सहभागी नियोजन हेतु वातावरण निर्माण

आजादी के बाद से हमारे देश में लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने हेतु विभिन्न विकास योजनाएं कियान्वित की गई। गांधी जी की कल्पना थी कि स्वतंत्र भारत में हमारे गांव के लोग अपने विकास के निर्णय स्वयं लेंगे। वे बाहरी संस्थाओं के साथ बराबरी के साथ समझौते करेंगे। इस प्रक्रिया में ग्रामीण, बाहय संस्थाओं को (कच्चे माल के प्रदाय के रूप में) सहयोगी बनें व बाह्य संस्थायें उन्हें उनकी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में मददगार बनें। उन्होंने गांव के विकास के लिए छोटे छोटे कुटीर उद्योग स्थापित करने की वकालत की थी। यदि देश में बड़े बड़े बांध, उद्योग स्थापित होंगे तो उसके आस-पास के लोगों का जीवन स्तर ऊँचा होगा। इन लोगों से प्रेरित होकर दूर दराज के लोग भी प्रयास करेंगे व अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में सफल होंगे। जब इन बड़ी परियोजनाओं के असर का मूल्यांकन किया गया तो देखने मिला कि देश में अमीरी व गरीबी के बीच की खाई बढ़ रही है। कारण साफ था कि बड़ी परियोजनाओं के नजदीक के लोग तो खुशहाल हुये किन्तु जो पहिले गरीब थे उनकी स्थिति में बदलाव नहीं हुआ। जिससे देश के अलग-अलग भागों में आर्थिक विषमता में वृद्धि हुई। अंधोसंरचना के विकास के लिए भी एक बड़ी पूंजी लगाई गई, क्षेत्र में जब लोगों से इन योजनाओं के असर के बारे में चर्चा की गई तो लोगों ने इन योजनाओं से अपेक्षित लाभ न मिलने की बात की। इस संबंध में उन्होंने शासन द्वारा किये गये नियोजन व क्रियान्वयन के बारे में प्रश्न उठाये। लोगों की सहभागिता न लेने के कारण क्रियान्वित की गई योजनाओं खासकर सार्वजनिक उपयोग की संरचनाओं जैसे हैडपंप, स्कूल भवन, औषधालय, स्टॉपडेम इत्यादि को ग्रामीणों ने सरकार की माना (उनकी नहीं) इसमें जो कुछ भी सुधार, रखरखाब करना है, यह सरकार को करना है। यह मान्यता लोगों में धीरे धीरे दृढ़ होती गई। इसका परिणाम यह हुआ कि थोडी सी राशि से सुधार योग्य अधोसंरनाचाऐं टूटती गई व लोगों को इससे अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में यह बात भी उभरकर आई कि केन्द्र से गांव में गरीब तक पहुंचने वाली पूरी पूरी राशि उस तक नहीं पहुंच पाती। इसी के साथ ही विकेन्द्रीकरण को बल मिला। 73वें संविधान संशोधन के बाद स्थानीय लोगों को पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से विकास संबंधी सभी निर्णय लेने के अधिकार मिले।

स्थानीय लोगों में विकास की प्रक्रिया के बारे में विश्वास की कमी से देश के कुछ भागों में लोगों के मन में व्यवस्था के प्रति विभिन्न रूपों में असंतोष के स्वर उभरे है।

ग्रामीण विकास से जुड़े विकास कार्यकर्ताओं के बीच बहस का अहम मुद्दा रहता है: किसका विकास ? कैसा विकास? कैसे विकास? और किसके द्वारा विकास? जब हम इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने का प्रयास करते हैं तो हम सहजता से कह सकते हैं कि गांव का विकास करना है, किन्तु हम यह नहीं पहचान पाते कि उनमें से किसका विकास पहले करना आवश्यक है, क्योंकि हम गांव के लोगों की अंदरुनी स्थिति को नहीं जानते हैं। अब दूसरे प्रश्न का उत्तर ढूंढने का प्रयास करते हैं- ‘कैसा विकास’ क्या हम तय कर ग्रामीणों को कहेंगे कि उन्हें इस तरह अपना विकास करने का तरीका। कैसे विकास किया जावे यह आता है तीसरा प्रश्न। क्या हम ग्रामीणों को बतलाएँगे कि उन्हें किस तरह विकास करना चाहिये। अंतिम व सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आता है।

“किसके द्वारा विकास’ जब कभी भी हम गांव के लोगों के विकास के लिये कोई योजना उनके विकास की सुझाते हैं व ग्रामीण हमारी बात मान जाते हैं तो हम खुश होते हैं यह मानकर कि हम ग्रामीणों का विकास करने में सफल रहे।

सभी की सहभागिता से ग्राम पंचायत विकास योजना को तैयार किये जाने के लिए उचित वातावरण बनाना अत्यन्त आवश्यक है। उचित वातावरण निर्माण के लिए प्रचार-प्रसार किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। राज्य से लेकर ग्राम पंचायत के स्तर तक वातावरण निर्माण किया जाना होगा। हर एक स्तर पर वातावरण निर्माण की अलग-अलग रणनीति तैयार किया जाना उचित होगा।

सहभागी नियोजन के उद्देश्य

नियोजन की प्रक्रिया का आरम्भ जमीनी स्तर से हो

विकास योजना स्थानीय स्तर पर मौजूद संसाधनों के आधार पर हो।

. इस विकास प्रक्रिया में स्थानीय स्तर की संस्थाओं के साथ ग्राम पंचायत, युवा, समुदाय आधारित संगठन, स्वयं सहायता समूह, धार्मिक प्रतिनिधियों इत्यादि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इस पूरी प्रक्रिया में निर्णय लेने का अधिकार समुदाय का हो, न कि अन्य किसी का।

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