मिट्टी जाँच: महत्व एवं तकनीक


  1. मिट्टी जाँच: महत्व एवं तकनीक
  2. नमूना लेने का उद्देश्य
  3. नमूना एकत्रित करने की विधि
  4. मिट्टी परीक्षण कहाँ करायें ?
  5. जैविक खादों में पोषक तत्वों की मात्रा
  6. उत्पादन वृद्धि के लिए अम्लीय मृदा प्रबंधन

मिट्टी जाँच: महत्व एवं तकनीक

मिट्टी के रासायनिक परीक्षण के लिए पहली आवश्यक बात है – खेतों से मिट्टी के सही नमूने लेना। न केवल अलग-अलग खेतों की मृदा की आपस में भिन्नता हो सकती है, बल्कि एक खेत में अलग-अलग स्थानों की मृदा में भी भिन्नता हो सकती है। परीक्षण के लिये खेत में मृदा का नमूना सही होना चाहिए।

मृदा का गलत नमूना होने से परिणाम भी गलत मिलेंगे। खेत की उर्वरा शक्ति की जानकारी के लिये ध्यान योग्य बात है कि परीक्षण के लिये मिट्टी का जो नमूना लिया गया है, वह आपके खेत के हर हिस्से का प्रतिनिधित्व करता हो।

नमूना लेने का उद्देश्य

रासायनिक परीक्षण के लिए मिट्टी के नमूने एकत्रित करने के मुख्य तीन उद्देश्य हैं:

  • फसलों में रासायनिक खादों के प्रयोग की सही मात्रा निर्धारित करने के लिए।
  • ऊसर तथा अम्लिक भूमि के सुधार तथा उसे उपजाऊ बनाने का सही ढंग जानने के लिए।
  • बाग व पेड़ लगाने हेतु भूमि की अनुकूलता तय करने के लिए।

मिट्टी का सही नमूना लेने की विधि के बारे में तकनीकी सिफारिश:

रासायनिक खादों के प्रयोग के लिये नमूना लेना

  1. समान भूमि की निशानदेही :

जो भाग देखने में मृदा की किस्म तथा फसलों के आधार पर जल निकास व फसलों की उपज के दृष्टिकोण से भिन्न हों, उस प्रत्येक भाग की निशानदेही लगायें तथा प्रत्येक भाग को खेत मानें।

  1. नमूना लेने के औजार:

मृदा का सफल नमूना लेने के लिये मृदा परीक्षण टयूब (soil tube), बर्मा फावड़ा तथा खुरपे का प्रयोग किया जा सकता है।

नमूना एकत्रित करने की विधि

  1. मृदा के उपर की घास-फूस साफ करें।
  2. भूमि की सतह से हल की गहराई (0-15 सें.मी.) तक मृदा हेतु टयूब या बर्मा द्वारा मृदा की एकसार टुकड़ी लें। यदि आपको फावड़े या खुरपे का प्रयोग करना हो तो ‘’v’’ आकार का 15 सें.मीं. गहरा गड्ढा बनायें। अब एक ओर से ऊपर से नीचे तक 10-12 अलग-अलग स्थानों (बेतरतीब ठिकानों) से मृदा की टुकड़ियाँ लें और उन पर सबको एक भगोने या साफ कपड़े में इकट्ठा करें।
  3. अगर खड़ी फसल से नमूना लेना हो, तो मृदा का नमूना पौधों की कतारों के बीच खाली जगह  से लें। जब खेत में क्यारियाँ बना दी गई हों या कतारों में खाद डाल दी गई हो तो मृदा का नमूना लेने के लिये विशेष सावधानी रखें।

नोट: रासायनिक खाद की पट्टी वाली जगह से नमूना न लें। जिन स्थानों पर पुरानी बाड़, सड़क हो और यहाँ गोबर खाद का पहले ढेर लगाया गया हो या गोबर खाद डाली गई हो, वहाँ से मृदा का नमूना न लें। ऐसे भाग से भी नमूना न लें, जो बाकी खेत से भिन्न हो। अगर ऐसा नमूना लेना हो, तो इसका नमूना अलग रखें।

  1. मिट्टी को मिलाना और एक ठीक नमूना बनाना :

एक खेत में भिन्न-भिन्न स्थानों से तसले या कपड़े में इकट्ठे किये हुए नमूने को छाया में रखकर सूखा लें। एक खेत से एकत्रित की हुई मृदा को अच्छी तरह मिलाकर एक नमूना बनायें तथा उसमें से लगभग आधा किलो मृदा का नमूना लें जो समूचे खेत का प्रतिनिधित्व करता हो।

5. लेबल लगाना: 
हर नमूने के साथ नाम, पता और खेत का नम्बर का लेबल लगायें। अपने रिकार्ड के लिये भी उसकी एक नकल रख लें। दो लेबल तैयार करें– एक थैली के अन्दर डालने के लिये और दूसरा बाहर लगाने के लिये। लेबल पर कभी भी स्याही से न लिखें। हमेशा बाल पेन या कॉपिंग पेंसिल से लिखें।

6. सूचना पर्चा:
खेत व खेत की फसलों का पूरा ब्योरा सूचना पर्चा में लिखें। यह सूचना आपकी मृदा की रिपोर्ट व सिफारिश को अधिक लाभकारी बनाने में सहायक होगी। सूचना पर्चा कृषि विभाग के अधिकारी से प्राप्त किया जा सकता है। मृदा के नमूने के साथ सूचना पर्चा में निम्नलिखित बातों की जानकारी अवश्य दें।

  1. खेत का नम्बर या नाम :
  2. अपना पता :
  3. नमूने का प्रयोग (बीज वाली फसल और किस्म) :
  4. मृदा का स्थानीय नाम :
  5. भूमि की किस्म ( सिंचाई वाली या बारानी) :
  6. सिंचाई का साधन :
  7. प्राकृतिक निकास और भूमि के नीचे पानी की गहराई :
  8. भूमि का ढलान :
  9. फसलों की अदल-बदल :
  10. खादों या रसायनों का ब्योरा, जिसका प्रयोग किया गया हो :
  11. कोई और समस्या, जो भूमि से सम्बन्धित हो :
  12. नमूने बाँधना :

हर नमूने को एक साफ कपड़े की थैली में डालें। ऐसी थैलियों में नमूने न डालें जो पहले खाद आदि के लिए प्रयोग में लायी जा चुकी हो या किसी और कारण खराब हों जैसे ऊपर बताया जा चुका है। एक लेबल थैली के अन्दर भी डालें। थैली अच्छी तरह से बन्द करके उसके बाहर भी एक लेबल लगा दें।

मिट्टी परीक्षण दोबारा कितने समय के अंतराल पर करायें ?

  • कम से कम 3 या 5 साल के अन्तराल पर अपनी भूमि की मृदा का परीक्षण एक बार अवश्य करवा लें। एक पूरी फसल-चक्र के बाद मृदा का परीक्षण हो जाना अच्छा है। हल्की या नुकसानदेह भूमि की मृदा का परीक्षण की अधिक आवश्यकता है।
  • वर्ष में जब भी भूमि की स्थिति नमूने लेने योग्य हो, नमूने अवश्य एकत्रित कर लेना चाहिये। यह जरूरी नहीं कि मृदा का परीक्षण केवल फसल बोने के समय करवाया जाये।

मिट्टी परीक्षण कहाँ करायें ?

किसान के लिए विभिन्न स्थानों पर मिट्टी जाँच की सुविधा नि:शुल्क उपलब्ध है। अपने-अपने खेत का सही नमूना निम्रलिखित क्षेत्रों में एवं विश्वविद्यालय में कार्यरत मिट्टी जाँच प्रयोगशाला में भेजकर परीक्षण करवा सकते हैं एवं जाँच रिपोर्ट प्राप्त कर सकते हैं। ये स्थान है-

(क) बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ( काँके, राँची),
(ख) क्षेत्रीय अनुसंधान केन्द्र (चियांकी एवं दारिसाई),
(ग) विभागीय मिट्टी जाँच प्रयोगशाला ( राँची, चक्रधरपुर, लातेहार), दामोदर घाटी निगम (हजारीबाग)।

मिट्टी के प्रकारपी.एचसुधारने के उपाय
अम्लीय मिट्टी झारखंड में
पाई जाती है। इस भाग में
ऊँची जमीन अधिक अम्लीय
होता है।
इस तरह की मिट्टियों की
रासायनिक प्रतिक्रिया पी.एच.
7 से कम होती है। परन्तु
उपयोग को ध्यान में रखते हुए
6.5 पी.एच. तक की मिट्टी को
ही सुधारने की आवश्यकता है।
चूने का महीन चूर्ण 3 से 4
क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से
बुआई के समय कतारों में डालकर
मिट्टी को पैर से मिला दें। उसके
बाद उर्वरकों का प्रयोग एवं बीज की
बुआई करें। जिस फसल में चूना की
आवश्यकता है। उसी में चूना दें, जैसे
दलहनी फसल, मूँगफली, मकई
इत्यादि। चूने की यह मात्रा प्रत्येक
फसल में बोआई के समय दें।



नाइट्रोजन की कमी के लक्षण

पौधों की बढ़वार रूक जाना। पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं। निचली पत्तियाँ पहले पीली पड़ती है तथा नयी पत्तियाँ हरी बनी रहती हैं। नाईट्रोजन की अत्यधिक कमी से पौधों की पत्तियाँ भूरी होकर मर जाती हैं।

फॉस्फोरस की कमी के लक्षण

पौधों का रंग गाढ़ा होना। पत्तों का लाल या बैंगनी होकर स्याहीयुक्त लाल हो जाना। कभी-कभी नीचे के पत्ते पीले होते हैं, आगे चलकर डंठल या तना का छोटा हो जाना। कल्लों की संख्या में कमी।

पोटाश की कमी के लक्षण

पत्तियों का नीचे की ओर लटक जाना। नीचे के पत्तों का मध्य भाग ऊपर से नीचे की ओर धीरे- धीरे पीला पड़ना। पत्तियों का किनारा पीला होकर सूख जाना और धीरे-धीरे बीच की ओर बढ़ना। कभी -कभी गाढ़े हरे रंग के बीच भूरे धब्बे का बनना। पत्तों का आकार छोटा होना।

मिट्टी जाँच के निष्कर्ष के आधार पर निम्न सारिणी से भूमि उर्वरता की व्याख्या की जा सकती है :


पोषक तत्त्व
उपलब्ध पोषक तत्त्व की मात्रा (कि./ हे.)
न्यूनमध्यमअधिक
नाइट्रोजन280 से कम280 से 560560 से अधिक
फॉस्फोरस10 से कम10 से 2525 से अधिक
पोटाश110 से कम110 से  280280 से अधिक
जैविक कार्बन0.5% से कम0.5 से 0.75%0.75% से अधिक




जैविक खादों में पोषक तत्वों की मात्रा

पोषक तत्वों की प्रतिशत मात्रा
जैविक खाद का नाम नाइट्रोजन फॉस्फोरस पोटाश
गोबर की खाद0.50.30.4
कम्पोस्ट0.40.41.0
अंडी की खली4.21.91.4
नीम की खली5.41.11.5
करंज की खली4.00.91.3
सरसो की खली4.82.01.3
तिल की खली5.52.11.3
कुसुम की खली7.92.11.3
बादाम की खली7.02.11.5



रासायनिक उर्वरक में पोषक तत्त्वों की मात्रा

पोषक तत्वों की प्रतिशत मात्रा
उर्वरक का नाम नाइट्रोजन फॉस्फोरस पोटाश
यूरिया46.0
अमोनियम सल्फेट20.6
अमोनियम सल्फेट नाइट्रेट26.0
अमोनियम नाइट्रेट35.0
कैल्सियम अमोनियम नाइट्रेट25.0
अमोनियम क्लोराइड25.0
सोडियम नाइट्रेट16.0
सिंगल सुपर फॉस्फेट16.0
ट्रिपल सुपर फॉस्फेट48.0
डाई कैल्सियम फॉस्फेट38.0
पोटैशियम सल्फेट48.0
म्यूरिएट ऑफ पौटाश60.0
पोटैशियम नाइट्रेट13.040.0
मोनो अमोनियम फॉस्फेट11.048.0
डाई अमोनियम फॉस्फेट18.046.0
सुफला (भूरा)20.020.0
सुफला (गुलाबी)15.015.015.0
सुफला (पीला)18.018.09.0
ग्रोमोर20.028.0
एन.पी.के12.032.016.0



  • पोषक तत्वों की अनुशंसित या वांछित मात्रा के लिए किसी जैविक खाद या उर्वरक की मात्रा उपर्युक्त तालिका से जानी जाती है।
  • फॉस्फोरस की कमी को दूर करने के लिए अम्लीय मिट्टी में रॉक फॉस्फेट का व्यवहार करें।
  • बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के अन्तर्गत किये गये शोध के आधार पर रॉक फॉस्फेट के व्यवहार से निम्नलिखित लाभ मिला है :
  • रॉक फॉस्फेट से पौधों को धीरे-धीरे पूर्ण जीवनकाल तक फॉस्फोरस मिलता रहता है।
  • रॉक फॉस्फोरस के लगातार व्यवहार से मिट्टी में फॉस्फेट की मात्रा बनी रहती है।
  • रॉक फॉस्फेट के व्यवहार से फॉस्फेट पर कम लागत आती है।
  • अगर मसूरी रॉक फॉस्फेट का व्यवहार लगातार 3-4 वर्षो तक किया जाता है तो अम्लीय मिट्टी की अम्लीयता में भी कुछ कमी आती है और पौधों को फॉस्फेट के आलावा कैल्शियम भी प्राप्त होती है।

रॉक फॉस्फेट का व्यवहार कैसे करें ?

  1. मसूरी रॉक फॉस्फेट, जो बाजार में मसूरी फॉस के नाम से उपलब्ध है, का व्यवहार निम्नलिखित किन्हीं एक विधि से किया जा सकता है-
  2. फॉस्फेट की अनुशंसित मात्रा का ढाई गुना रॉक फॉस्फेट खेत की अन्तिम तैयारी के समय भुरकाव करें। अथवा
  3. बुआई के समय कतारों में फॉस्फेट की अनुशंसित मात्रा का एक तिहाई सुपर फॉस्फेट एवं दो तिहाई रॉक फॉस्फेट के रूप में मिश्रण बनाकर डाल दें। अथवा
  4. खेत में नमी हो या कम्पोस्ट डालते हो तो बुआई के करीब 20-25 दिन पूर्व ही फॉस्फेट की अनुशंसित मात्रा रॉक फॉस्फेट के रूप में भुरकाव करके अच्छी तरह मिला दें।

भूमि की उर्वरा शक्ति को कायम रखने हेतु महत्वपूर्ण सुझाव…

06 December, 2017 12:00 AM IST By: KJ Staff

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पौधों की वृद्धि के लिए मिट्टी की भौतिक, रसायनिक एवं जैविक शक्ति को सुरक्षित रखना अति आवश्यक है। भूमि पौधों द्वारा उपयोग में लाये जाने वाले पोषक तत्वों का असीमित भण्डार नहीं है। किसान भाई कई सदियों से प्रकृति द्वारा दी गई इस अमूल्य धरोहर को फसलोत्पादन हेतु उपयोग में ला रहे है। अधिकतम उत्पादन लेने एवं अविवेकपूर्ण भूमि का प्रबन्ध किये जाने से मिट्टी की उर्वरता अत्यधिक प्रभावित हुई है, परिणामस्वरूप मिट्टी में कई प्रकार के विकार उत्पन्न होने लगे है जैसे मिट्टी की बनावट बदल जाना, कई सूक्ष्म तत्वों का अभाव हो जाना। अतः भूमि से अधिकाधिक फसलोत्पादन लेने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता भी बनाये रखने के लिए किसान भाइयों को कुछ कार्य निम्न प्रकार से अवश्य करना चाहिए।

उर्वरकों को सही चुनाव- उर्वरकों का प्रयोग फसल एवं भूमि की बनावट के आधार पर ही आवश्यकतानुसार करना चाहिए। उर्वरकों की आवश्यक मात्रा का जानकारी के लिये मिट्टी की जांच कराना जरूरी होता है। जांच कराने हेतु मिट्टी का नमूना समतल खेत से खुरपी की सहायता से मृदा सतह को साफ करके लगभग 6 इंच की गहराई तक लेना चाहिए। नमूना कई स्थानों से (एक एकड़ खेत में 6-8 स्थानों पर) लेकर छाया, में सुखाकर चैथाई करने की विधि द्वारा लगभग आधा कि0ग्रा0 मृदा नमूना तैयार कर लेते है। इस नमूने को पालीथीन या साफ कपड़े की थैली में भरकर आवश्यक सूचनायें जैसे, नाम, पता, खेत का नम्बर आदि लिखकर मिट्टी परीक्षण हेतु प्रयोगशाला में भेज देना चाहिए। क्षारीय भूमियों में अम्लीय स्वभाव वाली (जैसे अमोनियम सल्फेट तथा अम्लीय भूमियों में क्षारीय स्वभाव वाले उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए।

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जल निकास की समुचित व्यवस्था- भूमि में उचित जलनिकास की व्यवस्था न होने पर मिट्टी में उपस्थित खाद्य पदार्थ रिसाव द्वारा नष्ट हो जाते हैं तथा भूमि की निचली सतह पर उपस्थित हानिकारक तत्व भी मृदा की ऊपरी सतह पर इकट्ठा हो जाते हैं.

लगातार जल भराव की स्थिति में उचित वायु संचार भी नही हो पाता है जिससे कि मृदा में कार्बनडाई आक्साइड की मात्रा बढ़ जाने के कारण जड़ों के विकास में बाधा पड़ती है और पौधों का विकास पूर्ण रूपेण नहीं हो पाता है। अतः भूमि में जल विकास की समुचित व्यवस्था करना अति आवश्यक है।

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मृदा में नमी का संरक्षण- मिट्टी में नमी का कम या अधिक होना भी मृदा की उर्वरता को प्रभावित करता है। मृदा में नमी को सुरक्षित रखने  के लिए वर्षा के पानी को खेत में रोकना चाहिए, सूखे क्षेत्रों में परती छोड़ना चाहिए, उचित समय पर जुताई करना चाहिए, मृदा में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाना चाहिए, खरपतवारों को नष्ट करते रहना चाहिए, आदि कार्य समय समय पर करना आवश्यक रहता है।

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खेत का समतलीकरण- भूमि की उर्वरता सुरक्षित रखने के लिए खेत को समतल होना भी आवश्यक रहता है अन्यथा बरसात के दिनों में या सिचाई करने पर खेत की ढाल की ओर पानी के साथ-साथ मिट्टी एवं पोषक तत्व बहकर नष्ट हो जाएंगे।

प्रयोगों द्वारा यह पाया गया है कि यदि खेत में दो प्रतिशत ढाल है तो 43 टन प्रति एकड़ सतह की मिट्टी बह जाती है। अतः किसान भाइयों की मिट्टी का कटान रोकने के लिए खेत के चारों ओर मजबूत बांध बनाना चाहिये। ढालू भूमि के ऊपरी भाग पर घास उगाना चाहिए। ढाल के विपरीत दिशा में जुताई करना चाहिए। बरसात में शीघ्र पकने वालों फलीदार फसले उगाना आदि उपाय करना चाहिए।

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संतुलित उवरकों का प्रयोग आवश्यक-  मिट्टी में सभी पोषक तत्वों के आपसी संतुलन बनाये रखने के लिए सदैव संतुलित उर्वरको का प्रयोग करना चाहिए। तत्वों के आपसी संतुलन विगड़ जाने से पौधों की वृद्धि पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है इसलिए आवश्यकतानुसार सभी उर्वरको की उचित मात्रा के साथ-साथ सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति हेतु जिंक सलफेट, फेरसल्फेट आदि का भी प्रयोग करना चाहिए, जिसकी कमी से धान में खैरा रोग व सफेदा रोग लग जाता है।

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कार्बनिक खादों का प्रयोग अति आवश्यक- भूमि में रसायनिक उर्वरकों जैसे यूरिया, डाई अमोनियम फास्फेट, म्यूरेट आफ पोटाश के साथ-साथ कार्बनिक खादे जैसे गोबर की खाद, तथा विभिन्न फसलों के अवशेषों का भी प्रयोग करना चाहिए। केवल रसायनिक उर्वरकों के लगातार प्रयोग करने से मिट्टी फसलोत्पादन के अयोग्य हो सकती हैं। कार्बनिक खादों में लगभग सभी खाद्य तत्वों के मौजूद रहने से इसके प्रयोग के परिणाम स्वरूप मृदा उर्वरता में वृद्धि होती है। हरी खादे उगाने से मिट्टी की निचली सतह पर मौजूद पोषक तत्व ऊपरी सतह पर आ जाते है जिससे कि भूमि में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है।

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फसल चक्र अपनाये- भूमि की पोषक तत्व क्षमता का भरपूर उपयोग करने हेतु फसल चक्र को अपनाना आवश्यक होता है। जैसे अधिक गहराई तक जड़ वाली फसले उगानी चाहिए इस प्रकार मृदा के विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध पोषक तत्वों का भरपूर उपयोग हो जाता है एवं खाद्य तत्वों की कमी भी एक निश्चित क्षेत्र में नही होने पाती है।

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दलहनी फसलें भी उगायें- अन्य फसलों के साथ-साथ दलहनी फसलों को भी उगाना चाहिए क्योंकि इन फसलों की जड़ों में सहजीवी जीवाणु वायुमण्डल से नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करते है। दलहनी फसले जैसे बरसीम, रिजका, मटर, चना, लोविया, सनई, ढैचा, ग्यार, मूग, व उरद आदि है। अनुकूल परिस्थितियों में ये फसले लगभग 40 किग्रा से 150 किग्रा0 तक नाइट्रोजन प्रति एकड़ प्रति वर्ष जमा करती हैं।

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खरपतवारों का नियन्त्रण- खेत में उगे खरपतवार, फसलों के साथ, प्रकाश, नमी एवं खाद्य पदार्थों के लिए प्रतिस्पर्धा करते है। अतः इनकी बढ़वार पर नियन्त्रण पाने के लिए किसान भाइयों को स्वच्छ बीज का इस्तेमाल करना चाहिए, खरपतवारों को पकने के पहले काट लेना चाहिए, गर्मियों में खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से कर देना चाहिए। इस प्रकार से भूमि की उर्वरा शक्ति बरकरार रहेगी।

मृदा उर्वरता प्रबंधन

Submitted by birendrakrgupta on Fri, 11/21/2014 – 15:21

Author

जगपाल सिंह मलिक

Source

कुरुक्षेत्र, नवंबर 2014

  •  

जहां पर सघन खेती की जा रही हो, वहां आवश्यक हो जाता है कि दो-तीन साल में एक बार हरी खाद की फसल जैसे सनई, ढैंचा, मूंग या ग्वार अवश्य उगाई जाए। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति तो बढ़ती ही है साथ ही मृदा उर्वरता में भी सुधार होता है। परिणामस्वरूप अगली फसलों का उत्पादन भी अच्छा होता है।पिछले दो दशकों के दौरान खेती में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग के कारण कृषि भूमि का उपजाऊपन घटता जा रहा है। मृदा की उर्वरा शक्ति नष्ट होती जा रही है। साथ ही कृषि रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से कृषि उपज भी विषाक्त होती जा रही है। बढ़ती जनसंख्या के भरण-पोषण के लिए यह नितांत आवश्यक है कि खाद्यान्न व खाद्य तेलों के उत्पादन में अधिकाधिक वृद्धि की जाए ताकि भविष्य में देश का खाद्यान्न उत्पादन बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप हो। इसके लिए प्रति इकाई क्षेत्र उत्पादन बढ़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है क्योंकि भविष्य में कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल बढ़ने की संभावनाएं नगण्य हैं। यह मृदा उर्वरता के उचित प्रबंध द्वारा ही सम्भव हो सकेगा। मृदा में किसी खास पोषक तत्व की कमी हो तो उसकी आपूर्ति जैविक खादों एवं रासायनिक उर्वरकों के द्वारा की जानी चाहिए। अन्यथा इसका मृदा उर्वरता व उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

“मृदा उर्वरता से तात्पर्य उसकी उस क्षमता से है जो पौधे की वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों को संतुलित मात्रा व उपलब्ध अवस्था में आपूर्ति कर सके। साथ ही मृदा किसी दुष्प्रभाव या विषैले प्रभाव से पूर्णतया मुक्त हो।” मृदा उर्वरता से हमें उसमें पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की उपलब्धता के स्तर का बोध होता है।

मृदा उर्वरता सामान्यतः मिट्टी के भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणों पर निर्भर करती है। हमारे देश की मृदाओं में नाइट्रोजन की कमी सर्वव्यापी है। नाइट्रोजन के साथ ही कई क्षेत्रों में फास्फोरस की भी व्यापक कमी महसूस की गई है। विभिन्न सूक्ष्म पोषक तत्वों में जस्ते व लौह तत्व की कमी देश के अनेक क्षेत्रों में मुख्य रूप से देखी गई है। जिंक की कमी प्रमुखतया पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, गुजरात व मध्य प्रदेश की मृदाओं में है।

कुछ क्षेत्रों में जिंक की कमी इतनी उग्र होती जा रही है कि जिंकयुक्त उर्वरकों का प्रयोग किए बिना फसलोत्पादन असफल होता देखा गया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि धान का ‘खैरा’ रोग और गेहूूं के पौधे की पत्तियों का पीला पड़ना जिंक की कमी के कारण होता है। हमारे देश में जिंक की कमी विशेष रूप से चूनायुक्त मृदाओं व खराब जलनिकास वाली मृदाओं में पाई जाती है। आज खेती में मुख्य पोषक तत्वों—नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश के अत्यधिक व असंतुलित प्रयोग के कारण कुछ सूक्ष्म और गौण पोषक तत्वों की मृदा में कमी होती जा रही है। बिना मिट्टी परीक्षण के उर्वरकों व खादों के बिना सोचे-समझे अत्यधिक व असंतुलित प्रयोग के कारण उपयुक्त समस्याएं आ रही हैं। यहां यह भी स्पष्ट किया जाता है कि किसी भी पोषक तत्व की आवश्यकता से अधिक मात्रा प्रयोग करने पर पोषक तत्वों की आपसी क्रिया के कारण अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

मृदा में जीवांश पदार्थ की कमी से उसमें उपस्थित लाभकारी जीवाणु और जीव-जंतु विलुप्त हो जाएंगे। इनकी उपस्थिति में मृदा में होने वाली विभिन्न अपघटन इत्यादि क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जिससे पोषक तत्वों एवं खनिज लवणों का बहुत बड़ा हिस्सा पौधे को प्राप्त नहीं हो सकेगा।खेतों में गोबर की खाद व पशुओं के मल-मूत्र तथा बिछावन का बहुत कम प्रयोग हो रहा है। परिणामस्वरूप मृदा में जीवांश पदार्थ की कमी होती जा रही है। मृदा में जीवांश पदार्थ की कमी से उसमें उपस्थित लाभकारी जीवाणु और जीव-जंतु विलुप्त हो जाएंगे। इनकी उपस्थिति में मृदा में होने वाली विभिन्न अपघटन इत्यादि क्रियाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा जिससे पोषक तत्वों एवं खनिज लवणों का बहुत बड़ा हिस्सा पौधे को प्राप्त नहीं हो सकेगा। अतः फसलों से अच्छी गुणवत्ता की अधिक पैदावार लेने के लिए तथा जमीन के उपजाऊपन को बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के संतुलित प्रयोग की आवश्यकता है। इसके लिए खेती में रासायनिक उर्वरकों के अलावा पौधों को पोषक तत्व प्रदान करने वाले अन्य स्रोतों के प्रयोग की भी पर्याप्त संभावनाएं हैं।

देश के अनेक कृषि क्षेत्रों में पौधों के लिए तीन मुख्य पोषक तत्वों—नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश का प्रयोग एक अनिश्चित अनुपात में किया जाता है। जबकि इनका आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए। किसानों द्वारा खेती में लगातार एक ही प्रकार के उर्वरकों का लगातार प्रयोग करने से मृदा में कुछ सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होती जा रही है। सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी से खाद्यान्न, दलहन, तिलहन और उद्यानिकी फसलों की उपज प्रभावित होती जा रही है।

इसी प्रकार धान-गेहूं फसल प्रणाली के अंतर्गत भूमि को आराम न मिल पाने के कारण कार्बन-नाइट्रोजन का अनुपात गड़बड़ा रहा है जिसके परिणामस्वरूप मृदा की उत्पादन क्षमता में काफी गिरावट होती जा रही है। अत्यधिक नाइट्रोजन और फास्फोरस उर्वरकों के प्रयोग करने के बावजूद हमारे फसलोत्पादन में वृद्धि नहीं हो पा रही है। इसका स्पष्ट कारण मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों का अत्यधिक दोहन, सघन फसल प्रणाली व जीवांश की कमी के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है। किसी-किसी क्षेत्र में लवणीय जल से सिंचाई करने के कारण मिट्टी में उपस्थित लाभकारी जीवाणुओं की संख्या में अत्यधिक कमी होती जा रही है। खेती में हर वर्ष एक-सा फसल चक्र होने के कारण हानिकारक सूक्ष्म जीव-जंतुओं की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। भारत के उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व राज्यों में सघन कृषि प्रणाली के अंतर्गत यह समस्या और भी गंभीर होती जा रही है।

मृदा उपजाऊपन और मृदा पीएच में घनिष्ठ संबंध है। सामान्यतः खनिज मृदाओं का पीएच मान 3.5 से 10 के बीच होता है। उदासीन मृदाओं का पीएच 7.0 के आसपास होता है। कृषि योग्य मृदाओं का पीएच 4.0 से 8.0 तक होता है। सभी पौधों की पीएच आवश्यकताएं भिन्न-भिन्न होती हैं। मृदा पीएच के बढ़ने से कुछ पोषक तत्वों की उपलब्धता कम हो जाती है जैसे आयरन, जिंक और मैगनीज इसमें प्रमुख हैं। जबकि पीएच के अधिक बढ़ने से मौलिब्डेनम अधिक उपलब्ध होता है। मृदा पीएच के घटने से (5.0 से 5.5 के मध्य) एल्युमिनियम तथा मैगनीज अधिक घुलनशील अवस्था में होते हैं जो पौधों की वृद्धि और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। 

केंचुए जीवांश पदार्थ की उपस्थिति में अधिक सक्रिय रहते हैं। अतः किसान भाइयों से सिफारिश की जाती है कि उन्हें अपने खेतों में हर दो या तीन वर्ष बाद जीवांश खादों एवं हरी खादों का प्रयोग करते रहना चाहिए। इससे मृदा पीएच को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी और फसल चक्र में आगामी फसलों का उत्पादन भी अच्छा होगा।मृदा में पाए जाने वाले विभिन्न लाभकारी जीवाणुओं की क्रियाशीलता पर भी मृदा पीएच का सीधा प्रभाव पड़ता है। पौधों के लिए मुख्य पोषक तत्व नाइट्रोजन की उपलब्धता मृदा जीवाणुओं की सक्रियता पर निर्भर करती है। जब मृदा पीएच 6.0 व 7.0 के बीच होता है तो नाइट्रीकरण की क्रिया अधिक तेजी से होती है। फास्फोरस की उपलब्धता के लिए भी मृदा पीएच 6 व 7 के मध्य होना चाहिए जबकि पोटाश की उपलब्धता पर मृदा पीएच का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता है।

किसान का मित्र समझे जाने वाले ‘केंचुए’ कैल्शियमयुक्त मृदाओं में अधिक संतोषजनक रूप से कार्य करते हैं। केंचुए अम्लीय भूमियों में मिट्टी खोदने में अक्रियाशील होते हैं और अधिक समय तक जीवित नहीं रहते हैं। केंचुए जीवांश पदार्थ की उपस्थिति में अधिक सक्रिय रहते हैं। अतः किसान भाइयों से सिफारिश की जाती है कि उन्हें अपने खेतों में हर दो या तीन वर्ष बाद जीवांश खादों एवं हरी खादों का प्रयोग करते रहना चाहिए। इससे मृदा पीएच को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी और फसल चक्र में आगामी फसलों का उत्पादन भी अच्छा होगा। किसानों को सघन कृषि प्रणाली अपनाते समय मृदा का नियमित परीक्षण कराते रहना चाहिए। जिन मुख्य, गौण व सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी पाई जाए, उनकी आपूर्ति उर्वरकों के रूप में व अन्य जैविक खादों को देकर कर सकते हैं।

प्रकृति में पाए जाने वाले विभिन्न मित्रों कीट जैसे परजीवी, परभक्षी एवं कीड़ों में बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को कीट/व्याधि नियंत्रण हेतु प्रयोग करना चाहिए। ट्राइकोग्रामा एक सूक्ष्म अंड परजीवी है जो तनाछेदक, फलीछेदक व पत्ती खाने वाले कीटों के अंडों पर आक्रमण करते हैं। इसी प्रकार ट्राईकोडरमा नामक फफूंद को भूमि द्वारा उत्पन्न रोगों में नियंत्रण के काम लेते हैं। इसको जड़ गलन, उकठा व नर्सरी में पौधों का सड़ना इत्यादि रोगों के विरुद्ध प्रयोग करते हैं। बीजोपचार के लिए 6 से 8 ग्राम चूर्ण प्रति किग्रा बीज व भूमि उपचार के लिए 2 से 3 किग्रा चूर्ण प्रति हे. की दर से गोबर व वर्मी कंपोस्ट में मिलाकर भूमि में डालने से विभिन्न मृदाजनित रोगों की रोकथाम की जा सकती है। इससे कृषि रसायनों के प्रतिकूल प्रभावों से भूमि को बचाया जा सकता है।

यदि वर्षा ऋतु में वर्षा जल को अच्छी तरह से संरक्षित कर लिया जाए तो इसका प्रयोग सूखे की स्थिति में सिंचाई जल के रूप में किया जा सकता है। साथ ही क्षेत्र विशेष में भूमिगत जलस्तर भी ऊपर उठेगा। बाढ़ द्वारा होने वाले मिट्टी कटाव के नुकसान से भी बचा जा सकता है।




कृषि प्रणाली में बदलाव


उचित फसल चक्र अपनाकर भी मृदा का उपजाऊपन बढ़ाया जा सकता हैं। फसल चक्र में खाद्यान्न फसलों के साथ दलहनी फसलों को भी उगाना चाहिए। दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाती हैं। साथ ही समृद्ध एवं टिकाऊ खेती के लिए मृदा में जीवांश पदार्थ की मात्रा को भी बढ़ाती हैं। इसके लिए पूर्ण प्रचार एवं प्रसार की आवश्यकता है ताकि किसानों का रुझान इस ओर किया जा सके।

भूमि के उपजाऊपन को बनाए रखने में जैविक कृषि विधियों का विशेष योगदान है। इसके अलावा खेत की तैयारी, फसल चक्र, कीट व रोग प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव, समय से बुवाई, सस्य, भौतिक व यांत्रिक विधियों द्वारा खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। मृदा के उपजाऊपन को बढ़ाने में एकीकृत कीट/व्याधि प्रबंध की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। इसमें कीटनाशकों एवं शाकनाशियों के साथ हानिकारक जीवों व खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए बायोएजेंट, बायोपेस्टीसाइड, कृषि प्रणालियों में बदलाव जैसे शून्य जुताई व कम जुताई को अपनाकर भी मृदा की उर्वरा शक्ति में सुधार किया जा सकता है। 

अनुसंधानों द्वारा यह भी पाया गया है कि खेत की बार-बार जुताई करने से कोई विशेष लाभ नहीं होता है और न ही फसल की पैदावार मेें कोई अतिरिक्त वृद्धि होती है। बल्कि बार-बार जुताई करने से उत्पादन लागत बढ़ती है। शून्य जुताई तकनीक में चूंकि खेत की जुताई नहीं करनी पड़ती है जिससे जमीन की सतह समतल बनी रहने के कारण परंपरागत विधि की अपेक्षा सिंचाई जल जल्दी ही ज्यादा क्षेत्रों में फैल जाता है। इस विधि से फसलों की बुवाई करने पर खरपतवारों का भी कम जमाव होता हैै।

लघु व सीमांत किसान बिना रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किए खेती कर सकते हैं। इन किसानों की खरीद शक्ति कम होती है। ऐसे किसान गोबर की खाद, कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट, हरी खादें, जैविक उर्वरक, नीम की खली व पत्तियां, फसल कटाई के उपरांत फसल अवशेष खेत में दबाकर अपनी जमीन का उपजाऊपन बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार भूमि की जलधारण क्षमता तथा फसलों को जल की उपलब्धता को भी बढ़ाया जा सकता हैं।

आधुनिक कृषि यंत्रों लेज़र लेवलर व लेवल मास्टर के प्रयोग से खेत को पूर्णतया समतल किया जा सकता है। पूर्ण समतल खेत की सिंचाई में पानी कम लगता है जिससे सिंचाई में खर्च होने वाली ऊर्जा बचती है।भूमि प्रबंधन का आधार खेतों की समतलता है। किसानों ने खेतों की समतलता के महत्व को समझा और खेतों को समतल करने की कई पारंपरिक विधियों को अपनाया जिसमें कुछ लाभ प्राप्त हुए। परंतु इन पारंपरिक विधियों में खेत पूर्णतया समतल नहीं हो पाते हैं। आधुनिक कृषि यंत्रों लेज़र लेवलर व लेवल मास्टर के प्रयोग से खेत को पूर्णतया समतल किया जा सकता है। पूर्ण समतल खेत की सिंचाई में पानी कम लगता है जिससे सिंचाई में खर्च होने वाली ऊर्जा बचती है। खेत में खाद एवं कीटनाशकों का फैलाव समान रूप से होता है जिससे मृदा की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार होता है।

फसल विविधिकरण में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर प्रयोग होता है। फसल विविधिकरण का मुख्य लक्ष्य ग्रामीण पर्यावरण एवं मृदा स्वास्थ्य का बचाव और उच्च कृषि बढ़वार बनाए रखने, ग्रामीण रोजगार सृजन व बेहतर आर्थिक लाभ पाने हेतु कृषि, बागवानी, मतस्यिकी, वानिकी, पशुधन प्रणाली के पक्ष में अनुकूल स्थितियां पैदा करना है। विविधकृत फसल चक्र कीट तथा व्याधियों के प्रकोप को कम करते हैं।

मृदा उर्वरता को सुधारने के लिए निम्नलिखित बिंदुओं का अनुसरण करना चाहिए-




खेत की मिट्टी की जांच कराएं


मृदा उर्वरता जानने के लिए अपने खेत की मिट्टी की जांच प्रयोगशाला में करवाएं। खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर ही खादों एवं उर्वरकों की मात्राएं सुनिश्चित करें। इससे मृदा स्वास्थ्य और उर्वरा शक्ति में संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। साथ ही उर्वरकों के अनावश्यक प्रयोग पर भी रोक लगेगी। यह सुविधा नजदीकी कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि अनुसंधान केन्द्रों व कृषि विज्ञान केन्द्रों पर मुफ्त उपलब्ध है। मृदा जांच से हमें निम्नलिखित जानकारियां मिलती हैं-




मृदा पीएच मान


मृदा को अम्लीय, क्षारीय या उदासीन, पीएच मान के आधार पर विभाजित किया जाता है। मृदा पीएच फसलों द्वारा मृदा से पोषक तत्वों व पानी के अवशोषण को प्रमुख रूप से प्रभावित करने वाला कारक है। खनिज मृदाओं का पीएच मान 3.5 से 10 के बीच होता है। सामान्य मृदाओं का पीएच मान 7.0 के आसपास होता है। जिस प्रकार विभिन्न मिट्टियों का पीएच अलग-अलग होता है उसी प्रकार पौधों की पीएच आवश्यकताएं भिन्न-भिन्न होती हैं।




मृदा में उपलब्ध पोषक तत्व


मृदा जांच से हमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जिंक, आयरन व मैगनीज की स्थिति का ज्ञान होता है। मृदा में पोषक तत्वों की उपलब्धता पौधों के विकास व वृद्धि को सीधा प्रभावित करती हैं। फसलों में असंतुलित पोषण से मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों के लगातार दोहन से मृदा उर्वरता स्तर घटता जा रहा है।




कार्बनिक पदार्थों की मात्रा


यह मृदा की जलधारण क्षमता, मृदा ताप, लाभदायक जीवाणुओं की सक्रियता को बढ़ाने तथा मृदा उर्वरकता को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण गुण है। मृदा में कार्बनिक पदार्थों की स्थिति का सीधा संबंध मृदा उर्वरता से होता है।




विद्युत चालकता


विद्युत चालकता से हमें मृदा में घुलनशील कैल्शियम, मैग्निशियम और सोडियम तथा कार्बोनेट, बाइकार्बोनेट, सल्फेट व क्लोराइड जैसे ऋणायन लवणों की प्रकृति और मात्रा इत्यादि का ज्ञान होता है। इन लवणों की अधिक मात्रा का मृदा के भौतिक, रासायनिक व जैविक गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।




मृदा सुधारकों जैसे जिप्सम व चूने की मात्रा का ज्ञान
मृदा में जीवांश पदार्थों का स्तर बनाए रखें


मृदा में उपलब्ध जैविक पदार्थों की मात्रा का मृदा में उपलब्ध पोषक तत्वों, मृदा संरचना, मृदा ताप, जलधारण क्षमता, लाभकारी जीवाणुओं की संख्या, फसल गुणवत्ता व मृदा उर्वरता इत्यादि पर प्रमुख प्रभाव होता है। मृदा में जैविक पदार्थों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. फसल उत्पादों की अच्छी गुणवत्ता और मृदा उर्वरता बनाए रखने के लिए गोबर की खाद, कंपोस्ट, वर्मी कंपोस्ट, मुर्गी खाद, हरी खाद, फसल अवशेषों इत्यादि का समय-समय पर प्रयोग करते रहना चाहिए।
2. खेती में जैविक उर्वरकों जैसे एजोटोबैक्टर, राइजोबियम, एजोस्पिरिलम, नीलहरित शैवाल, फास्फो-बैक्टीरिया, अजोला व माइकोराइजा का प्रयोग भी मृदा उर्वरता को बढ़ाने में लाभदायक पाया गया है।
3. जहां पर सघन खेती की जा रही हो, वहां आवश्यक हो जाता है कि दो-तीन साल में एक बार हरी खाद की फसल जैसे सनई, ढैंचा, मूंग या ग्वार अवश्य उगाई जाए। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति तो बढ़ती ही है साथ ही मृदा उर्वरता में भी सुधार होता है। परिणामस्वरूप अगली फसलों का उत्पादन भी अच्छा होता है। इस प्रकार भूमि की जलधारण क्षमता तथा फसलों में जल की उपलब्धता को भी बढ़ाया जा सकता है।
4. उचित फसल चक्र अपनाकर भी मृदा उर्वरता को बनाए रखा जा सकता है। फसलों के साथ दलहनी फसलों को उगाना चाहिए। दलहनी फसलें वायुमंडलीय नाइट्रोजन का मृदा में यौगिकीकरण कर नाइट्रोजन की मात्रा को बढ़ाती हैं। साथ ही समृद्ध एवं टिकाऊ खेती के लिए मृदा में रुझान इस ओर किया जा सके।
5. लघु एवं सीमांत किसान नीम की खली व पत्तियां, फसल कटाई उपरांत फसल अवशेष खेत में दबाकर अपनी जमीन का उपजाऊपन बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार भूमि में जीवांश पदार्थ की उपलब्धता को भी बढ़ाया जा सकता है।




समन्वित पोषण प्रबंधन


समन्वित पोषण प्रबंधन से तात्पर्य यह है कि पौधों को पोषक तत्व प्रदान करने वाले सभी संभव स्रोतों जैसे रासायनिक उर्वरक, जैविक खादें, जैविक उर्वरक, फसल अवशेष इत्यादि का कुशलतम समायोजन कर फसलों को संतुलित पोषण दिया जाए। ये सभी स्रोत पर्यावरण हितैषी हैं और इनसे मुख्य पोषक तत्व भी पौधों को धीरे-धीरे व लम्बे समय तक प्राप्त होते रहते हैं। सघन फसल प्रणाली के अंतर्गत फसलें मृदा से जितने पोषक तत्वों का अवशोषण करती हैं उनकी क्षतिपूर्ति मृदा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए अति आवश्यक है। 

मृदा परीक्षण के आधार पर मुख्य, गौण और सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जिंक, लौह, तांबा, बोरोन, मौलिब्डेनम, मैगनीज व क्लोरीन की बहुत कम मात्रा में आवश्यकता होती है। यदि फसल अवशेष व अन्य जैविक खादों का नियमित प्रयोग होता रहे तो पौधों को इन तत्वों के अतिरिक्त पोटाश की भी कमी नहीं रहती है। फास्फोरस की कमी जीवाणु खाद द्वारा बीज का जीवाणु उपचार करके पूरी की जा सकती है। समन्वित पोषण प्रबंधन के प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैंः-

1. वर्ष में एक बार दाल वाली फसल अवश्य लगानी चाहिए। ज्वार, बाजरा व मक्का के बाद रबी में चना, मसूर व बरसीम लगाएं। दाल वाली फसलों की जड़ों में राइजोबियम जीवाणु की गांठें होती हैं जो नाइट्रोजन स्थिरीकरण का काम करती हैं।
2. फसल अवशेषों को भी खाद के रूप में प्रयोग करना चाहिए। इससे पोषक तत्वों के साथ-साथ मृदा में कार्बन की मात्रा भी अधिक बढ़ती है।
3. हरी खाद वाली फसलें जैसे ढैंचा, सनई, लोबिया व ग्वार उगाने से जमीन में नाइट्रोजन व कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है।
4. जैविक उर्वरकों जैसे राइजोबियम कल्वर, पीएसबी व एजोटोबैक्टर आदि का प्रयोग करने से रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में कमी की जा सकती है।
5. अरंडी व नीम की खली का प्रयोग भी समन्वित पोषण प्रबंधन के अंतर्गत किया जा सकता है। बुवाई से 15 से 20 दिन पहले 8 से 10 टन खली को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में अच्छी तरह मिलाएं।
6. मिट्टी जांच के आधार पर सूक्ष्म पोषक तत्वों को प्रदान करने वाले उर्वरकों को मृदा में डालें या फसल पर छिड़काव करें। भारतीय मृदाओं में प्रमुख रूप से जिंक, आयरन व मैगनीज की कमी पाई जाती है।
7. फसलोत्पादन में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश के प्रयोग का आदर्श अनुपात 4:2:1 रखना चाहिए।




खेती में कृषि रसायनों का प्रयोग कम करें


खेती में कृषि रसायनों के अंधाधुंध और अनुचित प्रयोग से मृदा उर्वरता को बिगड़ने से बचाने के लिए अनुकूल नीतियां अपनानी होंगी। तभी हम टिकाऊ खेती की नींव रख सकते हैं। कृषि रसायनों को बेचने वाले डीलरों की सलाह पर ही किसान इन रसायनों का प्रयोग करते हैं। यदि इसके लिए कृषि वैज्ञानिकों, विषय-वस्तु विशेषज्ञों व कृषि प्रसारकर्मियों की मदद ली जाए तो बेहतर रहेगा। इस प्रकार किसान अनावश्यक खर्च से भी बच जाएगा और मृदा उर्वरता एवं उर्वरता को बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। 

साथ ही नकली कृषि रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से होने वाले दुष्परिणामों से किसानों को अवगत कराना अति आवश्यक है। इसके लिए किसान सम्मेलन, किसान संगोष्ठी एवं किसान दिवस का आयोजन किया जा सकता है। कृषि रसायनों के प्रयोग को कम करने के लिए समन्वित कीट प्रबंधन व समन्वित रोग प्रबंधन को अपनाना चाहिए।




मृदा सुधार


सफल कृषि उत्पादन के लिए लवणीय, क्षारीय व अम्लीय मृदाओं का सुधार आवश्यक है। लवणीय, क्षारीय व अम्लीय मृदाओं में पौधे भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों व जल का अवशोषण नहीं कर पाते हैं। लवणीय भूमि सुधार के लिए भूमि समतलीकरण, मेड़बंदी या सिंचाई जलभराव करके घुलनशील लवणों का निक्षालन करें। मृदा जांच के आधार पर क्षारीय भूमि में जिप्सम, सल्फर व केल्साइट का प्रयोग करें। हरी खाद वाली फसलों जैसे ढैंचा, सनई व लोबिया भी क्षारीय भूमि सुधारने में उपयोगी सिद्ध हुई हैं। अम्लीय मृदाओं के सुधार हेतु मृदा पीएच के अनुसार चूने की मात्रा का प्रयोग करें।




मृदा संरक्षण


मृदा की ऊपरी उपजाऊ सतह को जल व वायु द्वारा होने वाले क्षरण से बचाना चाहिए। इसके लिए खेतों की मेड़बंदी करके वर्षा ऋतु में वर्षा जल को संरक्षित कर लिया जाए। इससे क्षेत्र विशेष में भूमिगत जलस्तर भी ऊपर उठेगा। जलकटाव से होने वाले नुकसान से भी मृदा को बचाया जा सकता है। मृदा में अधिक से अधिक जैविक खादों का प्रयोग करें जिससे भूमि की जलधारण क्षमता को बढ़ाया जा सके। कृषि कार्यों में बदलाव जैसे शून्य जुताई को अपनाकर भी मृदा स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। खेत की बार-बार जुताई करने से मृदा संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मृदा को आवरण प्रदान करने वाली फसलों जैसे मूंग, उड़द, लोबिया आदि का समावेश फसल चक्र में करने से भी मृदा को संरक्षित कर सकते हैं।

(लेखक पूर्व कृषि रक्षा अधिकारी हैं)

भूमि एवं मृदा

Submitted by admin on Tue, 09/23/2008 – 12:31

भूमि क्या है ? 

पृथ्वी के पृष्ठ का कोई भाग जो जलाच्छादित नही हो, भूमि कहलाता है। भूमि का अभिप्राय धरातल से होता है जिसके संघटक मृदा, वनस्पति तथा भू-आकृति पृष्ठ लक्षण होते है। भूमि एक आर्थिक वस्तु है जिसका मूल्य होता है एवं इसका स्वामित्व क्रय-विक्रय किया जाता है तथा हस्तान्तरित किया जाता है। यह राष्ट्र की अमूल्य संपदा है। भूमि को क्षेत्रफल की इकाई में जैसे : एकड़, हैक्टेयर, बीघा अथवा नाली में मापा जाता है।

भूमि उन तीन प्राकृतिक संसाधनों, अन्य दो जल तथा वायु है, में से एक है जो इस पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। अति आवश्यक मानव क्रियाओं के लिए भूमि एक अपरिहार्य संसाधन है। यह कृषि तथा वनोत्पादन, जल संग्रह, मनोरंजन तथा आवासन के लिए आधार प्रदान करती है। यही कारण है कि किसी राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक अपनी मातृ भूमि पर गर्व करता है तथा उसके संरक्षण के लिए उत्तरदायी होता है।

कृषि के अतिरिक्त भूमि के कई उपयोग है जैसे वन, चारागाह, मनोरंजन सुविधाएं, बाहरी संरचनाएं, सड़क इत्यादि।

किसान के सत्‌त जीवनयापन के लिए भूमि सबसे मूल्यवान संसाधन है। वह भूमि की जुताई करता है तथा उस पर खाद्यान्न फसलें, फल, सब्जियां तथा अन्य फसले उगाता है।

स्वभाव तथा उपयोग के आधार पर भूमि के कई किस्म होती है यथाकृष्य भूमि जिस पर मौसमी, वार्षिक अथवा बहुवर्षीय फसले जैसे उद्यान लगाए जाते है।
वन भूमि जिसपर बन होते है।
बंजर भूमि जो किसी दुर्गुण के कारण कृषि के लिए उपयुक्त नही है।
अनुर्वर भूमि जो अनुत्पादक है जैसे ऊसर भूमि।
नम भूमि जो प्राय जलाक्रांत रहती है तथा अधिकांश समय में नम रहती है।
निचली भूमि जो निचले क्षेत्र में होती है जहाँ से वाह्‌य जल निकास नही होता है तथा भूमि प्रायः जलाक्रांत रहती है।
उपजाऊ भूमि जो ऊँचे स्थान पर होती है तथा जिससे उत्तम जल निकास होता है।
सिंचित भूमि जिसके सिंचाई हेतु सुनिश्चित साधन होता है।
शुष्क भूमि जिसके सिंचाई की व्यवस्था नही होती तथा वह अत्यन्त कम वर्षा (500 मि.मी. से कम) पर निर्भर होती है।

मृदा क्या है ? 

मृदा पृथ्वी की ऊपरी परत है जो पौधों की वृद्धि के लिए प्राकृतिक माध्यम प्रदान करता है। पृथ्वी की यह ऊपरी परत खनिज कणों तथा जैवांश का एक संकुल मिश्रण है जो कई लाख वर्षो में निर्मित हुआ है तथा इसके बिना इस पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व असंभव है। भूमि के एक अभिन्न संद्यटक के रूप में मृदा जीवन समर्थक तंत्र का एक संघटक है।
भूमि की उपादेयता उसके मृदा की किस्म पर निर्भर है। इस कारण जनसाधारण भूमि तथा मृदा में कोई अंतर नही मानते किन्तु वैज्ञानिक मानते है। किसी वनस्पति विहीन भूमि पर आप मृदा को प्रथम दृष्टया देख सकते है किन्तु किसी सघन वन में इस प्रकार मृदा नही दिखती क्योंकि वहॉ गिरी हुई पत्तियों से मृदा पृष्ठ आच्छादित रहता है।
पौधों की वृद्धि को समर्थित करने के लिए मृदा एक क्रांतिक संसाधन है। विभिन्न खेतों की मृदाए उनकी उत्पत्ति तथा प्रबंधन के अनुसार दृष्य रूप, लक्षणों तथा उत्पादकता में भिन्न-भिन्न हो सकती है किन्तु वे सभी कृषि तथा खाद्य सुरक्षा, वानिकी, पर्यावरण सुरक्षा तथा जीवन की गुणवत्ता में समान महत्वपूर्ण कार्य संपन्न करती है।

मृदा को कृषि की उपयोगिता के दृष्टिकोण से इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है।
“मृदा एक प्राकृतिक पिन्ड है जो चट्टानों के अपक्षय के परिणाम स्वरूप विकसित होती है, जिसके लाक्षणिक भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुण होते है तथा जो पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए माध्यम प्रदान करती है।”

मृदा एक प्राकृतिक त्रि-आयमी पिन्ड है जिसके गुणधर्म तीनों दिशाओं (लम्बाई, चौड़ाई तथा गहराई) में परिवर्तनीय है। मृदा के इस त्रिआयामी रूप को मृदा परिच्छेदिका कहा जाता है। मृदा-परिच्छेदिका उपरी पृष्ठ से लेकर नीचे पैतृक पदार्थ तक सभी संस्तरो सहित एक उर्द्ध्वाधर कटान है। एक पूर्ण विकसित परिपक्व मृदा परिच्छेदिका में तीन खनिज संस्तर होते है : क, ख तथा ग। किसी स्थान पर मृदा की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करने हेतु वहाँ पर मृदा परिच्छेदिका का विस्तृत अध्ययन आवश्यक होता है। इसके लिए हमे मृदा का पृष्ठ से नीचे तक एक अनुभाग काटना होगा तथा उसमें विभिन्न परतो का निरीक्षण करना होगा, जिन्हे ”संस्तर” कहा जाता है। प्रत्येक विकसित मृदा की एक भिन्न परिच्छेदिका लक्षण होते है। मृदा परिच्छेदिकाओं के समानता तथा विषमता के आधार पर उन्हें विभिन्न समूहों में वर्गीकृत किया जाता है।

मृदा पृष्ठ अथवा जुताई परत मृदा परिच्छेदिका का ऊपरी परत है जिसमें पर्याप्त मात्रा में जैवांश होता है तथा यह जैवांश के एकत्र होने से काले रंग का होता है। यह ऊपरी परत ”संस्तर क” कहलाता है। पृष्ठ मृदा के नीचे की परत में ऊपरी परत से कम जैवांश होता है तथा इसमें प्रायः मृतिका, चूना अथवा लौह यौगिको का एकत्रीकरण होता है। इस मध्यवर्ती परत जिसमें ”संस्तर क” से निक्षालित सामग्री पुनः निक्षेपित हो जाती है को ”संस्तर ख” कहा जाता है। मृदा परिच्छेदिका में सबसे नीचे पैतृक सामग्री होती है जिसे ”संस्तर ग” कहा जाता है।
प्रत्येक संस्तर में मृदा एक समान विकसित हुई है तथा समान लक्षण प्रदर्षित करती है। प्रत्येक संस्तर के विशिष्ट दृष्य लक्षण जैसे कणों का परिमाण तथा आकार, उनका विन्यास, रंग इत्यादि होते है जो एक संस्तर को दूसरे से विभेद करते है।
मृदा परिच्छेदिका का अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मृदा के लाक्षणिक गुणों तथा गुणवत्ता को प्रकट करता है।
मृदा की गहराई अत्यधिक ढलान वाले पहाड़ी पर कुछ सेन्टीमीटर होती है तो जलोढ़ निक्षेपों में यह कई मीटर गहरी हो सकती है।
मृदा निर्माण एक सतत लंबी प्राकृतिक प्रक्रिया है। अनुमानतः पृष्ठ मृदा (15 से.मी. गहरी) के निर्माण में प्राकृति को 3600 से 6000 वर्ष लगते है।

मृदा संघटन

मृदा के चार अवयव होते है : खनिज पदार्थ, जैवांश, सजीव जीवो सहित, जल तथा वायु। शुष्क पृष्ठ मृदा में खनिज पदार्थ का अंश सबसे अधिक लगभग 95-98 प्रतिशत (45 प्रतिशत आयतन) होता है तथा जैवांश सजीव जीवो सहित 2-5 प्रतिशत (5 प्रतिशत आयतन) होता है। शेष ठोस कणों के बीच रंध्राकाश (50 प्रतिशत आयतन) में जल तथा वायु होता है, जिनका परस्पर अनुपात घटता-बढ़ता रहता है। जब वर्षा होती है तो मृदा के रिक्त स्थान जलपूर्ण हो जाते है तथा वायु का अंश कम हो जाता है। मृदा से जल के अतः स्रवण तथा वाष्पीकरण द्वारा ह्यस होने से वायु का अंश बढ़ जाता है।

खनिज पदार्थ
खनिज पदार्थ का परिमाण तथा संघटन परिवर्तनीय है। इसमें सामान्यता चट्टानों के टुकड़े तथा विभिन्न प्रकार के खनिज होते है कुछ खनिज बड़े आकार के होते है किन्तु अन्य जैसे मृतिका कण इतने छोटे होते है कि उन्हें साधारण सूक्ष्मदर्षी से भी नहीं देखा जा सकता।

परिमाण के आधार पर खनिज प्रभाव को चार वर्गो में विभाजित किया जाता हैः
1- बहुत मोटा जैसे पत्थर तथा बजरी
2- मोटा जैसे रेत
3- महीन जैसे सिल्ट (साद)
4- बहुत महीन जैसे मृतिका
सूक्ष्म मृतिका कण (0.002 मिलीमीटर से कम व्यास) कलिल स्वभाव की होती है तथा इन्हे मृदा का सबसे सक्रिय अंश कहा जाता है। खेत में मृदा का गुण एवं व्यवहार मुख्यतः खनिज पदार्थ के स्वभाव पर निर्भर करता है।

जैवांश

मृदा में उपस्थित जैवांश के दो संद्यटक होते है।
1- आंशिक विघटित पादप तथा जन्तु अवशेष ।
2- स्थिर ह्यूमस जो काले अथवा भूरे रंग का तथा कलिल स्वभाव का होता है।

सजीव जीव जैसे सूक्ष्मजीव, केचुए, कीट तथा अन्य अपने निवास तथा भोजन के लिए जैवांश से संवद्ध होते हे। जैवांश मृदा के रंग, भौतिक गुण, सुलभ पोषक तत्वों की आपूर्ति तथा अधिशोषण क्षमता को प्रभावित करता है।
अधिकांश भारतीय मृदाओं में जैवांश की मात्रा अत्यन्त कम है, मात्र 0.2 प्रतिशत से 2 प्रतिशत तक (भारानुसार), किन्तु इसका मृदा गुणों तथा पौधों की वृद्धि पर प्रभाव बहुत अधिक होता है। प्रथमः जैवांश खनिज पदार्थ के ”संबंधक” का कार्य करता है जिससे उत्पादक मृदाओं की भुरभुरी उत्तम दशा विकसित होती है। द्वितीयः जैवांश दो महत्वपूर्ण पोषक तत्वोः नाइट्रोजन तथा गंधक का प्रमुख स्रोत है। तृतीयः मृदा की उत्तम भौतिक दशा बनाए रखने में जैवांश का महत्वपूर्ण भूमिका होता है जिसके द्वारा मृदा की जल धारण क्षमता तथा वातन नियंत्रित होते है। अंतिमः मृदा सूक्ष्म जीवों के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत जैवांश ही है, जिनकी सक्रियता से स्थानीय तथा वैष्विक पारिस्थितिकी प्रणाली में मृदा एक सक्रिय अंग का स्थान प्राप्त करती है।

मृदा जल

मृदा जल रंध्राकाश में रहता है तथा ठोस कणों (खनिज पदार्थ तथा जैवांश) द्वारा जल की मात्रा के अनुसार परिवर्ती बल से धारित रहता है। मृदा जल में विलेय लवण होते है जो तथाकथित ”मृदा विलयन” संरचित करते है जो पौधों को पोषक तत्व आपूर्ति करने का माध्यम के रूप में महत्वपूर्ण है। मृदा विलयन से जब पोषक तत्व अवशोषित कर लिए जाते है तो उन्हे ठोस कणों (खनिज तथा जैवांश) से पुनर्नवीकृत किया जाता है। पौधों की वृद्धि के लिए माध्यम के रूप में मृदा कार्य करती रहे, इसके लिए उसमें कुछ जल रहना अनिवार्य है। मृदा में जल के प्रमुख कार्य है।

मृदा में अनेक भौतिक, रासायनिक तथा जैविक सक्रियाओं को प्रोत्साहित करता है।
पोषक तत्वों के विलायक तथा वाहक के रूप में कार्य करता हैं।
पौधों की कोशिकाओं में तनाव बनाए रखने हेतु पौधों की जड़े मृदा से जल अवशोषित करती है।
प्रकाश संष्लेषण प्रक्रिया में एक कर्मक का कार्य करता है।
मृदा जीवों के लिए उपयुक्त पर्यावरण प्रदान करता है।

मृदा वायु

मृदा में होने वाली सभी जैविक अभिक्रियाओं के लिए आक्सीजन अनिवार्य है। इसकी आवश्यकता मृदा वायु से पूरी की जाती है।
मृदा का गैसीय प्रावस्था आक्सीजन प्रवेश का मार्ग प्रशस्त करता है जिसे मृदा में सूक्ष्म जीव या पौधो की जड़ें अवशोषित करती है। साथ ही यह मृदा सूक्ष्म जीवों तथा पौधों की जड़ों द्वारा निस्काषित कार्बन डाईआक्साइड के मृदा से बाहर निकलने का मार्ग भी प्रदान करता है। इस द्वि-मार्ग प्रक्रिया को मृदा वातन कहा जाता है। जब मृदा में जल की मात्रा अधिक हो तो मृदा वातन क्रांतिक हो जाता है क्योंकि रंधाकाश से जल द्वारा वायु का विस्थापन हो जाता है।

मृदा वायु का संघटन वायुमंडलीय वायु से भिन्न होता है। इसमें मृदा के ऊपर विद्यमान वायुमंडल की तुलना में आक्सीजन कम तथा कार्बन डाइआक्साइड बहुत अधिक होता है। मृदा जल तथा सूक्ष्म जीवों की सक्रियता में परिवर्तन अनुसार मृदा वायु का संघटन गतिक (परिवर्ती) होता है।
 




जानिए किस किस पोषक तत्व का क्या है काम और उसकी कमी के लक्षण Vineet Bajpai   17 April 2018 पोषक तत्व। लखनऊ। जिस तरह से हर व्यक्ति को पोषक तत्वों की जरूरत होती है, उसी तरह से पौधों को भी अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इन पोषक तत्वों के न मिल पाने से पौधों की वृद्धि रूक जाती है यदि ये पोषक तत्व एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधा सूख जाता है। वैज्ञानिक परीक्षणो के आधार पर 17 तत्वों को पौधो के लिए जरूरी बताया गया है, जिनके बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं। इनमें से मुख्य तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश है। नाइट्रोजन, फास्फोरस तथा पोटाश को पौधे अधिक मात्रा में लेते हैं, इन्हें खाद-उर्वरक के रूप में देना जरूरी है। इसके अलावा कैल्सियम, मैग्नीशियम और सल्फर की आवश्यकता कम होती है अतः इन्हें गौण पोषक तत्व के रूप मे जाना जाता है इसके अलावा लोहा, तांबा, जस्ता, मैंग्नीज, बोरान, मालिब्डेनम, क्लोरीन व निकिल की पौधो को कम मात्रा में जरूरत होती है। ये भी पढ़ें : धान की फ़सल को रोगों और खरपतवार से बचाएं, पैदावार बढ़ाएं 1- नत्रजन के प्रमुख कार्य नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है तथा पर्ण हरित के निर्माण में भी भाग लेती है। नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि एवं विकास में योगदान इस तरह से है- यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है। वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है। अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है। यह दानो के बनने में मदद करता है। ये भी पढ़ें : खरीफ के मौसम में प्याज की खेती करना चाहते हैं तो इन बातों का रखें ध्यान नत्रजन-कमी के लक्षण पौधों मे प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना। निचली पत्तियाँ झड़ने लगती है, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं। पौधे की बढ़वार का रूकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना। फल वाले वृक्षों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना। ये भी पढ़ें : किसान पेठा कद्दू की खेती से कमा सकते हैं अच्छा मुनाफा 2- फॉस्फोरस के कार्य फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन जल्द होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स व फाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है। यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकान्ड्रिया का मुख्य अवयव है। फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदा होता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटरोधकता बढ़ती है। फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा मजबूत होती हैं। पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती है। इससे फल जल्दी आते हैं, फल जल्दीबनते है व दाने जल्दी पकते हैं। यह नत्रजन के उपयोग में सहायक है तथा फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है। ये भी पढ़ें : कम पानी में धान की अच्छी पैदावार के लिए किसान इन किस्मों की करें बुवाई फॉस्फोरस-कमी के लक्षण पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्का बैगनी या भूरा हो जाता है। फास्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी (निचली) पत्तियों पर दिखते हैं। दाल वाली फसलों में पत्तियां नीले हरे रंग की हो जाती हैं। पौधो की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होता है कभी-कभी जड़े सूख भी जाती हैं। अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना, फल व बीज का निर्माण सही न होना। इसकी कमी से आलू की पत्तियां प्याले के आकार की, दलहनी फसलों की पत्तियाँ नीले रंग की तथा चौड़ी पत्ती वाले पौधे में पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है। ये भी पढ़ें : अधिक मुनाफे के लिए करें फूलगोभी की अगेती खेती 3- पोटैशियम के कार्य जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है। स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है। अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है। आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है। सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है। मृदा में नत्रजन के कुप्रभाव को दूर करता है। पोटैशियम-कमी के लक्षण पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले गिर जाती हैं। पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़ते हैं। इसी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले तथा किनारोंपर दाने कम पड़ते हैं। आलू में कन्द छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया कम तथा श्वसन की क्रिया अधिक होती है। ये भी पढ़ें : जानिए किसान अच्छी पैदावार के लिए किस महीने में करें किस सब्ज़ी की खेती 4- कैल्सियम के कार्य यह गुणसूत्र का संरचनात्मक अवयव है। दलहनी फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक है। यह तत्व तम्बाकू, आलू व मूँगफली के लिए अधिक लाभकारी है। यह पौधों में कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है। कैल्सियम-कमी के लक्षण नई पत्तियों के किनारों का मुड़ व सिकुड़ जाना। अग्रिम कलिका का सूख जाना। जड़ों का विकास कम तथा जड़ों पर ग्रन्थियों की संख्या में काफी कमी होना। फल व कलियों का अपरिपक्व दशा में मुरझाना। 5- मैग्नीशियम के कार्य क्रोमोसोम, पोलीराइबोसोम तथा क्लोरोफिल का अनिवार्य अंग है। पौधों के अन्दर कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है। पौधों में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के निर्माण मे सहायक है। चारे की फसलों के लिए महत्वपूर्ण है। मैग्नीशियम-कमी के लक्षण पत्तियां आकार में छोटी तथा ऊपर की ओर मुड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं। दलहनी फसलों में पत्तियो की मुख्य नसों के बीच की जगह का पीला पड़ना। 6 गन्धक (सल्फर) के कार्य यह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है। विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम 3ए22 के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है। यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये जरूरी है। तम्बाकू की पैदावार 15-30 प्रतिशत तक बढ़ती है। गन्धक-कमी के लक्षण नई पत्तियों का पीला पड़ना व बाद में सफेद होना तने छोटे एवं पीले पड़ना। मक्का, कपास, तोरिया, टमाटर व रिजका में तनों का लाल हो जाना। ब्रेसिका जाति (सरसों) की पत्तियों का प्यालेनुमा हो जाना। 7- लोहा (आयरन) के कार्य लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है। क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है। यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है। श्वसन क्रिया में आक्सीजन का वाहक है। लोहा-कमी के लक्षण पत्तियों के किनारों व नसों का अधिक समय तक हरा बना रहना। नई कलिकाओं की मृत्यु को जाना तथा तनों का छोटा रह जाना। धान में कमी से क्लोरोफिल रहित पौधा होना, पैधे की वृद्धि का रूकना। 8- जस्ता (जिंक) के कार्य कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है। हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है। यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, लेसीथिनेज, इनोलेज, डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है। क्लोरोफिल निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है। जस्ता-कमी के लक्षण पत्तियों का आकार छोटा, मुड़ी हुई, नसों मे निक्रोसिस व नसों के बीच पीली धारियों का दिखाई पड़ना। गेहूं में ऊपरी 3-4 पत्तियों का पीला पड़ना। फलों का आकार छोटा व बीज की पैदावार का कम होना। मक्का एवं ज्वार के पौधों में बिलकुल ऊपरी पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं। धान में जिंक की कमी से खैरा रोग हो जाता है। लाल, भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं। 9- ताँबा (कॉपर ) के कार्य यह इंडोल एसीटिक अम्ल वृद्धिकारक हार्मोन के संश्लेषण में सहायक है। ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है। अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है। ताँबा-कमी के लक्षण फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं। अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों में रिक्लेमेशन नामक बीमारी होना। 10- बोरान के कार्य पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है। दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है। यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है। यह डीएनए, आरएनए, एटीपी पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है बोरान-कमी के लक्षण पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना। पौधों मे बौनापन होना। जड़ का विकास रूकना। बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप-सिकनेस नामक बीमारी का लगना। 11- मैंगनीज के कार्य क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वागीकरण में सहायक है। पौधों में ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है। मैंगनीज-कमी के लक्षण पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं। अनाज की फसलों में पत्तियाँ भूरे रंग की व पारदर्शी होती है तथा बाद मे उसमे ऊतक गलन रोग पैदा होता है। जई में भूरी चित्ती रोग, गन्ने का अगमारी रोग तथा मटर का पैंक चित्ती रोग उत्पन्न होते हैं। 12- क्लोरीन के कार्य यह पर्णहरिम के निर्माण में सहायक है। पोधो में रसाकर्षण दाब को बढ़ाता है। पौधों की पंक्तियों में पानी रोकने की क्षमता को बढ़ाता है। क्लोरीन-कमी के लक्षण गमलों में क्लोरीन की कमी से पत्तियों में विल्ट के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। कुछ पौधों की पत्तियों में ब्रोन्जिंग तथा नेक्रोसिस रचनायें पाई जाती हैं। पत्ता गोभी के पत्ते मुड़ जाते हैं तथा बरसीम की पत्तियाँ मोटी व छोटी दिखाई पड़ती हैं। 13- मालिब्डेनम के कार्य यह पौधों में एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवंनाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है। यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है। पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है। मालिब्डेनम-कमी के लक्षण सरसों जाति के पौधो व दलहनी फसलों में मालिब्डेनम की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं। पत्तियों का रंग पीला हरा या पीला हो जाता है तथा इसपर नारंगी रंग का चितकबरापन दिखाई पड़ता है। टमाटर की निचली पत्तियों के किनारे मुड़ जाते हैं तथा बाद में मोल्टिंग व नेक्रोसिस रचनायें बन जाती हैं। इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं। नीबू जाति के पौधो में मॉलिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग लगता है।

https://www.gaonconnection.com/bat-pate-ki/get-to-know-what-are-the-benefits-of-which-nutrients-and-what-are-its-deficiencies

किसान जिप्सम का उपयोग क्योंकब और कैसे करें ?

राजीव कुमार

गो00पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालयपन्तनगर,


          किसान फसल उगाने के लिए सामान्यत: नत्रजन, फॉस्फोरस तथा पोटैशियम का उपयोग करते है, कैल्शियम एवं सल्फर का उपयोग नहीं करते है। जिससे कैल्शियम एवं सल्फर की कमी की समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप धारण कर रही है, इनकी कमी सघन खेती वाली भूमि, हल्की भूमि तथा अपक्षरणीय भूमि में अधिक होती है। कैल्शियम एवं सल्फर  संतुलित पोषक तत्व प्रबन्धन के मुख्य अवयवको में से है जिनकी पूर्ति के अनेक स्त्रोत है इनमें से जिप्सम एक महत्वपूर्ण उर्वरक है।

रासायनिक रूप से जिप्सम कैल्शियम सल्फेट है, जिसमें  23.3 प्रतिशत कैल्शियम एवं 18.5 प्रतिशत सल्फर होता है। जब यह पानी में घुलता है तो कैल्शियम एवं सल्फेट आयन प्रदान करता है तुलनात्मक रूप से कुछ अधिक धनात्मक होने के कारण कैल्शियम के आयन मृदा में विद्यमान विनिमय सोडियम के आयनों को हटाकर उनका स्थान ग्रहण कर लेते है। आयनों का मटियार कणों पर यह परिर्वतन मृदा की रासायनिक एवं भौतिक अवस्था मे सुधार कर देता है तथा मृदा फसलोत्पादन के लिए उपयुक्त हो जाती हैं। साथ ही, जिप्सम भूमि में सूक्ष्म पोषक तत्वों का अनुपात बनाने में सहायता करता है।

जिप्सम क्यों डालें ?

  • कैल्शियम और सल्फर की आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए।
  • फसलों में जड़ों की सामान्य वृध्दि एवं विकास में सहायता देता है।
  • जिप्सम का उपयोग फसल संरक्षण में भी किया जा सकता है क्योंकि इसमें सल्फर उचित मात्रा में होता है।
  • तिलहनी फसलों में जिप्सम डालने से सल्फर की पूर्ति होती है, जो बीज उत्पादन तथा पौधे व तेल से आने वाली विशेष गन्ध के लिए मुख्यतया: उत्तरदायी होता है।
  • जिप्सम देने से मृदा में पोषक तत्वों सामान्यत: नत्रजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम तथा सल्फर की उपलब्धता में वृध्दि हो जाती है।
  • जिप्सम कैल्शियम का एक मुख्य स्त्रोत है जो कार्बनिक पदार्थो को मृदा के क्ले कणों से बाँधता है जिससे मृदा कणों में स्थिरता प्रदान होती है तथा मृदा में वायु का आवागमन सुगम बना रहता है।
  • जिप्सम मृदा में कठोर परत बनने को रोकता है तथा मृदा में जल प्रवेश को बढ़ाता है।
  • कैल्शियम की कमी के कारण ऊपरी बढ़ती पत्तियों के अग्रभाग का सफेद होना, लिपटना तथा संकुचित होना होता है। अत्यधिक कमी की स्थिति में पौधों की वृध्दि अवरूध्द हो जाती है तथा वर्धन शिखा भी सूख जाती है जो कि जिप्सम ड़ालने से पूरी की जा सकती है।
  • जिप्सम एक अच्छा भू सुधारक है यह क्षारीय भूमि को सुधारने का कार्य करता है।
  • जिप्सम अम्लीय मृदा में एल्युमिनियम के हानिकारक प्रभाव को कम करता है।
  • जिप्सम का उपयोग फसलों में अधिक उपज तथा उनकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए किया जाता है।

जिप्सम को कब और कैसे डालें ?

          जिप्सम को मृदा में फसलों की बुवाई से पहले डालते हैं। जिप्सम डालने से पहले खेत को पूर्ण रूप से तैयार करके (2-3 गहरी जुताई एवं पाटा लगाकर) जिप्सम का बुरकाव करें। इसके पश्चात्, एक हल्की जुताई करके जिप्सम को मिट्टी में मिला दें। सामान्यत: धान्य फसलें 10-20 किग्रा कैल्शियम प्रति हैक्टेयर एवं दलहनी फसलें 15 किग्रा कैल्शियम प्रति हैक्टेयर भूमि से लेती है और सामान्य फसल पध्दति 10-20 किग्रा प्रति हैक्टेयर कैल्शियम भूमि से लेती है।

जिप्सम को क्षारीय भूमि में मिलाने के लिए आवश्यक मात्रा, क्षारीय भूमि की विकृति की सीमा, वांछित सुधार की सीमा तथा भू-सुधार के बाद उगाई जाने वाली फसलों पर निर्भर करती है। कितना सुधारक डालना है, इसकी मात्रा का निर्धारण करने के लिए सबसे पहले कितना जिप्सम डालने की आवश्यकता होगी, का निर्धारण किया जाता है। इसको जिप्सम की आवश्यकता (जिप्सम रिक्वायरमेन्ट या जी.आर.) कहा जाता है जिप्सम की उचित मात्रा जानने के लिए जिप्सम की विभिन्न मात्राओं को लेकर प्रयोग किये गये। इन प्रयोगों से यह प्रमाणित होता है कि धान की फसल के लिए जिप्सम की कुल मात्रा का एक चौथाई भाग काफी है। जबकि गेहॅँ की फसल के लिए यह कुल मात्रा से आधा पर्याप्त है तथा मैदानी क्षेत्रों में पाये जाने वाली क्षारीय मृदाओं के लिए लगभग 12-15 किग्रा प्रति हेक्टेयर जिप्सम का प्रयोग किया जाता है।

          क्षारीय भूमि सुधार के कार्यों को प्रारम्भ करने का सबसे उत्तम समय गर्मी के महीनों में होता है। जिप्सम फैलाने के तुरन्त बाद कल्टीवेटर या देशी हल से भूमि की ऊपरी 8-12 सेमी की सतह में मिलाकर और खेती को समतल करके मेढ़बन्दी करना जरूरी है ताकि खेत में पानी सब जगह बराबर लग सके। जिप्सम को मृदा में अधिक गहराई तक नहीं मिलाना चाहिए। धान की फसल में, जिप्सम की आवश्यक मात्रा को फसल लगाने से 10-15 दिन पहले डालना चाहिए। पहले 4-5 सेमी हल्का पानी लगाना चाहिए जब पानी थोड़ा सूख जाए तो पुन: 12-15 सेमी पानी भरकर रिसाव क्रिया सम्पन्न करनी चाहिए।

क्षारीय-भूमि में जिप्सम को बार-बार मिलाने की आवश्यकता नहीं होती है। यह पाया गया है कि यदि धान की फसल को क्षारीय भूमि में लगातार उगाते रहें तो भूमि के क्षारीयपन में कमी आती हैं। खेतों को भी लम्बी अवधि के लिए खाली नहीं छोड़ना चाहिए। 

 जिप्सम के उपयोग में ध्यान देने योग्य बातें:

  • जिप्सम को अधिक नमी वाले स्थान पर न रखें तथा जमीन से कुछ ऊपर रखें।
  • मृदा परिक्षण के उपरान्त जिप्सम की उचित मात्रा डालें।
  • तेज हवा बहने पर जिप्सम का बुरकाव न करें।
  • जिप्सम डालने से पहले अगर इसमें ढेले हैं तो इन्हे महीन कर लें।
  • जिप्सम का बुरकाव करते समय हाथ सूखे होने चाहिए।
  • जिप्सम का बुरकाव पूरे खेत में समान रूप से डालें।
  • जिप्सम डालने के पश्चात उसको मिट्टी में अच्छी प्रकार से मिला दें।
  • जिप्सम को बच्चों की पहुँच से दूर रखें।

किसान जिप्सम कहाँ से प्राप्त कर सकता है ?

  • एफ.सी.आई., अरावली जिप्सम एवं मिनरल्स इण्डिया लिमिटेड, जोधपुर, राजस्थान
  • अपने नजदीक के ब्लॉक कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है।
  • जिला कृषि अधिकारी कार्यालय से भी प्राप्त किया जा सकता है।

पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का वर्गीकरण

Submitted by Ashok Kumar on 1 August 2015 – 12:17pm

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पौधे जडो द्वारा भूमि से पानी एवं पोषक तत्व, वायु से कार्वन डाई आक्साइड तथा सूर्य से प्रकाश ऊर्जा लेकर अपने विभिन्न भागों का निर्माण करते है।
पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है।

मुख्य पोषक तत्व- नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश।
गौण पोषक तत्व- कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक।
सूक्ष्म पोषक तत्व- लोहा, जिंक, कापर, मैग्नीज, मालिब्डेनम, बोरान एवं क्लोरीन।

पौधों में आवश्यक पोषक तत्व एवं उनके कार्य

1. पौधों के सामान्य विकास एवं वृद्धि हेतु कुल 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। इनमें से किसी एक पोषक तत्व की कमी होने पर पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और भरपूर फसल नहीं मिलती ।
2. कार्बन , हाइड्रोजन व आक्सीजन को पौधे हवा एवं जल से प्राप्त करते है।
3. नाइट्रोजन , फस्फोरस एवं पोटैशियम को पौधे मिट्टी से प्राप्त करते है। इनकी पौधों को काफी मात्रा में जरूरत रहती है। इन्हे प्रमुख पोषक तत्व कहते है।
4. कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक को पौधे कम मात्रा में ग्रहण करते है। इन्हे गौड अथवा द्वितीयक पोषक तत्व कहते है।
5. लोहा, जस्ता, मैगनीज, तांबा, बोरोन, मोलिब्डेनम और क्लोरीन तत्वों की पौधों को काफी मात्रा में आवश्यकता पड़ती है। इन्हे सूक्ष्म पोषक तत्व कहते है।

पोषक तत्वों के कार्य

नाइट्रोजन
– सभी जीवित ऊतकों यानि जड़, तना, पत्ति की वृद्दि और विकास में सहायक है।
– क्लोरोफिल, प्रोटोप्लाज्मा प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों का एक महत्वपूर्ण अवयव है।
– पत्ती वाली सब्जियों और चारे की गुणवत्ता में सुधार करता है।

फास्फोरस
– पौधों के वर्धनशील अग्रभाग, बीज और फलों के विकास हेतु आवश्यक है। पुष्प विकास में सहायक है।
– कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक है। जड़ों के विकास में सहायक होता है।
न्यूक्लिक अम्लों, प्रोटीन, फास्फोलिपिड और सहविकारों का अवयव है।
– अमीनों अम्लों का अवयव है।

पोटेशियम
– एंजाइमों की क्रियाशीलता बढाता है।
ठण्डे और बादलयुक्त मौसम में पौधों द्वारा प्रकाश के उपयोग में वृद्धि करता है, जिससे पौधों में ठण्डक और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।
– कार्बोहाइड्रेट के स्थानांतरण, प्रोटीन संश्लेषण और इनकी स्थिरता बनाये रखने में मदद करता है।
– पौधों की रोग प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि होती है।
– इसके उपयोग से दाने आकार में बड़े हो जाते है और फलों और सब्जियों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

कैल्शियम
– कोशिका भित्ति का एक प्रमुख अवयव है, जो कि सामान्य कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक होता है।
– कोशिका झिल्ली की स्थिरता बनाये रखने में सहायक होता है।
– एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
– पौधों में जैविक अम्लों को उदासीन बनाकर उनके विषाक्त प्रभाव को समाप्त करता है।
– कार्बोहाइट्रेड के स्थानांतरण में मदद करता है।

मैग्नीशियम
– क्लोरोफिल का प्रमुख तत्व है, जिसके बिना प्रकाश संश्लेषण (भोजन निर्माण) संभव नहीं है।
– कार्बोहाइट्रेड-उपापचय, न्यूक्लिक अम्लों के संश्लेषण आदि में भाग लेने वाले अनेक एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
– फास्फोरस के अवशोषण और स्थानांतरण में वृद्दि करता है।

गंधक
– प्रोटीन संरचना को स्थिर रखने में सहायता करता है।
– तेल संश्लेषण और क्लोरोफिल निर्माण में मदद करता है।
– विटामिन के उपापचय क्रिया में योगदान करता है।

जस्ता
– पौधों द्वारा फास्फोरस और नाइट्रोजन के उपयोग में सहायक होता है
– न्यूक्लिक अम्ल और प्रोटीन-संश्लेषण में मदद करता है।
– हार्मोनों के जैव संश्लेषण में योगदान करता है।
– अनेक प्रकार के खनिज एंजाइमों का आवश्यक अंग है।

तांबा
– पौधों में विटामिन ‘ए’ के निर्माण में वृद्दि करता है।
– अनेक एंजाइमों का घटक है।

लोहा
– पौधों में क्लोरोफिल के संश्लेषण और रख रखाव के लिए आवश्यक होता है।
– न्यूक्लिक अम्ल के उपापचय में एक आवश्यक भूमिका निभाता है।
– अनेक एंजाइमों का आवश्यक अवयव है।

मैगनीज
– प्रकाश और अन्धेरे की अवस्था में पादप कोशिकाओं में होने वाली क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
– नाइट्रोजन के उपापचय और क्लोरोफिल के संश्लेषण में भाग लेने वाले एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है।
– पौधों में होने वाली अनेक महत्वपूर्ण एंजाइमयुक्त और कोशिकीय प्रतिक्रियओं के संचालन में सहायक है।
– कार्बोहाइट्रेड के आक्सीकरण के फलस्वरूप कार्बन आक्साइड और जल का निर्माण करता है।

बोरोन
– प्रोटीन-संश्लेषण के लिये आवश्यक है।
– कोशिका –विभाजन को प्रभावित करता है।
– कैल्शियम के अवशोषण और पौधों द्वारा उसके उपयोग को प्रभावित करता है।
– कोशिका झिल्ली की पारगम्यता बढ़ाता है

भूमि पोषण प्रबंधन: 

आवश्यक तत्व की जरूरत और पूर्ति

पोषक तत्व

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सागर में पोषण चक्र

एक पोषक तत्व या पोषकतत्व वह रसायन होता है, जिसकी आवश्यकता किसी जीव के उसके जीवन और वृद्धि के साथ साथ उसके शरीर के उपापचय की क्रिया को चलाने के लिए भी पड़ती है और जिसे वो अपने वातावरण से ग्रहण करता है।[1] पोषक तत्व वह पदार्थ हैं जो शरीर को समृद्ध करते हैं। यह ऊतकों का निर्माण और उनकी मरम्मत करते हैं, यह शरीर को उष्मा और ऊर्जा प्रदान करते हैं और यही ऊर्जा शरीर की सभी क्रियाओं को चलाने लिए आवश्यक होती है। पोषक तत्वों के सेवन के विभिन्न तरीके हैं, जहां प्राणी यह तत्व अपने भोजन से प्राप्त करते हैं, वहीं पादप इनको अपनी जड़ों के माध्यम से सीधे मिट्टी से या अपने वातावरण से प्राप्त करते हैं। कुछ पौधे, जिन्हें मांसभक्षी पादप कहा जाता है पहले कीट, पतंगो आदि को बाहर अपने पाचक रस से पचा कर फिर उनसे प्राप्त पोषक तत्वों को चूस लेते हैं। पोषक तत्वों के प्रभाव उनकी ली गयी खुराक पर निर्भर करते हैं।

जैविक पोषक तत्वों में कार्बोहाइड्रेटवसाप्रोटीन (अमिनो अम्ल) और विटामिन शामिल हैं। अकार्बनिक रासायनिक यौगिकों, जैसे खनिज लवणपानी और ऑक्सीजन को भी पोषक तत्व माना जा सकता हैं।[तथ्य वांछित] किसी जीव को एक पोषक तत्व किसी बाहरी स्रोत से लेने की आवश्यकता तब पड़ती है जब उसका शरीर इनकी पर्याप्त मात्रा का संश्लेषण स्वयं उसके शरीर में नहीं कर पाता। जिन पोषक तत्वों की आवश्यकता अधिक मात्रा में पड़ती है उन्हें स्थूल पोषक तत्व कहते हैं; इसी तरह सूक्ष्म पोषक तत्व कम मात्रा में जरूरी होते हैं।

अनुक्रम

पोषकों के प्रकार[संपादित करें]

पोषकों को कई तरह से वर्गीकृत किया जाता है-

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