Planing

योजना बनाने का महत्व

गांव की योजना बनाने के संबंध में पिछले में कही गई बातों को ध्यान में रखते हुये इसके पक्ष को भी जानना जरूरी है। संविधान के अनुच्छेद 243 में प्रावधान है कि पंचायतें गांव के विकास और समाजिक न्याय की योजना बनायें। 11 वीं अनुसूची में दिए 20 विषयों से संबंधित ग्रामीण क्षेत्र में संचालित कार्यक्रमों व योजनाओं के कन्यावयन की जिम्मेदारी पंचायतराज संस्थाओं को हामी गयी है।

विकास का मतलब है, सामाजिक आर्थिक विकास, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक विकास, मानव विकास और पर्यावरण(जल, जंगल, जमीन) संरक्षण और समाजिक न्याय का मतलब है, कमजोर, दलित, आदिवासी, महिलाएं, दिव्यांग, निराश्रित आदि को बराबरी का हक देना। इन दोनों प्राथमिकताओं के आधार पर हमें अपनी योजना बनानी चाहिए।

विकेन्द्रीकरण एवं सहभागी नियोजन

73वें संविधान संशोधन के बाद स्थानीय लोगों को अपने पंचायत की विकास योजना बनाने के अधिकार प्राप्त हुए। अपनी ग्राम पंचायत में होने वाले हर काम की योजना अब हम सभी को मिलकर बनानी है। यह ग्राम सभा की ताकत है कि अब गांव की योजना सभी के सामने, सभी लोग साथ मिलकर बनायेंगे।

यदि किसी को कोई दिक्कत हो तो सभी के सामने बात हो, और सभी को पता चले कि हमारे गांव में क्या होने जा रहा है और क्यों? इसमें यह अच्छी बात है, कि यदि किसी पंच के वार्ड में कुछ काम होना है. तो वह अपने वार्ड में पहले सभी के साथ बात कर लें. योजना बना ले और बाद में उसे ग्रामसभा में रखें।

हम कई बार भूल जाते हैं कि हमें गांव के उन वार्डों का जहाँ पर आदिवासी और दलित समुदाय के लोग रहते हैं, अथवा जहाँ महिला पंच है, का विशेष ध्यान रखना है क्योंकि कई बार वो खुद अपनी बात नहीं रख पाते हैं। इसलिए योजना बनाते समय हमें प्रश्नों के बारे में हमेशा सजग रहना होगा-किसका विकास?, कैसा विकास? और किसके द्वारा विकास?


गांव की योजना बनाने में इन पाँच सवालों के जवाब से मदद मिलती है

End you and

को दया करणार

हमारी जरूरतें क्या है? गांव की खास जरूरतें जैसे पीने का पानी, बीमारियों का इलाज एवं रोकथाम, साफ स्वच्छ वातावरण, रोजगार के साधन, सबको रहने के लिए घर, निराश्रितों के लिए सहायता, स्कूल, बिजली, सड़क आदि बहुत सी जरूरतें हो सकती हैं। इनमें सबसे ज्यादा जरूरी काम सबसे पहले और कम जरूरी काम को सबसे बाद में रखते हैं। जरूरतों का पता करने में हमें अंदाजा हो जाता है कि हमें क्या-क्या करना है।

  1. इन जरूरतों को पूरा करने के लिए क्या करना होगा?- गांव की खास जरूरतें तय हो जाने के बाद यह देखते हैं कि इन जरूरतों को पूरा करने के लिए क्या-क्या करना होगा ? कौन सी जरूरतें सरकारी कार्यक्रमों एवं योजनाओं से पूरी की जा सकती हैं।
  2. कौन सी ऐसी जरूरतें हैं जो अन्य साधनों से पूरी की जा सकती है जैसे गैर सरकारी संस्थाओं से प्राप्त अनुदान, कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर), स्वयं के संसाधन, स्वयं की आय श्रमदान, जन भागीदारी आदि से बिना लागत के पूरी की जा सकती हैं।
  3. जरूरतों के हिसाब से आवश्यकता सूची तैयार कर लेनी चाहिए, उदाहरण के लिए गांव में सड़क एवं नाली निर्माण शासन के द्वारा चलायी जा रही पंच परमेश्वर योजना से कराया जा सकता है। जबकि गांव में शराबबंदी या नशामुक्ति के लिए बिना किसी लागत के समुदाय आधारित अभियान चलाकर गांव को नशामुक्त गांव बनाया जा सकता है।
  4. इसी प्रकार गांव को हरा-भरा गांव बनाना, खुले में शौंच से मुक्त करना, शतप्रतिशत टीकाकरण, संस्थागत प्रसव, स्कूलों में बच्चों का शतप्रतिशत दाखिला, कुपोषण से मुक्ति और सामाजिक बुराइयां जैसे- बाल विवाह, बाल श्रम, दहेज प्रथा इत्यादि से मुक्ति, गांव के लोगों की जागरूकता, सहभागिता और दृढ़ निश्चय से पायी जा सकती है।
  5. कब क्या करना होगा- जरूरतें पूरा करने के लिए क्या करना होगा, इस बात का निश्चय हो जाने के बाद किस काम को कब करना है इसकी बारी आती है। जैसे शासन से मिलने वाली धन राशि आदि के लिए समय रहते तैयारी करके प्रस्ताव तैयार करना, निर्माण आदि के काम बारिश आने से पहले पूरे हो जायें इसे ध्यान में रखकर काम की शुरूआत कराना, स्कूल खुलने के समय बच्चों के दाखिले कराना।
  6. किस मौसम में कौन सी बीमारियां होती है उनके रोकथाम के लिए पहले से तैयारी करना, किसी प्राकृतिक या मानवीय आपदा के प्रबंधन के लिए समय रहते उससे निपटने के कारगर उपाय व उसकी तैयारी करना आदि।
  7. कैसे करना है?- कब क्या करना है यह मालूम होने के बाद किस काम को कैसे करना है? इसकी तैयारी करनी है। कौन से दस्तावेज जुटाना होगा, कागज-पत्तर कैसे तैयार करना होगा? किस तरह की लिखा-पढ़ी करनी होगी तथा प्रस्ताव नक्शा कैसे बनाना होगा आदि काम करने के तरीके


स्पष्ट कर लेना उपयोगी होता है। जैसे कि हमें अपने गांव में मनरेगा योजना की उपयोजना कपिलधारा से कुआ बनाना है तो सबसे पहले ग्राम सभा से उसका प्रस्ताव तैयार कराकर अनुमोदन लेना होगा कि किस हितग्राही की जमीन पर कुआं बनाया जाना है।

फिर किसान का सहमति पत्र, जमीन का खसरा नक्शा, कुएं की तकनीकि प्रतिवेदन एस्टीमेट और उसकी तकनीकी स्वीकृति लेनी होती है। मान लेते है कुएं का एस्टीमेट राशि रूपये 15 लाख के अन्दर है तो उसकी प्रशासकीय स्वीकृति सरपंच के द्वारा दी जावेगी । इतना सब कुछ औपचारिकता करने के बाद कुआं निर्माण का कार्य शुरू किया जा सकेगा।

  1. कौन क्या करेगा?- अब काम का बटवारा और जिम्मदारी सौंपना जरूरी होता है। इसके लिए ग्राम सभा की समितियों तो बनी ही है, जरूरत होने पर अस्थायी समितियां भी बनाई जा सकती हैं। जैसे कि ग्राम में स्वच्छता अभियान को मजबूती प्रदान करने के लिए ग्रामसभा के अनुमोदन से अस्थाई ग्राम स्वच्छता तदर्थ समिति का गठन कई ग्राम पंचायतों में किया गया है. इसी तरह स्वास्थ्य एवं पोषण को सुदृढ़ करने के लिए स्वस्थ ग्राम तदर्थ समिति गांव में कार्यरत है।
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