड़ता है ।व्यापारिक गंधक 15 ग्राम$ बोरेक्स 10 ग्राम प्रति पम्प का छिड़काव करें । कटाई फसल की कटाई उपयुक्त समय पर करनी चाहिए । धनिया दाना दबाने पर मध्यम कठोर तथा पत्तिया पीली पड़ने लगे , धनिया डोड़ी का रंग हरे से चमकीला भूरा/पीला होने पर तथा दानों मंे 18 प्रतिशत नमी रहने पर कटाई करना चाहिए । कटाई में देरी करने से दानों का रंग खराब हो जाता है । जिससे बाजार में उचित कीमत नही मिल पाती है । अच्छी गुणवत्तायुक्त उपज प्राप्त करने के लिए 50 प्रतिशत धनिया डोड़ी का हरा से चमकीला भूरा कलर होने पर कटाई करना चाहिए । गहाई धनिया का हरा-पीला कलर एवं सुगंध प्राप्त करने के लिए धनिया की कटाई के बाद छोटे-छोटे बण्डल बनाकर 1-2 दिन तक खेत में खुली धूप में सूखाना चाहिए । बण्डलों को 3-4 दिन तक छाया में सूखाये या खेत मे सूखाने के लिए सीधे खड़े बण्डलों के ऊपर उल्टे बण्डल रख कर ढेरी बनावें । ढेरी को 4-5 दिन तक खेत में सूखने देवंे । सीधे-उल्टे बण्डलों की ढेरी बनाकर सूखाने से धनिया बीजों पर तेज धूप नही लगने के कारण वाष्पशील तेल उड़ता नही है । उपज सिंचित फसल की वैज्ञानिक तकनीकि से खेती करने पर 15-18 क्विंटल बीज एवं 100-125 क्विंटल पत्तियों की उपज तथा असिंचित फसल की 5-7 क्विंटल/हे. उपज प्राप्त होती है । भण्डारण भण्डारण के समय धनिया बीज में 9-10 प्रतिशत नमी रहना चाहिए । धनिया बीज का भण्डारण पतले जूट के बोरों में करना चाहिए । बोरांे को जमीन पर तथा दिवार से सटे हुए नही रखना चाहिए । जमीन पर लकड़ी के गट्टों पर बोरांे को रखना चाहिए। बीज के 4-5 बोरों से ज्याद एक के ऊपर नही रखना चाहिए । बीज के बोरों को ऊंचाई से नही फटकना चाहिए । बीज के बोरें न सीधे जमीन पर रखंे और न ही दीवार पर सटाकर रखें । बोरियों मे भरकर रखा जा सकता है । बोरियों को ठण्डे किन्तु सूखे स्थानो पर भण्डारित करना चाहिए । भण्डारण में 6 माह बाद धनिया की सुगन्ध में कमी आने लगती है । प्रसंस्करण धनिया प्रसंस्करण द्वारा 97 प्रतिशत धनिया बीजों की पिसाई कर पावडर बनाया जाता है । जो मसाले के रूप में भोजन को स्वादिष्ट,सुगंधित एवं महकदार बनाने के उपयोग में आता है । शेष तीन प्रतिशत धनिया बीज, धनिया दाल एवं वाष्पशील तेल बनाने में उपयोग होता है । धनिया की ग्रेडिंग कर पूरा बीज,दाल एवं टूटा-फूटा, कीट-व्याधि ग्रसित बीज अलग किये जाते है । धनिया की ग्रेडिंग करने से 15-16 रू. प्रति किलो का खर्च आता है ।ग्रेडेड धनिया बैग या बंद कंटेनर में रखा जाता है । धनिया ग्रेडिंग की स्पेशिफिकेशंस (मापदण्ड)निम्न है । विवरण स्पेशिफिकेशन (मापदण्ड) स्पेशिफिकेश
न (मापदण्ड)
  अन्य बीज
दाल/टुकड़े
क्षतिग्रस्त बीज नमी
कलर पैकिंग
  अधिकतम 2 प्रतिशत
अधिकतम 5 प्रतिशत
अधिकतम 2 प्रतिशत
अधिकतम 10 प्रतिशत प्राकृतिक रंग
(बिना कलरिंग मटेरियल मिलाऐ) 25 कि.ग्रा. बीज (निर्यात के लिये)
100 ग्राम धनिया पावडर
200 ग्राम धनिया पावडर निर्यात के लिये निर्धारित मापदण्डों का अनुपालन करना आवश्यक है। आर्थिक विश्लेषण कुल लागत 18730 रु. /हे. धनिये की उपज 15.00 क्विं / हे. कुल आमदनी 60000 रू. शुद्ध आय 41270 रू. आमदनीःलागत अनुपात 3.20:1 शुद्ध आमदनीःलागत अनुपात 2.20:1 प्रचलित बाजार मूल्य 40.00 रू. / कि.ग्रा. धनिया फसल की उत्पादकता बढाने हेतु प्रमुख बिन्दु पाले से बचाव के लिए बुआई नवम्बर के द्वितीय सप्ताह में करें तथा गंधक अम्ल 0.1 प्रतिशत का छिड़काव शाम को करें। धनिया की खेती उपजाऊ भूमि में करे। तनाव्रण एवं चूर्णिलआसिता प्रतिरोधी उन्नत किस्मों का उपयोग करें। उकठा, तनाव्रण, चूर्णिलआसिता जैसे रोगों का समेकित नियंत्रण करें। खरपतवार का प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रण करें। भूमि में आवश्यक एवं सूक्ष्म तत्वो की पूर्ति करें । चार सिंचाई क्रांतिक अवस्थाओं पर करे। कटाई उपयुक्त अवस्था पर करे एवं छाया में सुखाये। इस हेतु कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी को अपनावे । गाजर गाजर उत्पादन तकनीक गाजर का जड़ वाली सब्जियों में प्रमुख स्थान है। इसे संपूर्ण भारत में उगाया जाता है। इसका उपयोग सलाद, अचार, हलुआ आदि बनाने में किया जाता है। गाजर में विटामिन ए’’ अधिक मात्रा में पाया जाता है। जलवायु गाजर को विभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता हैं। लेकिन, अच्छी उपज के लिए उचित जल निकास वाली भुर-भुरी दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है गाजर की उन्नत किस्में नैन्टिस वंशावली यू.एस.ए. चयनित अनुमोदन वर्ष केन्द्रीय प्रजाति विमोचन समिति-1985 अनुमोदित क्षेत्र सम्पूर्ण भारत के लिए औसत उपज 120 कुन्तल/हेक्टेयर विशेषताएं हरे पत्तों के साथ लघु शीर्ष, उत्तम आकृति की मूसली, छोटा, नारंगी,छोटी-पतली पुच्छ के साथ बेलनाकार जड़, नारंगी रंग का मधुर गूदा। पूसा मेघाली वंशावली पूसा केसरगनैन्टीस चयन अनुमोदन वर्ष केन्द्रीय प्रजाति विमोचन समिति-1994 अनुमोदित क्षेत्र मध्यप्रदेष एवं महाराष्ट्र औसत उपज 250 कुन्तल/हेक्टेयर विशेषताएं अगेती,कोर सहित नारंगी मूसली, लघु शीर्ष, उत्तम आकृति, मैदानी भागों में बीजोत्पादन, अगेती बुवाई हेतु उपयुक्त, 100-120 दिनों में तैयार। पूसा रुधिर वंशावली स्थानीय चयन जारी होने का वर्ष राज्य प्रजाति विमोचन समिति-2008 अनुमोदित क्षेत्र दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र औसत उपज 300 कुन्तल/हेक्टेयर विशेषताएं लम्बी स्वरंगी कोर सहित लाल मूसली, थोड़ी त्रिकोण आकृति लिए, मध्य सितम्बर से अक्टूम्बर तक बुवाई योग्य,मध्य दिसम्बर में मूसली तैयार, पूसा आंसिता वंशावली स्थानीय चयन जारी होने का वर्ष राज्य प्रजाति विमोचन समिति-2008 अनुमोदित क्षेत्र दिल्ली एवं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र औसत उपज 250 कुन्तल/हेक्टेयर विशेषताएं लम्बी स्वरंगी कोर सहित काली मूसली, सितम्बर से अक्टूम्बर तक बुवाई के लिए उपयुक्त, दिसम्बर-जनवरी में मूसली तैयार,90-110 दिनों में तैयार। अन्य उन्नत किस्में पूसा केसर, पूसा यमदग्नि, चैटेनी, इंपरेटर एवं संकर किस्मे आदि। नेन्टीस पूसा आसींता पूसा रुधिर भूमि सभी प्रकार की भूमि उपयुक्त रहती है। लेकिन रेतीली दोमट भूमि अधिक उपयुक्त रहती है। इसके लिए सर्वोत्तम पी.एच. 6.5 या इसके आसपास माना गया है। भूमि की तैयारी प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद 2-3 बार कल्टीवेटर चलाकर खेत को समतल कर लें। खाद एवं उर्वरक गोबर की खाद या कम्पोस्ट 150 क्ंिवटल, नत्रजन 75 किलो प्रति हेक्टेयर आवष्यक है। गोबर की खाद, स्फुर तथा पोटाष भूमि की तैयारी के समय तथा नत्रजन बुवाई के 15 तथा 30 दिनों बाद देना चाहिए। विकल्प-1 विकल्प-2 मात्रा कि.ग्रा./हे. मात्रा कि.ग्रा./हे. यूरिया सु. फॉ. एम.ओ.पी. डी.ए.पी. यूरिया एम.ओ.पी. 217 438 117 152 158 117 बोने का समय गाजर की बुवाई उसकी जातियों के ऊपर निर्भर करती हैं। मध्य अगस्त से नवम्बर तक का समय इसकी बुवाई के लिए उपयुक्त रहता है। बीज की मात्रा 5-6 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर आवष्यक होता है। बोने की विधि गाजर की बुवाई समतल क्यारियों में या डोलियों पर की जाती है। पंक्तियों और पौधों की आपसी दूरी क्रमषः 45 ग 7.5 सेमी. रखना चाहिए। क्यारी में बुआई लिए क्यारियों के बीच में गाजर के बीज का छींटकर बोते हैं। तथा बाद में छॅटाई की जाती है। सिंचाई पहली सिंचाई बीच बोने के तुरन्त बाद करें, तदुपरान्त 4-5 दिन बाद दूसरी हल्की सिंचाई करनी चाहिए। बाद में 10-15 दिन के अंतर में सिंचाई करनी चाहिए। निदाई-गुड़ाई यदि खेत मे खरपतवार उग आये हों तो आवष्यकतानुसार उन्हें निकालते रहना चाहिए। रासायनिक खरपतवार नाषक जैसे पेन्डिमीथेलिन 30 ई.सी. 3.0 कि.ग्रा. 1000 ली.पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 48 घंटे के अन्दर प्रयोग करने पर प्रारम्भ के 30-40 दिनों तक खरपतवार नहीं उगते हैं। खरपतवारों के नियंत्रण के लिए खेत की 2-3 बार निदाई-गुड़ाई करें। दूसरी निदाई-गुड़ाई करने के समय पौधों की छटनी कर दें। कीट नियत्रण गाजर की बीविल:- इस कीट के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ई. सी. की 2 मिली. मात्रा को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। रागों की रोकथाम आर्द्रगलन:- इस रोग के कारण बीज के अंकुरित होते ही पौधे संक्रमित हो जाते है। तने का निचला भाग जो भूमि की सतह से लगा रहता है, सड़ जाता है। फलस्वरूप पौधे वहीं से टूटकर गिर जाते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए बीज को बोने से पूर्व कार्बेन्डाझीम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। जीवाणु मृदुगलन इस रोग का प्रकोप विषेष रूप से गूदेदार जड़ों पर होता है, जिसके कारण जड़े सड़ने लगती है, ऐसी भूमियों में जिनमें जल निकास की उचित व्यवस्था नहीं होती है यह रोग अधिक लगता है। इस रोग की उचित रोकथाम के लिए खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करना चाहिए तथा रोग के लक्षण दिखाई देने पर नाइट्रोजन धारी उर्वरकों की टॉप ड्रेसिंग न करें। खुदाई गाजर की खुदाई का समय विशेष रूप से उसकी उगाई जाने वाली जातियों पर निर्भर करता है। वैसे जब गाजर की जड़ों के ऊपरी भाग 2.5-3.5 सेमी. व्यास के हो जाये तब उनकी खुदाई कर लेनी चाहिए। उपज गाजर की औसत उपज लगभग 220 से 225 किवंटल प्रति हेक्टेयर होती है। जो कि किस्मों के उपर निर्भर करती है। गाजर का आर्थिक विशलेषण लागत प्रति हेक्टेयर विवरण खर्चा(रु) खेत की तैयारी, जुताई एवं बुवाई का खर्चा 2000 बीज की लागत का खर्चा 3000 खाद एवं उर्वरक पर व्यय 6500 निंदा नियंत्रण पर व्यय 4000 कीट व्याधि नियंत्रण पर व्यय 1500 सिंचाई का व्यय 4000 खुदाई एवं सफाई पर व्यय 8000 अन्य 2000 कुल 31000 आय की गणना   औसत उपज (क्वि.हे.) बिक्री दर सकल आय लागत शुद्ध आय 120 800 96000 31000 65000 बिक्री दर बाजार भाव पर निर्भर रहती है जो समय-समय पर बदलती है।   ईसबगोल ईसबगोल की कृषि कार्यमाला ईसबगोल Plantago ovata Forsk. एक अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय फसल है।औषधीय फसलों के निर्यात में इसका प्रथम स्थान हैं। वर्तमान में हमारे देश से प्रतिवर्ष 120 करोड के मूल्य का ईसबगोल निर्यात हो रहा है। विश्व में ईसबगोल का सबसे बडा उपभोक्ता अमेरिका है। विश्व में इसके प्रमुख उत्पादक देश ईरान, ईराक, अरब अमीरात, भारत, फिलीपीन्स इत्यादि हैं। भारत का स्थान ईसबगोल उत्पादन एवं क्षेत्रफल में प्रथम है। भारत में इसका उत्पादन प्रमुख रूप से गुजरात ,राजस्थान ,पंजाब , हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश में करीब 50 हजार हेक्टर में हो रहा हैं। म. प्र. में नीमच, रतलाम, मंदसौर, उज्जैन एवं शाजापुर जिले प्रमुख है। उपयोग ईसबगोल का औषधीय उपयोग अधिक होने के कारण विश्व बाजार में इसकी मांग तेजी से बड रही हैं। ईसबगोल के बीज पर पाएं जाने वाला छिलका ही इसका औषधीय उत्पाद हैं जिसे ईसबगोल की भूसी के नाम से जाना जाता हैं। भूसी और बीज का अनुपात 25:75 रहता है।इसकी भूसी में पानी सोखने की क्षमता अधिक होती हैं ।इसलिए इसका उपयोग पेट की सफाई , कब्जीयत, दस्त आव पेचिस , अल्सर, बवासीर , जैसी शारीरिक बीमारियों के उपचार में आयुर्वेदिक दवा के रूप में किया जाता हैं।इसके अलावा आइसक्रीम रंग रोगन , प्रिंटिंग आदि उद्योगों में भी इसका उपयोग किया जाता हैं ।इसकी मांग एवं उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए इसकी खेती वैज्ञानिक तकनीक से करना आवश्यक हैं । भूमि एवं जलवायु – ईसबगोल के लिए ठंडी एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त हैं।फसल पकते समय वर्षा व ओस का होना फसल के लिए बहुत ही हानिकारक होता हैं । कभी कभी फसल 100 प्रतिशत तक नष्ट हो जाती हैं। अधिक आद्रता एवं नमीयुक्त जलवायु में इसकी खेती नहीं करना चाहिए । इसके अंकुरण के लिए 20-25 डिग्री सेल्सियस तथा फसल की परिपक्वता के समय 30-35 डिग्री सेल्सियस तापक्रम उपयुक्त हैं। इसके लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट भूमि उपयुक्त हैं। भूमि की पी-एच मान 7-8 तक होना चाहिए। भूमि की तैयारी – दो बार आडी खडी जुताई एवं एक बार बखर चलावें तथा पाटा चलाकर मिटटी भुरभुरी एवं समतल कर लेवें। छोटी क्यारियां बना लें। क्यारियों की लम्बाईचैडाई खेत के ढलान एवं सिंचाई की सुविधानुसार रखें।  क्यारियों की लम्बाई 8-12 मीटर व चैडाई 3 मीटर से अधिक रखना उचित नहीं होता हैं। खेत मेंजल निकास का प्रबंध अच्छा होना चाहिए। क्योंकि खेत में पानी का भराव ईसबगोल के पौधे सहन नहीं कर सकते हैं। उन्नत जातियां – जवाहर ईसबगोल 4 – यह प्रजाति 1996 में औषधीय एवं सुगन्धित पौध की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत कैलाश नाथ काटजू उद्यानिकी महाविघालय ,मंदसौर (राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय,ग्वालियर) द्वारा म.प्र. के लिए अनुमोदित एवं जारी की गई है। इसका उत्पादन 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता है।

गुजरात ईसबगोल 2 – यह प्रजाति 1983 में अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, आणंद, गुजरात से विकसित की गई हैं। इसका उत्पादन 9-10 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता हैं। 

हरियाणा ईसबगोल 5 – यह प्रजाति अखिल भारतीय समन्वित औषधीय एवं सुगन्धित पौध परियोजना, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा 1989 में निकाली गई हैं। इसका उत्पादन 10-12 क्विंटल प्रति हेक्टर लिया जा सकता हैं। 

अन्य किस्मों में गुजरात ईसबगोल 1, हरियाणा ईसबगोल – 2, निहारिका, ट्राबे सलेक्शन 1 से 10 आदि का चयन कर बुवाई की जा सकती है। बोआई का समय- ईसबगोल की अगेती बोआई करने पर फसल की ज्यादा वानस्पतिक वृद्धि हो जाती हैं परिणामस्वरुप फसल आडी पड जाती हैं तथा मदुरोमिल आसिता का प्रकोप बढ जाता हैं। वही पर देरी से बुवाई करने पर प्रकोप का वानस्पतिक विकास कम होता हैं और मानसून पूर्व की वर्षा से बीज झडने का अंदेशा बना रहता हैं। इसलिए किसान भाई ईसबगोल की बोआई अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर के द्वितीय सप्ताह तक करते हैं तो यह अच्छा समय होता हैं। दिसम्बर माह तक बोआई करने पर उपज में भारी कमी आ जाती हैं। बीज की मात्रा – बडे आकार का, रोग रहित बीज की 4 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टर की दर से उपयोग लेने पर फसल का अच्छा उत्पादन लिया जा सकता हैं। बीज दर ज्यादा होने की दशा में मदुरोमिल आसिता का प्रकोप बढ जाता हैं व उत्पादन प्रभावित हो जाता है। बीजोपचार – ईसबगोल के बीज को मैटालैक्जिल 35 एस. डी. की 5 ग्राम मात्रा प्रति किलो बीज के मान से बीजोपचार कर बुवाई करें। किसान भाई मृदा उपचार हेतु जैविक फफंदी नाशक ट्राइकोडर्मा विरिडी की 2.5 किग्रा मात्रा प्रति हेक्टर की दर से अच्छी पकी हुई गोबर की खाद अथवा वर्मीकम्पोस में मिला कर नमी युक्त खेत में प्रयोग करें। बोने की विधि किसानों में ईसबगोल की छिटकाव पद्धति से बुवाई करना प्रचलित हैं। परंतु इस विधि से अंतःसस्य किय्राएं करने में कठिनाई आती हैं। परिणामस्वरुप उत्पादन प्रभावित हो जाता है। अतः किसान भाई ईसबगोल की बुवाई कतारों में करते हुए कतार से कतार की दूरी 30 से. मी. एवं पौधे की दूरी 5 से. मी. रखे । बुवाई करते समय बीज में महीन बालू रेत अथवा छनी हुई गोबर की खाद मिलाकर बुवाई करें जिससे वंाछित बीज दर का प्रयोग हो सके। बीज की गहराई 2-3 से.मी. रखे। इससे ज्यादा गहरा बीज न बोयें । छिटकाव पद्धति से बोने पर मिट्टी में ज्यादा गहरा न मिलावें। खाद एवं उर्वरक :- ईसबगोल का अच्छा उत्पादन हेतु अच्छी पकी हुई गोबर की खाद 15-20 टन प्रति हेक्टर डालें। 10-15 किलो नत्रजन , 40 किलो स्फुर एवं 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टर बुवाई के समय डालें। नत्रजन की 10-15 किलो प्रति हेक्टर बुवाई के 40 दिन बाद छिटकाव कर डालें। सिंचाई :- अच्छे अंकुरण के लिए बुवाई के तुरंत बाद हल्की सिंचाई धीमी गति से करें। अंकुरण कमज़ोर होने पर दूसरी सिंचाई 5-6 दिन बाद देवें । इसके बाद प्रथम सिंचाई 30 दिन बाद एवं दूसरी सिंचाई 70 दिन बाद देवें। फूल एवं दाना भरने की अवस्था पर सिंचाई न दें। इनमें दो से ज्यादा सिंचाई देने पर रोगों का प्रकोप बढ जाता हैं तथा उपज में कमी आ जाती हैं। पुश्पक्रम / बाली आने के बाद स्प्रिकंलर से सिचाई ना करें । निंदाई-गुडाई :- बुवाई के 20-25 दिन बाद एक बार निंदाई-गुडाई अवश्य करें । इसी समय छनाई का काम भी कर देवें तथा पौधों की दूरी 5 से.मी. रखें । इस फसल में रासायनिक नींदा नियंत्रण के लिए सल्फोसल्फुरोन की 25 ग्राम मात्रा अथवा आइसोप्रोटूरोंन  की 500-750 ग्राम सक्रिय तत्व की मात्रा 500 लीटर पानी में घोलकर बोनी के 20 दिन पर छिडकाव करें। पौध संरक्षण :- डाउनी मिल्ड्यू (मदुरोमिल आसिता)-मृदुल रोमिल आसिता के लक्षण पौधों में बाली (स्पाइक) निकलते समय दिखाई देते हैं। सर्वप्रथम पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद या कत्थई रंग के धब्बे दिखाई देते हैं तथा पत्ती के निचले भाग में सफेद चूर्ण जैसा कवक जाल दिखाई देता हैं। बाद में पत्तियां सिकुड जाती हैं तथा पौधों की बढवार रुक जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप डंठल की लम्बाई , बीज बनना एवं बीज की गुणवत्ता प्रभावित होती हैं। रोग नियंत्रण हेतु स्वस्थ व प्रमाणित बीज बोयें , बीजोपचार करें एवं कटाई के बाद फसल अवशेषों को जला देवें। प्रथम छिडकाव रोग का प्रकोप होने पर मैटालैक्जिल $ मैंकोजेब की 2-2.5 ग्राम मात्रा अथवा कापर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें। छिडकाव 10-15 दिन के अंतराल पर दोहराए।

मोयला – माहू का प्रकोप सामान्यतः बुवाई के 60-70 दिन की अवस्था पर होता है।यह सुक्ष्म आकार का कीट पत्तियों, तना एवं बालियों से रस चूसकर नुकसान पहुंचाता है। अधिक प्रकोप होने की दषा में पूरा पौधा मधु स्त्राव से चिपचिपा हो जाता हैं तथा फसल पर क क्रिया बाधित हो जाती हैं जिससे उत्पादन प्रभावित होता हैं। इसकी रोकथाम हेतु आक्सी मिथाइल डेमेटान 25 प्रतिशत ई.सी. अथवा डाइमिथोएट 30 प्रतिशत ई.सी. की 1.5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में अथवा इमिडाइक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस.एल. अथवा एसिटामिप्रिड 20 प्रतिशत एस. पी. की 5 मिली/ग्राम मात्रा प्रति 15 लीटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें एवं आव यकतानुसार छिडकाव को दोहराए । फसल की कटाई :- फसल 110-120 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं , फसल पकने पर पौधों की ऊपरी पत्तियां पीली एवं नीचे की पत्तियां सूख जाती हैं। बालियों को हथेली में मसलने पर दाने आसानी से निकल जाते हैं। इसी अवस्था पर फसल की कटाई करें। कटाई सुबह के समय करने पर झडने की समस्या से बचा जा सकता हैं। फसल कटाई देर से न करें अन्यथा दाने झडने से उपज में बहुत कमी आ जाती हैं। मावठा आने की स्थिति में फसल कटाई 2-3 दिन जल्दी कर लेवें। उपज:- उन्नत तकनीक से खेती करने पर 15-16 क्विंटल प्रति हेक्टर उपज मिल जाती हैं । ईसबगोल की अधिक उपज के लिए क्या करें :- 1 समय पर बोनी करें । 

2 बीज की गहराई 2-3 सेमी से ज्यादा न रखें। 

3 बीजोपचार अवश्य करें । 

4 उन्नत बीज का उपयोग करें । 

5 पौधों की छनाई 20 – 25 दिन बाद अवश्य करें। 

6 क्रांतिक अवस्थाओं पर दो सिंचाई से ज्यादा न करें। 

7 डाउनी मिल्ड्यू रोग का उपचार फफूंदनाशक से अवश्य करें। 

8 रोगग्रस्त पौधों को उखाड कर नष्ट कर देवें। 

9 मोयला का नियंत्रण समय पर अवश्य करें । 

10 खरपतवार नियंत्रण समय पर करें । 

11 कटाई उपयुक्त अवस्था में करें । 

12 मावठा / बरसात को ध्यान में रखते हुए कटाई 2-3 दिन जल्दी कर लेवें । 

13 फसल की गहाई सुबह के समय खेत में ही करें। ईसबगोल की खेती का आर्थिक विश्लेषण क्र.  विवरण मात्रा एवं दर प्रति इकाई लागत (रु) 1. भूमि की तैयारी     क   जुताई की संख्या – 03 / 400रु/घंटा, 2 घंटा /हेक्टर 2400 2. खाद और उर्वरक       4.7 क  उर्वरक गोबरकी खाद      10 टन/हे./ 400रु/टन     4000 अ   नत्रजन      30 * 12.5  375 ब   फॉस्फोरस    40 * 32.5     1300 स   पोटाश    20 * 20 400 ख  मजदूरों की संख्या    2 पर 250रु/मजदूर       500 3. बीज एवं बुआई        क  बीज की मात्रा    5 किग्रा / 150 रु/किग्रा      750 ख बीज उपचार           अ  मैटालैक्जील        5 ग्राम/किग्रा     50 ब   राइजोबियम    50 ग्राम/किग्रा       10 स  पी.एस.बी.     50 ग्राम/किग्रा  10 ग  बुआई का खर्च    2 घंटा /हेक्टर / 400रु/ घंटा      800 घ  मजदूरों की संख्या      4 पर 250रु/मजदूर          1000 4. निंदाई/खरपतवार           क  आइसोप्रोटूरोंन 750 ग्राम  975 ख निंदाई – मजदूरी  25 / 200 रु/  मजदूर 5000 5. फसल सुरक्षा      क  डाइमिथोएट (2 बार)  750 मिली/हेक्टर (1.5 लीटर)   525 ख   मैटालैक्जील $ मैंकोजेब  1 किग्रा  900 6. सिंचाई        क मजदूरों की संख्या     3 सिंचाई / 750रु/ मजदूर   2250 ख  विद्युत खर्च  100 रु/हेक्टर  300 7.  कटाई       क    मजदूरों की संख्या      20 मजदूर / 200रु/ मजदूर    4000    मडाई 650रु/घंटा, 4 घंटा /हेक्टर 2600 8. कुल खर्च      28145 9. उपज   15 क्विंटल / हेक्टर / 8000 रु/ किग्रा    120000 10. शुद्ध लाभ    91855     केला 1. म.प्र. में केला का कुल क्षेत्रफल लगभग 26.02 हजार हेक्टर , उत्पादन 1448.13 टन एवं उत्पादकता 55.65 (APEDA। 2012..13)टन हेक्टर
2. प्रदेश में इसकी खेती बुरहानपुर, खरगौन, धार, बडवानी, शाजापुर, राजगढ आदि जिलों में प्रमुख रूप से की जाती है।
3. बुरहानपुर मे केले की खेती लगभग 20200 हेक्टेयर क्षेत्र मे की जाती है उत्पादकता लगभग 700 क्विन्टल/हेक्टर है।
4. मध्यप्रदेश में टपक सिंचाई द्वारा केले की खेती कर क्षेत्रफल 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।
5. केले के फल में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा पाई जाती है। केले के पौधों का उपयोग भिन्न भिन्न रूपों में किया जाता है, 6. पके फलों से प्रसंस्करण द्वारा जूस, पावडर एवं फिग्स बनाते हैं। कुपोषण एवं प्रोटीन की कमी से उत्पन्न विकारों को दूर करने में केला अनोखी भूमिका निभाता है।
  जलवायु और भूमि 1. केले की बागवानी के लिये उर्वर भूमि की आवश्यकता होती है। 5.5 से 8.5 पी.एच. मान वाली भूमि में की जा सकती है, परन्तु अच्छी वृद्धि, फल के विकास एवं अच्छे उत्पादन के लिये 6.0 से 7.0 पी.एच. मान वाली मिट्टी सबसे उपयुक्त है। 
2. केला मुख्य रूप से उष्ण जलवायु का पौधा है परन्तु इसका उत्पादन नम उपोष्ण से शुष्क उपोष्ण क्षेत्रों में किया जा सकता है। केले के अच्छे उत्पादन के लिये 20 से 35 डिग्री सेल्सियस का तापमान उपयुक्त रहता है। तापमान में अधिक कमी या वृद्धि होने पर पौधों की वृद्धि, फलों के विकास एवं उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 
  गुणवत्ता युक्त अधिक उपज हेतु मुख्य उत्पादन तकनीक अनुशासित प्रजाति का चुनाव 
डवार्फ कैवेन्डिश, रोबस्टा, ग्रेन्डनेन (टिशुकल्चर), महालक्ष्मी, बसराई गुणवत्ता युक्त पौध / प्रकंद का चुनाव 
1. रोपाई के लिये टिशुकल्चर (जी-9), पौध की लम्बाई 30 से.मी., मोटाई 5 से.मी. तथा 4-5 पूर्णरूप से खुली पत्तियां
2. सोर्ड सकर का चुनाव : पत्तिया पतली उपर की तरफ तलवारनूमा, खेती के लिये सबसे उपयुक्त होते है। तीन माह पुराने पौधे का कन्द जिसका वजन 700 ग्राम से 1 कि.ग्रा. का हो, उपयुक्त होता है।
3. वाटर सकर : चौड़ी पत्ती वाले देखने में मजबूत परन्तु आन्तरिक रूप से कमजोर, प्रवर्धन हेतु इनका प्रयोग वर्जित है।
4. सकर्स का चुनाव  संक्रमण  मुक्त बागान से करें।
  प्रकंद का उपचार 1. सकर्स की अच्छी सफाई कर रोपाई पूर्व कार्बेन्डिाजिम (0.1:), + इमिडाक्लोरोप्रिड (0.05.:) के जलीय घोल में लगभग 30 मिनट तक डालकर शोधन करते है। तत्पश्चात सकर्स को एक दिन तक छाया में सुखाकर रोपाई करें। 2. टिशु कल्चर पौध की रोपाई से एक सप्ताह पूर्व 1:कार्बोफ्यूरान एवं 1 प्रतिशत ब्लीचिंग पावडर का घोल बनाकर पोलीथिन बेग में छिडकाव करें। जिससे निमेटोड एवं बैक्टरियल राट जैसी बिमारीयों से बचा जा सकें।
  अनुशंसित दूरी एवं उचित पौध संख्या पद्धति किस्म दूरी (मीटर) पौधों की संख्या 
(प्रति हेक्टेयर) सामान्य रोपण ग्रैण्ड नाइन 1.6 * 1.6 3900 डवार्फ कैवेण्डिश 1.5 * 1.5 4444 रोबस्टा 1.8 * 1.8 3086 सघन रोपण रोबस्टा, कैवेन्डिश, बसराई 15 * 1.5 * 2.0 4500 ग्रैण्ड नाइन 1.2 * 1.2 * 2.0 5000 अनुशंसित समय पर रोपाई 
1.  मृग बहार     :   जून, जूलाई
2.  कांदा बहार    :   अक्टुबर, नवम्बर अनुशंसित खाद एवं उर्वरक  
200 ग्राम नत्रजन+ 60 ग्राम स्फुर +300 ग्राम पोटाश प्रति पौधा। उर्वरक देने हेतु निम्न विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है । विकल्प उर्वरक की मात्रा विकल्प नम्बर 1 434 ग्राम युरिया, 375 ग्राम सुपर (एसएसपी) एवं 500 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (एमओपी) विकल्प नम्बर 2 190 ग्राम एनपीके (12:32:16), 390 ग्राम युरिया एवं 430 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (एमओपी) विकल्प नम्बर 3 231 ग्राम एनपीके (10:26:26), 380 ग्राम युरिया एवं 370 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (एमओपी) विकल्प नम्बर 4 130 ग्राम डीएपी, 380 ग्राम युरिया एवं 500 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश (एमओपी) उर्वरक देने की विधि – खेत के तैयारी के समय गोबर/कम्पोस्ट की मात्रा – 25 टन प्रति हेक्टर एवं पौध लगाते समय 15 कि.ग्रा. गोबर की खाद प्रति पौधा, कार्बोक्यूरान 25 ग्राम एवं स्फुर व पोटाश की आधारिय मात्रा देकर ही रोपाई करे। उर्वरक हमेशा पौधे से 30 सेंटीमीटर की दूरी पर रिंग बनाकर नमी की उपस्थिति में व्यवहार कर मिट्टी में मिला दें।
  उर्वरक तालिका – उर्वरक देने का समय उर्वरक  उर्वरक की मात्रा (ग्राम) पौध लगाते समय सुपर फास्फेट + म्यूरेट आफ पोटाश 125:100 30 दिन के पश्चात युरिया 60 75 दिन के पश्चात युरिया + सुपर फास्फेट + सुक्ष्म पोषक तत्व 60:125:25 125 दिन के पश्चात युरिया + सुपर फास्फेट 60:125 165 दिन के पश्चात युरिया + पोटाश 60:100 210 दिन के पश्चात युरिया + पोटाश 60:100 255 दिन के पश्चात युरिया + पोटाश 60:100 300 दिन के पश्चात युरिया + पोटाश 60:100 केले में फर्टीगेशन द्वारा अनुशंसित उर्वरकों की मात्रा   मात्रा / पौधा (ग्राम) : 170 ग्राम नाइट्रोजन 45 ग्राम स्फुर 200 ग्राम पोटाश रोपाई के बाद 
( सप्ताह में ) नाइट्रोजन 
(ग्राम / पौधा) स्फुर 
(ग्राम / पौधा) पोटाश 
(ग्राम / पौधा) 9-18 50 45 30 19-30 90 – 90 31-42 30 – 60 43-46 – – 20 कुल 170 45 200 उपरोक्त उर्वरक के अलावा सूक्ष्म पोषक तत्व 10 ग्राम प्रति पौधा एवं मैग्नीशियम सल्फेट 25 ग्राम प्रति पौधा रोपाई के 75 दिन बाद फर्टीगेशन द्वारा दें।
  खरपतवार प्रबंधन केले की फसल को 90 दिन तक खरपतवार से मुक्त रखें। इसके प्रबंधन हेतु यांत्रिक विधियों जैसे बख्खर एवं 15 दिन के अंतराल पर डोरा चलाने से फसल वृद्धि एवं उत्पादकता में अनुकूल प्रभाव पड़ता है। केले में अन्र्तवर्ती फसल  राज्य मे केले के किसान इस फसल को एकाकी फसल के रूप मे ही करते चले आ रहे है लेकीन आज बदले हुए विपरित स्थिती मे केला कृषको को अपने खेती के परम्परागत तरीको मे बदलाव लाने की जरूरत है। केला उत्पादकों का उत्पादन लागत बढ़ती जा रहा है। केले के साथ अन्र्तवर्ती खेती कर लागत को कम किया जा सकता है। मृग बहार – मृग बहार मे मूंग, ग्रीष्म कालीन कटुआ धनिया, चैलाफली, टमाटर, सागवाली फसल लेना चाहिए परन्तु ध्यान रखा जावे कि कृषक के पास पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध हो, फसले केले की जड से 9 इंच से 1 फीट की दूरी पर बोई जाये। कांदा बहार -इस मौसम मे पालक, मेथी, सलाद, आलू, प्याज, टमाटर, मटर, धनिया, मक्का, गाजर, मूली, बैगन की फसल ली जा सकती है। इन्हें अतिरिक्त पोषक तत्व देना जरूरी रहता है। मौसमी फूल भी उगाये जा सकते है।
  सिंचाई प्रबंधन माह रबी खरीफ माह रबी खरीफ जून 5-6 12-14 नवम्बर 8-10 4-6 जूलाई 4-5 12-14 दिसम्बर 6-8 4-6 अगस्त 5-6 12-14 जनवरी 10-12 5-7 सितम्बर 6-8 14-16 फरवरी 12-14 5-7 ऑक्टोबर 8-10 4-6 मार्च 16-18 10-12       अप्रैल 18-20 12-14       मई 20-22 12-14 पानी की आवश्यकता प्रति पौधा प्रति दिन (लीटर) 
नोट – पानी की मात्रा जमीन के प्रकार एवं मौसमानुसार बदलाव करें। फसल चक्र
केला – गेहूँ  / मक्का / चना 
केला – मूँग –  मक्का 
  विशेष शस्य क्रियाएँ पत्तियों की कटाई छटाई 
मिटटी चढ़ाना सहारा देना
मल्चिंग 
अवांछित सकर्स (प्रकंद) की कटाई 
गुच्छों को ढकना एवं नर पुष्प की छटाई 
घड़ के अविकसित हत्थों को हटाना पौध संरक्षण लू से बचाव – गर्मी के दिनो में लू से बचाव के लिए खेत के चारो तरफ बागड वायु अवरोधक के रूप मे लगाना चाहिए, इसके लिए उत्तर एवं पश्चिम दिशा मे ढैंचा की दो कतार लगाते है। जिससे फसल को अधिक तापमान एवं लू से बचाया जा सकता है। कीट 1. तना छेदक कीट (ओडोपोरस लांगिकोल्लिस) 2. पत्ती खाने वाला केटर पिलर (इल्ली) 3. महू (एफिड)) बीमारी – 1. सिगाटोका लीफ स्पाट (करपा) 2. पत्ती गुच्छा रोग (बंची टॉप) 3. जड़ गलन 4. एन्थ्रेकनोज कीट प्रबंधन कीट के नाम लक्षण एवं नुकसान प्रबंधन तना छेदक कीट केले के तना छेदक कीट का प्रकोप 4-5 माह पुराने पौधो में होता है । शुरूआत में पत्तियाँ पीली पडती है तत्पश्चात गोदीय पदार्थ निकालना शुरू हो जाता है। वयस्क कीट पर्णवृत के आधार पर दिखाई देते है। तने मे लंबी सुरंग बन जाती है। जो बाद मे सडकर दुर्गन्ध पैदा करता है। 1. प्रभावित एव सुखी पत्तियों को काटकर जला देना चाहिए। 
2.नयी पत्तियों को समय – समय पर निकालते रहना चाहिए। 
3. घड काटने के बाद पौधो को जमीन की सतह से काट कर उनके उपर कीटनाषक दवाओ जैसे – इमिडाक्लोरोपिड (1 मिली. /लिटर पानी) के घोल का छिडकाव कर अण्डो एवं वयस्क कीटो को नष्ट करे। 4. पौध लगाने के पाचवे महीने में क्लोरोपायरीफॉस (0.1 प्रतिशत) का तने पर लेप करके कीड़ो का नियंत्रण किया जा सकता है। पत्ती खाने वाला केटर पिलर यह कीट नये छोटे पौधों के उपर प्रकोप करता है लर्वा बिना फैली पत्तियों में गोल छेद बनाता है। 1. अण्डों को पत्ती से बाहर निकाल कर नष्ट करें
2. नव पतंगों को पकड़ने हेतु 8-10 फेरोमेन ट्रेप / हेक्टेयर लगायें।
3. कीट नियंत्रण हेतु ट्राइजफॉस 2.5 मि.ली./लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें एवं साथ में चिपचिपा पदार्थ अवश्य मिलाऐं।   बीमारी के नाम लक्षण एवं नुकसान प्रबंधन सिगाटोका लीफ स्पाट यह केले में लगने वाली एक प्रमुख बीमारी है इसके प्रकोप से पत्ती के साथ साथ घेर के वजन एवं गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। शुरू में पत्ती के उपरी सतह पर पीले धब्बे बनना शुरू होते है जो बाद में बड़े भूरे परिपक्व धब्बों में बदल जाते है। 1. रोपाई के 4-5 महीने के बाद से ही ग्रसित पत्तियों को लगातार काटकर खेत से बाहर जला दें।
2. जल भराव की स्थिति में जल निकास की उचित व्यवस्था करे।
3. खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।
4. पहला छिड़काव फफूंदनाशी कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम 7 से 8 मि. ली. बनोल आयल का छिड़काव करे। दूसरा प्रोपीकोनाजोल 1 मि.ली. 7 से 8 मि. ली. बनोल आयल का छिड़काव करे एव तीसरा ट्राइडमार्फ 1 ग्राम 7 से 8 मि. ली. बनोल आयल का छिड़काव करे। पत्ती गुच्छा
रोग यह एक वायरस जनित बीमारी है पत्तियों का आकार बहुत ही छोटा होकर गुच्छे के रूप में परिवर्तित हो जाता है। 1. ग्रसित पौधों को अविलंब उखाड कर मिट्टी में दबा दें या जला दें। फसल चक्र अपनायें। 
2. कन्द को संक्रमण मुक्त खेत से लें।
3. रोगवाहक कीट के नियंत्रण हेतु इमीडाक्लोप्रिड 1 मि. ली. / पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। जड़ गलन इस बीमारी के अंतर्गत पौधे की जड़े गल कर सड़ जाती है एवं बरसात एवं तेज हवा के कारण गिर जाती है। 1. खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था करें।
2. रोपाई के पहले कन्द को फफूंदनाशी कार्बन्डाजिम 2 ग्राम/लीटर पानी के घाले से उपचारित करे।
3. रोकथाम के लिये काॅपर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम 0.2 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन/लीटर पानी की दर से पौधे में ड्रेचिग करें। फसल की कटाई एवं कटाई के उपरांत शस्य प्रबंधन भण्डारण – कटाई उपरांत केला की गुणवत्ता मे काफी क्षति होती है क्योकि केला उत्पादन स्थल पर भंडारण की समाप्ति व्यवस्था एवं कूल चेंम्बर की व्यवस्था नही होती है। कूल चेम्बर मे 10-12 0 ब तापक्रम रहने से केला के भार व गुणवत्ता मे हराष नही होता एवं बाजार भाव अच्छा मिलता है। इस विधि मे बहते हुए पानी मे 1 घंटे तक केले को रखा जाता है। भंण्डारण मे केले को दबाकर अथवा ढककर नही रखना चाहिए अन्यथा अधिक गर्मी से फल का रंग खराब हो जाता है। भंडार कक्ष में तापमाकन 10-12 0ब और सापेक्ष आर्द्रता 70 से अधिक ही होनी चाहिए। निर्यात के लिए डिहेडिंग वाशिंग एवं फफूंदनाशक दवाओं से उपचार प्राय: स्थानीय बाजार मे विक्रय के लिए गुच्छा परिवहन किया जाता है, परन्तु निर्यात के लिए हैण्ड को बंच से पृथक करते है, क्योकि इसमे सं क्षतिग्रस्त एवं अविकसित फल को प्रथक कर दिया जाता है। चयनित बड़े हैण्डस को 10 पीपीएम क्लोरीन क घोल मे धोया जाता है फिर 500 पीपीएम बेनोमिल घोल में 2 मिनट तक उपचारित किया जाता है। पैकिंग एवं परिवहन निर्यात हेतु प्रत्येक हैण्ड को एच.एम.एच, डीपीआई बैग में पैककर सीएफबी 13-20 किलो प्रति बाक्स की दर से भरकर रखा जाता है। ट्रक अथवा वेन्टिीलेटेड रेल बैगन मे 150ब तापक्रम पर परिवहन किया जाता है। जिससे फल की गुणवत्ता खराब नही होती है। उपज –  जून जुलाई रोपण वाली फसल की उपज 70-75 टन प्रति हेक्टेयर एवं अक्टूबर से नवम्बर में रोपित फसल की औसत उपज 50 से 55 टन प्रति हेक्टेयर होती है। केला प्रसंस्करण –  केले के फल से प्रसंस्करित पदार्थ जैसे केला चिप्स, पापड़, अचार, आटा, सिरका, जूस, जैम इल्यादि बना सकते है। इसके अलावा केले के तने से अच्छे किस्म के रेशे द्वारा साड़ियाँ, बैग, रस्सी एवं हस्त सिल्क के माध्यम से रोजगार सृजन किया जा सकता है। आय व्यय तालिका (मुख्य फसल) प्रति एकड़ विवरण परम्परागत विधि टिश्यू कल्चर दूरी (मीटर में) 
पंक्ति से पंक्ति 
पौध से पौध   1.5 
1.5   1.6
1.6 पौध संख्या (प्रति एकड़) 1742 1550 लागत रूपये में (प्रति पौधा) 22 33 लागत रूपये में (प्रति एकड़) 38324 51150 फसल अवधि (महीने में) 18 12-13 उपज (औसतन गुच्छे का वनज किलोग्राम/पौधा)
गैर फलन पौध संख्या लगभग 10 प्रतिशत उपज प्रति एकड़ (मैट्रिक टन) 15 174 23.52 23 0 35.65 विक्रय मूल्य रूपये में (प्रति मैट्रिक टन) 6000 6000 कुल आय (रूपये में) 1,41,120 2,13,900 शुद्ध आय (रूपये में) 1,02,796 1,62,750 केले की खेती के मुख्य बिंदु 1. टिश्यू कल्चर केले की खेती को बढ़ावा देना
2. संतुलित उर्वरक प्रबंधन एवं फर्टिगेशन द्वारा उर्वरक देने को बढ़ावा देना
3. केले के पौध/प्रकंद को उपचारित करके रोपाई करना
4. केले के साथ अंर्तवर्ती फसल को बढ़ावा देना
5. हरी खाद फसल को फसल चक्र में शामिल करना एवं जुर्लाइ रोपण को बढ़ावा देना
6. पानी की बचत एवं खरपतवार प्रबंधन हेतु प्लास्टिक मल्चिंग को बढ़ावा देना
7. प्रमुख कीट एवं बीमारी प्रबंधन हेतु समेकित कीट प्रबंधन को अपनाना
8. फसल को तेज/गर्म हवा या लू से बचाने हेतु खेत के चारो ओर वायु रोधक पौध का रोपण करना         लहसुन मध्य प्रदेश में लहसून उत्पादन हेतु उन्नत उत्पादन तकनीक लहसुन एक कन्द वाली मसाला फसल है। इसमें एलसिन नामक तत्व पाया जाता है जिसके कारण इसकी एक खास गंध एवं तीखा स्वाद होता है। लहसुन की एक गांठ में कई कलियाँ पाई जाती है जिन्हे अलग करके एवं छीलकर कच्चा एवं पकाकर स्वाद एवं औषधीय तथा मसाला प्रयोजनों  के लिए उपयोग किया जाता है। इसका इस्तेमाल गले तथा पेट सम्बन्धी बीमारियों में होता है। इसमें पाये जाने वाले सल्फर के यौगिक ही इसके तीखेस्वाद और गंध के लिए उत्तरदायी होते हैं। जैसे ऐलसन ए ऐजोइन इत्यादि। इस कहावत के रूप में बहुत आम है “एक सेब  एक दिन डॉक्टर को दूर करता है” इसी तरह एक लहसुन की कली एक दिन डॉक्टर को दूर करता है यह एक नकदी फसल है तथा इसमें कुछ अन्य प्रमुख पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं । इसका उपयोग आचार,चटनी,मसाले तथा सब्जियों में किया जाता है। लहसुन का उपयोग इसकी सुगन्ध तथा स्वाद के कारण लगभग हर प्रकार की सब्जियों एवं माँस के विभिन्न व्यंजनों में किया जाता है । इसका उपयोग हाई ब्लड प्रेशर, पेट के विकारों, पाचन विकृतियों, फेफड़े के लिये, कैंसर व गठिया की बीमारी, नपुंसकता तथा खून की बीमारी के लिए होता है इसमें एण्टीबैक्टीरिया तथा एण्टी कैंसर गुणों के कारण बीमारियों में प्रयोग में लाया जाता है। यह विदेशी मुद्रा अर्जित करने में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। म. प्र. में लहसून का क्षेत्रफल 60000 हे., उत्पादन 270 हजार मे. टन। लहसुन की खेती मंदसौर, नीमच, रतलाम, धार, एवं उज्जैन के साथ-साथ प्रदेश के सभी  जिलों में इसकी खेती की जा सकती है। आजकल इसका प्रसंस्करण कर पावडर, पेस्ट, चिप्स तैयार करने हेतु प्रसंस्करण इकाईया म.प्र. में कार्यरत है जो प्रसंस्करण उत्पादों को निर्यात करके विदेशी मुद्रा आर्जित कर रहे है। जलवायु लहसुन को ठंडी जलवायु की आवश्यकता होती है वैसे लहसुन के लिये गर्मी और सर्दी दोनों ही कुछ कम रहे तो उत्तम रहता है अधिक गर्मी और लम्बे दिन इसके कंद निर्माण के लिये उत्तम नहीं रहते है छोटे दिन इसके कंद निर्माण के लिये अच्छे होते है इसकी सफल खेती के लिये 29.35 डिग्री सेल्सियस तापमान 10 घंटे का दिन और 70% आद्रता उपयुक्त होती है 
  भूमि एवं खेत की तैयारी :- इसके लिये उचित जल निकास वाली दोमट भूमि अच्छी होती है। भारी भूमि में इसके कंदों का भूमि विकास नहीं हो पाता है। मृदा का पी. एच. मान 6.5 से 7.5 उपयुक्त रहता है। दो – तीन जुताइयां करके खेत को अच्छी प्रकार समतल बनाकर  क्यारियां एवं सिंचाई की नालियां बना लेनी चाहिये।
  लहसुन की किस्में :- यमुना सफेद 1 (जी-1) यमुना सफेद 1 (जी-1) इसके प्रत्येक शल्क कन्द ठोस तथा बाह्य त्वचा चांदी की तरह सफेद ए कली क्रीम के रंग की होती है। 150-160 दिनों में तैयार हो जाती है पैदावार 150-160 क्विन्टल प्रति हेक्टयर हो जाती है। यमुना सफेद 2 (जी-50) शल्क कन्द ठोस त्वचा सफेद गुदा , क्रीम रंग का होता है। पैदावार 130.140 क्विन्टल प्रति हेक्टयर हो जाती है। फसल 165-170 दिनों में तैयारी हो जाती है। रोगों जैसे बैंगनी धब्बा तथा झुलसा रोग के प्रति सहनशील होती है। यमुना सफेद 3 (जी-282) इसके शल्क कन्द सफेद बड़े आकार ब्यास (4.76 से.मी.) क्लोब का रंग सफेद तथा कली क्रीम रंग का होता है। 15-16 क्लाब प्रति शल्क पाया जाता है। यह जाति 140-150 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार 175-200 क्विंटल / हेक्टेयर है। यह जाति निर्यात की दृष्टी से बहुत ही अच्छी है यमुना सफेद 4 (जी-323) इसके शल्क कन्द सफेद बड़े आकार (ब्यास 4.5 से.मी.) क्लोब का रंग सफेद तथा कली क्रीम रंग का होता है। 18-23 क्लाब प्रति शल्क पाया जाता है। यह जाति 165-175 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार 200-250 क्विंटल / हेक्टेयर है। यह जाति निर्यात की दृष्टी से बहुत ही अच्छी है प्रदेश में उक्त किस्मों के अलावा स्थानीय किस्में महादेव, अमलेटा आदि को भी किसान अपने स्तर पर सफलतापूर्वक खेती  कर रहे है। 
  बुवाई का समय – लहसुन की बुवाई का उपयुक्त समय ऑक्टोबर -,नवम्बर होता है। 
  बीज एवं बुवाई – लहसुन की बुवाई हेतु स्वस्थ एवं बडे़ आकार की शल्क कंदो (कलियों) का उपयोग किया जाता है। बीज 5-6 क्विंटल / हेक्टेयर होती है। शल्ककंद के मध्य स्थित सीधी कलियों का उपयोग बुआई के लिए नही करना चाहिए। बुआई पूर्व कलियों को मैकोजेब+कार्बेंडिज़म 3  ग्राम दवा के सममिश्रण के घोल से उपचारित करना चाहिए। लहसुन की बुआई कूड़ों में, छिड़काव या डिबलिंग विधि से की जाती है। कलियों को 5-7 से.मी. की गहराई में गाड़कर उपर से हलकी मिट्टी से ढक देना चाहिए। बोते समय कलियों के पतले हिस्से को उपर ही रखते है। बोते समय कलियों से कलियों की दूरी 8 से.मी. व कतारों की दूरी 15 से.मी.रखना उपयुक्त होता है। बड़े क्षेत्र में फसल की बोनी के लिये गार्लिक प्लान्टर का भी उपयोग किया जा सकता है। खाद एवं उर्वरक खाद व उर्वरक की मात्रा भूमि की उर्वरता पर निर्भर करती है। सामान्यतौर पर प्रति हेक्टेयर 20-25 टन पकी गोबर या कम्पोस्ट या 5-8 टन वर्मी कम्पोस्ट, 100 कि.ग्रा. नत्रजन, 50 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 50 कि.ग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती है। इसके लिए 175 कि.ग्रा. यूरिया, 109 कि.ग्रा., डाई अमोनियम फास्फेट एवं 83 कि.ग्रा. म्यूरेट आफ पोटाश की जरूरत होती है। गोबर की खाद, डी.ए. पी. एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा यूरिया की आधी मात्रा खेत की अंतिम तैयारी के समय भूमि मे मिला देनी चाहिए। शेष यूरिया की मात्रा को खडी फसल में 30-40 दिन बाद छिडकाव के साथ देनी चाहिए। सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा का उपयोग करने से उपज मे वृद्धि मिलती है। 25 कि.ग्रा. जिन्क सल्फेट प्रति हेक्टेयर 3 साल में एक बार उपयोग करना चाहिए । टपक सिचाई एवं फर्टिगेशन का प्रयोग करने से उपज में वृद्धि होती है जल घुलनशील उर्वरकों का प्रयोग टपक सिर्चाइ के माध्यम से करें । 
  सिंचाई एवं जल निकास बुआई के तत्काल बाद हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। शेष समय में वानस्पतिक वृद्धि के समय 7-8 दिन के अंतराल पर तथा फसल परिपक्वता के समय 10-15 दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए। सिंचाई हमेशा हल्की एवं खेत में पानी भरने नही देना चाहिए। अधिक अंतराल पर सिंचाई करने से कलियां बिखर जाती हैं । 
  निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण जड़ों में उचित वायु संचार हेतु खुरपी या कुदाली द्वारा बोने के 25-30 दिन बाद प्रथम निदाई-गुडाई एवं दूसरी निदाई-गुडाई 45-50 दिन बाद करनी चाहिए। खरपतवार नियंत्रण हेतु प्लुक्लोरोलिन 1 कि.ग्रा. सक्रिय तत्व बुआई के पूर्व या पेड़ामेंथिलीन 1 किग्रा. सक्रिय तत्व बुआई बाद अंकुरण पूर्व 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करना चाहिए। प्रमुख कीट  थ्रिप्स – यह छोटे और पीले रंग के कीट होते है जो पत्तियों का रस चूसते है। जिससे इनका रंग चितकबरा दिखाई देने लगता है। इनके प्रकोप से पत्तियों के शीर्ष भूरे होकर एवं मुरझाकर सू ख जाते हैं। नियंत्रण:- 
इस कीट के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 5 मिली./15 ली. पानी या थायेमेथाक्झाम 125 ग्राम / हे. + सेंडोविट 1 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करना चहिए। शीर्ष छेदक कीट – इस कीट की मैगट या लार्वी पत्तियों के आधार को खाते हुये शल्क कंद के अंदर प्रवेश कर सड़न पैदा कर फसल को नुकसान पहुँचाती है । नियंत्रण:- 
1. उपयुक्त फसलचक्र व उन्नत तकनीक से खेती करें । 
2. फोरेट 1-1.5 कि.ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में छिडक कर मिलावें। 
3. इमिडाक्लोप्रिड 5 मिली./15 ली. पानी या थायेमेथाक्झाम 125 ग्राम / हे. + सेंडोविट 1 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अन्तराल पर छिडकाव करना चहिए। प्रमुख रोग बैंगनी धब्बा – बैंगनी धब्बा रोग (पर्पिल ब्लाच) इस रोग के प्रभाव से प्रारम्भ में पत्तियों तथा उर्ध्व तने पर सफेद एवं अंदर की तरफ धब्बे बनते है, जिससे तना एवं पत्ती कमजोर होकर गिर जाती है। फरवरी एवं अप्रेल में इसका प्रक्रोप ज्यादा होता है। रोकथाम एवं नियंत्रण 
1 .मैकोजेब+कार्बेंडिज़म 2.5 ग्राम दवा के सममिश्रण से प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुआई करें।
2. मैकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बेंडिज़म 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से कवनाशी दवा का 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिडकाव करें।
3. रोग रोधी किस्म जैसे जी-50 , जी-1, जी 323 लगावें।
झुलसा रोग – रोग से प्रक्रोप की स्थिति में पत्तियों की उर्ध्व स्तम्भ पर हल्के नारंगी रंग के धब्बे बनते है । नियंत्रण 
मैकोजेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या कार्बेंडिज़म 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से कवनाशी दवा का15 दिन के अंतराल पर दो बार छिडकाव करें अथवा कापर आक्सीक्लोराईड 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी सेंडोविट 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से कवनाशी दवा का15 दिन के अंतराल पर दो बार छिडकाव करें। कटाई लहसुन 50% गर्दन गिरावट के स्तर पर काटा जाना चाहिए। खुदाई एवं लहसुन का सुखाना – जिस समय पौधौं की पत्तियाँ पीली पड़ जायें और सूखने लग जाये सिंचाई बन्द कि देनी चाहिए । इसके बाद गाँठो को 3-4 दिनों तक छाया में सुखा लेते हैं। फिर 2 से 2.25 से.मी. छोड़कर पत्तियों को कन्दों से अलग कर लेते हैं । कन्दो को साधारण भण्डारण में पतली तह में रखते हैं। ध्यान रखें कि फर्श पर नमी न हो । लहसुन पत्तियों के साथ जुड़े बांधकर भण्डारण किया जाता है।

छटाई . लहसुन को बाजार या भण्डारण में रखने के लिए उनकी अच्छी प्रकार छटाई रखने से अधिक से अधिक लाभ मिलता है तथा भण्डारण में हानि काम होती है इससे कटे फटे बीमारी तथा कीड़ों से प्रभावित लहसुन छांटकर अलग कर लेते हैं।
  उपज लहसुन की उपज उसकी जातियों भूमि और फसल की देखरेख पर निर्भर करती है प्रति हेक्टेयर 150 से 200 क्विंटल उपज मिल जाती है | भण्डारण अच्छी प्रक्रिया से सुखाये गये लहसनु को उनकी छटाई कर के साधारण हवादार घरो में रख सकतेहैं। 5.6 महीने भण्डारण से 15.20 प्रतिशत तक का नुकसान मुख्य रूप से सूखने से होता है। पत्तियों सहित बण्डल बनाकर रखने से कम हानि होती है।   मिर्च मिर्च भारत की प्रमुख मसाला फसल है| वर्तमान में भारत में 7,92000 हेक्टेयर में मिर्च की खेती की जा रही है| जिसमे 12,23000 टन उत्पादन प्राप्त होता है| (वर्ष 2010-2011), भारत में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल तथा राजस्थान प्रमुख मिर्च उत्पादक राज्य हैं | जिनसे कुल उत्पादन का 80 प्रतिशत भाग प्राप्त होता है | बड़वानी जिले में मिर्च के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल 17050 हेक्टेयर तथा उत्पादन 77,6200 टन (हरी मिर्च ), 40,362 टन (लाल मिर्च ) प्राप्त होती है (वर्ष 2012-2013 )
  जलवायु और मृदा मिर्च की खेती विविध प्रकार की मिट्टियों मे जिसमे की कार्बनिक पदार्थ पर्याप्त हो एवं जल निकास की उचित सुविधा हो, मे सफलतापूर्वक की जा सकती है। मिर्च की फसल जलभराव वाली स्थिति सहन नही कर पाती है। यद्यपि मिर्च को pH 6.5—8.00 वाली मिट्टी मे भी (वर्टीसोल्स) मे भी उगाया जा सकता है | 
मिर्च की खेती के लिये 15 – 35 डिग्री सेल्सियस तापमान तथा गर्म आर्द जलवायु उपयुक्त होती है। तथा फसल अवधि के 130 – 150 दिन के अवधि मे पाला नही पडना चाहिये। 
  मिर्च की उन्नत किस्में काशी अनमोल (उपज 250 क्वि. / हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./ हे.), जवाहर मिर्च – 283 (उपज 80 क्वि. / हे हरी मिर्च.) जवाहर मिर्च -218 (उपज 18-20 क्वि. / हे सूखी मिर्च.) अर्का सुफल (उपज 250 क्वि. / हे.) तथा संकर किस्म काशी अर्ली (उपज 300-350 क्वि. / हे.), काषी सुर्ख या काशी हरिता (उपज 300 क्वि. / हे.) का चयन करें। पब्लिक सेक्टर की एचपीएच-1900, 2680, उजाला तथा यूएस-611, 720 संकर किस्में की खेती की जा रही है।
  मिर्च की पौध तैयार करना तथा नर्सरी प्रबंधन मिर्च की पौध तैयार करने के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहाँ पर पर्याप्त मात्रा में धूप आती हो तथा बीजो की बुवाई 3 गुणा 1 मीटर आकार की भूमि से 20 सेमी ऊँची उठी क्यारी में करें। मिर्च की पौधषाला की तैयारी के समय 2-3 टोकरी वर्मी कंपोस्ट या पूर्णतया सड़ी गोबर खाद 50 ग्राम फोटेट दवा / क्यारी मिट्टी में मिलाऐं। बुवाई के 1 दिन पूर्व कार्बन्डाजिम दवा 1.5 ग्राम/ली. पानी की दर से क्यारी में टोहा करे। अगले दिन क्यारी में 5 सेमी दूरी पर 0.5-1 सेमी गहरी नालियाँ बनाकर बीज बुवाई करें। बीज की मात्रा – मिर्च की ओ.पी. किस्मों के 500 ग्राम तथा संकर (हायब्रिड) किस्मों के 200-225 ग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र की नर्सरी तैयार करने के लिए पर्याप्त होती है। रोपाई की तकनीक एवं समय  – मिर्च की रोपाई वर्षा, शरद, ग्रीष्म तीनों मौसम  मे की जा सकती है। परन्तु मिर्च की मुख्य फसल खरीफ (जून-अक्टू.) मे तैयार की जाती है। जिसकी रोपाई जून.-जूलाई मे, शरद ऋतु की फसल की रोपाई सितम्बर-अक्टूबर तथा ग्रीष्म कालीन फसल की रोपाई फर-मार्च में की जाती है। पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक  – मिर्च की फसल मे उर्वकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करे। सामन्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्रफल मे 200-250 क्वि गोबर की पूर्णतः सडी हुयी खाद या 50 क्वि. वर्मीकंपोस्ट खेत की तैयारी के समय मिलायें। नत्रजन 120-150 किलों, फास्फोरस 60 किलो तथा पोटाष 80 किलो का प्रयोग करे।
  मिर्च में मल्चिंग के प्रयोग की तकनीक – मिर्च फसल की आधुनिक खेती में सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति लगाई जा रही है तथा खरपतवार नियंत्रण के लिए 30 माइक्रोन मोटाई वाली अल्ट्रावॉयलेट रोधी प्लास्टिक मल्चिंग शीट का प्रयोग किया जाता है | जिससे खरपतवार प्रबंधन के साथ साथ सिंचाई जल की मात्रा भी कम रहती है |
  मिर्च में फर्टीगेशन तकनीक द्वारा पोषक तत्व प्रबंधन – मिर्च के पौधों जिनको फरवरी में उठी हुई क्यारी पर लगाया गया हो ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का उपयोग करे तथा जल विलेय उर्वरको जैसे 19:19:19 को सिंचाई जल के साथ ड्रिप में देने से उर्वरक की बचत के साथ साथ उसकी उपयोग क्षमता में भी वृद्धि होती है तथा पौधों को आवश्यकतानुसार एवं शीघ्र पोषक तत्व उपलब्ध होने से उपज तथा गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है |
  मिर्च में पादप वृद्धि हार्मोन्स का प्रयोग मिर्च की फसल में प्लैनोफिक्स 10 पी पी एम का पुष्पन के समय तथा उसके 3 सप्ताह बाद छिड़काव करने से शाखाओं की संख्या में वृद्धि होती है एवं फल अधिक लगते हैं | तथा रोपाई के 18 एवं 43 दिन के बाद ट्राई केटेनॉल १ पी पी एम की ड्रेन्चिंग करने से पौधों की अच्छी वृद्धि होती है 
जिब्रेलिक एसिड 10-100 पी पी एम सांद्रता को घोल के फल लगने के बाद छिड़काव करने से फल ज्यादा लगते हैं | मार्केटिंग  – बड़वानी से हरी एवं लाल मिर्च का निर्यात सुदूर क्षेत्र मुंबई, पुणे, दिल्ली एवं अन्य क्षेत्रों को किया जा रहा है
 
मिर्च के महत्वपूर्ण कीट एवं प्रबंधन तकनीक कीट प्रमुख लक्षण रोकथाम / नियंत्रण के उपाय थ्रिप्स वैज्ञानिक भाषा मे इसे सिटरोथ्रिटस डोरसेलिस हुड कहते है। छोटी अवस्था मे ही कीट पौधों की पत्तियों एवं अन्य मुलायम भागों से रस चूसते है जिसके कारण पत्तियां उपर की ओर मुड कर नाव के समान हो जाती है। 1. बुवाई के पूर्व थायोमिथम्जाम 5 ग्राम प्रति किलो बीज दर से बीजोचार करे। 
2. नीम बीज अर्क का 4 प्रतिशत का छिडकाव करें।
3. रासायनिक नियंत्रण के अंतर्गत फिप्रोनिल 5 प्रतिशत एस.सी. 1.5 मि. ली. 1 ली. पानी मे मिला कर छिडकाव करें। 
4. एसिटामिप्रिड 0.2 ग्रा. 1 ली. या इमिडक्लोप्रिड 0.3 ग्रा. 1 ली. या थायोमिथम्जाम 0.3 ग्र्रा.1 ली. पानी में मिलाकर छिडकाव करें। सफ़ेद मक्खी इस कीट का वैज्ञानिक नाम बेमिसिया तवेकाई है | जिसके शिशु एवं वयस्क पत्तियों की निचली सतह पर चिपक कर रस चूसते हैं | जिसकी पत्तियां नीचे तरफ मुड़ जाती हैं | 1. कीट की सतत निगरानी कर तथा संख्या के आधार पर डाईमिथएट की 2 मि.ली. मात्रा 1 पानी मिलकर छिड़काव करें |
2. अधिक प्रकोप की स्थिति में थायमेथाइसम 25 डब्लू जी की 5 ग्राम मात्रा 15 ली. पानी में मिलकर छिड़काव करें | माइट कीट का वैज्ञानिक नाम – हेमीटारयोनेमसलाटस बैंक है। यह बहुत ही छोटे कीट होते है जो पत्तियों की सतह से रस चूसते है जिसम पत्तियां नीचे की ओर मुड जाती है। 1. नीम की निबोंली के सत का 4 प्रतिशत का छिडकाव करे।
2. डायोकोफाल 2.5 मि.ली. या ओमाइट 3 मि.ली. / ली. पानी मे मिलाकर छिडकाव करें। मिर्च के महत्वपूर्ण रोग एवं प्रबंधन तकनीक रोग प्रमुख लक्षण रोकथाम / नियंत्रण के उपाय डेम्पिंग ऑफ़ आर्द्रगलन इस रोग का कारण पीथियम एफिजडरमेटम, फाइटोफ्थोरा स्पी. फफूंद  जिसम नर्सरी में पौधा भूमि की सतह के पास से गलकर गिर जाता है। 1. मिर्च की नर्सरी उठी हुयी क्यारी पद्धति से तैयार करे जिसम जल निकास की उचित व्यवस्था हो। 
2. बिजोचार कार्बेन्डाजिम 1 ग्रा.दवा 1 किलो बिज से करें। एन्थे्रक्लोज कोलेटोट्राइकम कैप्सीकी नामक फफूंद से होने वाला अतिव्यापक एवं महत्वपूर्ण रोग  है। विकसित पौधों पर शाखाओं का कोमल शीर्ष भाग ऊपर से नीचे की ओर सूखना प्रारम्भ होता है। 1. फसल चक्र अपनाएं तथा स्वस्थ व प्रमाणित बीज बोये बुवाई पूर्व बिजोंचार अवश्य करें।
2. रोग का प्रारंभिक अवस्था मे ही लाइटक्स 50, अइथेन 45, के 0. 25 प्रतिशत धोल का 7 दिन अंतराल पर अवश्यकता अनूसार छिडकाव करें। जीवाणु जम्लानी (बैक्टीरियलविल्ट) इस रोग का कारण स्यूडोमोनस सोलेनेसियेरम नमक जीवाणु है | शिमला मिर्च, टमाटर तथा बैगन में इसका अधिक प्रकोप होता है | पौध रोपण पूर्व बोरडेक्स मिश्रण के 
1 घोल या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 3 ग्राम दवा 1 ली. पानी में घोलकर मृदा उपचार अवश्य करें या टोह करें 
ट्राइकोडर्मा विरिडी या हरजीयनम 4 ग्राम और मेटलेक्सिल 6 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें पर्ण कुंचन यह रोग विषाणु के कारण होता है जो कि तंबाकूपर्ण कुंचन विषाणु से होता है। रोग के कारण पौधें की पत्तियां छोटी होकर मुड जाती है तथा पौधा बोना हो जाता है यह रोग सफेद मक्खी कीट के कारण एक दूसरे पौधे पर फैलता है 1. नर्सरी मे रोगी पौधौं को समय-समय पर हटाते रहे। तथा स्वस्थ पौधौं का ही रोपण करे।
2. रसचूसक कीटो के नियंत्रण हेतू अनुशंसित दवाओं का प्रयोग करे । मिर्च में खरपतवार प्रबंधन  सामान्यतः मिर्च मे पहली निंदाई 20-25 तथा दूसरी निंदाई 35-40 दिन पश्चात करें या डोरा या कोलपा चलायें। हाथ से निदाई या डोरा कोलपा को ही प्राथमिकता दे। जिससे खरपतवार नियंत्रण के साथ साथ मृदा नमी का भी संरक्षण होता है। मल्चिंग का प्रयोग करें। उपज / उत्पादन (क्वि./हे .) – वैज्ञानिक विधि से उन्नत किस्मों से 20-25 क्वि. तथा संकर किस्मों से 30-40 क्वि. उत्पादन प्राप्त होता है। मिर्च का भण्डारण  – हरी मिर्च के फलों को 7-10 से. तापमान तथा 90-95 प्रतिशत आर्द्रता पर 14-21 दिन तक भंण्डारीत किया जा सकता है । भण्डारण हवादार वेग मे करे । लाल मिर्च को 3-10 दिन तक सूर्य की तैज धुप मे सुखा कर 10 प्रतिशत नमी पर भण्डारण करे ।
  मिर्च की खेती पर होने वाले लागत लाभ का विवरण प्रति हेक्टेयर विवरण उन्नत किस्म संकर किस्म कुल लागत 53090 100662 उत्पादन (क्वि./हे.) 150 300 विक्रय (८०० रु. प्रति क्वि.) 120000 240000 लाभ लागत अनुपात 2.30 2.50 प्रति कि.ग्रा. उत्पादन लागत (रूपये /किलो ) 3.50 3.30 शुद्ध लाभ (रूपये में ) 66910 139338 मिर्च की उत्पादकता वृद्धि हेतु महत्वपूर्ण सुझाव     मिर्च की उन्नत किस्मो काशी अनमोल (उपज 250 क्वि./हे.), काशी विश्वनाथ (उपज 220 क्वि./हे.), जवाहर मिर्च – 218 (उपज 18-20 क्वि./हे. सूखी मिर्च), अर्का सुफल (उपज 250 क्वि./हे.) तथा संकर किस्म काशी अर्ली (उपज 300-350 क्वि./हे.), काशी सुर्ख या काशी हरिता (उपज 300 क्वि./हे.) का चयन करें मिर्च की नर्सरी उठी हुई क्यारी में कीट अवरोधी नेट के अंदर तैयार करें तथा नर्सरी में बीजोपचार के पश्चात ही बीज बोयें | खेत में रोपण 20 से.मी. उठी हुई मेड पर करें | मिर्च की फसल में खाद एवं उर्वरकों का संतुलित मात्रा में प्रयोग करें (120-150 H: 60 PO: 80 KO Kg./Ha.) तथा जल विलेय उर्वरक (19:19:19) का पत्तियों पर छिड़काव करें | मिर्च में खरपतवार नियंत्रण हेतु डोरा कोल्पा चलायें | मल्चिंग का प्रयोग करें | मिर्च में वायरस वाहक कीटों थ्रिप्स एफिड माइट्स सफ़ेद मक्खी का समय पर नियंत्रण करें     मूली म.प्र. में गाजर एवं मूली की खेती प्रायः सभी जिलों में की जाती है। सामान्यतः सब्जी उत्पादक कृषक सब्जियों की अन्य फसलों की मेढ़ों पर या छोटे-छोटे क्षेत्रों में लगाकर आय अर्जित करते है। शीत ऋतु में ही कृषक दोनों फसलों को 50-60 दिन में तैयार कर पुनः बोवनी कर दो बार उपज प्राप्त कर लेते हैं यह दोनों फसलें कम खर्च में अधिक उत्पादन देने वाली सलाद के लिए उत्तम फसलें हैं। जड़ वाली सब्जियों में इनका प्रमुख स्थान है। इनकी खेती सम्पूर्ण भारत वर्ष में की जाती है।
महत्व – मूली का उपयोग प्रायः सलाद एवं पकी हुई सब्जी के रूप में किया जाता है इसमें तीखा स्वाद होता है। इसका उपयोग नाष्ते में दही के साथ पराठे के रूप में भी किया जाता है। इसकी पत्तियों की भी सब्जी बनाई जाती है। मूली विटामिन सी एवं खनीज तत्व का अच्छा स्त्रोत है। मूली लिवर एवं पीलिया मरीजों के लिए भी अनुसंषित है। जलवायु मूली के लिए ठण्डी जलवायु उपयुक्त होती है लेकिन अधिक तापमान भी सह सकती है। मूली की सफल खेती के लिए 10-150से. तापमान सर्वोत्तम  माना गया है। भूमि – सभी प्रकार की भूमि उपयुक्त रहती है लेकिन रेतीली दोमट भूमि अधिक उपयुक्त रहती है। भूमि की तैयारी- मूली के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है। एक जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद 2-3 बार कल्टीवेटर चलाकर भूमि को समतल कर लें। मूली की उन्नत किस्में :- पूसा चेतकी   वंशावली डेनमार्क जनन द्रव्य से चयनित जारी होने का वर्ष राज्य प्रजाति विमोचन समिति-1988 अनुमोदित क्षेत्र सम्पूर्ण भारत औसत उपज 250 कुन्तल/हेक्टेयर विशेषतायें पूर्णतया सफेद मूसली, नरम, मुलायम, ग्रीष्म-ऋतु की फसल में कम तीखी जड़ 15-22 से.मी. लम्बी, मोटी जड़, पत्तियां थोड़ी कटी हुई, गहरा हरा एवं उध्र्वमुखी, 40-50 दिनों में तैयार ग्रीष्म एवं वर्षा ऋतु हेतु
उपयुक्त फसल (अप्रैल-अगस्त ) जापानीज़ व्हाइट   जारी होने का वर्ष केन्द्र द्वारा अनुशंसित विदेशी किस्म1988 अनुमोदित क्षेत्र उच्च एवं निम्न पहाड़ी क्षेत्र औसत उपज 25-30 टन/हेक्टेयर विशेषतायें जड़ें सफेद लम्बी, बेलनाकार, एवं 60 दिनों में तैयार गस्त ) पूसा हिमानी   अनुमोदित वर्ष 1970 अनुमोदित क्षेत्र उच्च एवं निम्न पहाड़ी क्षेत्र औसत उपज 32-5 टन/हेक्टेयर विशेषतायें जड़ें 30-35 से. मी. लम्बी, मोटी, तीखी,अंतिम छोर गोल नहीं होते सफेद एवं टोप हरे होते है। हल्का तीखा स्वाद एवं मीठा फ्लेवर, बोने के 50 से 60 दिन में परिपक्व, दिसम्बर से फरवरी में तैयार पूसा रेशमी   अनुमोदित क्षेत्र सम्पूर्ण भारत औसत उपज 32.5 टन/हेक्टेयर विशेषतायें जड़ें 30-35 से.मी. लम्बी, मध्यम मोटाई, शीर्ष में हरापन लिए हुए सफेद मोटी, तीखी होती है। यह किस्म बुवाई के 55 से 60 दिन में तैयार हो जाती है। अन्य उन्नत किस्मे :- जोनपुरी मूली, जापानी सफेद, कल्याणपुर, पंजाब अगेती, पंजाब सफेद, व्हाइट लौंग, हिसार मूली एवं संकर किस्मे आदि।             खाद एवं उर्वरक 150 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट, 100 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो स्फुर तथा 100 किलो पोटाष प्रति हेक्टेयर आवष्यक है। गोबर की खाद, स्फुर तथा पोटाष खेत की तैयारी के समय तथा नाइट्रोजन दो भागों में बोने के 15 और 30 दिन बाद देना चाहिए। विकल्प – 1 विकल्प – 2 विकल्प – 3 मात्रा कि.ग्रा./ हे. मात्रा कि.ग्रा. / हे. मात्रा कि.ग्रा. / हे. यूरिया सु. फॉ. एम.ओ.पी. डी.ए.पी. यूरिया एम.ओ.पी. 12%32%16 यूरिया एम.ओ.पी. 217 313 167 109 174 167 188 168 117 बीज कि मात्रा मूली के बीज की मात्रा उसकी जाति, बोने की विधि और बीज के आकार पर निर्भर करती है। 5-10 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर आवश्यक होता है। बुवाई का समय – मूली साल भर उगाई जा सकती है, फिर भी व्यावसायिक स्तर पर इसे सितम्बर से जनवरी तक बोया जाता है। बुवाई कि विधि –  मूली की बुवाई दो प्रकार से की जाती है।
(1) कतारों में:- अच्छी प्रकार तैयार व्यारियों में लगभग 30 से.मी. की दूरी पर कतारें बना ली जाती है। और इन कतारों में बीज को लगभग 3-4 सें.मी. गहराई में बो देते हैं। बीज उग जाने पर जब पौधों में दो पत्तियाँ आ जाती है तब 8-10 से .मी. की दूरी छोड़कर अन्य पौधो को निकाल देते हैं।
(2) मेड़ों पर:- इस विधि में क्यारियों में 30 सें.मी. की दूरी पर 15-20 सें.मी. ऊँची मेड़ें बना ली जाती है। इन मेड़ों पर बीज को 4 से.मी. की गहराई पर बो दिया जाता है। बीज उग आने पर जब पौधों में दो पत्तियाँ आ जाए तब पौधों को 8-10 सें.मी. की दूरी छोड़कर बाकी पौधो को निकाल दिया जाता है। यह विधि अच्छी रहती है। क्योंकि इस विधि से बोने पर मूली की जड़ की बढ़वार अच्छी होती हैं और मूली मुलायम रहती है। अंत: सस्य क्रियाएँ यदि खेत में खरपतवार उग आये हों तो आवश्यकतानुसार उन्हें निकालते रहना चाहिए। रासायनिक खरपतवारनाशक जैसे पेन्डिमीथेलिन 30 ई.सी. 3.0 कि.ग्रा.1000 ली. पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 48 घंटे के अन्दर प्रयोग करने पर प्रारम्भ के 30-40 दिनों तक खरपतवार नहीं उगते हैं। निंदाई-गुड़ाई 15-20 दिन बाद करना चाहिए। मूली की खेती में उसके बाद मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। मूली की जड़े मेड़ से उपर दिखाई दे रही हों तो उन्हें मिट्टी से ढक दें अन्यथा सूर्य के प्रकाश के सम्पर्क से वे हरी हो जाती हैं सिंचाई एवं जल निकास – बोवाई के समय यदि भूमि में नमी की कमी रह गई हो तो बोवाई के तुरंत बाद एक हल्की सी सिंचाई कर दें। वैसे वर्षा ऋतु की फसल मे सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती हैं परन्तु इस समय जल निकास पर ध्यान देना आवष्यक हैं। गर्मी के फसल में 4-5 दिन के अन्तराल पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। शरदकालीन फसल में 10-15 दिन के अन्तर पर सिंचाई करते हैं। मेड़ों पर सिंचाई हमेशा आधी मेड़ ही करनी चाहिए ताकि पूरी मेड़ नमीयुक्त व भुरभुरा बना रहे। प्रमुख कीट व रोग माहू –  हरे सफेद छोटे-छोटे कीट होते है। जो पत्तियों का रस चूसते हैं। इस कीट के लगने से पत्तियाँ पीली पड़ जाती है। तथा फसल का उत्पादन काफी घट जाता है। इसके प्रकोप से फसल बिकने योग्य नहीं रह जाती है। इस कीट के नियंत्रण हेतू मैलाथियान 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से लाभ होता है। इसके अलावा 4 प्रतिशत नीम गिरी के घोल में किसी चिपकने वाला पदार्थ जैसे चिपको या सेण्ड़ोविट के साथ छिड़काव उपयोगी है। रोयेंदार सूडी – कीड़े का सूड़ी भूरे रंग का रोयेदार होता है। एवं ज्यादा संख्या में एक जगह पत्तियों को खाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए मैलाथियान 10 प्रतिशत चूर्ण 20 से 25 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से सुबह के समय भुरकाव करनी चाहिए। अल्टेरनेरिया झुलसा – यह रोग जनवरी से मार्च के दौरान बीज वाली फसल पर ज्यादा लगता है। पत्तियों पर छोटे घेरेदार गहरे काले धब्बे बनते हैं। पुष्पक्रम व फल पर अण्डाकार से लंबे धब्बे दिखाई देते हैं। प्रायः यह रोग मूली की फसल पर लगता हैं। इसके नियंत्रण हेतू कैप्टान 2.5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें। नीचे की पत्तियों को तोड़कर जला दें। पत्ती तोड़ने के बाद मैन्कोज़ेब 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करे । खुदाई एवं उपज खुदाई – जब जड़े पूर्ण विकसित हो जाएँ तब कड़ी होने से पहले मुलायम अवस्था में ही खोद लेना चाहिए।
उपज – मूली की पैदावार इसकी किस्में, खाद व उर्वरक तथा अंतः सस्य क्रियाओं पर निर्भर करती है। मूली की औसत उपज 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के करीब होती है। मूली का आर्थिक विश्लेषण विवरण खर्चा (रु.) खेत की तैयारी, जुताई एवं बुवाई का खर्चा 2000 बीज की लागत का खर्चा 3000 खाद एवं उर्वरक पर व्यय 6900 निंदा नियंत्रण पर व्यय 4000 कीट व्याधि नियंत्रण पर व्यय 1500 सिंचाई का व्यय 4000 खुदाई एवं सफाई पर व्यय 6000 अन्य 2000 कुल (रु.) 38400 आय की गणना – औसत उपज (क्वि./हे.) बिक्री दर सकल आय लागत शुद्ध आय 200 600 1,20,000 38400 81600 बिक्री दर बाजार भाव पर निर्भर रहती है जो समय-समय पर बदलती है।     पपीता पपीता, विश्व के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाने वाला महत्वपूर्ण फल है। केला के पश्चात् प्रति ईकाई अधिकतम उत्पादन देने वाली एवं औषधीय गुणों से भरपूर फलदार पौधा है। पपीता को भारत में लाने का श्रेय डच यात्री लिन्सकाटेन को जाता है जिनके द्वारा पपीता के पौधे वेस्टइंडीज से सन् 1575 में मलेशिया लाया फिर वहां से भारत आया। बड़वानी में भी लगभग 958 हे. क्षेत्रफल में पपीतें की व्यावसायिक खेती की जा रही है। बड़वानी जिले की लाल तथा पीली किस्मे प्रसिध्द हैं पपीते के फलो से पपेन तैयार किया जाता है। जिसका प्रसंस्कृत उत्पाद हेतु उपयोग किया जाता है। पपीता प्यूरी का भी बडा निर्यातक है। जलवायु और मृदा
पपीते की नर्सरी
पपीता एक उष्णकटिबंधीय जलवायु वाली फसल है जिसको मध्यम उपोष्ण जलवायु जहाँ तापमान 10-26 डिग्री सेल्सियस तक रहता है तथा पाले की संभावना न हो, इसकी खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। पपीता के बीजों के अंकुरण हेतु 35 डिग्री सेल्सियस तापमान सर्वोत्तम होता है। ठंड में रात्रि का तापमान 12 डिग्री सेल्सियस से कम होने पर पौधों की वृद्धि तथा फलोत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। पपीता की खेती के लिए 6.5-7.5 पी. एच मान वाली हल्की दोमट या दोमट मिट्टी जिसमें जलनिकास अच्छा हो सर्वाधिक उपयुक्त होती है। पपीते की महत्वपूर्ण किस्में पपीते की किस्मों का चुनाव खेती के उद्देश्य के अनुसार किया जाना चाहिए जैसे कि औद्योगिक रूप से महत्व की किस्में जिनके कच्चे फलों से पपेन निकाला जाता है, पपेन किस्में कहलाती हैं इस वर्ग में महत्वपूर्ण किस्में सी. ओ- 2 ए सी. ओ- 5 एवं सी. ओ- 7 है। इसके साथ दूसरा महत्वपूर्ण वर्ग है टेबिल वैरायटी या जिनको पकी अवस्था में काटकर खाया जाता है। इस वर्ग को पुनः दो भागों में बांटा गया है पारम्परिक पपीते की किस्में :- पारंपरिक पपीते की किस्मों के अंतर्गत बड़वानी लाल, पीला, वाशिंगटन, मधुबिन्दु, हनीड्यू, कुर्ग हनीड्यू , को 1, एवं 3 किस्में आती हैं। नई संकर किस्में उन्नत गाइनोडायोसियस /उभयलिंगी किस्में :- इसके अंतर्गत निम्न महत्वपूर्ण किस्में आती हैः- पूसा नन्हा, पूसा डेलिशियस, सी. ओ- 7 पूसा मैजेस्टी, सूर्या आदि। पपीते की पौध तैयार करने की तकनीक तथा बीज की मात्रा पपीते के 1 हेक्टेयर के लिए आवश्यक पौधों की संख्या तैयार करने के लिए परंपरागत किस्मों का 500 ग्राम बीज एवं उन्नत किस्मों का 300 ग्राम बीज की मात्रा की आवश्यकता होती है। पपीते की पौध क्यारियों एवं पालीथीन की थैलियों में तैयार की जा सकती है। क्यारियों में पौध तैयार करने हेतु क्यारी की लंबाई 3 मीटर, चैड़ाई 1 मीटर एवं ऊंचाई 20 सेमी रखें। प्लास्टिक की थैलियों में पौध तैयार करने के लिए 200 गेज मोटी 20 गुना 15 सेमी आकर की थैलियाँ (जिनमें चारों तरफ एवं नीचे छेद किए गए हो ) में वर्मीकंपोस्ट, रेत, गोबर खाद तथा मिट्टी के 1:1:1:1 अनुपात का मिश्रण भरकर प्रत्येक थैली में 1 या 2 बीज बोंए। खेत की तैयारी तथा रोपण तकनीक – पौध रोपण पूर्व खेत की तैयारी मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई कर 2-3 बार कल्टिवेटर या हैरो से जुताई करें। तथा समतल कर लें । पूर्ण रूप से तैयार खेत में 45*45*45 सेमी आकार के गढडे 2ग2 मीटर (पंक्ति – पंक्ति एवं पौध से पौध )की दूरी पर तैयार करें। पोषक तत्व प्रबंधन तकनीक – 200 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम फास्फोरस और 250 ग्राम पोटाश प्रति पौधा प्रतिवर्ष 3-4 बराबर भागों में बांटकर दें। सिंचाई एवं खरपतवार प्रबंधन तकनीक पपीता के पौधो की अच्छी वृद्धि तथा अच्छी गुणवत्तायुक्त फलोत्पादन हेतु मिटटी में सही नमी स्तर बनाए रखना बहुत जरूरी होता है। नमी की अत्याधिक कमी का पौधों की वृद्धि फलों की उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। सामान्यतः शरद ऋतु में 10-15 दिन के अंतर से तथा ग्रीष्म ऋतु में 5-7 दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। सिंचाई की आधुनिक विधि ड्रिप तकनीकी अपनाऐ। अंत: वर्तीय फसलें – पपीते बाग में अंतःवर्तीय फसलों के रूप में दलहनी फसलों जैसे मटर, मैथी, चना, फ्रेंचबीन व सोयाबीन आदि ली जा सकती। मिर्च, टमाटर, बैंगन, भिण्डी आदि फसलों को पपीते पौधों के बीच अंतःवर्तीय फसलों के रूप में न उगायें। फलों की तुड़ाई तथा श्रेणीकरण एवं पैकिंग पपीत के पूर्ण रूप से परिपक्व फलों को जबकि फल के शीर्ष भाग में पीलापन शुरू हो जाए तब डंठल सहित तुड़ाई करें। तुड़ाई के पश्चात् स्वस्थ, एक से आकार के फलों को अलग कर लें तथा सड़े गले फलों को अलग हटा दें। पपीते में पौध संरक्षण (एकीकृत कीट प्रबंधन तकनिकी) एफिड – कीट का वैज्ञानिक नाम एफिस गोसीपाई, माइजस परसिकी है। इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं। तथा पौधे में मौजेक रोग के वाहक का कार्य करते है। प्रबंधन तकनीक  – मिथाइल डेमेटान या डायमिथोएट की 2 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर पौध रोपण पश्चात् आवश्यकतानुसार 15 दिन के अंतर से पत्तियों पर छिड़काव करें। लाल मकड़ी – इसे वैज्ञानिक भाषा में ट्रेट्रानायचस सिनोवेरिनस कहते है। यह पपीते का प्रमुख कीट है जिसके आक्रमण से फल खुरदुरे और काले रंग के हो जाते है। तथा पत्तियाँ पर आक्रमण की स्थिति में फफूंद पीली पड़ जाती है। प्रबंधन – पौधे पर आक्रमण दिखते ही प्रभावित पत्तियों को तोड़कर दूर गढढे में दबाऐं। वेटेबल सल्फर 2.5 ग्राम/ ली. या डाइकोफॉल 18.5 ईसी की 2.5 मिली या ओमाइट 1.5 मिली मात्रा/ ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें। पपीते में एकीकृत रोग प्रबंधन तकनिकी तना गलन (तने तथा जड़ के गलने की बीमारी ) – इस रोग का कारण पीथियम एफिनडरमेटम फाइटोफ्थरा पामीबोरा नामक फफूंद है जिसके कारण पौधे भूमि के पास तने का ऊपरी छिलका पीला होकर गलने लगता है धीर-धीरे गलन जड़ तक पहुँच जाती है। इस कारण फफूंद सूख जाती है और पौधा मर जाता है। प्रबंधन के लिए जलनिकास में सुधार करें तथा रोग ग्रसित पौधों को खेत से निकालकर हटा दें उसके पश्चात् पौधों पर 1 प्रतिशत बोर्डो मिश्रण या काॅपर आक्सीक्लोराइउ या ब्लाइटाकस दवा की 2 ग्रा / ली. पानी में मिलाकर छिड़काव करें तथा ड्रेंचिंग करें। डम्पिंग ऑफ (आर्द गलन ) – यह रोग पपीते में नर्सरी अवस्था में आता है जिसका कारण पीथियम एफिनडरमेटस, पी. अल्टीमस फाइटोफ्थोरा पामीबोरा तथा राइजोक्टोनिया स्पी. के कारण होता है।
लक्षण – रोगे नीचे (जमीन की सतह के पास से )से गलकर मरने लगते है। 
प्रबंधन – रोग से बचने के लिए पपीते के बीजों का उपचार बुवाई पूर्व सेरेसान या एग्रोसान जी एन से उपचारित करें तथा नर्सरी को फार्मेल्डिहाइड के 2.5 प्रतिशत घोल से ड्रेंचिंग करें या उपचारित करें।
रिंग स्पॉट वायरस  – इस रोग का कारण विषाणु है जो कि माहू द्वारा फैलता है | इस रोग के गंभीर आक्रमण की स्थिति में 50-60 प्रतिशत तक हानि हो जाती है | जिस कारण पत्तियों पर क्लोरोसिस दिखाई देता है पत्तियाँ कटी – कटी दिखाई देती है तथा पौधे की वृद्धि रूक जाती है। लीफकर्ल – यह भी विषाणु जनित रोग है जो कि सफेद मक्खी के द्वारा फैलता है जिस कारण पत्तियाँ मुड़ जाती है इस रोग से 70-80 प्रतिषत तक नुकसान हो जाता है। नियंत्रण – स्वस्थ पौधो का रोपण करें। रोगी पौधों को उखाड़कर खेत से दूर गढढे में दबाकर नष्ट करें। सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु अनुसंशित कीटनाशक का प्रयोग करें। पपीते के फल एवं उपज अच्छी तरह वैज्ञानिक प्रबंधन करने पर प्रति पौधा 40-50 किलो उपज प्राप्त हो जाती है। पपीते की प्रति हेक्टेयर राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादकता 317 क्विं/हे. है। संकर पपीते की खेती पर होने वाली आय व्यय का ब्यौरा (अनुमानित प्रति हेक्टेयर ) कुल लागत 165400 उत्पादन ( क्वि. / हे.) 900 विक्रय 405000 लाभ लागत अनुपात 2.44 शुद्ध लाभ 194600 पपीते की उत्पादकता बढ़ाने के उपाय 1. पपीते की व्यावसायिक खेती में उभयलिंगी किस्मों जैसे सूर्या ( भारतीय बागवानी अनु. सं. बैंगलोर ) सनराइज सोलो, रेडी लेडी -786 के साथ किचिन गार्डन के लिए पूसा नन्हा, कुर्ग हनीड्यू, पूसा ड्वार्फ, पंत पपीता 1, 2 एवं 3 के चयन को प्राथमिकता दें। 2. रसचूसक कीटों के प्रभाव वाले क्षेत्रो में पपीते को अक्टूबर में रोपण करें। तथा पौधों की नर्सरी कीट अवरोधी नेट हाऊस के भीतर तैयार करें। 3. खाद व उर्वरक की संतुलित मात्रा 250 ग्राम नत्रजन, 250 ग्राम स्फुर तथा 250 -500 ग्राम पोटाश प्रति पौधा/वर्ष प्रयोग करें। 4. सिंचाई के लिए ड्रिप सिंचाई पद्धिति अपनाऐं। 5. फसल में रसचूसक कीटों के नियंत्रण हेतु फेरामोन ट्रेप, प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करें तथा नीम सत्व 4 प्रतिशत का छिड़काव करें। 6. पपीते के पौधों को 30 सेमी उठी मेड़ पर 2 गुणा 2 मीटर की दूरी पर रोपाई करें। तथा अंतवर्तीय फसल के रूप में मिर्च , टमाटर बैंगन न लगाएं। पपीते के फलों से पपेन निकालने की विधि सामान्यत: पपेन को पपीते के कच्चे फलों से निकला जाता है | पपेन के लिए 90-100 दिन विकसित कच्चे फलों का चुनाव करें | कच्चे चुने हुए फलों से सुबह ३ मि.मी. गहराई के 3-4 चीरे गोलाई आकार में लगाएं | इसके पूर्व पौधों पर फलों से निकलने वाले दूध को एकत्रित करने के लिए प्लास्टिक के बर्तन को तैयार रखें | फलों पर प्रथम बार के (चीरा लगाने के बाद ) 3-4 दिनों पश्चात पुन: चीरा लगाकर पपेन एकत्रित करें | पपेन (दूध) प्राप्त होने के बाद उसमे 0.5 प्रतिशत पोटेशियम मेन्टाबाई सल्फेट परिरक्षक के रूप में मिलाये ताकि पपेन को ३-४ दिन तक सुरक्षित रखा जा सके | पपेन को अच्छी तरह सुखाकर पपेन को प्रसंस्करण केंद्र भेजें | पपेन का उत्पादन इस प्रकार पपीते की पपेन के लिए उपयुक्त किस्मों सी ओ -2 एवं सी ओ – 5 के पौधों से 100 – 150 ग्राम पपेन प्रति पौधा प्रति वर्ष प्राप्त हो जाता है | कच्चे पपेन को अच्छी तरह सुखाकर प्राप्त पाएं को प्रसंस्करण के लिए सयंत्र महाराष्ट्र के जलगॉव तथा येवला (नासिक ) में भेज दिया जाता है| कच्चे फलों से पपेन निकालने के बाद उनसे अन्य प्रसंस्कृत उत्पाद जैसे टूटी फ्रूटी, मुरब्बा बनाया जा सकता है तथा चीरा लगे पके फलों का जैम जेली मुरब्बा रास या गुदा जिसे प्यूरी कहते है बनाकर डिब्बाबंद किया जाता है | भारत पपीता प्यूरी का एक बड़ा निर्यातक है | पपीते के बगीचे में फर्टीगेशन तकनीक द्वारा पोषक तत्व प्रबंधन पपीते के पौधों जिनको फरवरी में उठी हुई क्यारी पर लगाया गया हो ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का उपयोग करें तथा जल विलेय उर्वरकों जैसे 19:19:19 को सिंचाई जल के साथ ड्रिप में देने से उर्वरक की बचत के साथ साथ उसकी उपयोग क्षमता में भी वृद्धि होती है तथा पौधों को आवश्यकतानुसार एवं शीघ्र पोषक तत्व उपलब्द्ध होने से उपज तथा गुणवत्ता दोनों में वृद्धि होती है | पपीते की मार्केटिंग पपीते के पूर्ण विकसित फलों को न्यूज़ पेपर के टुकड़ों में लपेटकर उचित तरीके से सामान आकार के फलों को कैरेट में पैक कर स्थानीय एवं सुदूर बाजार में भेजा जाता है | शिमला-मिर्च हमारे देश मे उगाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की सब्जियों मे टमाटर एवं शिमला मिर्च (कैपसीकम एनम) का एक महत्वपूर्ण स्थान है। शिमला मिर्च को सामान्यता बेल पेपर भी कहा जाता है। इसमे विटामिन-सी एवं विटामिन -ए तथा खनिज लवण जैसे आयरन, पोटेशियम, ज़िंक, कैल्शियम इत्यादी पोषक तत्व प्रचुर मात्रा मे पाये जाते है। जिसके कारण अधिकतर बीमारियो से बचा जा सकता है।बदलती खाद्य शैली के कारण शिमला मिर्च की मांग दिन प्रतिदिन बढती जा रही है। शिमला मिर्च की खेती भारत मे लगभग 4780 हैक्टयर में की जाती है तथा वार्षिक उत्पादन 42230 टन प्रति वर्ष होता है। उपज बढाने मे मध्यप्रदेश मे अभी काफी गुजाईश हैं। इसके लिए खेत की तैयारी, उन्नत संकर बीज का उपयोग, बीज उपचार, समय पर बुवाई, निर्धारित पौध संख्या, कीट और बीमारी का नियन्त्रण, निर्धारित मात्रा मे उर्वरको का उपयोग और समयपर सिंचाई आदि उपज बढाने मे विशेष भूमिका अदा करते है। टमाटर एवं शिमला मिर्च की खेती देशवासियो को भोजन तथा खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के अलावा रोजगार सजृन तथा विदेशी मुद्रा का भी अर्जन कराती है। जलवायु और मृदा दिन का तापमान 22 से 28 डिग्री सेंटीग्रेड एवं रात्रीकालीन तापमान सामान्यतः 16 से 18 डिग्री सेंटीग्रेड उत्तम रहता है।अधिक तापमान की वजह से फूल झडने लगते है एवं कम तापमान की वजह से परागकणो की जीवन उपयोगिता कम हो जाती है। सामान्यतः शिमला मिर्च की संरक्षित खेती पॉली हाउस मे कीटरोधी एवं शेड नेट लगाकर सफलतापूर्वक कर सकते है। शिमला मिर्च की खेती के लिए सामान्यतः बलुई दोमट मृदा उपयुक्त रहती है जिसमे अधिक मात्रा मे कार्बनिक पदार्थ मौजूद हो एवं जल निकासी अच्छी हो।     पॉलीहाउस परिचय :- पॉलीहाउस पारदर्शी आवरण से ढके हुए ऐसे ढांचे होते है जिनमे कम से कम आंशिक या पूर्णरूप से नियंत्रित वातावरण मे फसले पैदा की जाती है। पॉलीहाउस तकनीक का बे-मौसमी सब्जियाँ पैदा करने मे महत्वपूर्ण स्थान है। पॉलीहाउस की खेती के लिए सामान्यतः ऐसी फसलो का चयन किया जाता है। जिनका आयतन कम हो एवं अधिक मूल्यवान हो जैसे खीरा, टमाटर, शिमला मिर्च इत्यादि।       भूमि की तैयारी पौध रोपण के लिए मुख्य खेत को अच्छी तरह से 5-6 बार जुताई कर तैयार किया जाता है । गोबर की खाद या कम्पोस्ट अंतिम जुताई के पूर्व खेत मे अच्छी तरह से खेत मे मिला दिया जाना चाहिए। तत्पश्चात उठी हुई 90 सेमी चौडी क्यारियाँ बनाई जाती है । पौधों की रोपाई ड्रिप लाईन बिछाने के बाद 45 सेमी की दूरी पर करनी चाहिए। एक क्यारी पर पौधो की सामान्यतः दो कतार लगाते है। किस्मों का चयन  :- प्रमुख किस्मेः कैलिफोर्निया वंडर, रायल वंडर, येलो वंडर, ग्रीन गोल्ड, भारत , अरका बसन्त, अरका गौरव , अरका मोहिनी, सिंजेटा इंडिया की इन्द्रा, बॉम्बी, लारियो एवं ओरोबेल, क्लॉज़ इंटरनेशनल सीडस की आशा, सेमिनीश की 1865, हीरा आदि किस्मे प्रचलित है। बीज दर – सामान्य किस्म – 750-800 ग्राम एवं संकर शिमला – 200 से 250 ग्राम प्रति हैक्टयर रहती है पौध तैयार करना शिमला मिर्च के बीज मंहगे होने के कारण इसकी पौध प्रो-ट्रेज मे तैयार करनी चाहिए। इसके लिए अच्छे से उपचारित ट्रेज का उपयोग किया जाना चाहिए। ट्रेज मे मीडिया का मिश्रण जैसे वर्मीकुलाइट, परलाइट एवं कॉकोपीट 1:1:2 की दर से तैयार करना चाहिए एवं मीडिया को भली भांति ट्रेज मे भरकर प्रति सेल एक बीज डालकर उसके उपर हल्का मिश्रण डालकर झारे से हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। यदि आवश्यक हो तो मल्च का उपयोग भी किया जा सकता है। एक हेक्टयर क्षेत्रफल मे 200-250 ग्राम संकर एवं 750-800 ग्राम सामान्य किस्म के बीज की आवश्यकता होती है। रोपाई – 30 से 35 दिन मे शिमला मिर्च के पौध रोपाई योग्य हो जाते है। रोपाई के समय रोप की लम्बाई तकरीबन 16 से 20 सेमी एवं 4-6 पत्तियां होनी चाहिए। रोपाई के पूर्व रोप को 0.2 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम मे डुबो कर पूर्व मे बनाए गए छेद मे लगाना चाहिए। पौधो की रोपाई अच्छी तरह से उठी हुई तैयार क्यारियाँ मे करनी चाहिए। क्यारियो की चौड़ाई सामान्यतः 90 सेमी रखनी चाहिए। पौधो की रोपाई ड्रिप लाईन बिछाने के बाद 45 सेमी की दूरी पर करनी चाहिए। एक क्यारी पर पौधों की सामान्यतः दो कतार लगाते है। उर्वरक –25 टन /है. गोबर खाद एवं रासायनिक उर्वरक मे एनः पीः के: 250:150: एवं 150 किग्रा. / है. सिंचाई – गर्म मौसम मे 7 दिन तथा ठण्डे मौसम मे 10-15 दिन के अन्तराल पर। ड्रिप इरीगेशन की सुविधा उपलब्ध होने पर उर्वरक एवं सिंचाई (फर्टीगेशन) ड्रिप द्वारा ही करना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण शिमला मिर्च की 2 से 3 बार गुडाई करना आवश्यक है। अच्छी उपज के लिए 30 एवं 60 दिनो के बाद गुडाई करनी चाहिए। शिमला मिर्च मे अच्छी उपज के लिए मिट्टी चढाना आवश्यक है यह कार्य 30-40 दिन की अवस्था पर करना चाहिए। रासायनिक दवा के रूप मे खेत तैयार करते समय 2.22 लीटर की दर से फ्लूक्लोरेलिन (बासालिन ) का छिडकाव कर खेत मे मिला देना चाहिए। या पेन्डीमिथेलिन 3.25 लीटर प्रति हैक्टयर की दर से रोपाई के 7 दिन के अंदर छिडकाव कर देना चाहिए। वृद्धि नियंत्रक – शिमला मिर्च की उपज बढाने के लिए ट्राइकोन्टानाॅल 1.25 पी.पी.एम (1.25 मिलीग्राम/लीटर पानी ) रोपाई के बाद 20 दिन की अवस्था से 20 दिन के अन्तराल पर 3से 4 बार करना चाहिए। इसी प्रकार एन.ए.ए. 10 पी.पी.एम (10 मिलीग्राम/लीटर पानी ) का 60 वे एवं 80 वे दिन छिडकाव करना चाहिए। पौधों को सहारा देना – शिमला मिर्च मे पौधो को प्लास्टिक या जूट की सूतली रोप से बांधकर उपर की और बढने दिया जाना चाहिए जिससे फल गिरे भी नही एवं फलो का आकार भी अच्छा हो। पौधो को सहारा देने से फल मिट्टी एवं पानी के सम्पर्क मे नही आ पाते जिससे फल सडने की समस्या नही होती है। कीट एवं व्याधियां शिमला मिर्च मे कीटो मे मुख्य तौर पर चेपा, सफेद मक्खी, थ्रिप्स , फल भेदक इल्ली एवं तम्बाकू की इल्ली एवं व्याधियों मे चूर्णी फफूंद, एन्थ्रेक्नोज, फ्यूजेरिया विल्ट, फल सडन एवं झुलसा का प्रकोप समन्वित नाशीजीव प्रबंधन क्रियाएँ – नर्सरी के समय
1. पौधशाला की क्यारियों भूमि धरातल से लगभग 10 सेमी ऊची होनी चाहिए।
2. क्यारियों को मार्च अप्रेल माह मे 0.45 मि.मी. मोटी पॉलीथिन शीट से ढकना चाहिए। भू-तपन के लिए मृदा मे पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
3. 3 किग्रा गोबर की खाद मे 150 ग्राम फफूंद नाशक ट्राइकोडर्मा मिलाकर 7 दिन तक रखकर 3 वर्गमीटर की क्यारी मे मिट्टी मे अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।
4. पौधशाला की मिट्टी को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के 3 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल से बुवाई के 2-3 सप्ताह बाद छिडकाव करे। मुख्य फसल
पौध रोपण के समय पौध की जडो को 0.2 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति लीटर पानी के घोल मे 10 मिनट तक डुबो कर रखे। 
पौध रोपण के 15-20 दिन के अंतराल पर चेपा, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स के लिए 2 से 3 छिडकाव इमीडाक्लोप्रिड या एसीफेट के करे माइट की उपस्थिती होने पर ओमाइट का छिडकाव करे। 
फल भेदक इल्ली एवं तम्बाकू की इल्ली के लिए इन्डोक्साकार्ब या प्रोफेनोफॉस का छिडकाव ब्याधि के उपचार के लिए बीजोपचार, कार्बेन्डाजिम या मेन्कोज़ेब से करना चाहिए। खडी फसल मे रोग के लक्षण पाये जाने पर मेटालेक्सिल + मैन्कोजेब या ब्लाईटॉक्स का धोल बनाकर छिडकाव करे। चूर्णी फफूंद होने सल्फर घोल का छिडकाव करे। फलों की तुड़ाई एवं उपज शिमला मिर्च के फलो की तुडाई हमेशा पूरा रंग व आकार होने के बाद ही करनी चाहिए तथा तुडाई करते समय 2-3 से.मी. लम्बा डण्ठल फल के साथ छोडकर फल को पौधो से काटा जाना चाहिए। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर संकर शिमला मिर्च की औसतन पैदावार 700-800 क्विंटल प्रति हेक्टयर होती है । शिमला मिर्च की प्रति हेक्टेयर कृषि लागत व्यय (रुपये में ) विवरण मात्रा एवं दर प्रति इकाई खर्चा (रु.) भूमि की तैयारी     जुताई की संख्या 02, दर 500/- प्रति घंटा 1000 मजदूरों की संख्या 06, दर 150/- 900       खाद एवं उर्वरक     गोबर की खाद 20 टन, 2 वर्ष में एक बार 1000/-प्रति टन, 20000 नत्रजन 250 किलोग्राम दर 12.40/- 3100 फास्फोरस 150 किलोग्राम दर 32.70/- 905 पोटाश (मृदा परीक्षण के अनुसार ) 150 किलोग्राम दर 19.88/- 2982 मजदूरों की संख्या 20, दर 150/- 3000       पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग)     बॉस एवं वायर   31000 मजदूरों की संख्या 40, दर 150/- 6000       बीज की मात्रा 200 ग्राम दर 800/10 ग्राम 16000 बुवाई पर मजदूरों की संख्या 15, दर 150/- 2250       सिंचाई संख्या 10 5000 मजदूर 10 दर 150/- 1500       निदाई मजदूरों की संख्या 40 दर 150/- 6000       फसल सुरक्षा     ट्राइजोफॉस
इमीडाक्लोप्रिड 
एसीफेट 
प्रोफेनोफॉस 
मजदूरों की संख्या 2 बार, दर 450/- 
2 बार, दर 200/- 
2 बार, दर 160/- 
2 बार, दर 500/- 
16 दर 150/- 900/- 
400/- 
320/- 
1000/- 
2400/- तुडाई (मजदूरों की संख्या ) 40 दर 150/- 6000 कुल लागत   114657 कुल आय (औसतन पैदावार 700 क्विंटल प्रति हेक्टेयर)   700000 शुद्ध लाभ   585343   टमाटर जलवायु टमाटर की फसल पाला नहीं सहन कर सकती है। इसकी खेती हेतु आदर्श तापमान 18 से 27 डिग्री से.ग्रे. है। 21-24 डिग्री से.ग्रे तापक्रम पर टमाटर मे लाल रंग सबसे अच्छा विकसित होता है। इन्ही सब कारणो से सर्दियो मे फल मीठे और गहरे लाल रंग के होते है। तापमान 38 डिग्री से.ग्रे. से अधिक होने पर अपरिपक्व फल एवं फूल गिर जाते है। भूमि- उचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि जिसमे पर्याप्त मात्रा मे जीवांश उपलब्ध हो जाते हैं टमाटर की किस्में :- देशी किस्म- पूसा रूबी, पूसा – 120, पूसा शीतल, पूसा गौरव , अर्का सौरभ , अर्का विकास, सोनाली संकर किस्म- पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड -4, अविनाश-2, रश्मि तथा निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रेड गोल्ड, 501, 2535 उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यू.एस. 440 आदि। बीज की मात्रा और बुवाई बीजदर- एक हेक्टेयर क्षेत्र में फसल उगाने के लिए नर्सरी तैयार करने हेतु लगभग 350 से 400 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। संकर किस्मों के लिए बीज की मात्रा 150-200 ग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहती है। 
बुवाई – वर्षा ऋतु के लिये जून-जलाई तथा शीत ऋतु के लिये जनवरी-फरवरी। फसल पाले रहित क्षेत्रो में उगायी जानी चाहिए या इसकी पाले से समुचित रक्षा करनी चाहिएं। 
बीज उपचार- बुवाई पूर्व थाइरम /मेटालाक्सिल से बीजोपचार करे ताकि अंकुरण पूर्व फफून्द का आक्रमण रोका जा सके। नर्सरी एवं रोपाई 1. नर्सरी मे बुवाई हेतु 1 से 3 मी. की ऊठी हुई क्यारियां बनाकर फोर्मेल्डिहाइड द्वारा स्टेरीलाइजशन कर ले अथवा कार्बोफ्यूरान 30 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से मिलावें । 
बीज को कार्बेन्डाजिम/ट्राइकोडर्मा प्रति किग्रा. बीज की दर से उपचारित कर 5 से.मी. की दूरी रखते हुये कतारो मे बीजो की बुवाई करे। बीज बोने के बाद गोबर की खाद या मिट्टी ढक दे और हजारे से छिडकाव। 
2. बीज उगने के बाद डायथेन एम-45/मेटालाक्सिल छिडकाव 8-10 दिन के अंतराल पर करना चाहिए।
3. 25 से 30 दिन का रोपा खेतो मे रोपाई से पूर्व कार्बेन्डिजिम या ट्राईटोडर्मा के घोल में पौधों की जड़ों को 20-25 मिनट उपचारित करने के बाद ही पौधों की रोपाई करें।
4. पौध को उचित खेत में 75 से.मी. की कतार की दूरी रखते हुए 60 से.मी के फासले पर पौधो की रोपाई करे।
5. मेंड़ों पर चारों तरफ गेंदा की रोपाई करें । फूल खिलने की अवस्था में फल भेदक कीट टमाटर की फसल में कम जबकि गेदें की फलियों / फूलों में अधिक अंडा देते है। उर्वरक का प्रयोग – 20 से 25 मैट्रिक टन गोबर की खाद/है एवं 200 किलो नत्रजन, 100 किलो फाॅस्फोरस व 100 किलो पोटाश /है।बोरेक्स की कमी हो वहाँ बोरेक्स 0.3 प्रतिशत का छिडकाव करने से फल अधिक लगते है। 
सिंचाई – सर्दियों मे 10-15 दिन के अन्तराल से एवं गर्मियों में 6-7 दिन के अन्तराल से हल्का पानी देते रहे। अगर संभव हो सके तो कृषकों को सिंचाई ड्रिप इरीगेशन द्वारा करनी चाहिएं 
मिटटी चढाना व पौधों को सहारा देना (स्टेकिंग) – टमाटर मे फूल आने के समय पौधो मे मिटटी चढाना एवं सहारा देना आवश्यक होता है। टमाटर की लम्बी बढने वाली किस्मो को विशेष रूप से सहारा देने की आवश्यकता होती है। पौधो को सहारा देने से फल मिटटी एवं पानी के सम्पर्क मे नही आ पाते जिससे फल सडने की समस्या नही होती है। 
सहारा देने के लिए रोपाई के 30 से 45 दिन के बाद बांस या लकडी के डंडो मे विभिन्न ऊंचाइयों पर छेद करके तार बांधकर फिर पौधो को तारो से सुतली को बांधते है। इस प्रक्रिया को स्टेकिंग कहा जाता है । खरपतवार नियंत्रण- 1. आवश्यकतानुसार फसलो की निराई-गुड़ाई करें। फूल और फल बनने की अवस्था मे निंदाई-गुडाई नही करनी चाहिए। 
2. रासायनिक दवा के रूप मे खेत तैयार करते समय फ्लूक्लोरेलिन (बासालिन ) या से रोपाई के 7 दिन के अंदर पेन्डीमिथेलिन छिडकाव करे। प्रमुख कीट एवं रोग- प्रमुख कीट – हरा तैला, सफेद मक्खी, फल छेदक कीट एंव तम्बाकू की इल्ली 
प्रमुख रोग – आर्द्र गलन या डैम्पिंग आफ, झुलसा या ब्लाइट, फल सड़न एकीकृत कीट एवं रोग नियंत्रण 1. गर्मीयो मे खेत की गहरी जुताई करे। 
2. पौधशाला की क्यारियो भूमि धरातल से ऊची रखें एवं फोर्मेल्डिहाइड द्वारा स्टेरीलाइज़ेशन कर ले 
3. क्यारियो को मार्च अप्रेल माह मे पोलिथिन शीट से ढके भू-तपन के लिए मृदा मे पर्याप्त नमी होनी चाहिए। 
4. गोबर की खाद मे ट्राइकोडर्मा मिलाकर क्यारी मे मिट्टी मे अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। 
5. पौधशाला की मिट्टी को कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के घोल से बुवाई के 2-3 सप्ताह बाद छिडकाव करे। 
6. पौध रोपण के समय पौध की जडो को कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा के घोल मे 10 मिनट तक डुबो कर रखे। 7. पौध रोपण के 15-20 दिन के अंतराल पर चेपा, सफेद मक्खी एवं थ्रिप्स के लिए 2 से 3 छिडकाव इमीडाक्लोप्रिड या एसीफेट के करे । माइट की उपस्थिती होने पर ओमाइट का छिडकाव करे।
8. फल भेदक इल्ली एवं तम्बाकू की इल्ली के लिए इन्डोक्साकार्ब या प्रोफेनोफॉस का छिडकाव ब्याधि के उपचार के लिए बीजोपचार, कार्बेन्डाजिम या मेन्कोजेब से करना चाहिए। खडी फसल मे रोग के लक्षण पाये जाने पर मेटालेक्सिल + मैन्कोजेब या ब्लाईटोक्स का घोल बनाकर छिडकाव करे। चूर्णी फफूंद होने सल्फर घोल का छिडकाव करे। फलों की तुड़ाई, उपज एवं विपणन – जब फलों का रंग हल्का लाल होना शुरू हो उस अवस्था मे फलों की तुडाई करें तथा फलो की ग्रेडिंग कर कीट व व्याधि ग्रस्त फलो दागी फलो छोटे आकार के फलो को छाटकर अलग करें। ग्रेडिंग किये फलों को कैरेट मे भरकर अपने निकटतम सब्जी मण्डी या जिस मण्डी मे अच्छा टमाटर का भाव हो वहा ले जाकर बेचें। टमाटर की औसत उपज 400-500 क्विंटल/है. होती है तथा संकर टमाटर की उपज 700 -800 क्विंटल/है. तक हो सकती है । टमाटर की प्रति हेक्टेयर कृषि लागत व्यय (रूपये में) विवरण मात्रा एवं दर प्रति इकाई लागत (रु.)       भूमि की तैयारी     जुताई की संख्या 02, दर 500/- प्रति घंटा 1000 मजदूरों की संख्या 06, दर 150/- 900       खाद एवं उर्वरक     गोबर की खाद 10 टन, 2 वर्ष में एक बार 1000/-प्रति टन, 10000 नत्रजन  200 किलोग्राम दर 12.40/- 2480 फास्फोरस 100 किलोग्राम दर 32.70/- 3270 पोटाश (मृदा परीक्षण के अनुसार ) 100 किलोग्राम दर 19.88/- 1988 मजदूरों की संख्या 20, दर 150/- 3000       पौधो को सहारा देना (स्टेकिंग)     बॉस एवं वायर   31000 मजदूरों की संख्या 20, दर 150/- 7500       बीज की मात्रा 200 ग्राम दर 400/10 ग्राम 8000 बुआई पर मजदूरों की संख्या 15, दर 150/- 2250       सिंचाई संख्या 10 5000 मजदूर 10, दर 150/- 1500       निंदाई     मजदूरों की संख्या 40, दर 150/- 6000       फसल सुरक्षा     ट्राईजोफास 2 बार, दर 450/- 900 इमीडाक्लोप्रिड 2 बार, दर 200/- 400 एसीफेट 2 बार, दर 160/- 320 प्रोफेनोफॉस 2 बार, दर 500/- 1000 मजदूरों की संख्या 16, दर 150/- 2400       तुडाई (मजदूरों की संख्या ) 40, दर 150/- 6000       कुल लागत   88158 कुल आय (औसतन पैदावार 600 क्विंटल प्रति हेक्टयर)   480000 शुद्ध लाभ   391842





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