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ग्राम पंचायत विकास योजना के द्वारा गांव का सतत विकास

ग्रामपंचायत विकास योजना क्या है और इसके माध्यम से हम गांव के परिप्रेक्ष्य में सतत विकास के लक्ष्यों को कैसे पूरा कर सकते हैं? इन सभी महत्वपूर्ण सवालों के जबाब ढूंढने के लिए ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) तैयार करने का अभियान गांव-गांव में जोर-शोर से चलाया जा रहा है।

गांव-गांवमें समाज के हर तबके हर वर्ग के लोग विशेष रूप से महिलायुवा, कृषक, दलित, आदिवासी, बुजुर्ग और दिव्यांग आदि अपने गांव की योजना बनाने के लिए बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। इस बात के समर्थन में देश के प्रधानमंत्री के द्वारा किया गया देशव्यापी आहवान “जन योजना अभियान” (PPC) और संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित “सतत् विकास के लक्ष्य” (सस्टेनेबल डेव्हलपमेंट गोल्स, एस.डी.जी.) विशेष उल्लेखनीय है।

“सतत् विकास के लक्ष्य”

सतत विकास लक्ष्य में कुल 17 लक्ष्य तय किये गये हैं। जो इस प्रकार हैं-

गरीबी का अंत,

शून्य भुखमरी,

अच्छा स्वास्थ्य एवं कल्याण,

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,

लैंगिक समतुल्यता,

स्वच्छ जल एवं स्वच्छता,

सस्ती एवं स्वच्छता,

सस्ती एवं स्वच्छ ऊर्जा,

सम्मानजनक कार्य और आर्थिक विकास,

उद्योग नवाचार एवं मूलभूत संरचना,

असमानताओं में कमी,

स्थायी शहर एवं समुदाय,

जिम्मेदार खपत एवं उत्पादन,

जलवायु कार्यवाही,

जल के नीचे जीवन,

भूमि पर जीवन,

शांति,

न्याय एवं सशक्त संस्थान लक्ष्यों के लिये भागीदारी ये लक्ष्य वैश्विक लक्ष्य हैं, जिनका अनुपालन सभी सदस्य देशों के द्वारा किया जाकर 2030 तक इन लक्ष्यों की लक्ष्य पूर्ती की जानी है।

हमारा देश गांवों का देश है, जहां की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है। सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने की शुरुआत गांवों से करने पर ही हम सही मायनों में राष्ट्रीय स्तर यह लक्ष्य हासिल कर पायेंगे। इसी उद्देश्य से “ जन योजना अभियान ” पूरे भारत में चलाया गया। इन


को पाने के लिए एक विशेष टूल (औजार) तैयार किया गया है। जिसकी चर्चा गांव के हर गली हर श्रीहल्ले में हो रही है। इस औजार को ग्राम पंचायत विकास योजना का नाम दिया गया है। इस दृष्टि का सपना) के साथ हम अपने गांव को जैसा देखना चाहते है ठीक वैसा ही आदर्श गांव बनाने की योजना बना रहे हैं।

सतत् विकास के लक्ष्यों का महत्व

सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए गांव की वर्तमान स्थिति और आने वाले समय में तय किये गये उद्देश्यों को नापने के लिए सूचक और सूचकांक निर्धारित किया जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। विकास के लक्ष्यों को नापने के लिए सही सूचक (इंडीकेटर) के अभाव में हम विकास का सही मूल्यांकन दिल्ली कर पाते हैं।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है जैसे-हमारा उद्देश्य तय हुआ कि हमें अपने बंद को 2019 तक खुले में शौच से मुक्त गांव बनाना है। इस काम की शुरूआत हमारे गाँव की वर्तमान स्थिति का आंकलन करने से किया जाएगा, जिसके तहत गांव के कितने घरों में शौचालय बने हैं, उनमें से कितने लोग शौचालय का उपयोग कर रहें हैं और कितने अभी भी शौच के लिए बाहर जाते हैं।

कितने घरों में शौचालय बनने हैं, और कितने घर ऐसे है जहां शौचालय तो बने है, किन्तु लोग उनको उपयोग नही करते हैं, इन सारी बातों के आंकलन के लिए ग्राम पंचायत की विकास योजना में लक्ष्यों के विरुद्ध सूचकांकों (इंडीकेटर) का उल्लेख होना चाहिए ताकि विकास की गति को निश्चित समय सीमा में मूल्यांकन में मदद मिल सके।

इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जिस उद्देश्य के लिए हम एक आधारशिला से आगे बढ़े थे, उसमें कितना आगे आ चुके हैं और अभी कितना आगे जाना है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण गांड में अभी कितने कुपोषित बच्चे हैं. कुपोषण से कितने बच्चों की मृत्यु हो चुकी है, जिसके आधार पर हमने जो योजना बनाई है

आने वाले समय में कुपोषित बच्चों के दर में कमी आई या बढ़ोत्तरी हुई है. गांव में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों में कमी आई है या बढ़ोत्तरी हुई है। इस प्रकार गांव पंचायत विकास योजना में सतत विकास के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए जो प्रयास किये जाने हैं, उनको एक निश्चित समय सीमा में नापने के लिए सूचक (इंटीकेटर) होना आवश्यक है।

इस प्रकार ग्राम पंचायत विकास योजना बनाने के कम में हमें सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि उसमें कौन-कौन से पहलू जोड़े जायें? ताकि सतत सन्तुलित संर्वागीण विकास की अवधारणा आकार से सके। अंतिम गांव के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना ही सही मायनों में सच्चा विकास है।

इन लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुये हम अपने गांव का कैसा विकास चाहते हैं? इसे थोड़ा बारीकी से समझने की कोशिश करते हैं। पूरी दुनिया में लोग विकास की बात करते हैं, विकास के लिए चिंतित रहते हैं, विकास के नये-नये तरीके सोचते हैं, विकास को अलग-अलग ढंग से परिभाषित करते हैं।

हमारे यहाँ भी सांडीय स्तर पर केन्द्र सरकार, प्रदेश के लिए राज्य सरकार विला उदय ग्राम प्रधान और याम का ही या चिमटी है कि के वन अपने स्तर पर विकास के लिए काम कर और वियोग विलास योज

जब हम सतत संतुलित और समग्र विकास की बात करते हैं तो विकास के हर पहलू को जोड़कर देखने का नजरिया बनता जाता है। फिर किसी ग्राम का विकास केवल ईंट-पत्थर से बने भवन या सीमेन्ट कॉन्कीट रोड तक सीमित नहीं रहता, वरन यह कहना चाहिये कि विकास का दायरा बहुत व्यापक हो जाता है। सतत-सन्तुलित- समग्र विकास के लिए ग्राम पंचायत विकास योजना में केवल


अधोसंरचनात्मक विकास की बात न होकर उसमें सामाजिक, आर्थिक एवं वैयक्तिक विकास भी शामिल होना चाहिए। समग्र और समावेशी विकास की सोचे ग्राम पंचायत की विकास योजना के केन्द्र में होनी चाहिए। ग्राम पंचायत के अंतर्गत सतत विकास लक्ष्यों के घटक

चहुमुखी विकास

हमारी ग्राम पंचायत में ऐसे साधन हो जहाँ कोई व्यक्ति भूखा न सो सके, सबके सर पर छत हो, सबको अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य, लहलहाते खेत, अनाजों से भरे गोदाम, भरा-पूरा बाजार, हर हाथ को काम (रोजगार) हो दूध-दही, घी, मठा घर-घर में खाने को मिले, हर किसी का बैंक में खाता हो,

जिसमें वह अपने कमाई से बचत कर सके, कम ब्याज दरों में खेती किसानी और व्यापार-उद्योग के लिए ऋण उपलब्ध हो सके, ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा मिले, जल-जंगल-जमीन की रक्षा हो और उसका संवर्धन हो, ऐसी चहुमुखी विकास की कल्पना हम गांव में करते हैं। जिसमें सतत विकास के लक्ष्य 2030 के उद्देश्य समाहित है।

मानव विकास:-मानव विकास से आशय है मानवीय गुणों का विकास। मतलब कि हमारे बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य, पोषण युक्त भोजन, समाज में महिलाओं का सम्मान व समान अधिकार, रहने के लिए घर, पहनने के लिए कपड़े, मनोरंजन के साधन, युवाओं के कौशल उन्नयन यानि किसी विशेष काम को करने के लिए हुनर सीखने की व्यवस्था और उससे अपने आय बढ़ाने के अवसर, स्वच्छ समाज से स्वस्थ्य समाज और सब मिलकर एक विकसित समाज बनायें।

जीवन की गुणवत्ता :

आर्थिक विकास और मानव विकास के साथ-साथ जरूरी है कि सभी लोग स्वस्थ्य रहें. तंदुरस्त रहें। इसके लिए जरूरी है कि सबको पीने का साफ पानी मिले. बीमारियों से बचने के लिए समय-समय पर टीके लगते रहें, सभी को खासकर बच्चों और गर्भवती माताओं को पोषक आहार मिले।

इलाज और देखरेख की सुविधायें बढ़े ताकि जन्म से पांच-छह साल तक के बच्चों की मौत में कमी आये. मतलब शिशु मृत्यु दर में भी कमी आये। जन्म देते समय माँ की सुरक्षा भी जरूरी है इसलिए संस्थागत प्रसव को बढ़ावा मिले, जिससे महिलाओं की उचित देख-रेख हो सके।

महिलाओं को समय पर जांच और इलाज की सुविधायें मिलें। महिला और पुरुषों की संख्या बराबर होना जीवन के संतुलन के लिए जरूरी है। महिलाओं की संख्या कम होना चिंता की बात है। यह पिछड़ेपन की निशानी है। इस असंतुलन को मिटाने के लिए बेटी के जन्म को प्रोत्साहित करना तथा महिलाओं के स्वास्थ्य और रहन-सहन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

लड़के-लड़कियों को पढ़ाई लिखाई और दूसरी सभी सुविधायें बराबरी से मिले। इसके अतिरिक्त नशा मुक्त समाज, साफ-सफाई युक्त वातावरण, खेलकूद, जैव विविधता / संरक्षण, ऊर्जा बचत, इत्यादि गतिविधियां शामिल हो सकती हैं।


प्राकृतिक संतुलन

जल, जंगल, जमीन और शुद्ध हवा, हमारे जीवन के आधार हैं। यह कीमती खजाना है, जिससे हमारा जीवन चलता है। विकास का मतलब है साधनों में बढ़ोत्तरी होना।

विकास को समझने के लिए हमें यह देखना होगा कि हमारे जंगल बढ़ रहे हैं या कम हो रहे हैं? जमीन ज्यादा उपजाऊ हो रही है या कम? पानी कम हो रहा है या ज्यादा ? पानी के स्त्रोत नदी, नाले पोखर तालाब, कुये बाबड़ी आदि का पानी साफ है या दूषित? सांस लेने के लिए शुद्ध हवा मिल रही है या नहीं?

प्रकृति का जो खजाना हमारे पास है यह साफ सुथरा बचा है या दूषित हो रहा है? बढ़ रहा है या कम हो रहा है ? उदाहरण के तौर पर हमारे गांव मेंयूरिया बनाने वाला एक प्लांट गांवकी नदी के किनारे लगाया गया है। उस कारखाने में गांव के कई पुरूष एवं महिलाओं को रोजगार मिला है।

इस प्रकार प्रचलित धारणा के अनुसार कहा जा सकता है कि गांव का विकास हुआ, किन्तु दूसरी ओर कारखाने की प्यास बुझाने के लिए एक ओर जहां नदी के पानी का बेतहासा दोहन किया जा रहा है तो दूसरी ओर भी जा रहा है। फैक्ट्री से निकलने वाला मलवा दूषित पानी आदि उसी नदी में बहाया जा रहा है।

जिससे नदी के पानी में प्रदूषण बढ़ रहा है और इससे नदी सूखने की कगार पर है प्रदूषित पानी के इस्तमाल से कई तरह के रोग पनपने लगे हैं। यह वजह है कि इसे संतुलित विकास नहीं कहा जा सकता। संतुलित विकास में गांव में ढाँचागत सुविधाओं, रोजगार के अदसरों और आर्थिक स्थिति में वृद्धि के साथ ही पर्यावरण का भी विकास हो।

हमारे खेतों, नदियों, वनस्पतियों, जानवरों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। अतः ऐसी योजना बनायें जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का विनाश न हो बल्कि उनका विकास व संवर्धन हो।

सामाजिक विकासः

“”समाज” विभिन्न समुदाय, लिंग, भाषा, जाति, वर्ग, धर्म को मिलाकर बनी मानव सभ्यता की एक संगठित इकाई हैजो एक विशिष्ठ सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश को जोड़कर रखती है। उसमें रहने वाले लोग एक दूसरे से कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में परस्पर जुड़े हुए होते हैं। यही समाज की परिभाषा है। अतः गांव के विकास में गांव के समाज का विकास एक महत्वपूर्ण घटक है।

महात्मा गांधी राज्य ग्रामीण विकास एवं पंचायतराज संस्थान, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.)

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इसीलिए आवश्यक है कि सर्वांगीण विकास की चर्चा करते समय सामाजिक विकास के विभिन्न पहलुओं को उसमें जोड़े ताकि समाज समुदाय का पक्ष विकास योजना में प्राथमिकता से शामिल किया जा सके।

सामाजिक विकास से आशय है सामाजिक बुराईयों का अंत जैसे बाल विवाह, बाल शोषण, दहेज प्रथा, छुआछूत, अस्वच्छता, अंधविश्वास, नशाखोरी, जुआ-सट्टा, अनैतिक कार्य, अपराध, आपसी विवाद, घरेलू हिंसा, सार्वजनिक हिंसा सार्वजनिक सम्पत्ती को नुकसान पहुँचाना, अधिकारों के प्रति सजग व जागरूक न होना इत्यादि।

ये सारी बातें सर्वागीण विकास के रास्ते बी बाधा हैजिन्हें दूर करना आवश्यक है। जिस समाज में हम रहते हैं वहा आपसी भाईचारा सोहार्दपूर्ण वातावरण, अहिंसा, महिलाओं का सम्मान एवं उनको बराबर का दर्जा आदि बांतों को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है।

सामाजिक न्यायः

जहां सब बराबर हो, जहां निर्णय एवं कार्यान्वयन में सबकी भागीदारी हो, सबको निडरता से अपनी बात कहने का मौका हो, उस समाज को तो विकसित कहेंगे परन्तु जहां ऊंच-नीच हो? भेदभाव हो? छुआ-छूत हो? अभीर-गरीब हो? जहां महिलाओं, दलितों, अनुसूचित जनजातियों और गरीबों को सम्मानजनक और बराबरी का स्थान नहीं है क्या उस समाज को विकसित कहेंगे? कदापि नहीं। सभी में मेल-जोल, भाई चारे और सद्भाव के बिना भी विकास अधूरा रहेगा।

सुशासन :

वंचित वर्ग, दिव्यांग एवं महिलाओं के विकास हेतुबेहतर सुविधायें प्रदान करने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर विभिन्न विभागों से समन्वय स्थापित कर योजनाओं का लाभ दिलाना और ग्राम विकास की योजना बनाते समय इन वर्गों की आवश्यकताओं को शामिल करना।

अधोसंरचना विकास

विभिन्न सामुदायिक संरचनाएँ,

भवनों,

केन्द्रों की स्थापना जैसे पंचायत कार्यालय भवन,

ई-पंचायत कक्ष,

बैंक कियोस्क, जन सुविधा केन्द्र,

आंगनबाड़ी भवन,

सामुदायिक कला केन्द्र,

खेल मैदान,

हाट बाजार,

सार्वजनिक पार्क,

शांतिधाम,

पक्की सड़क,

पक्की नालियां,

फुटपाथ,

यात्री प्रतिक्षालय,

ग्राम सभा चौपाल,

स्ट्रीट लाईट,

पेय जल हेतु हैण्डपम्प,

नलकूप,

नल-जल कनेक्शन,

बिजली कनेकशन,

पहुँच मार्ग,

पुल-पुलिया,

जल संरक्षण के लिए स्टॉप डेम चेक डेम,

परकोलेसन टेंक,

तालाब, झील,

तरल प्रबंधन इत्यादि अनेक अधोसंरचना विकास जीवन को आसान बनाते हैं।


ग्राम पंचायत विकास योजना के जरिए समग्र

दिव्यांग एवं

महिलाओं की देखभाल

और सुरक्षा •

• सामाजिक/ नैतिक मूल्यों की स्थापना

सामाजिक न्याय

. सुशासन

पंचायत भवन निर्माण ई-कक्ष निर्माण

.

. आँगनवाडी भवन निर्माण

.

सामुदायिक भवन

निर्माण

सीमेंट कांकीट सड़क

निर्माण

अधोसंरचना विकास

. कृषि का

आधुनिकीकरण

कौशल उन्नयन

.

आजीविका संवर्धन

सामाजिक सुरक्षा

• वित्तीय समावेषण बुनियादी

सुविधाएँ सेवाए

तथा उत्तरदायित्व

समा • जानकारियों का सार्वजनिक स्थानों पर

प्रदर्शन

• ग्राम पंचायत को नागरिक सुविधा केन्द्र | बनाना

ग्राम पंचायत के संसाधन

गुणवत्ता पूर्ण सेवाऐं सकिय एवं सुदृढ ग्राम

कहावत है कि “दाम करें सब काम” इसलिए जरूरी है कि हमारी पंचायतें आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर हों। अतः हमें यह समझना होगा कि पंचायत की आय के स्त्रोत क्या-क्या हैं।

वर्तमान में पंचायत की आय के स्त्रोत अथवा संसाधन के संग्रह एवं उसके आंकलन को “रिसोर्स एनवलप” का नाम दिया गया है। हम पहले चर्चा कर चुके हैं कि ग्राम पंचायत विकास योजना क्या है? उसकी क्या आवश्यकता है और उसके कौन-कौन से जरूरी घटक होंगे?

परन्तु किसी भी विकास योजना को अमली जामा पहनाने के लिए “संसाधनों” की आवश्यकता होती है। संसाधन के बिना विकास के लक्ष्यों को साकार करना असम्भव है। इसलिए विकास योजना की चर्चा करते समय हमें अपनी ग्राम पंचायत के समस्त उपलब्ध या निकट भविष्य में उपलब्ध होने वाले संसाधनों का आंकलन करना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

इस दृष्टिकोण से ग्राम पंचायत के संसाधन को प्रमुख चार भागों में बांटा जा सकता है।

वित्तीय संसाधन – इस संसाधन के तहत ग्राम पंचायत को राज्य, केन्द्र, जिला, जनपद स्तर की वित्तपोषित योजनाओं एवं कार्यक्रमों के तहत प्राप्त होने वाली अनुदान एवं राशि तथा ग्राम पंचायत की स्वयं की आय आती है तात्पर्य यह कि किसी भी स्त्रोत से प्राप्त होने वाली वित्तीय आय, जिससे ग्राम पंचायत बजट व ग्राम सभा का कोष निर्धारित होता है वित्तीय संसाधन कहलाते हैं।


प्राकृतिक संसाधन हर ग्राम पंचायत के कुदरती तौर पर प्राकृतिक सम्पदा का वरदान मिला है। जिसके तहत गांव का जल, जंगल, जमीन जिसमें मुख्य रूप से नदी, पहाड़, मिट्टी और पेड़ पौधे कन्दमूल जड़ी-बूटी व वेलें आदि शामिल हैं उनका पी.आर.ए. (संसाधन मानचित्र) के माध्यम से सही आंकलन करके योजना बनाते समय इन संसाधनों का समुचित एवं संतुलित उपयोगिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

मानव संसाधन मानव संसाधन ग्राम पंचायत की सबसे बड़ी ताकत है जिसमें ग्राम सभा के सदस्य, पंचायत प्रतिनिधि, पंचायत पदाधिकारी एवं कर्मचारी, महिला समूह, कृषक समूह, युवा दल, किशोरी बालिका समूह, वृद्धजन, व्यापारी, शिक्षक, चिकित्सक, पटवारी आदि के साथ-साथ गांव के विशिष्ट लोग जिसमें लोककला एवं शिल्प के जानकार गुणी व वैद्यजन जैसे- कुम्हार, लोहार, बढ़ई, सुनार, राजमिस्त्री, वैद्य, मूर्तिकार, शिल्पकार आदि को ग्राम पंचायत रिसोर्स एनवलप में जरूर शामिल किया जाना चाहिए।

सामाजिक संसाधन-गांव के विभिन्न समुदाय, लिंग, भाषा, जाति, धर्म, वर्ग और सांस्कृतिक समावेश से निर्मित होते हैं। इनकी विशेषताओं को संसाधन के रूप में चिन्हित कर उसे रिसोर्स एनवेलप में शामिल करना चाहिए।

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