ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) GPDP

ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) कैसे बनायें ग्राम पंचायत का विजन (सपना) क्या हो

बिना सपने के विकास नहीं हो सकता। विकास का दृष्टिकोण तय करने के लिए यह जरूरी होती हम अपने गांव की आज की परिस्थिति का आंकलन कर लें। जैसे कि स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा, गरीबी, समुदाय की भागीदारी, पीने योग्य पानी, उर्जा, आवास के क्षेत्र में हम आज कहां है।

हम आज जहां पर है यहाँ से 15 साल आगे अपने गाँव को कहाँ देखते हैं उसके लिए कौन-कौन से संसाधनों की आवश्यकता होगी. उनका आंकलन करना आवश्यक होगा। जिससे विकास योजना बनाते समय विभिन्न पहलुओं को जैसे- हरे-भरे लहलहाते खेत हो, शुद्ध प्राणवायु पेयजल, स्वच्छ वातावरण हो, शिक्षित एवं स्वस्थ्य समाज का निर्माण हो, आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय के पहलुओं को भी न भूले ऐसी एक ग्राम पंचायत की हम परिकल्पना करते हैं।

ग्राम पंचायत विकास योजना (जीपीडीपी) कैसे बनायें

योजना बनाने के महत्वपूर्ण चरण और उसके साथ जुड़े सिद्धान्त तथा दर्शन को समझना बहुत जरूरी है। जो इस प्रकार हैं: कमजोर, गरीब और महिलाओं की सम्पूर्ण प्रक्रिया में उपस्थिति और सक्रिय भागीदारी

होना। सहभागी नियोजन को सबसे पहला चरण है किसी भी प्रक्रिया में, उस काम से जुड़े उन सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना, जिनके हित इससे प्रभावित होते हैं। खासकर कमजोर वर्गों की भागीदारी जरूर सुनिश्चित की जाए। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बहुत मेहनत की जरूरत पड़ती है।

इसमें निम्न गतिविधियों शामिल हैं- सम्बन्ध बनाना, मानचित्र बनाना व हितसाधक विश्लेषण करना, विभिन्न लक्षित वर्गों जैसे- अनुसूचित जाति, जनजाति के लोगों को प्रक्रिया में शामिल करना। उनके साथ फोकस्ड समूह चर्चा करके उनके योजना बनाने का हिस्सा बनाना।


वातावरण निर्माण

सभी की सहभागिता से ग्राम पंचायत विकास योजना तैयार करने के लिए उचित वातावरण बनाना अत्यन्त आवश्यक है। उचित वातावरण निर्माण के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना बहुत जरूरी है। राज्य से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक वातावरण का निर्माण किया जाना चाहिए।

हर एक स्तर पर वातावरण निर्माण की अलग-अलग रणनीति तैयार की जानी चाहिए। ग्राम पंचायत के संदर्भ में वातावरण निर्माण के लिए विभिन्न गतिविधियां अपनायी जा सकती है जैसे ग्रामसभा की स्थाई एवं तदर्थ समिति के सभापतियों एवं उनके सदस्यों के सामने ग्राम पंचायत विकास योजना की पूरी रूप रेखा रखना और उस पर चर्चा करना।

महिला स्वसहायता समूहों, पंचायत के सरपंच, उपसरपंच, पंचों, सचिव व अन्य पंचायत कर्मियों के साथ बैठकर चर्चा करना, उसके बाद समितियों के साथ मिलकर गांव के घर-घर में सम्पर्क करके लोगों को जीपीडीपी की प्रक्रिया में शामिल होने के लिए आमंत्रित करना सार्वजनिक स्थानों जैसे बसस्टॉप, पंचायत भवन, ग्राम चौपाल आदि जगहों पर बैनर, पोस्टर लगाना।

परिस्थिति विश्लेषण या चर्चा

सबकी भागीदारी सुनिश्चित होने के बाद परिस्थिति का विश्लेषण एवं चर्चा करना आवश्यक होता है। यहां पर यह ध्यान देना जरूरी है कि इस पर्चा में लोगों के दैनिक जीवन और उससे जुड़ी परिस्थितियों पर ध्यान केन्द्रित किया जाए। यह चर्चा समुदाय को और लोगों को अपने जीवन की परिस्थिति और उसे प्रभावित करने वाले स्थानीय व बाह्य कारकों को समझने व उसके विश्लेषण के लिए प्रेरित तथा मदद करती है।

समस्या पहचानना

परिस्थिति विश्लेषण के बाद समस्याओं के पहचान की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इस प्रक्रिया के दौरान लोग किन समस्यओं का समना कर रहे हैं? इन समस्याओं की मूल वजह क्या है? इन सभी तथ्यों की सूची बनाना महत्वपूर्ण है। ऐसा करने से यह स्पष्ट होगा कि जिसे हम समस्या समझ रहे हैं वह वास्तविक रूप से समस्या है या नहीं? जो वास्तविक रूप में समस्या के कारण हैं उन्हें समझना आसान होगा।

यही कारण और प्रभाव हमें उद्देश्य और उन्हें प्राप्त करने के लिए गतिविधियां तय करने में मदद आमतौर पर गांव में परिस्थिति विश्लेषण की प्रक्रिया शुरू करते समय कुछ विशेष पीआरए टूल्स का इस्तेमाल व्यवहारिक होता है।

जैसे बेसलाईन सर्वे, पहले से उपलब्ध संसाधनों जैसे वेबसाईड, साहित्य, विभागीय प्रतिवेदन, विभागीय सर्वे इत्यादि से आंकड़े प्राप्त करना, प्राथमिक आंकड़े प्राप्त करने के लिए गांव वालों की भागीदारी से उनके बीच जाकर सामाजिक मानचित्र, संसाधन मानचित्र, चपाती चित्र, मौसमी मानचित्र इत्यादि टूल्स का उपयोग करके सटीक परिस्थिति विश्लेषण से वर्तमान परिस्थिति को समझने और समस्याओं के चिन्हांकन में मदद मिलती है।

समस्याओं को प्राथमिकता के कम में रखना

समस्याओं और कारणों की पहचान हो जाने के बाद समझना जरूरी हो जाता है कि समस्याओं की प्राथमिकता का कम क्या हो? पहचानी गई समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या कौन-सी है। जो हमारे जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है और सभी परेशानियों की जड़ क्या है? इसकी वजह क्या है ? यह विश्लेषण आधारभूत समस्या को पहचानने में मदद करता है। एक बार जब आधारभूत समस्या स्पष्ट हो जाए तो माध्यम से बदलाव की प्रक्रिया शुरू करने की रणनीति बनाना आसान हो जाता है।

महात्मा गांधी राज्य ग्रामीण विकास एवं पंचायतराज संस्थान, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.)

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विकास योजना के लिए जरूरी संसाधन किसी भी काम को पूरा करने के लिए संसाधनों की जरूरत पड़ती है। यह संसाधन हो सकते हैं

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संसाधनों की पहचान

कितने संसाधन चाहिए, यह मामला सुलझ जाए तब सवाल उठता है कि ये संसाधन कहां से आयेंगे। यह चरण पूरी प्रक्रिया में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अतः इस प्रक्रिया का संयोजन करते समय बहुत सावधानीपूर्वक काम करना चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ प्रक्रियाएँ ऐसी हैं जिन पर समझौता नहीं किया जा सकता। ध्यान देने वाले विन्दु इस प्रकार हैं:

• संसाधन पहचानते वक्त सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर कौन-कौन से संसाधन उपलब्ध है।

• स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के आधार पर नियोजन शुरू करना चाहिए। • जो संसाधन स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं हैं उन्हें बाहर से प्राप्त होने वाले संसाधनों के रूप में देखा जाना चाहिए। वह कहां से और कैसे आएंगे।

इस बात को समझने के गंभीर प्रयास होने चाहिए ताकि समुदाय को यह अहसास हो कि तय की गयी गतिविधि का कुछ भाग उसे अपने पास से क्यों देना है? • सामुदायिक कार्यों की जिम्मेदारी तो ग्राम पंचायत की है, समुदाय उसमें भागीदारी करें।

संसाधन कैसे मिलेगा

● अभी तक गांव की जरूरत कैसे पूरी होती है? आमतौर पर हम गांव की जरूरत पर आपस में चर्चा करते हैं और हम अपनी समस्या की पूर्ति कि लिये माननीय विधायक, माननीय सांसद या अधिकारियों के पास जाते हैं। उन्हें बताते हैं और सहायता मांगते हैं। कभी सहायता मिलती है, तो कभी नहीं। क्या हमने कभी इस बात पर सोचा है कि हमें सहायता क्यों नहीं मिलती ? इस सवाल का उत्तर पाने के लिये हमें नीचे लिखे बिन्दुओं पर विचार करने की आवश्यकता है:

महात्मा गांधी राज्य ग्रामीण विकास एवं पंचायतराज संस्थान, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.)

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क्या हम समस्या को ठीक ढंग से दूसरे को समझा पाते हैं ? क्या हम अपनी बात पूरी तरह से दूसरों के सामने रख पाते हैं ? .

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क्या हम हमारी बात पर खड़े किये गए सवालों के उत्तर ठीक से दे पाते हैं ?

क्या हम यह प्रभावी तरीके से बता पाते हैं कि इस समस्या को दूर कर देने से गांव के हालात

में क्या बदलाव आएगा ?

• क्या हम अपनी बातों से यह स्पष्ट कर पाते हैं कि यह समस्या हमारे गांव की सबसे बड़ी और जरूरी समस्या है और यह गांव के सभी वर्गों से जुड़ी है?

यह ध्यान रखना जरूरी है कि गांव की जिन्दगी पर समस्याओं का क्या प्रभाव होता है? इस समस्या को दूर करने में गांव के अपने प्रयास जैसी बातों को समझना जरूरी है उसको समझाने की पर्याप्त तैयारी भी होना चाहिए।

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ग्राम पंचायत विकास योजना का प्रस्ताव तैयार करना

परियोजना का प्रस्ताव किसी भी काम को व्यवस्थित ढंग से पूरा करने के लिए बनायी गयी योजना का दस्तावेज है। इस दस्तावेज में विषय, विषय से जुड़ी समस्या. समस्या दूर करने के विभिन्न उपाय, संसाधन की उपलब्धता और परिस्थिति के आधार पर चुना गया उपाय इस उपाय को लागू करने में क्या-क्या जरूरत आएगी.

इत्यादि बातों का उल्लेख होता है। यह दस्तावेज बताता है कि कितने संसाधन बाहर से चाहिए और क्यों आमतौर पर प्रस्ताव लिखा जाता है कागज और कलम से। इसी वजह से योजना और परियोजना को विशेषज्ञों का काम माना जाता है।

यहाँ पर हम इसके दूसरे विकल्प भी सुझा रहे हैं। जो लोग या गांव अपने प्रस्ताव लिख सकते हैं वे कागज पर लिख कर दूसरों को अपनी बात समझा सकते हैं और विभिन्न संस्थाओं से सहायता मांग सकते हैं।

जो लिख नहीं सकते वे पूरे प्रस्ताव को अपनी आवाज में टेप कर के दे सकते हैं। यह टेप सरकारी विभाग या दाता संस्था को दी जा सकती है। संस्थाएँ हमारी बात सुन कर भी समझ सकती हैं, और मदद कर सकती हैं।

ग्राम पंचायत विकास योजना का अनुमोदन

ऊपर कही गई सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद जो भी तथ्य सामने आये हैं जैसे गांव की वर्तमान स्थिति, गांव का बजट व संसाधन, गांव की समस्याएं, गांव की आवश्यकता. उनके निदान, परिणाम इत्यादि महत्वपूर्ण बिन्दुओं का अभिलेखीकरण कर लेना चाहिए।

यह अभिलेख ग्राम पंचायत विकास योजना का प्रारूप है जिसे ग्रामसभा में चर्चा के लिए रखा जाएगा और उसके हर एक बिन्दु पर विस्तृत चर्चा एवं सलाह मशवरा किया जायेगा। इसके बाद ग्राम सभा के द्वारा बताये गये सुझाव एवं संसोधनो को शामिल


हालात

और

• इस

की

कर पुनः योजना दस्तावेज ग्राम सभा के समक्ष अनुमोदन के लिए किया जाएगा। ग्राममा सर्वसम्मति या बहुमत से ग्राम पंचायत विकास योजना का अनुमोदन कर सकेगी। | पंचायत विकास योजना को कैसे लागू करें

ग्राम

योजना को तय किये गए उद्देश्यों एवं गतिविधियों के अनुसार ही लागू किया जाना चाहिए। योजना को ठीक ढंग से लागू करना आवश्यक है और इसके लिए यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि गतिविधि कम होनी है. कैसे होनी है, कौन करेगा, कैसे करेगा? परियोजना लागू करते समय बराबर ध्यान देना आवश्यक होता है कि तय गतिविधियां तय किए गये समय, संसाधन, जिम्मेदारी के अनुरूप हो। इसके लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए

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कार्ययोजना निर्माण के समय ही स्पष्ट कर देना जरूरी है कि बनायी गयी योजना के क्रियान्यवन की देख-रेख करने की जिम्मेदारी स्वयं समुदाय की है। कोई भी बाहरी संस्था या व्यक्ति केवल सहयोग देने वाले की भूमिका ही निभा सकते हैं। शुरूआत में पीछे से दिए जाने वाले इस सहयोग का स्वरूप प्रशिक्षण, दैनिक भ्रमण और सघन सहयोग जैसी गतिविधियों हो सकती हैं।

निगरानी

योजना का क्रियान्वयन शुरू होना सिर्फ एक शुरुआत है। जैसे-जैसे काम आगे बढ़ेगा बहुत सारी ऐसी समस्याएं भी आएंगी जिनके बारे में हमने सोचा ही नहीं होगा। अगर इन समस्याओं को दूर करने की हमारी पहले से तैयारी नहीं होगी तो सारा काम ठप्प हो सकता है। अतः योजना लागू करने के बाद सतत निगरानी करना जरूरी

मूल्यांकन

मूल्यांकन से आशय है कि निश्चित समय-सीमा के बाद पीछे मुड़कर यह देखना कि हमारे द्वारा किए गए किसी कार्य से क्या परिवर्तन आया है। जैसे ग्राम पंचायत ने अपनी योजना बनाते समय सतत विकास के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, पीने का पानी, शिक्षा, सुशासन, अधोसंरचना निर्माण इत्यादि को लेकर कार्ययोजना बनायी थी।

इस प्रक्रिया को अपनाने से यह ज्ञात हो सीमा तक सफल रही। इससे वर्तमान स्थिति की जानकारी प्राप्त हो जाती है और अगले वर्ष की जाता है कि ग्राम पंचायत स्तर पर संचालित की जा रही योजना अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में किस कार्ययोजना बनाने में सहायता मिलती है। जब हम समुदाय के भीतर सहभागिता आधारित प्रक्रियाओं के द्वारा बदलाव की बात कर रहे हैं तो हमारी कोशिश होनी चाहिए कि

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