Madhya Pradesh Panchayt raj

पंचायतराज के मूल विचार

पंचायतराज को समझने के लिए हमें देश के संविधान की मुख्य बातें समझना जरूरी है। भारत के संविधान की धारा 40 में लिखा है कि राज्य सरकारें पंचायतों को ऐसे अधिकार व जिम्मेदारी सोपेंगी जिससे की स्वयत इकाई के रूप काम कर सके।

स्वशासन का मतलब खुद का शासन और स्वायत्त का मतलब है काम करने की आजादी एक सीमा तक

हमारे यहाँ पहले राजाओं का राज था. उसके बाद अंग्रेजों का शासन था। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ तब लोकतंत्र की व्यवस्था लागू हुई। जिसका मतलब है जनता का राज जनता के लिए राज और जनता के द्वारा राज।

जनता का प्रतिनिधित्व करने के लिए ससंद व विधानसभाओं का गठन हुआ परन्तु संसद विधानसभा में प्रतिनिधित्व की संख्या सीमित है। इसमें व्यापकता एवं सहभागिता लाने के लिए 1993 में संविधान में संशोधन (बदलाव किया गया जिसे हम 73 वें संविधान संशोधन के नाम से जानते हैं।

इस बदलाव के पहले कुछ सौ लोगों के पास राज चलाने की जिम्मेदारी थी जबकि पंचायतराज लागू होने से यह जिम्मेदारी पंचायत के लिए चुने हुए पंच, सरपंच, जनपद और जिला पंचायत सदस्यों के पास आ गई है, जिनकी संख्या लगभग चार लाख है।

म.प्र. सरकार ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए 26 जनवरी 2001 से ग्राम स्वराज लागू करके यह जिम्मेदारी ग्राम सभाओं को सौंप दी है। गाँव के सभी वयस्क (18 वर्ष से ऊपर) मतदाता ग्राम सभा के सदस्य होते है जिससे जनता का राज, जनता के द्वारा राज को अधिक विस्तार मिल गया।

भारतीय संविधान अनुच्छेद-243-छ

पंचायतराज में ग्राम पंचायत त्रिस्तरीय व्यवस्था है। जिसके अंतर्गत जनपद पंचायत, जिला पंचायत होती हैं।

एक ग्राम पंचायत में कम से कम 10 व अधिक से अधिक 20 पंच और एक सरपंच जनता के द्वारा चुने

जाते हैं। उपसरपंच का चुनाव पंचो के द्वारा किया जाता है।

ग्राम पंचायत को समझने के लिए हमें फिर संविधान के पास जाना होगा। संविधान की धारा 243 (४) कहती है कि पंचायत गाँव के आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय की योजना बनाये। गाँव के आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय का काम पंचायत कर सके इसके लिए संविधान की 11वीं अनुसूची में दिये गये 29 विषयों के काम पंचायतों को सौंपे गये हैं। (परिशिष्ट-1 में देखें)

ग्राम पंचायत का मतलब सिर्फ सरपंच और सचिव ही नहीं है इसमें हर एक को अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है। सचिव शासकीय सेवक के रूप में ग्राम पंचायत के काम होते हैं। पंचायत के फैसले पंच व सरपंच ग्राम पंचायत की बैठक में लोगों और ग्राम सैनकों के अनुमोदन के सहयोग व संचालन के लिए पश्चात् उस पर मिलजुल कर काम करेंगे।

जिससे कि गरीब कमजोर दलित, आदिवासी दिव्यांग महिलाओं एवं बच्चों को सरकार की योजनाओं व कार्यक्रमों का लाभ मिल सके तथा सामाजिक न्याय सुनिश्चित हो सके।

“पंचायतराज अधिनियम की धारा 6 के अनुसार ग्राम सभा एक निगमित निकाय है

प्रत्येक राजस्व ग्राम और वन ग्राम में ग्राम सभा होती है। उस गांव में सभी वयस्क मतदाता ग्राम सभा के सदस्य होते हैं। पंचायतराज अधिनियम की धारा 6 के अनुसार ग्राम सभा एक निगमित निकाय है। निगमित निकाय का मतलब है कि ग्राम सभा एक वैधानिक संस्था है, जो कानून के द्वारा बनाई गई ईकाई है।

ग्राम सभा मुकदमा दायर कर सकती है और इस पर भी मुकदमा दायर किया जा सकता है। ग्राम समा की एक मुद्रा (सील) होती है जो इसकी पहचान है। कम से कम 1000 की जनसंख्या पर एक ग्राम पंचायत होती है। जिन गाँवों की जनसंख्या कम होती है, वहाँ पर एक से अधिक गांवों को मिलाकर पंचायत बनती है।

ग्राम पंचायत जो भी काम करें वह ग्राम सभा से अनुमोदित होना चाहिए। इसीलिए ऐसी व्यवस्था की गई है कि ग्राम पंचायत अपनी वार्षिक योजना की मंजूरी ग्राम सभा से ले। ग्राम पंचायत की योजना ग्राम सभाओं की योजनाओं को समाहित करके बनाई जाती है।

यदि ग्राम पंचायत की ग्राम सभाओं में कहीं मतभेद हो या एक राय नहीं हो पा रही हो तो ऐसे में पंचायत की सभी ग्राम सभाओं को मिलाकर संयुक्त ग्राम सभा से फैसला लेना चाहिए।

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