Aiced Co-Operative Union Ltd.

कार्यक्षेत्र : संपूर्ण जबलपुर जिला

2 परिभाषायें ।

इन उपविधियों में जब तक संदर्भ से अपेक्षित न हो। 1. अधिनियम ● से तात्पर्य मध्यप्रदेश सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1960 से

है।

  1. नियम

का अर्थ मध्यप्रदेश सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1962 से है अर्थ है उपविधि क्रमांक-एक में वर्णित संख्या से है। 4. सहकारीता वर्ष से तात्पर्य प्रति वर्ष 31 मार्च को समाप्त होने वाले वर्ष से

  1. संस्था

है। से तात्पर्य मध्यप्रदेश सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1960 की

धाराओं से है।

से तात्पर्य इस अधिनियम के अन्तर्गत पंजिकृत सहकारिता

अथवा पंजिकृत माल्य की गई उपविधियों से है तथा जो

तत्समय प्रवत्त हो और उनके अंतर्गत उपविधियों का कोई

  1. धारा
  2. उपविधिया

पंजीकृत संसोधन आता है। 7. रजिस्टार (पंजीयक) से तात्पर्य धारा-30 के अधीन राज्य सरकार के जिस

किसी व्यक्ति को सहकारिता का रजिस्टार (पंजीयक) से है। तथा उस अधिकारी से है जिसे सहकारिता के संबंध में रजिस्टार (पंजीक की शक्ति के प्रयोग करने हेतु शासन द्वारा

अधिकृत किया हो।

  1. लाभांस से तात्पर्य किसी सदस्य को उनके द्वारा पारित मूल्य के अनुपात
  2. सदस्य

में सहकारिता के लाभ में से चुकाई गई रकम से है। 3 से तात्पर्य इस सहकारिता के राजिस्ट्रीकरण संबंधित संयोजन में सम्मिलित कोई व्यक्ति/महिला जिसे रजिजस्ट्रेशन के बाद

  1. अध्यक्ष

उपविधियों अनुसार सदस्यता प्रदान की गई हैं। + अभिप्रेत चैतनिक या अवैतनिक हैसियत वाला वह व्यक्ति जिसे उपविधियों के अनुसार बोर्ड द्वारा सदस्यों, निर्देशकों या अन्य में से नाम निर्देशित या निर्वाचित या नियुक्त किया गया हो ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जिससे ऐसे उत्तरदायित्व होगें और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो उपविधियों में विनिर्दिष्ट है तया बोर्ड द्वारा निर्देशित की गई है।

  1. कार्यक्षेत्र • वह क्षेत्र जहाँ से सदस्यता ली जा सकती हैं।
  2. बोर्ड (समिति) से अभिप्राय है पारा 48 के अधीन सहकारिता का कोई शासी

निकाय जो चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो तथा संचालक

मंडल / प्रबंधकारिणी/ अथवा किसी भी नाम से पुकारी या जानी

जाती हो जिसे उपविधियों के अधीन सहकारिता के कार्यकलाप

के निर्देशन सौपे गये हैं।

  1. प्रवर्धक (कर्मचारी से तात्पर्य है संस्था के कार्य संचालन के लिये संचालक

मंडल / प्रबंधकारिणी बोर्ड द्वारा नियुक्त सेवारत अधिकारी/ कर्मचारी से है।

  1. राज्य शासन से तात्पर्य मध्य प्रदेश शासन से हैं।

अध्यक्ष

प्रस्ता. ज. वि. वा. रोज वि.सह.संघ मर्दा जबलपुर

  1. सेवा नियम

से तात्पर्य अनिका के अन्तर्गत संचालक मंडल कारण बोर्ड द्वारा सेवानियमों से है।

  1. सहकारिता संस्था से तात्पर्य उपविधि क्रमांक 01 में वर्णित सहकारिता से है इस अधिनियम के अधीन जिस्कृत व्यक्तियों की स्वायत संस्था,जो संयुक्त स्वामित्व के और लोकतांत्रिक के माध्य से सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिये स्वेछा से संयोजित हुये है।
  2. प्रतिनिधि

1 से अभिप्रेत है वह सदस्य जो किसी सहायक सहकारिता की प्रज्योति समय तथा ऐसी सहायक सहकारिता के जिससे वह सहकारिता संबंध है सम्मेलन के समय उसके हित का प्रतिनिधित्व करने के लिये उसके द्वारा नाम का निद्दिष्ट किया गया है या अन्य सहकारिता में प्रतिनिधित्व के लिये निर्वाचित किया गया है।

  1. निर्देशक से अभिप्रेत हैं बोर्ड का निर्देशक से है। 19, विनिदृष्ट पद से तात्पर्य अध्यक्ष/सभापति के पद से हैं ऐसी परिभाषायें जो इन उपविधियों में वर्णित नहीं है उनकी व्याख्या मध्य प्रदेश सहकारी सोसायटी अधिनियम 1960 में दी गयी परिभाषा से की जावेगी।
  2. आरक्षित वर्ग से अभिप्राय अधिनियम के अर्थ में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति दर्ग के सदस्यों से हैं।
  3. कर्मचारी सेवा नियम से तात्पर्य है रजिस्ट्रार द्वारा अधिनियम की धारा 55 (1) के अर्न्तगत अनुमोदित एवं प्रसारित सेवा नियम से है। 22. प्राधिकारी से अभिप्रेत है धारा 57-ग की उपधारा (1) के अधीन गठित

मध्य प्रदेश राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकारी से हैं।

  1. नाममात्र का सदस्य से तात्पर्य संस्था के कार्य व्यापार से संबंध रखने वाले

ठेकेदार, विता, एजेन्ट आदि से हैं जिन्हें संस्था ने प्रवेश शुल्क तथा

अभिदान 100/- रूपये लेकर ऐसी सदस्यता प्रदान की है।

  1. सम्भावी सदस्य से अभिप्रेत है, कोई व्यक्ति जिसे किसी सहकारिता द्वारा प्रस्तुत

की जा रही अभ्यन्तर कोर सेवाओं की आवश्यकता है, और जो

उस सहकारिता का सदस्य होने का पात्र हैं किन्तु जिसने अभी तक सदस्यता के लिए आवेदन नहीं किया है।

  1. निर्वाचन अधिकारी से तात्पर्य कोई ऐसा व्यक्ति जिसे राज्य सहकारी निर्वाचन प्राधिकारी ने साधारण या विशेष आदेश द्वारा संस्था के निर्वाचन

हेतु नियुक्त किया हो कि वह संत्या के निर्वाचन हेतु अधिनियम के अधीन अधिकारी के कर्तव्यों का पालन करें। 26. अंकेक्षक (संपरीक्षा फार्म) से अभिप्रेत है, अधिनियम की धारा 58 के अन्तर्गत

सहकारी सोसायटी की संपरीक्षा के लिये प्राधिकृत संपरीक्षक/ चार्टेड अकाउंटेंट फर्म से है।

  1. माध्यस्थम् परिषद् से अभिप्रेत है, विवादों का निपटारा करने के लिए किसी सहकारिता के सामान्य / साधारण निकाय द्वारा इस अधिनियम तथा उपविधियों के उपबंधों के अनुसार, धारा 57 के अधीन गठित तीन व्यक्तियों का समूह से हैं।

अध्यक्ष

प्रा.वि.वा.क वि. वह संघर

  1. मुख्य कार्यपालक से अभिप्रेत है, वैतनिक या अवैतनिक हैसियत वाला वह व्यक्ति जिसे उपविधियों के अनुसार बोर्ड द्वारा सदस्यों, निदेशकों या अन्य में से नामनिर्दिष्ट मनोनीत या निर्वाचित या नियुक्त किया गया हो, जो ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जिसके ऐसे उत्तरदायित्व होने और जो ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो उपविधियों में विनिर्दिष्ट है तथा बोर्ड द्वारा समनुदेशित की गई 81
  2. सामान्य आवश्यकता से अभिप्रेत है, ऐसी आर्थिक आवश्यकता जो उन सभी व्यक्ति के लिए सामान्य हैं, जो सहकारिता बनेको करते हैं या जिन्होने किसी सहकारिता में सदस्यता ग्रहण की है तथा जो ऐसी सहकारिता के उद्देश्यों से संगत है।
  3. सहकारी कारबार से अभिप्रेत है, कोई ऐसा कारवार जो अनुसूची क में

विनिर्दिष्ट सहकारी सिद्धांतों के अनुसार कृत्य करने का आशय रखाता है। 31. अभ्यन्तर कौर सेवा से अभिप्रेत है, सदस्यों को उपलब्ध कराई गई केन्द्रीय

सेवाएँ जिनके माध्यम से सहकारिता सभी सदस्यों की उन सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति करने का आशय रखती है जिनकी पूर्ति के लिए सहकारिता का गठन किया गया था, इनमें मूल्यपरक सेवाऐं सम्मिलित है।

  1. व्यायलय : से अभिप्रेत है, सक्षम अधिकारिता रखने वाला सिविल न्यायलय। 33. घाटा

1 से अभिप्रेत है, वित्तीय वर्ष के अन्त में आय पर प्राप्त जाय का

शुद्ध आधिक्य

  1. घाटे का प्रभार से अभिप्रेत है, घाटे की यदि कोई हो, पूर्णतः या भगतः पूर्ति

करने के लिए उपविधियों और साधारण निकाय के संकल्प के

अनुसार सहकारिता की सेवाओं के उपयोग या अनुपयोग के

अनुपात में, सदस्यों से एकत्रित की गई या उनके लेखे में

विकलित की गई रकम

  1. प्रत्यायुक्त से अभिप्रेत है, वैयक्तिक सदस्यों के किसी समूह द्वारा सहकारिता

के साधारण निकाय में उनका प्रतिनिधित्व करने के लिए

सहकारिता की उपविधियों के अनुसार निर्वाचित कोई व्यक्ति।

  1. प्रत्यायुक्त साधारण निकाय से किसी सहकारिता के सम्बन्ध में अभिप्रेत है, उसके सभी प्रत्यायुक्त 37. प्रत्यायुक्त साधारण निकाय सम्मिलन से अभिप्रेत है, इस अधिनियम तथा

उपविधियों के उपबन्धों के अनुसार बुलाया गया तथा संचालित किया गया. प्रत्यायुक्तों का सम्मिलन | 1 से अभिप्रेत है, कोई व्यक्ति, उसका पति या पत्नी, उस पर आश्रित उसकी सन्तान तथा उस पर आश्रित और उसके साथ

  1. कुटुम्ब

संयुक्ततः निवास करने वाले अन्य लातेदार। 39. साधारण निकाय से सहकारिता के सम्बन्ध में अभिप्रेत हैं, उसके सभी सदस्य ।

  1. साधारण सम्मिलन से अभिप्रेत है, इस अधिनियम तथा उपविधियों के उपबन्धों के अनुसार बुलाया गया तथा संचालित किया गया साधारण निकाय का कोई सम्मिलन ।

41.

विधयों के अनुसार बोर्ड द्वारा सहकारिता के किसी पद पर निर्वाचित, नियुक्त या किया गया

अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और निदेशक 42. प्राथमिक सहकारिता से अभिप्रेत है, ऐसी सहकारिता जिसकी कोई अन्य

  1. सेवा

सहकारिता सदस्य नहीं है। 1 से अभिप्रेत है, यया आयोजित ऐसी सुविधाएँ, जो सहकारिता द्वारा अपने लक्ष्य की पूर्ति करने के लिए प्राथमिक रूप से

सदस्यों को उपलब्ध कराई जाती है। 44. विशेष संकल्प से अभिप्रेत है, साधारण निकाय का ऐसा कोई संकल्प जिसे साधारण सम्मिलन में मत देने का अधिकार रखने वाले सदस्यों में से पास से अधिक प्रतिशत तथा उपस्थित सदस्यों में से

  1. अधिशेष
  2. अधिशेष

कम से कम दो तिहाई सदस्यों का अनुमोदन प्राप्त हो। से अभिप्रेत है, वित्तीय वर्ष के अन्त में व्यय के ऊपर आय आधिक्य, जो अंश पुँजी पर ब्याज, यदि कोई हो, के भुगतान

के पश्चात् और अधिशेष प्रतिदाय के भुगतान और आरक्षित तथा अन्य विधियों के आवेदन के पूर्व प्राप्त होता है। प्रतिदाय से अभिप्रेत है, उपविधियों और साधारण निकाय के संकल्प

के अनुसार सहकारिता की सेवा का उपयोग या अनुपयोग करने अनुपात में सदस्यों को दिये गये या उनके लेखा में जमा या विकलित किये गये अधिशेष का प्रतिदाय

  1. परिभाषाएं

से अभिप्रेत हैं कि उपरोक्त वर्णित परिभाषाएं से है एवं ऐसी परिभाषाएं जो इन उपविधियों में वर्णित नहीं है, उनकी व्याख्या अधिनियम एवं नियमों में दी गई परिभाषाओं से की जायेगी। गई है किन्तु परिभाषित नही किये गये हैं/की गई है परन् मध्यप्रदेश सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1960 क्रमांक 17 सन् 1961द्ध तथा उसके अधीन बनाये गये नियमों में परिभाषित किये गये हैं/ की गई है यही अर्थ होगा जो कि उन्हें उस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाये गये नियमों में दिया गया

उन शब्दों तथा अभिव्यक्तियों का जो इस अधिनियम में प्रयुक्त किये गये हैं/ की

है। उपविधि क्रमांक 3 उद्देश्य । 3

जबलपुर संभाग के ग्रामीण और शहरी युवाओं एवं महिलाओं द्वारा संचालित सहकारिता का उद्देश्य सदस्यों को उनकी आर्थिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए रोजगार के अवसर को उपल्ब्ध कराके सबको वित्तीय दृष्टि से ऐसी लाभकारी व्यावस्था करना जो सबके द्वारा अनुभव की गई सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति करें स्वयं की सहायता करती हो। आत्मनिर्भर बनाती हो, परस्पर सहायता प्राप्त व्यावसायिक उद्यमों के रूप में जो सदस्यों के स्वामित्व के हो और जो सहकारिता नियमों, अधिनियमों व उपनियमों का पालन करती हो।

  1. बेरोजगार युवाओं को संघटित करना एवं उन्हें योग्यता अनुसार रोजगार उपलब्ध करना एवं स्वरोजगार को बढ़ावा देना। 2. मसिक बचत को बढावा देना, सहलाभ अर्जित करना एवं सहकारी कार्य को बढ़ावा देना।
  2. लघु और कुटीर उनो को बाढावा देना। 4 छोटे व्यापारीयों एवं दुकानदारों की व्यवसायिक सहायता प्रदान करना।
  1. व्यावसाय के नये को ताला और सदस्यों को उपलब्ध करना। ६. अन्य कच्चा माल खरीदना तथा उन्हें सदस्यों को देवा, जो तैयार माल में पर संस्था को सौंप देंगे। इस प्रकार माल तैयार करने के लिए मजदूरी देना,संख ये अधिक से अधिक लाभ पर इस तैयार माल को बेचने का प्रबंधक साल उत्पादन के लिए कारखाना कारखाना या गोदाम के लिए जमीन, भवन मोल लेना या किराये पर लेना आदि।
  2. हिस्से जारी करके और जमा रकम के रूप में या अन्य प्रकार से जी संग्रहीत करना एवं कारीगरों/ धनिको व्यापारीयों विक्रेता/सदस्यों और अन्य व्यक्तियों से संस्था के लिए आवश्यक रकम लुटाना।

B. उद्योग से संबंधित उन्नत किस्म के उपकरण खरीदना और उन्हें सामूहिक उपयोगार्थ रखना या किराये पर देना।

  1. अपने सदस्यों की व्यवसायिक एवं उद्योग आवश्यक वस्तुओं को संयुक्त खरीदी के लिये तथा सदस्यों में उन्हें बेचने के लिये अभिकर्ता के रूप में कार्य करना। 10. उन्नत किस्मों की ओर आसानी से बेची जा सकने वाली विविध प्रकार और नमूनों की

वस्तुएँ बनाने के संबंध में सदस्यों को सलाह एवं प्रशिक्षण देना। 11. सदस्यों में मितव्ययता और स्वावलंबन की आदत डालना। 12. केन्द्रीय व प्रादेशिक शासन व अन्य संस्थाओं से संस्था के कारवार चलाने के लिए ऋण

व अनुदान आदि प्राप्त करना।

  1. ग्रामीण और परम्पारिक व्यावसाय उन्नति हेतु सहायता करना। 14 सदस्यों को व्यावसायिक ऋण उपलब्ध कराना एवं आवश्यकतानुसार योग्य व्याज पर ऋण

देने की व्यवस्था करना । 15. आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना।

  1. संयुक्त उपक्रमों को चलाना । 17. व्यवसाय क्षेत्र को निरंतर प्रगतिशील करते हुये चढाना ।
  2. अन्य बैंकों से लोन प्राप्त करना एवं सदस्यों को ऋण दिलाने में मदद करना
  3. स्वा] सहायता समूहों के सदस्यों को बचत एवं साख की आदत डालना।
  4. सदस्यों द्वारा निर्मित उत्पाद अस्थियों की खरीद व खपत आदि को ध्यान में रखकर

गोदाम, बाजार, आदि की व्यवस्था करना। 21. सदस्यों से प्राप्त अमानत राशि (कार्यशील पूँजी) के सुरक्षित विनियोजन का प्रबंध करना।

22 सदस्यों के लिए अन्य आर्थिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना तथा गृहोपयोगी वस्तुओं का निर्माण व क्रय-विक्रय इत्यादि करना।

  1. सदस्यों के सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक विकास के लिये कार्यक्रम बनाना व क्रियान्वित

करना।

  1. ग्रामीण क्षेत्र, छोटे नगरीय क्षेत्र में संस्था की एक व्यवसायिक दुकान खोलना एवं संचालित करना, जिसके लिये नियम प्रबंधकारिणी द्वारा बनाया जावेगा एवं समय-समय में बदलाव किया जावेगा।

25 सदस्यों को प्रशिक्षण देना व सदस्यों में मितव्यता, आत्म निर्भरता, स्वालम्बन तथा सहकारिता की भावना का संचार करना। 26 सदस्यों को शासन द्वारा स्वारोजगार आदि योजनाओं पर ऋण दिलाने में मदद करना एवं

एजेंट व गटर का कार्य करना। 27. केन्द्रीय प्रांतीय एवं शासकीय अर्धशासकीय संस्थानों से काम ठेके अथवा लीज में प्राप्त

  1. सदस्यों को उनके गतिविधि के आधार पर उनके उत्पाद अस्थियों की खरीद व खपत आदि को ध्यान में रखकर अग्रिम, छोटे, मध्यम, बड़े एवं अन्य प्रकार के ऋण उपलब्ध

पूर

कराना जिसकी नगद सुरक्षा निधि का निर्धारण गतिविधि के अनुसार निर्देशक बोर्ड द्वारा

किया जायेगा 29. परिवार की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखकर सामान्य अर आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्हें सहायता एवं वेलफेयर योजना के तहत लाभ

  1. सदस्यों को उनकी आय बढ़ाने आजीविका सुधारने उपलब्ध रोजगार तथा उत्पादकता को बढ़ाने के लिए संसाधन एवं कार्यक्रम उपलब्ध कराना। 31. सदस्यों द्वारा किसी भी उत्पाद एवं उत्पाद के विक्रय हेतु उपभोक्ता की आवश्यकताओं के

अनुसार खरीद के लिए बेटिस, गुणवत्ता नियंत्रण भण्डारण, आवंटन आदि करना जिससे

उनकी आर्थिक तथा व्यवसायिक स्थिति में सुधार हो सके। 32 सहकारिता समूहिक रूप से व्यवसाय में लगने वाले अयों को अपने सदस्यों को अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने के लिये करेगा।

  1. खेती के उत्पादों की संनसाधित एवं आसंवसाधित रूप से खरीद, भण्डारण तथा बिक्री करना जो सदस्यों व गैरसदस्यों तथा किसी भी अन्य संस्था द्वारा उत्पादित हो जिससे सहकारिता के सदस्यों का अधिक से अधिक मिल सकें।
  2. स्वयं के कोष से ऋण देना। 35. संस्था की रूचि के अनुसार उनके खर्च एवं बचत से संबंधित शैक्षणिक प्रशिक्षण एवं प्रबंध की सामग्री प्रकाशित एवं वितरित करना।
  3. सदस्यों एवं कर्मचारीयों की योग्यता के आधार पर परियोजना तैयार कर तकनीकि रूप से प्राशिक्षत कराना ताकि संस्था एवं सदस्यों को अधिक अर्थिक लाभ मिल सके। 7. सहकारिता की तरफ से सरकार चाहे वह केन्द्र, राज्य, नगरनिगम, नगरपलिका, पंचायत, स्थानीय एवं कोई अन्य अधिकारी या कोई अन्य स्थानीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय

विकसीत संस्थाओं के साथ अनुबंध करना जिससे सहकारिता के वर्तमान एवं भूतकालीन

सदस्यों एवं उनके परिवार के लिये कोई भी हित लाभ व्यवस्था हो सके। 38. लोगी की उपयोगिता, किसी प्राकृतिक आपदा, राष्ट्रीय राहत कोष, व्यक्ति के जीवन, स्वास्थ, शिक्षा, एवं पर्यावरण आदि पर आग सहमति से दान सहायता कोष का निर्माण करना।

  1. संबंधित एजेंसियों जैसे सरकारी, अर्द्ध सरकारी वित्तीय संस्थाएं, क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीयकृत बैंक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी, संघ, महासंघ, मित्रा महासंघ, सहकारिता, स्थानिय, स्थानिय शासन, सहकारी, चेरीटेबल संस्थाएं इत्यादि के साथ संबंध स्थापित करना जिससे सदस्यों का अधिक से अधिक सहायता एवं लाभ मिल सके।
  2. काम के सुरक्षित विनियोजन का प्रबंध करना एवं माईक्रो फायनेस का संचालन। 41. आजीविका, शिक्षा व अन्य मुद्दों पर काम करना। 42. संयुक्त उपक्रम चालाना, जिसमें बाजार से लेकर उत्पादन तक ।
  3. क्षेत्र में रहने वाले कारीगरों और श्रमिकों की आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए रोजगार उपलब्ध कराना। 44. संस्था के लिये आवश्यक कच्चे माल और उपकरण खरीदना तथा सदस्यों के बीच उन्हें

फुटकर रूप में नगद में बेचना सदस्यों के तैयार माल को नगद या प्रेषण आधार पर (कन्साइमेंट बेसिक) पर खरीदना और उसे बाजार में बेचने की व्यवस्था करना। साथ ही का माल लाने ले जाने में सदस्यों की सुविधायें निर्माण करना।

  1. अन्य ऐसे अन्य कार्य करना, जो संस्था के सामान्य उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक हो। प्राधिकृत पूँजी व सदस्यों की हिस्सों की सर्वाधिक पुँजी व सदस्यों के हिस्सों की सर्वाधिक संख्या।

विजयय आलापुर

46 ऐसे समस्त विधि सम्मत कार्य करना जो संस्था के व्यापक हितों की पूर्ति

करते हो या अन्य ऐसे कार्य जो उपरोक्त उदेश्य की पूर्ति के लिए ए 47. सहकारी व्यवस्था में एक सहयोगिक सामूहिक प्रयास को बढ़ा है। 48. सहकारीता, औद्योगिक विकास, रोजगार एवं आर्थिक सहयोग एवं उ

अन्तर्सम्बन्धों से सम्बन्धित करता है।

49 सहकारी समिति के हित निर्माण में महत्वपुर्ण भूमिका निभाता है और सहकारीता संघ का विकास प्रक्रियों की निरंतर बढ़ाना है । 50. रोजगार एवं आर्थिक विकास के विभिन्न और महत्वपूर्ण कारकों के आधार पर निजी

प्रबंधन से भिन्न होगा।

  1. सदस्यों को सेवाएं प्रदान करने के कार्य में असंख्य निजी और शासकीय तन्त्र के साथ सम्बन्धित करना। 52 लाभ के तत्य को हमेशा ध्यान में रखकर संस्था का विकास करना
  2. सेवा की भावना एवं सार्वजनिक उत्तरदायित्व को बनाये रखना। 54. वित्तीय उन्नति के मार्ग को सरल बनाना।
  3. महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं रोजगार उपलब्ध कराना ताकि महिलाएं पुरुषों के समान आर्थिक विकास की मुख्य धारा का अंग बन सकें। 56. ग्रामीण महिलाओं में बचत की आदत तथा आर्थिक संसाधनों पर उनके नियन्त्रण को सुदृढ तथा संस्थागत बनना।
  4. महिलाओं की स्थिति, स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, स्वच्छता और सफाई, कानूनी अधिकार, अर्थिक उत्थान तथा अन्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों के सम्बन्ध में स्वा

सहायता समूहों (एस.एच.जी.) के सदस्यों में विश्वास तथा जागरुकता पैदा करना। 58. महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वा सहायता समूहों (एस.एच.जी.) की स्थापना करना।

  1. महिलाओं को लघु ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा में सुधार लाना। 60. संस्था स्तर के आयोजनों में महिलाओं को शामिल किया जाना ।
  2. संभाग में महिलाओं का स्वा सहायता समूहों (एस.एच.जी.) स्थापना करना जिनमें प्रत्येक समूह में कम से कम 5 व अधिक से अधिक 25 सदस्य हो । 62. आय-सृजन सम्बन्धी कार्यकलापों के लिए उन्हें आसान त्राण सुविधा उपलब्ध करा कर

उनके घर आगन तक पहुंचना

  1. महिलाओं, विशेष रूप से गरीब महिलाओं की आय सृजन सम्बन्धी कार्यकलापों में भागीदारी के माध्यम से घर-परिवार की आय तथा व्यय पर अत्याधिक नियन्त्रण महिलाओं का करना, जिससे शराब नशा आदि पर पुरुषों द्वारा घर की सम्पत्ति की क्षति पर रोक हो सके और पर का महौल खुशनुमा हो, साथ ही गरीबी उन्मूलन में मदद मिले। 64. महिलाओं के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए संसाधनों तक उनकी पहुंच को

चढावा, कठिन परिश्रम को कम करने वाले तथा समय की बचत करने वाले तरीकों का

प्रयोग करना। 65. महिलाओं की जरूरतों का सक्रिय रूप में ध्यान रखने के लिए संस्था की प्रबंध क्षमता को सुग्राही तथा सुदृढ़ बनाना।

सामाजिक उद्देश्य

  1. समाज को रोजगार देने के लिये,

अध्यक्ष

प्रस्ता. औ. वि. वा. रोज. वि यह संघ मर्या. जलपर

प्रस्ता औ

पुर

20

  1. पिपरागत उद्योगो को पटरी पर लाने के लिये
  2. एकाधिकार की प्रवृत्ति को रोकने के लिये,
  3. आय का असमानता को कम करने के लिये,
  4. उचित वितरण के लि
  5. वस्तुओं की कमी दूर करने के लिये,

आर्थिक उद्देश्य

  1. योजना विकास करने के लिये,
  2. क्षेत्रीय असन्तुलन का करने का लिये,
  3. भावी विकास हेतु वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए,
  4. विकास दर में वृद्धि करने के लिए, 11. क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए,
  5. लघु एवं कुटीर उद्योगों की सहायता के लिए, 13. संस्था के विकास को प्रभावित करने वाली आर्थिक तथा सामाजिक नीतियों सम्बन्धी विषयों पर एवं प्रगति पर हर तीन माह पर विचार करना 14. योजना के निर्माण के लिए पथ-प्रदर्शक सूत्र निश्चित करना, तैयार योजना पर

विचार करना एवं सामाजिक और आर्थिक नीति के महत्तवपूर्ण प्रश्नों पर विचार

करना।

4 उपविधि क्रमांक (4) सेवा जो सदस्यों को प्रदान की जायेगी।

(अ) सहकारिता सदस्यों के लिये सेवा उपलब्ध करवाने हेतु शर्त। सदस्यों के लिए सभी प्रकार की सेवा सहकारिता के माध्यम से उपलब्ध करवाना परन्तु केवल यही सेवा जो सहकारिता की सूची में व्यावसाय प्रबर्धन में आती है। जो निम्न है :

4(1) सदस्यों की मांग के अनुरूप उचित मूल्य पर घरेलू एवं जीवनोयोगी उपभोक्ता

वस्तुओं को उनके निवास पर उपलब्ध करने की सुविधा प्रदान की जायेगी।

4(2) संस्था के सदस्यों को संख्या द्वारा बेची गई वस्तुओं के लिए मरम्मत तथा अन्य सभी सुविधा आदि का विकास करना। 4(3) सदस्यों को संस्था द्वारा निमाण और बेची जाने वाली वस्तुओं पर कमीशन

प्रदान करना।

4(4) सदस्यों को माइक्रो फायनेन्स, व्यावसायिक गाण, व्यक्तिगत गुण, व्यावसायिक

प्राशिक्षण, व्यावसायिक सहयोग, आपातकालीन ऋण वाहन ऋण, होमलोन आदि उपलब्ध कराना ।

4(5) सदस्यों को बाजार व्यवस्था उपलब्ध कराना।

4 (6) सदस्यों को वार्षिक बोनस पर लाभांस देना, उत्पादन के लिये कच्चा माल देवा, मशीन आदि की व्यवस्था उपलब्ध करना आदि।

4 (6) तैयार माल या वस्तु क्रय करना

(ब) गैर सदस्यों को सहकारिता द्वारा उत्पादित सेवाएं तथा अन्य उत्पाद का उपभोग

करने के लिए सक्षम रहेंगें परन्तु उन्हें सहकारिता से होने वाले अन्य लाभ का लभांश नही मिलेगा।

अध्यक्ष

प्रस्ता. औ. दि. रोज दि वह जय जयसपुर

11

उपविधि क्रमांक (5) सदस्यता

सहकारिता का सदस्य बनने के कति में ना होनी चाहिये।

5(1). यह सहकारिता के निवासी हो और उसने सहकारिता की उपविधियों को पढ़कर मान्य कर लिया हो सदस्य होने के उपरांत वह सहकारिता के कार्यक्षेत्र से बाहर दूसरे स्थान पर चला जाता है तो वह सहकारिता का सदस्य नही रहेगा।

उसका आचरण अवध हो 5(2).

15 (3) अच्छी कक्षा अतीर्ण हो या पढ़ना लिखना आवश्य जानता हो और शिक्षित हो।

5(4). उसकी आयु 18 वर्ष से अधिक हो और 55 वर्ष से अधिक न हो और जो भारतीय विधान के अंतर्गत अनुबंध करने में सक्षम हो, परन्तु मृत सदस्यों के उत्तराधिकारियों के लिए आयु का प्रतिबंध लागू नही रहेगा। परन्तु आवश्यक क्लेम न्यायालय द्वारा नियुक्त किये गये संरक्षक के माध्यम से सदस्य के रूप में प्रवेश दिया जायेगा। ऐसे सदस्य अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए अपने संरक्षक के माध्यम से अधिकार का उपयोग उन दावों के अधीन रहते हुए करेंगे जो इन उपविधियों के अधिकार है।

5(5) उसने न्यूनतम 1 अंश हेतु राशि 100 रूपय एवं प्रवेश शुल्क रूपय 20 जमा करा दिया हो।

5(6) उसे दिवालिया घोषित किया गया हो।

5(7). उसे राजनैतिक ढंग की सजा को छोड़कर किसी दैतिकता संबंधी अपराध में दण्डित न किया गया हो परन्तु यदि दण्ड की अवधि से 5 वर्ष व्यतीत हो गये हो तो यह अयोग्यता लागू नही होगी।

5(8) उसे किसी सरकारी सेवा/सहकारी संस्था से निष्कासित न किया गया हो वह अधिनियम की धारा 20 के अधीन निर्हित न हो।

5 (9). यह अधिनियम की धारा 48-ए के अधीन निष्कासित न किया गया हो।

5 (10) यदि उसका बालिग पुत्र / अविवाहित, बालिका पुत्री अन्य: प्रस्तावित सहकारिता में सदस्य

है तो यह शपथ पत्र में घोषित करेगा कि पुत्र/पुत्री पिता से अलग रहते हैं।

5(11) संस्था गठन के समय के सदस्य एवं इनके उत्तराधिकारी संस्था के आजीवन सदस्य होगे यदि वह संस्था की सदस्यता लेना चाहे ।

संख्या में निम्न प्रकार के सदस्य हो सकेगे।

जो 1. (क) वर्ग के सदस्य, जिसमें वे व्यक्ति जो 18 वर्ष या अधिक वर्ष के हो और (1) समस्त धंधा, व्यवसाय एवं उद्योग को आय का एक साधन मानते हो। (2) औद्योगिक विकास एवं वाणिज्यिक लाभांश सहकारी सोसाइटी में दिलचस्पी रखते हों और उसके विकास के लिये निस्वार्थ सेवा का ध्येय रखते हो दिलचस्पी रखने वाले सदस्यों की संख्या उपरोक्त (क) (1) के कुल सदस्य संख्या के 5% प्रतिशत से अधिक न होगी।

  1. (ख) वर्ग के सदस्य, जिसमें संस्था के वैतनिक कर्मचारी या काम करने वाले अस्थायी कर्मचारी, कारीगर सम्मिलित है। इस प्रकार के सदस्य नाम मात्र (जामीनल) सदस्य वेगे और इन्हें संख्या के किसी भी बैठक की सूचना पाने उसमें भाग लेगे या मत देने या बंधकारिणी के सदस्य होने का अधिकार नही होगा और उसका दायित्व

खरीदे हुए हिस्सा के मूल्य के बराबर होगा। 2. (ग) राज्य शासन द्वारा संस्था के हिसे खरीदे जा सकते हैं। राज्य शासन द्वारा हिस्से खरीदे जाने पर राज्य शासन वर्ग का सदस्य होगा। पूर्व निर्धारित शर्तों के अनुसार संस्था द्वारा राज्य शासन के हिस्से वापस किये जा सकते हैं।

6

उपविधि क्रमांक (6) सदस्यता अभिप्राप्त करने हेतु प्रक्रिया।

आरंभ में सदस्य होगे जिन्होने सहकारिता के पंजीयन प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये हो उसके बाद नये सदस्य, बोर्ड/कार्यकारिणी समिति / संचालक मंडल/प्रबंध समिति की स्वीकृति से सम्मिलित किये जायेंगे।

8(1). संस्था की सदस्यता हेतु प्रस्तुत किए जाने वाले प्रत्येक आवेदन को अध्यक्ष एवं उसकी अनुपस्थिति में प्रबंधक द्वारा प्रस्तुत बैठक में उस बैठक तक प्राप्त हुए सभी सदस्यता आवेदनों को प्रबंध समिति के निर्णय हेतु प्रस्तुत करें। जिन पर प्रबंध समिति अधिनियमों, नियमों एवं उपविधियों के अधीन स्वीकृति / अस्वीकृति करने संबंधी निर्णय लेगी।

6(2) प्रबंध समिति को यह अधिकार होगा कि वह उपरोक्तानुसार पूर्ण आवेदन को स्वीकृत करें या उपविधियों/नियमों के अनुसार अस्वीकृत करें। किन्तु यदि आवेदन पत्र अस्वीकृत किया जाता है तो संख्या प्रबंध समिति के लिए यह अनिवार्य होगा कि यह आवेदन पत्र की अस्वीकृति 15 दिवस के अंदर अनिवार्य रूप से आवेदक को रजिस्टर्ड डाक से या व्यक्तिगत तामिली या लिखित सूचित के द्वारा उसका आवेदन स्वीकृत या अस्वीकृत किया गया है अगर अस्वीकृत किया गया है तो उसमें लिखित जानकारी एवं यतेष्ट कारणों को भी दर्शाना अनिवार्य होगा और अध्यक्ष या प्रबंधक हस्ताक्षर करेगें, सूचित करें, निर्णय की सूचना प्रबंधक द्वारा भेजी जायेगी। आवेदन-पत्र अस्वीकृति होने की स्थिति में सूचना प्राप्ति के 30 दिनों के अंदर आवेदक प्रबंध समिति के निर्णय के विरुद्ध पंजीयक को अपील कर सकेगा।

6(3) संस्था द्वारा सदस्यता आवेदन पंजी तथा सदस्यता पंजी के रूप में दो पृथक पृथक पंजीयाँ रखी जायेंगी। प्रथम पंजी में नवीन सदस्यता हेतु एवं सदस्यता समाप्ति हेतु प्राप्त होने वाले प्रत्येक आवेदन का प्रविष्टियाँ अंकित की जावेगी तथा दूसरी पंजी (सदस्यता पंजी) में सदस्यता प्रदान करते ही सदस्य के संबंध में प्रविष्टियाँ अंकित की जायेगी। इन दोनों पंजीयों में प्रविष्टियाँ क्रमानंसार ही की जावेगी और किसी भी स्थिति में इनका कोई अपवाद नही होगा।

6(4). सदस्य बनाये जाने की प्रार्थना-पत्र के साथ प्रत्येक को बीस रूपये शुल्क जमा करना

होगा। यदि प्रार्थना-पत्र स्वीकृत न हुआ तो प्रवेश शुल्क वापस कर दिया जावेगा।

6(5). नामांकन प्रत्येक सदस्यों को रजिस्टर में हस्ताक्षर करना होगें और उसको अपना उत्तराधिकारी मनोनीत करने का अधिकार होगा जिसको सदस्य के मरने पर उसकी यदि कोई रकम संस्था में जमा हो तो वह वापिस दी जा सके, अथवा उसके नाम परिवर्तन की जा सके। उत्तराधिकारी की मनोनीतगी और बाद में उसमें परिवर्तन दो साक्षियों के समक्ष लिखे जायेंगे।

13

6(6) यह भी लिख कर देना होगा कि यह की उपविधियों के ब हुई पोट उपविधियों को जो भी उसकी दस्तक से हो उनका पूर्ण रूप से पालन करेगा।

7

उपविधि क्रमांक (7) सदस्य बने रहने के लिये निर्बन्ध एवं शर्ते :

7(1) काई भी सदस्य संस्थाका सदस्य तब तक बना रह सकेगा

7(1.) (A) उसे उपविधि नियम अधिनियमों के अनुसार निष्कासित कर दिया गया हो।

7(1) (B) संस्था में त्याग-पत्र को प्रबंधकारिणी द्वारा अस्वीकृत न कर लिया हो।

7(1) (C) उसकी मृत्यु हो गई हो।

7(2) सदस्यता जारी रखने के लिए अन्य मुख्य शर्ते निम्नानुसार है:

7(2) (A) संस्था की प्रबंधकारिणी अथवा पंजीयक द्वारा विधि अनुसार दिये निर्देशों के अनुसार

कार्यवाही करना आवश्यक है।

7(2) (B) संस्था के उद्देश्यों के अनुरूप कार्य करें।

7(2) (C) संस्था की अपनी गतिविधियां सुचारू रूप से संचालित करने में मदद करें।

7(2) (D) संस्था से प्राप्त लोन/अमानतों की राशियों समय पर लौटाता रहें।

8 उपविधि क्रमांक (8) संभावित सदस्यों के लिए समय-सीमा : ऐसे संभावित सदस्य जिनका आवेदन-पत्र प्रबंधकारिणी समिति द्वारा अस्वीकृत किये जाने से सदस्य हेतु अपील पंजीयक के पास विचाररथीन होगी अधिकतम एक माह में निर्णय संभावित सदस्य के पक्ष में हाने के दिनांक से सदस्यता हेतु आवश्यक प्रदेश शुल्क, अंशराशि एवं आवेदन-पत्र संस्था में जमा करायेगा तभी वह सदस्यों को दी जाने वाली सुविधाओं एवं अधिकारों का पात्र होगा। उपविधि क्रमांक (9) सदस्यता वापस लेना एवं अन्तरण के लिए प्रक्रिया:

9

9(1). संख्या का कोई भी सदस्य लिखित में आवेदन कर उसकी सदस्यता वापसी हेतु निवेदन कर सकेगा, किन्तु ऐसे त्याग-पत्र के साथ सदस्य का शपथ पत्र, जिसमें उसके द्वारा स्थान पत्र दिये जाने के कारणों का उल्लेख होगा, संलग्न करना आवश्यक होगा। त्याग-पत्र वाचत आवेदन संस्था के अध्यक्ष को सम्बोधित होगा और अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में प्रबंधक को सौंपा जा सकेगा। संख्या का प्रबंधकारिणी समिति ऐसे सभी आवेदनों पर विचार कर अपनी बैठक में पारित प्रस्ताव द्वारा त्याग पत्र स्वीकार/ अस्वीकार कर सकेगा। यदि त्याग-पत्र अस्वीकार किया जाता है तो उसके कारण अभिलिखित करना अनिवार्य होगा।

9(2). किसी भी सदस्य को अपने सदस्यता अंश राशि या हित किसी अन्य के हस्तांतरित करने का अधिकार नही होगा, जब तक उसके द्वारा ऐसा अंश या हित कम से कम एक वर्ष तक धारण कर चुका हो तथा ऐसी अन्तरण उस संस्था को या उसके किसी सदस्य को न किया जाय एवं वह अंतरण समिति द्वारा अनुमोदित कर दिया जाए हस्तांतरण हेतु

अध्यक्ष

रोज

14

आवेदन के साथ रूपये 10 का हस्तांतरण शुल्क जमा करते हुए अध्यक्ष को संबोधित करते हुए आवेदन अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में प्रबंधक को प्रदान किया जा सकता है। जो ऐसे आवेदनों कोर समिति के निर्णय हेतु उसकी अगली बैठक में प्रस्तुत करेगा। जब तक दस्ता अंश का हस्तातरण संख्या के रजिस्टरों (पंजीयों में नहीं लिखा जाता उस समय तक जिसके नामांतरण होगा, उसका कोई अधिकार समिति के विरुद्ध नही होगा ही उसका परिणाम उस विवाद पर होगा, जो संस्था मे अंश हस्तांतरण करने या सदस्य पर किया हो। परिणी समिति द्वारा हस्तांतरण की स्वीकृति प्रदान करने के अधिकतम 15 दिवस से हस्तांतरण संबंधी आवश्यक कार्यवाही समिति द्वारा की जाये।

10 उपविधि क्रमांक (10) (अ) सदस्यता से हटाने की प्रक्रिया :

काई सदस्य तदाशय हेतु आमंत्रित प्रबंधकारिणी समिति की बैठक में उसस्थित एवं मतदान की पात्रता रखने वाले सदस्यों के 3/4 बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा निम्नलिखित कारणों मे से किन्ही कारणों से सदस्यता समाप्ति/निष्कासित किया जा सकेगा।

10(1) काई ऐसा कार्य, जिससे कि संख्या की साख को क्षति पहुंचने की संभावना हो, था जिससे उनकी कुरुयाति होने की संभावना हो, आशय करता है।

10(2) मिया द्वारा संख्या को जानकर धोखा देता हो । 10(3). कोई ऐसा कारोबार करता है, जिससे यह संभावना हो कि यह सोसायटी द्वारा किये

जाने वाले कारोबार की प्रतिद्वंद्विता में आता हो।

10 (4) अपने द्वारा देव पन का भुगतान करने में बार-बार व्यक्तिक्रम करता हैं या उपविधियों के किन्ही भी उपबंधों का अनुपालन करने में चूक करता है। 10(5) यदि कोई संस्था के गठन के उद्देश्यों के विरुद्ध कार्य करता हो, या समिति को अपना

उत्पादनमा जाने पर विपणन हेतु उपलब्ध नहीं कराता है।

10(6). यदि उसने सदस्य बनने के बाद, सदस्यों हेतु आवश्यक अर्हताओं में से किसी एक को भी खो दिया हो, परन्तु कोई भी ऐसा संकल्प तब तक विधि मान्य नही होगा जब तक कि सदस्य को उसे निष्कासित करने संबंधी प्रस्थापना को सात दिनों की सूचना या तो व्यक्तिगत रूप से या रजिस्टर्ड डाक से न दे दी गई हो और जब तक कि उसे अपने मामले के संबंध मेमं समिति के समक्ष अन्यावेदन करने का अवसर न दे दिया गया हो।

उपविधि क्रमांक (10) (ब) सदस्यता की समाप्ति प्रक्रिया :

निम्नलिखित में से किसी एक भी कारण से किसी व्यक्ति की सदस्यता समाप्त हो जावेगी।

10 (or)(1). मृत्यु हो जाने पर

10 (1) (2) स्थाई रूप से विक्षिप्त हो जाने पर

10 (अ) (3). उसके द्वारा पारित अंश किसी और को स्थानान्तरित किये जाने पर, या कम से कम एक अंश का स्वामी न रहने पर, अंश की राशि में वृद्धि होने पर संबंधित सदस्य को विधिवत सूचित करने 90 दिवस तक वृद्धि राशि का पुकारा न किये जाने पर

10 () (4) उपविधि 9 के अनुसार त्यागपत्र स्वीकृत होने पर सदस्य द्वारा 3 माह पूर्व स्थान पत्र प्रस्तुत करना होगा, किन्तु एस पर संस्था का शेष हो।

10 (अ)(5) कोई भी सदस्य को संस्था के हित के विरुद्ध कार्य करें अथवा भिया कानों से

संस्थाको जानकारप्रति करें या संस्था के कारोबार की प्रतिस्पर्धा में कोई कारोबार करें

या अपने द्वारा देयके भुगतान में बार-बार व्यति करें या उपविधियों या उसके

उपबंधों का अनुपालन करने में करे, तो ऐसे सदस्य को संचालक मण्डल द्वारा उपस्थित

सदस्यों के तीन-चौथाई बहुमत से सदस्यता से पृथक किया जा सकता है, किन्तु सदस्य को इस संबंध मैकम 15 दिन पूर्व सूचना व्यक्तिगत रूप से या पंजीकृत डाक से ही जाना चाहिये, सुनवाई हेतु समुचित अवसर दिया जाना चाहिये। संचालक/ विदेशको मण्डल की बैठक जिसमें सदस्य को सदस्यता से पृथक किया जाये, उसी उद्देश्य से बुलायी गयी होना चाहिये। 10 (ar) (6) उपविधि क्रमांक 10 (अ) के अनुसार निष्कासित किये जाने पर काई भी निकाला हुआ सदस्य निष्कासन की दिनांक से छ वर्ष की अवधि तक संस्था में पुनः सदस्य के रूप

में प्रवेश नहीं पा सकेगा। सदस्य के निष्कासन में उसके धारित अंश संस्था द्वारा जप्त किये

10 (3)(7). संस्था के कार्यक्षेत्र से बाहर चले जाने पर सदस्यता समाप्त हो जावेगी। किसी भी सदस्य की सदस्यता समाप्त होने पर संस्था देय राशि का भुगतान पर बकाया के समायोजन के उपरान्त कर सकेगी तथा ऐसा सदस्य एक वर्ष तक संस्था के उन सभी ऋणों के लिये देनदार होगा, जो उसकी सदस्यता समाप्ति की तिथि पर देय थी।

10 (अ) (B), सदस्य की मृत्यु की दशा में संस्था में उसके अंशों या जमा राशि में से उससे

वसूली योग्य राशि कम करके शेष राशि उसके द्वारा नामांकित व्यक्ति या नामांकन के अभाव

में संचालक/ निदेशक मण्डल के निर्णयानुसार ऐसा व्यक्ति, जो मृतक सदस्य के वैधानिक

उत्तराधिकारी के रूप में नियमों में वर्णित नामांकन की राशि प्राप्त करने का अधिकारी, को

इण्डेमिनिटी बाँड भरने पर भुगतान की जायेगी।

11 उपविधि क्रमांक (11) सदस्यों के अधिकार

संस्था के प्रत्येक सदस्य को निम्न अधिकार ही रहेंगे :

11(1), संस्था द्वारा सदस्यों को प्रदान की जा रही सुविधाओं का लाभ उठाने का अधिकार

11 (2). सदस्यता से निष्कासन की स्थिति में पंजीयक को अधिनियमों/नियमों/उपनियमों द्वारा निर्धारित समयावधि अव्यय 10 दिवसों में अपील का अधिकार

11 (3). सदस्य अपने में से संस्था की प्रअंधकारिणी समिति के सदस्यों को मत देकर चुनने का अधिकार

11 (4). उपविधियों/नियमों/अधिनियमों के अनुसार सदस्यों को संस्था की आमसभा में भाग लेकर मतदान का अधिकार 11 (5). संस्था की गतिविधियों को एवं उसकी प्रगति के बारे में जानकारी अध्यक्ष अथवा

प्रबंधक को लिखित आवेदन देकर प्राप्त करने का अधिकार।

पुर

11(6) किसी भी कर्मचारी द्वारा अनियमितताएं की जा रही है, स्पष्ट से जाने या सिद्ध होने पर उसकी सूचना प्रबंध को देने का अधिकार

[11 (7) किसी भी सदस्य द्वारा अनियमितताएं की जा रही है, स्पाट रूप से पायें या सिद्ध होने पर उसकी सूचना अध्यक्ष या प्रबंधक को देने का अधिकार 11 (8) सदस्यता से पत्र अपनी अंश पूँजी वापस प्राप्त करने का अधिकार सदस्यों

कोहोरों को और किसी भी प्रकार की राशि या लोन की राशि घटाकर वह

शेष राशि संस्था से प्राप्त कर सकेगा।

11 (9) सदस्यों को नामांकन का अधिकार, सदस्य द्वारा प्रस्तुत नामांकन दो साक्षियों के समक्ष विधि हस्ताक्षर होने एवं संबंधित नामांकन की प्रविष्टि संस्था अभिलेखों में होन पर ही मान्य होगा। सदस्य द्वारा नामांकन प्रस्तुत करने की दशा में सदस्य को पावती प्रदान की संस्था अभिलेखों में प्रस्तुत नामांकन अनुसार तदाशय की जानकारी दर्ज करनी।

11 (10) संख्या के अन्य सदस्य अथया ऐसे व्यक्ति को जिसे सदस्य बनाये जाने की स्वीकृति संख्या द्वारा प्रदान की जा चुकी है, वो अपना अंश हस्तांतरण कर सकने का अधिकार

12 उपविधि क्रमांक (12) सदस्यता के अधिकार (मत देने के अधिकार सहित) का प्रयोग करने के लिये, पात्रता बनाएं रखने के लिए सदस्यों की न्यूनतम प्रतिबद्धताएं : संस्था के प्रत्येक सदस्य को सदस्यता बनाये रसाने च मत देने के लिए पात्रता पान करने के लिए निम्न कृतव्य आवश्यक होगें :

12: (1). संस्था के गठन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किये जा रहे कार्यो कार्यवाहियों के संचालन गर्ने संस्था के पदाधिकारियों/अधिकारियों/कर्मचारियों को आवश्यक सहयोग प्रादन करना।

12 (2) संस्था के सदस्य होने के लिए आवश्यक अनिवार्यताएं बनाए रखना।

12 (3), संख्या के हितों के विरुद्ध कार्य न करना

*12 (4). संस्था के व्यवसाय के समान ऐसा व्यवसाय प्रारंभ न करना जिससे संस्था के व्यवसाय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

12 (5). संस्था द्वारा उसे जिन शर्तों पर सेवाएं लोन आदि प्रदान किया गया हो, उनका पालन करना।

12 (6) संख्या के सुचारू रूप से संचालन हेतु उसके पदाधिकारियों/अधिकारियों कर्मचारियों द्वारा दिये गये विधि सम्मत निर्देशों का पालन करना।

12 (7). संस्था के पक्ष में उसकी देवताओं को समय पर पूर्ण करना।

13 उपविधि क्रमांक (13) सदस्य द्वारा संस्था से शोध्य किसी रकम के संदा में व्यतिदम का परिणाम ।

अध्यक्ष

प्रस्ता. औ. दि. वा. रोज.. वि.सह.संघ मर्या. जबलपुर

किसी सदस्य द्वारा संख्या में गोप्य किसी के संदा को प्रतियम के परिणामस्वरूप निम्न बिन्दु प्रभावशील होने

13(1). यदि व्यतिक्रम की अवधि 12 से अधिक होगी तब सदस्य अपने मत का प्रयोग प्रबंध समिति में यदि वह प्रबंध समिति में पदाधिकारी / सदस्य के रूप में कार्यरत हैं, अथवा आमसभा संस्था के कार्य संबंधी बैठक के लिए योग्य नही रहेगा अर्थात अयोग्य हो जायेगा तथान ही प्रबंध समिति का सदस्य चुने जाने के लिए पात्र रह सकेगा।

13 (2) यदि व्यतिक्रम की अवधि 2 से अधिक हो जाती है तथा सदस्य संख्या को रकम कराने की अवधि का कोई सव्यपूर्ण व प्रति प्रस्ताव नहीं करता है तब संस्था अधिनियम/उपनियमों/उपविधियों के अनुसार रकम वसूल करने की कार्यवाही पारित कर सकेगा।

[13 (3). यदि व्यतिक्रमा की अवधि 2 वर्ष से अधिक हो जाने पर सदस्य की सदस्यता समाप्त किये जाने का प्रस्ताव प्रबंध समिति में विचार हेतु रखा जाकर निर्णय लिया जा सकेगा, परन्तु ऐसा कोई भी निर्णय लेने से पूर्व सदस्य को चुने जाने का पूर्ण अवसर प्रदान किया जावेगा।

14 उपविधि क्रमांक ( 14 ) अधिकृत अंशपूँजी

संस्था की प्राधिकृत पूँजी 10000000 (एक करोड़ रुपया होगी जिसमें 100-100 (सौ-सौ रूपये के 100000 (एक लाख) हिस्से होगें। इस प्राधिकृत हिस्सा पूँजी में किसी भी प्रकार की कमी व वृद्धि व्यापक सम्मिलित बैठक के ठहराव से व स्वीकृत कराकर पंजीयक सहकारी संस्थायें, मध्यप्रदेश की पूर्व मंजूड़ी ली जायेगी। अंश पुँजी के एक अंश का मूल्य राशि रुपये 100/- होगा। इस प्रकार संस्था के पास 100000 (एक लाख) अंश होगें।

15 उपविधि क्रमांक (15) सदस्यों का अंश ।

15 (1) प्रत्येक सदस्य को कम से कम एक हिस्सा लेना अनिवार्य होगा, किन्तु कोई सदस्य संस्था की प्राधिकृत पूँजी के 15 द्वारा भाग या उस समय तक वसूल की गई अंशपूँजी की राशि के 1/5 रुपये 2000000/- (बीस लाख) से अधिक मूल्य को हिस्सों का स्वामी न हो सकेगा। अतः कोई सदस्य अंशपूँजी की राशि के 15 रुपये 20/00/000/- (बीस लाख) से कम मूल्य को हिस्सों या अंश ले सकेगा। यदि किसी कारण से किसी सदस्य वा मृत सदस्य के उत्तराधिकारों होने से अथवा अन्य किसी कारण से किसी के पास इस सीमा से अधिक मुल्य के अंश हो जाये तो उसे प्रबंधकारिणी समिति को यह अधिकार होगा कि यह इस अंश को संस्था के अन्य सदस्यों को बेच दे राज्य शासन एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं पर यह प्रतिबंध न होगा। संस्था की संचालक/ निदेशक मण्डल को यह अधिकार होगा कि वह अंश हिस्से की रकम एक मुश्त या किस्तों में भी जमा करा सके।

15(2). एक अंश का मूल्य 100 रूपये का होगा और सदस्य द्वारा प्रथम लिये गये अंश पूँजी का पूरा मूल्य एक साथ जमा करना होगा ।।

अध्यक्ष

प्रस्ता. ओ. दि. वा. रोज. वि. वह च नयो जबलपुर

16 उपविधि क्रमांक (16) अंश प्रमाण-पत्र व हस्तांतरण –

16(1). एक अंश प्रमाण-पत्र लिये हुए के लिये दिया जायेगा जिस पर संस्था के अध्यक्ष हस्ताक्षर होने और संस्था की मुद्रा लगाई जायेगी काई सदस्य अंश को कम से कम एक वर्ष तक धारण करने के बाद प्रबंधकारिणी समिति की स्वीकृति से किसी दूसरे सदस्य को अथवा ऐसे व्यक्ति को जिसे सदस्य बनाया जाना संस्था के पालक निदेशक प्रबंधकारिणी समिति मण्डल स्वीकार किया हो, और प्रबंधकारिणी समिति हस्तांतरित करने की स्वीकृति प्रदान कर दिया हो। हस्तांतरण के लिये दस रुपये जमा करना होगा और हस्तांतरण तब तक पूरा नही हो सकेगा, जब तक कि हिस्सों को पंजी रजिस्टर में हिस्से प्राय करने वाले का नामांकन दर्ज व हो जाये।

16(2) उस सदस्य को, जिसका संव्यवहार संस्था से समाप्त हो गया हो और ऐसे सदस्य का सदस्यता से त्यागपत्र संचालक/ निदेशक महल द्वारा स्वीकार किया जा चुका हो, उसके द्वारा अंजी के की दो वर्ष के भीतर वापस की जा सकेगी, परन्तु पूर्ववर्ती सहकारी वर्ष के अंतिम दिन 31 मार्च को वर्ष में प्राप्त अंशपूँजी के 10 प्रतिशत की सीमा से अधिक अंशपूँजी की कुल वापसी नही की जायेगी और उसमें से यह लोग व अन्यः सुलक) जो संख्या को सदस्य से लेना हो, काट लिया जायेगा।

16(3). सदस्य की मृत्यु की दशा में संस्था में उसके अंशों या जमा राशि में से उससे वसूली राशि कम करके शेष राशि उसके द्वारा नामांकित व्यक्ति या नामांकन के अभाव में संचालक/ निदेशक मण्डल के निर्णयानुसार ऐसा व्यक्ति, जो मृतक सदस्य के वैधानिक उत्तराधिकारी के रूप में नियमों में वर्णित नामांकन की राशि प्राप्त करने का अधिकारी, को इन्डेमिनिटी भरने पर भुगतान की जावेगी।

16(4), किसी भी हिस्से को बिक्री, उपहारों, बंधक या अन्य किसी प्रकार से तब तक हस्तांतरण नही किया जायेगा, जब तक की उसकी पूरी रकम प्राप्त न हो जाये और हिस्से लेने के संबंध में उपविधि में निर्धारित अधिसीमा संबंधी शर्तें पूरी की जाये।

16(5) यदि किसी सदस्य के पास दान स्वरूप या अन्य किसी प्रकार से उपविधि में लिखित अधिकतम संख्या से अधिक हिस्से हो जाये तो प्रबंध समिति की यह शक्ति होगी कवह इन अतिरिक्त हिस्सों को बेचने या संस्था की ओर से इन्हें खरीद ले और इससे प्राप्त रकम को उस सदस्य के नाम से जमा कर ले।

17 उपविधि क्रमांक (17) अंश की वापसी

उस सदस्य को जिसका संबंध संस्था के उपविधि 10 (अ) अथवा 10 (ब) के अनुसार टूट गया हो उसके अंश के उस समय के मूल्य के समान उतनी रकम सहकारी सोसायटी नियमों के अनुसार प्रबंधकारिणी समिति निश्चित करे तथा उनको जमा की हुई रकम से अधिक हो 15 माह के भीतर वापिस दी जायेगी।

यह रकम को घटाकर जो उससे संस्था को लेनी हो, वापिस दी जावेगी, परन्तु किसी दर्प में पिछले 31 मार्च पर अंशी की रकम जो जमा हो उसके 1/10 से अधिक रकम इस प्रकार वापिस नही की जायेगी।

18 उपविधि क्रमांक (18) सदस्य का दायित्व

18(1)लिए जो संस्था पर ही सदस्यों का दायित्व उसके

केकेति सेा तथा राज्य शासन व बाग मात्र सदस्यों का

खरीदे हिस्सों के मूल्य तक होगा। 18(2) पिछले सदस्यों उस ऋण तथा अन्य देने के लिये जो संख्या पर उसके सोने के समय हो उसके होने से दो वर्ष तक रहेगा। ऐसा दाना मात्र सदस्यों व राज्य शासन पर न होगा।

18(3).] मृत्यु सदस्य की दशा में संस्था में उसके अंश वा जमा सम्पत्ति ऋण तथा अन्य देने के लिए एसके मृत्यु की तारीख से दो वर्ष तक उत्तरदायी होगे।

19 उपविधि क्रमांक (19) पूंजी एवं निधियों एवं निधियों का जुटाया जाना : संख्या साधारणतः निम्नलिखित साधनों से निधियों प्राप्त करेगी।

19(1) (A) प्रवेश शुल्क

19(1). (B) हिस्सा अभिदान/अंश निर्वहन द्वारा,

19(1). (C) कार्यशील पूंजी व हिस्सा जमा रकम डिपाजिट, अग्रिम न लेकर,

19(1).(D) व अनुदान आदि लेकर,

19(1). (E) लाभ से रक्षित निधि बनाकर आदि,

19(1).(F) हिस्सा केन्द्रीय सरकार और मध्यप्रदेश शासन, रिर्जव बैंक या अन्य अधिसंस्थाओं

या व्यक्तियों से प्राप्त अनुदान और अर्थ सहायता।

19(1). (G) बचत या अन्य फंड जो संख्या समय-समय पर निर्माण करें।

19(2) पंजीयक की स्वीकृति के बिना ऋण तथा अमानत की रकम अंध की वसूली की हुई तथा विधि के 10 गुने से अधिक नहीं होगी संस्था की पूंजी उपविधि 3 में उल्लेखित में लगाई जायेगी।

*19(2) सदस्यों से

19(3) सदस्यों से ऋण और जमा रकमे उस सीमा उन शर्तों के अधीन ली जावेगी जो पंजीयक सहकारी संस्थायें द्वारा निर्धारित की जायें इस ऋण में वह स्कम नही होगी जो कच्या माल या उत्पादित माल को रहन रखकर बैंको से उधार ली है।

19(4), संख्या राज्य सरकार, राज्य शासन में कार्य कर रहे किसी विधि के अधीन बैंक, वित्तीय नियमों, नियमित निकायों और व्यक्तियों से निक्षेप व उधार प्राप्त र सकेगी। नाममात्र ही सदस्यता प्रदान कर विशिष्टि करार या अनुमोदित परियोजना के अधीन अंशपूँजी

अध्यक्ष

के विधि भी प्राप्त कर सकेगी तथा किसी अन्य सोसाइटी या नाम साब के सदस्य को उधार दे सकेगी।

दैनिक/मासिक/सवादी अमानत जमा करा पूँजीव 19(6) संस्था द्वारा सदस्यों से ली गई दैनिक / मासिक /मियादी अमानत कार्यशील पूँजी स

19(5)विधियां

सदस्यों द्वारा समय पर भुगतान किये जाने पर कटौती संबंधी नियम प्रबंधकारिणी द्वारा तय

  1. (7). जमा रकमों एवं ऋणों के रूप में संस्था कुल उतनी रकम ही उधार लेगी जो प्राप्त हिस्सो पूंजी और रक्षित निधि से जोड़ में संचित हानि की स्वम पटाकर बेचने वाली रकम के दस गुने तक सीमित होगी और सदस्यों के ऋण और जमा रकमें उस सीमा तक और उन शर्तों के आधीन ली जायेगी जो पंजीयक सहकारी संस्थायें द्वरा निर्धारित की जायें। इस आण में यह रकम शामिल नही होगी जो संस्था ने कच्चा माल या उत्पादित वस्तु को हरन कर स्टेट बैंक आफ इन्द्रिया या अन्य अनुसूचित बैंको वा स्थानीय केन्द्रीय सहकारी बैंक आदि से उधार ली है।
  2. (8). कार्यशील पूँजी रकम सदस्यों या गैर सदस्यों से ली जा सकती है।
  3. (9), गैर सदस्यों की अपेक्षा सदस्यों से जमा रकमे पहले ली जायेंगी। मितव्ययता द्वारा

जमा रकमे

19.(10) प्रत्येक सदस्य, जब तक कि वह सदस्य रहें, संस्था से मिलने वाली मजदूरी/ परिश्रमिक में से प्रति 10% जमा कार्यशील पूंजी में देगा जब किसी सदस्य की निधि 100 रुपये हो जाये, तो यह उसके हिस्सा पूँजी लेखे में डाल दी जाये और उसे हिस्सा प्रमाण-पत्र दिया जायेगा जब किसी सदस्य के नाम पर जमा हिस्सा पूँजी उपविधि में निर्धारित अधिकतम सीमा तक पहुँच जाये, तो सदस्य द्वारा जो रकम जमा होगी उस पर प्रबंध समिति द्वारा निर्धारित ब्याज की दर से ब्याज दिया जावेगा।

20 उपविधि क्रमांक (20) (अ) निधियों के प्रयोग : संस्था की निधियों का प्रयोग संस्था के गठन के उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आवश्यक एवं संबंधित गतिविधियां को संचालित करने में सामान्यतः किया जायेगा। संस्था की पूँजी व

निधियां उपविधि में बतायें गये उद्देश्यों पर खर्च की जावेगी।

(ब) रक्षित निधि :

उपविधि 15 के अनुसार लाभ के अंश की रकम पर भारे रक्षित निधि में जमा होगा और कोई सदस्य उनमें से कोई अंश पाने का अधिकारी नही होगा इसका उपयोग व्यापक सम्मेलन के ठहराव से और सकारी संस्थाओं के पंजीयक की स्वीकृति के उपरान्त हानि को, जो संस्था को हुई हो दूर करने के काम में किया जा सकता है।

रक्षित निधि की रकम केवल ऐसी रीति में व ऐसी शर्तों व प्रतिबंधों पर जो

कि इस संबंध में पंजीयक द्वारा निर्धारित किया जावेगा नियुक्ति अथवा उपयोग में

लाई जायेगी।

संख्या के समापन के बाद तथा निधियों की जो रकम

रहेगी उसका विनियोग मध्यप्रदेश सहकारी संस्था विधान तथा उसके अंतर्गत नियमों

के अनुसार किया जायेगा।

21

21 उपविधि क्रमांक (21) निक्षेप ऋण पत्र एवं अन्य निधियों, सीमा व शर्ते ।

संस्था अपनी प्रदत्त पूँजी जया रक्षित निधि से संतान को घटाने के बाद बची राशि से अधिकतम 10 गुना तक निक्षेप, ऋण-पत्र, ऋण-पत्रों के माध्यम से नयां सदस्यों/असदस्य/वित्तीय संस्थानों/ शासन से प्राप्त कर सकेगी। संस्था द्वारा लोन एवं कार्यशील पूंजी व अमानते के लिए अलग से पंजी रोगी, जिसमें आवश्यक प्रविष्टियां होगी तथा इसकी जानकारी आमसभा में भी सदस्यों को दी जावेगी।

22 उपविधि क्रमांक (22) राज्य सहायता एवं वित्तीय संस्थाओं से प्रयोजन व शर्तें

संस्था समय-समय पर आवश्यकता एवं विभिन्न शासकीय/अशासकीय योजनाओं के माध्यम से उपलब्धताअनुसार (ग्रान्ट आदि) प्राप्त कर सकेगा, इस प्रकार से प्राप्त निधियों का उपयोग संख्या के गठन के उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु आवश्यक एवं संबंधित गतिविधियों के संचालन में किया जायेगा। प्रबंध समिति द्वारा इस संबंध में आवश्यक शर्ते का निर्धारण किया जायेगा।

23 उपविधि क्रमांक (23) लाभ अथवा अधि-शेष का व्ययन आम सभा की स्वीकृति से शुद्ध लाभ (नेट प्राफिट) का वितरण निम्नानुसार किया जावेगा।

  1. (1). कम से कम 25% प्रतिशत राशि रक्षितनिधि में स्थानांतरित की जावेगी।
  2. (2). म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम / नियमों के अनुसार जिला सहकारी संघ को

अंशदान दिया जा सकेगा।

  1. (3), शेष राशि में से 25% प्रतिशत तक लाभांश का वितरण अंशधारियों को आमसभा से अनुमोदन उपरांत किया जा सकेगा। पंजीयक की पूर्वानुमति से लाभांस में 25% प्रतिशत तक की वृद्धि की जा सकेगी।
  2. (4). शेषन में से संस्था के कर्मचारियों को बोनस 1965 के प्रावधनों के अनुसार बोनस दिया जा सकेगा।
  3. (5) अधिनियम की धारा 43 के अनुसार परोपकार संबंधी आशय के लिये अंशदान दिये जाने हेतु निधि का निर्माण किया जा सकेगा, चेरीटेबिल एलोटमेंट एक्ट 1890 के प्रावधानानुसार संचालित होगा।
  4. (6), शेष पन लाभांश पूर्ति निधि तथा अन्य निधियों में जमा किया जायेगा, लाभांश के अंश के अतिरिक्त प्रवेश शुल्क, जप्त हिस्से की धनराशि तथा अनिवार्य कार्यशील पूँजी अभावत में से कटा हुआ धन रक्षित निधि में जमा होगा धनराशि तथा अनिवार्य कार्यशील पूँजी अमानत रक्षित निधि का धन सदस्यों को वितरित नही हो सकेगा, और न ही कोई अंश पाने का अधिकारी होगा। इसका उपयोग साधारण सभा के प्रस्ताव के द्वारा पंजीयक की

स्वीकृति उपरान्त संस्था को जो हानि हुई हो, जसको दूर करने के कार्य में किया जा सकता है।

नोट:- हस्तांतरित किए हुए अंशी का लाभांश उन सदस्यों को दिया जायेगा जिनके नाम (

अंतिम दिवस पर रजिस्टर में अंकित हो 24 उपविधि क्रमांक (24) निधियों/कोषों का गठन और उनका प्रयोजन संस्था अपने गठन के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक सदस्यों/असदस्यों आदि के उत्थान

पर कल्याण के लिए कल्याण कोषों का गठन कर सकेगी। इस हेतु राशि उपविधि क्रमांक 23(6) में दिये अनुसार उपयोग की जा सकेगी। 25 उपविधि क्रमांक (25) साधारण/विशेष आम सभा बुलाने की रीति व गणपूर्ति

25(1), प्रत्येक सहकारी वित्तीय वर्ष को समाप्ति के 6 माह के भीतर साधारण निकाय, वार्षिक सम्मिलन निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए बुलायी जायेगी।

25 (1) (A) सोसायटी के क्रियाकलापों का, जो कि संचालक मंडल द्वारा आगामी वर्ष के लिये तैयार किया गया हो, अनुमोदन करने के लिये। 25(1). (B) संचालक मंडल के सदस्यों का निर्वाचन, यदि वह कारया जाना अपेक्षित हो गया

है। स्पष्टीकरण – संचालक मंडल का निर्वाचन अपेक्षित हो गया समझा जावेगा यदि संचालक

मंडल की अवधि समाप्त हो गई हो। 25 (1). (C) संपरीक्षा रिपोर्ट, यदि प्राप्त हो तथा वार्षिक रिपोर्ट पर विचार करने के लिये।

25 (1) (D) शुद्ध लाभ के व्ययन के लिये।

25(1).(E) किसी अन्य विषय पर जो कि उपविधियों के अनुसार लाया जाये, विचार करने के

लिये। 25(1). (F) आगामी सहकारी वर्ष के लिये बजट प्रस्तुत करने के लिये।

25(1). (G) वित्तीय वर्ष में कार्य संचालन के कारण हुये घाटे के कारणों का परीक्षण करना।

25(1).(H) लेखाओं की संरीक्षा करने के लिये संपरीक्षक की नियुक्ति करना।

परन्तु जहां किसी सोसायटी के संबंध में धारा 69 के अधीन समापन का आदेश दिया गया है, तो वहां वार्षिक साधारण सम्मिलन बुलाया जाना आवश्यक नहीं होगा। संचालक मंडल किसी भी समय सोसायटी की विशेष साधारण सम्मिलन दुला सकेगा यह रजिस्टार के या सदस्यों की कुल संख्या के 1/10 सदस्यों से अध्यापेक्षा प्राप्त होते.

के पश्चात एक माह के भीतर ऐसा सम्मिलन बुलायेगी, विशेष साधारण सम्मिलन बुलाने के

लिये अधिनियम में वर्णित प्रावधानों का पालन किया जायेगा।

25 (2) साधारण / विशेष आम सभा बुलाने की सूचना :

आमसभा की कार्य सूची दिनांक, समय तथा स्थान की सूचना प्रयेक सदस्य की

14 स्पष्ट दिवस पूर्व दी जायेगी उपविधियों में संशोधन की स्थिति में प्रस्तावित संशोधन की

रूपरेखा निर्धारित प्रारूप के साथ प्रत्येक सदस्य को दी जायेगी। प्रत्येक सदस्य को आगरा की सूचना साधारण डाक द्वारा भेजी जायेगी एवं सूचना सोसाइटी के क्षेत्रलत स्थानीय हिन्दी समाचार पत्रों में भी प्रकाशित की

जायेगी।

25 (3) गणपूर्ति

साधारण सम्मिलन की गणपूर्ति सम्मिलन की सूचना की तारीख को कुल सदस्यों के 1/10 या 50 सदस्य जो दोनों में कम है से होगी। सम्मिलन के लिये निर्धारित किये गये समय के आधा घंटे के भीतर यदि गणपूर्ति नहीं होती है तो सम्मिलन निर्धारित तिथि समय और स्थान के लिये स्थगित कर दी जायेगी और इसके पश्चात हुये सम्मिलन के लिये गणपूर्ति आवश्यक नहीं होगी। इस स्थगित सम्मिलन में कार्य सूची के विषय पर चर्चा कर निणर्य लिया जायेगा किन्तु विशेष साधारण सभा जो सदस्यों के आवेदन पर बुलाई गई हो यह विघटित होगी।

25 (4) कार्यवृत्त :

साधारण सभा के कार्यवृत्त इसके लिये निर्धारित पुस्तिका में किया जायेगा और इस कात्त के अंत में अध्यक्ष के हस्ताक्षर होगें। कार्यवृत्त सम्मिलन समाप्ति से 30 दिवस के भीतर अध्यक्ष के हस्ताक्षर से सोसायटी के सदस्यों को भेजा जायेगा।

26 उपविधि क्रमांक (26) साधारण सम्मेलन की आवृत्ति :

वार्षिक आमसभा की बैठक प्रतिवर्ष सहकारी वर्ष की समाप्ति के 3 माह के अंदर आहूत की जावेगी। इसके अतिरिक्त जब भी आवश्यक हो संचालक मंडल के प्रस्ताय अथवा संस्था के कम से कम 1/10 सदस्यों के लिखित प्रार्थना पत्र पर जिसमें आमसभा बुलाने की मांग की गई है अथवा पर विशेष आमसभा की बैठक एक माह के अंदर बुलाई जा सकती हैं।

27 उपविधि क्रमांक (27) साधारण सभा में मताधिकार :

व्यापक सम्मेलन साधारण सभा में प्रत्येक उपस्थित सदस्य को उसके कितने ही अंश क्यों न हो केवल एक मत देने का अधिकार होगा कोई सदस्य अपने प्रतिनिधि द्वारा मतदान नही कर सकेगा। उन मामलों के अतिरिक्त जिनके निर्णय के लिये मध्य प्रदेश सहकारी सोसायटी अधिनियम उसके अंतर्गत नियम या संस्था की उपविधियों में विशेष बहुमत से होगा दोनों पक्षों में समान मत होने की स्थिति में अध्यक्ष के मत से निर्णय होगा। अधिनियम एवं नियमों के प्रावधना अनुसार होगा परंतु चुनाव के अतिरिक्त सामान्य विषयों में मतगणना हाथ उठाकर अथवा उसी पद्धति से जो सभा के अध्यक्ष द्वारा निश्चित की जाये, सम्पन्न होगी।

28 उपविधि क्रमांक (28) साधारण सभा के विषय :

व्यापक सम्मेलन में उपस्थित सदस्यों के 2/3 के बहुमत से कोई सदस्य कार्य सूची में न किया हुआ प्रश्न प्रस्तुत कर सकता है। ऐसा प्रश्न किसी सदस्य के निकाले जाने अथवा

निकाले हुए सदस्यों को फिर से भर्ती करने अथवा इन उपविधियों में संशोधन करने के

संबंध में अथवा ब्याज व परिश्रमिक की दरों में घट बढ़ करने के बारे में नहीं होगा।

24

29 उपविधि क्रमांक (29) साधारण सभा की अध्यक्षता : साधारण सभा की अध्यक्षता संस्था के अध्यक्ष व अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष

यदि दोनों उपस्थित न हो तो संस्था के अन्य सदस्यों में से जिसको उपस्थित सदस्य

निर्वाचित करें, साधारण/विशेष सभा की अध्यक्षता करेगा।

परंतु ऐसी स्थिति में जबकि अधिनियम की धारा 49 (8) के तहत पंजीयक द्वारा संस्था का कार्यभार संभाल लिया गया हो, अथवा घाटा 53 (13) के तहत निर्वाचित प्रबंधकारिणी समिति के स्थान पर नामांकित समिति गठित की गई हो, साधारण सभा की अध्यक्षता पंजीयक द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा की जावेगी।

30 उपविधि क्रमांक (30) साधारण सभा के कर्त्तव्य एवं अधिकार विषय :

30 (1) (A) इन उपविधियों के अनुसार संचालक मंडल / प्रबंधकारिणी समिति के सदस्यों का

चुनाव करना। 30 (2). (A) वार्षिक पत्रक और उनसे संबंधित सम्पत्ति की रिपोर्ट पर विचार करना ।

30(3). (A) लाभ का वितरण स्वीकृत करना।

30(4). (A) संस्था का वार्षिक बजट स्वीकृत करना।

30 (5). (A) यह निश्चित करना कि कार्यशील पूंजी जमा/अमानते / लोन, कितना और किस अवधि के लिये और किस व्याज दर पर लिया व दिया जाये।

30(6). (A) संस्था के ऑडिट तथा निरीक्षण टीप पर समिति द्वारा की गई कार्यवाही पर विचार करते हुये आवश्यकानुसार उचित निर्देशन देना एवं संस्था के कार्य के देख-रेख करने हेतु दो आंतरिक निरीक्षक नियुक्त किये जायेंगे।

30(7) (A) संस्था के कार्य संचालन के लिये उपविधियों में आवश्यक संशोधन पर विचार करना।

30 (8). (A) संचालक मण्डल के सदस्यों पर बकाया लोन य अन्य अग्रिम की जानकारी से अवगत करना/ होना। 30(9). (A) अन्य बातों पर विचार करना जो संचालक मण्डल या सदस्यों की ओर से प्रस्तुत

किए जायें।

30 (10). (A) गत आमसभा की कार्यवाहियों की पुष्टि करना।

31 उपविधि क्रमांक (31) उपविधि के बनाने/संशोधन करने की रीति :

संस्था के गठन के समय प्रस्तुत उपविधियां उप पंजीयक कार्यालय से अनुमोदन उपयंत लागू होगी। तदुपरांत सिवाय आमसभा अथवा विशेष आमसभा में उपस्थित सदस्यों के 2/3 के बहुमत के इन उपविधियों में से किसी भी उपविधि का संशोधन नही हो सकेगा। सम्मेलन / सभा बुलाने के सूचना पत्र में प्रस्तावित संशोधन लिखा जावेगा और सूचना पत्र

कम से कम 14 दिन पहले दिया जायेगा ऐसा संशोधन इस समय तक व्यवस्था में न आ

जबकि पंजीयक उसको स्वीकृत करक

32 उपविधि क्रमांक ( 32 ) निर्वाचन की प्रक्रिया:

म.प्र. रहाकरीसाठी नियम 1962 के अध्याय 5 कप अधिनियम का अध्याय सहकारी सोसायटी मे संचालन की प्रक्रिया अंत किया जायेगा न कराये जाने हेतु सहकारी सोसायटी नियम 1962 के 49 (1) निर्धारित प्रारूप -2 में किया जायेगा आवेदन निर्धारित प्रारूप निर्वाचन प्राधिकारी को किया जावेगा। निर्वाचन प्राधिकारी द्वारा संख्या का निर्वाचन <-2

अधिनियम 1960 एवं नियम 1962 के तहत संपन्न कराया जायेगा। 33 उपविधि क्रमांक ( 33 ) प्रबन्ध समिति/संचालक मंडल का गठन :

संस्था के कार्य संचालन के लिये प्रबंधकारिणी समिति जिसका गठन निम्नानुसार होगा : इस वर्णित सदस्य संख्या में से निर्वाचित सदस्यों की संख्या : 1. जिसमे संचालक मण्डल के सदस्यों की संख्या गुल 11 सदस्यों की होगी जो निम्न है

अध्यक्ष

  • 01

उपाध्यक्ष (पुरुष वर्ग)

1301

3-01

03

उपाध्यक्ष (महिला)

संचालक (महिला वर्ग) संचालक (पुरुष वर्ग) प्रबंध महानिदेशक

03

01

वित्त सचिव

01

कुल संचालक मण्डल सदयों की संख्या जिसमें आरक्षण निम्न प्रकार होगा :

11

अध्यक्ष

3-01

संचालक

संचालक (आरक्षित कोटा पुरुष वर्ग)

सामान्य

F08

-04

वर्ग)

1-04

अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति

01 01

01

अन्य विदा दर्श

01

संचालक (आरक्षित कोटा महिला सामान्य –

01

अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति

:- 01

3-01

अन्य पिछडा वर्ग

01

अध्यक्ष

प्रस्ता. औ. वि. वा. रोज

प्रबंध निदेशक

01

01

वित्त सचिव कुल संचालक मण्डल सदयों की संख्या

11

  1. राजिस्ट्रार द्वारा नामांकित सदस्य : जो अंकेक्षण अधिकारी के सर से कम न हो।

-01 का हो 01.

  1. वित्तीय बैंक का प्रतिनिधि जो परवेक्षक के पद से काम 14. पदेन संचालक संस्था का मुख्य कार्यपालन अधिकारी/
  2. प्रबंधक पदेन सचिव होगा

01

  1. उपाध्यक्ष (महिला/पुरुष) संचालको में से एक-एक करके प्रति वर्ष एक-एक करके उपाध्यक्ष का पद ग्रहण करेंगे जिसमें अंतिम वर्ष चुनाव या बढ़ा हुआ समय का मिलान करने के बाद शेष समय के लिए चुनाव या अन्य पद्धति का स्वाय

कारेंगे। 34 उपविधि क्रमांक (34) प्रबंधक / प्रबंध महानिदेशक/सी.ई.ओ. (मुख्य कार्यपालन

अधिकारी) : संस्था के कार्य संचालन के लिये संचालक मण्डल द्वारा प्रबंधक / प्रबंध महानिदेशक/ सी.ई.ओ. (मुख्य कार्यपालन अधिकारी) की नियुक्ति की जावेगी।

35 उपविधि क्रमांक (35) प्रतिनिधि का चुनाव : (अ) प्रबंध समिति के सदस्यों का निर्वाचन हो जाने के बाद सदस्यगण अपने में से दो

उपाध्यक्षों का चुनाव करेंगे। जिसमें एक महिला उपाध्यक्ष व एक पुरुष उपाध्यक्ष होगे। अध्यक्ष/उपाध्यक्ष और अन्य संस्थाओं के लिए प्रतिनिधियों के निर्वाचन सहकारी सोसायटी अधिनियम 1960 एवं नियम 1962 के अंतर्गत किया जावेगा। (ब) प्रतिनिधि का चुनाव : संस्था की प्रबंधकारिणी समिति अध्यक्ष/उपाध्यक्ष और प्रबंधकारिणी समिति के सदस्यों के चुनाव के साथ-सथा अन्य सोसायटी जिसका कि वह सदस्य हैं, में संस्था का प्रतिनिधित्व करने के लिए प्रतिनिधि चुनेगी और ऐसे चुने हुए प्रतिनिधि को संस्था के चुनाव होने तक वापिस नहीं बुला सकेगी।

36 उपविधि क्रमांक (36) संचालक होने की पात्रता : किसी भी व्यक्ति में संचालक मण्डल के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए निम्न

योग्यताएं होना आवश्यक है। 36(1) (A) निर्वाचन दिनांक से 45 दिन पूर्व से संस्था की सदस्यता प्राप्त कर चुका हो तथा कम से कम एक अंश का स्वामी हो (प्रथम संचालक मण्डल के गठन के लिये यह

अनिवार्यता लागू नहीं होगी।

36(2). (A) वह संस्था में किसी लाभ के पद पर न हो।

36(3). (A) संस्था के व्यवसाय के समान ऐसा व्यवसाय न करता हो जिससे संस्था के हितो

पर कुठाराघात होता हो। 36(4). (A) वह संस्था के लिये किसी लोन या अग्रिम चुकाने में 12 माह के अधिक का

डिफाल्टर न हो।

36(5). (A) राज्य सरकार या सहकारी संस्था की सेवा से किया गया हो। 36(6) (A) म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 के अनुसार संचालक मण्डल में पद धारण करने के लिये अयोग्य न हो।

36(7) (A) दिवालिया या पागल न हो।

37 उपविधि क्रमांक: (37) संचालक पद पर बने रहने की शर्ते :

37(1)तक कि यह संचालक नियुक्त होने के लिए उपविधि क्रमांक 35 में लिखित अनिवार्य योग्यताएं पूर्ण करता हो। 37 (2) जब तक कि भारतीय संविधान के अनुसार अनुबंध करने के योग्य हो ।

37(3). जब तक कि निर्वाचित होने के बाद से किसी योग्ता के धारण करने के कारण

संचालक के पद से हटा न दिया हो।. 38 उपविधि क्रमांक ( 38 ) प्रबंध समिति का कार्यकाल :

38(1). प्रबंधकारिणी समिति/संचालक मण्डल के सदस्यों एवं पदाधिकारियों (अध्यक्ष/उपाध्यक्ष) का कार्यकाल 5 वर्ष का होगा। पाँच वर्ष की अवधि की गणना संचालक मण्डल की प्रथमः बैठक जिसमें अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का निर्वाचन हो, के दिनांक से होगी। सामान्यतः संचालक मण्डल का कार्यकाल 5 वर्ष रहेगा, परंतु उक्त अवधि के बीतने पर अगले संचालक मण्डल का निर्वाचन किसी तकनीकी कारण से न हो पाने अथवा म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 के प्रावधानों के अनुसार मण्डल के सदस्यों की अवधि उक्त समान्य 5 वर्ष की अवधि से अधिक हो सकती है।

38(2). संस्था की प्रथम प्रबंधकारिणी समिति पंजीयन की तिथि से तीन माह के लिए पंजीयक द्वारा नामांकित की जावेगी, इस अवधि में म.प्र. सहकारी सोसायटी नियम, 1962 के 34 (1) के अनुसार निर्वाचन की कार्यवाही किया जाना अनिवार्य होगा।

38(3), यदि प्रबंधकारिणी समिति का कोई सदस्य समिति की तीन लगातार बैठको में कोई ऐसा कारण बताये बिना समिति उचित समझे, अनुपस्थित पहे तो यह समझा जायेगा कि यह प्रबंधकारिणी समिति का सदस्य नही रहा।

39 उपविधि क्रमांक (39) अध्यक्ष/उपाध्यक्ष एवं संचालकों को हटाने और रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया :

39(1). रिक्त स्थानों को भरने की प्रक्रिया :

संचालक मण्डल के किसी भी सदस्य / पदाधिकारीयों को संचालक मण्डल से हटाने के लिये उनके विरुद्ध लाये गये प्रस्ताव संचालक मण्डल अपनी बैठक मेंमत देने के लिए उपस्थित सदस्यों में से 2/3 सदस्यों के बहुमत से ऐसे संचालक या अन्य पदाधिकारियों को हटाने की अनुशंसा करने का प्रस्ताव पास कर सकेगा तथा संबंधित सदस्यों / पदाधिकारीयों को ऐसा प्रस्ताव पास करने के उपरांत न्यूनतम 15 दिन की समयावधि में जवाब देने का अवसर देते

हुए कारण बताओं नोटिस व्यक्तिगत से पावती लेकर अथवा पंजीकृत डाक से अध्यक्ष या उसकी अनुपलब्धता पर उपाध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षरित कर प्रेषित किया जा सकेगा। अध्यक्ष के स्वयं ऐसे प्रकरण में शामिल होने पर उपाध्यक्ष ऐसे कारण बताओ सूचना पत्र पर हस्ताक्षर कर सकेगा। उशा नियम अवधि के बीतने के उरांत अथवा समयावधि में प्राप्त जवाब को संतोषप्रद न पाये जाने पर संचालक मण्डल अपनी अगली बैठक में मत देने के लिए उपस्थित कुल सदस्यों में से 2/3 सदस्यों के बहुमत से ऐसे संचालक पदाधिकारीको मण्ड से हटाने का निर्णय पारित किया जा सकेगा। संचालक मण्डल के किसी भी संचालक पदाधिकारी को हटाने के लिए जारी नोटिस में कारणों को स्पष्ट उल्लेख किया जायेगा, जिन पर विचार उपरांत संचालक मण्डल द्वारा उसे हटाये जाने की अनुशंसा की गई हो। ऐसे किसी भी पदाधिकारी/संचालक को हटाये जाने का निर्णय होने पर अध्यक्ष/उपाध्यक्ष अथवा संचालक मण्डल द्वारा नियुक्त सदस्य के हस्ताक्षर से जारी सूचना पत्र से संबंधित को व्यक्तिगत रूप से से पावती लेकर या पंजीकृत डाक से प्रेषित कर निर्णय से अवगत कराया जा सकेगा। संबंधित सदस्य पदाधिकारी ऐसे किसी भी निर्णय के विरुद्ध, पंजीयक के पास, उसे हटाये जाने के निर्णय के आदेश के जारी होने के दिनांक से 30 दिनों के अंदर अपील कर सकेगा।

*39(2). रिक्त स्थानों को भरने की प्रक्रिया :

यदि किसी समय प्रबंधकारिणी समिति में से किसी सदस्य / संचालक का पद संस्था द्वारा अन्य सहकारी संस्थाओं को भेजे गये प्रतिनिधि, या संख्या के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद त्याग देने, मृत्यु हो जाने से या अन्यथा रिक्त हो जाता है तो ऐसे रिक्त पद की पूर्ति इस हेतु बुलाई गई बैठक में ही की जायेगी और ऐसी बैठक की अध्यक्षता पंजीयक के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा नियुक्त अधिकारी द्वारा की जावेगी। इस हेतु बुलाई गई बैठक में गणपूर्ति (कोरम) होना आवश्यक होगा।

40 उपविधि क्रमांक (40) संचालक मण्डल के सम्मेलन को बुलाने की रीति और उसकी गणपूर्ति (कोरम)

40(1). प्रबंधकारिणी समिति / संचालक मण्डल के सम्मेलन आवश्यकतानुसार अध्यक्ष द्वारा अथवा उसकी अनुपस्थिति में व अधिकृत किये जाने पर उपाध्यक्ष द्वारा न्यूनतम एक सप्ताह का लिखित नोटिस देकर बुलाया जा सकेगा ऐसे सूचना पत्र में सम्मेलन का दिनांक, स्थान, समय व विषय का स्पष्ट उल्लेख होगा। सूचना पत्र व्यक्तिशः तामील कराया जायेगा या नामांकित व्यक्ति के कार्यकाल पर व अशासकीय / सदस्य के प्राप्त पर साथ निवास करने वाले किसी संबंधित बालिग व्यक्ति के हस्ताक्षर निवास पर छोड़ा जा सकेगा बैठक के लिए निर्धारित स्थान पर निर्धारित दिनांक व समय के 30 मिनट बीतने पर भी कोरम न हो, बैठक सूचना पत्र में उल्लेखित हो, अन्यथा उपस्थित सदस्य निश्चित करे। परन्तु ऐसी बाद में होने वाली बैठक के लिए कोरम आवश्यक नही होगा।

40(2). आवश्यक परिस्थिति में जबकि कमेटी की बैठक बुलाने के लिए पर्याप्त समय न हो तो कमेटी के सदस्यों में कागजात घुमास्कर आदेश प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार कागजात घुमाकर लिये गये निर्णय का कमेटी की आगामी बैठक में अनुमोदनार्थ के लिए रखा जावेगा।

40(3). कोरम- प्रबंधकारिणी/ संचालक मण्डल की बैठक के लिए कोरम सदस्यों की कुल संख्या के 50% (पचास) प्रतिशत से अधिक होगी।

41 उपविधि क्रमांक (41) प्रबंध संचालक मण्डल के सम्मेलन की आवृत्ति : प्रबंधकारिणी समिति/संचालक मण्डल की आवश्यकतानुसार बुलाई जावेगी। परंतु कम से कम तीन माह में एक बार बैठक अवश्य बुलाई जायेगी। यदि प्रबंधकारिणी समिति / संचालक मण्डल का कोई सदस्य लगातार तीन संचालक मण्डल की अनुमति के बिना अनुपस्थित रहता है, तो प्रबंध समिति उसे सुनवाई का अवसर देने के बाद प्रबंध समिति की सदस्यता से अलग कर सकती है। ऐसा अलग हुआ सदस्य फिर एक वर्ष तक प्रबंध समिति का सदस्य नही बनाया जा सकेगा। सब प्रस्तावों का निर्णय बहुमत से किया जायेगा। दोनो पक्षों में समान मत होने की स्थिति में अध्यक्ष को एक निर्णायक मत देने का अधिकार होगा।

(41) (अ) प्रबंधक संचालक/ सी. ई. ओ. (मुख्य कार्यपालन अधिकारी) के अधिकार एवं कर्तव्य : संचालक मण्डल के अधीक्षण नियंत्रण और निर्देशन के अध्याधीन रहते हुये मण्डल द्वारा संस्था के कार्यकलापों एवं प्रबंधन की देखरेख करना एवं संस्था के हितो के अनुसार

कार्य करना। 42 उपविधि क्रमांक (42) प्रबंध समिति/संचालक मंडल के अधिकार एवं कर्तव्य : प्रबंध समिति के निम्नानुसार अधिकार एवं कर्तव्य होंगें :

42(1), उन प्रस्तावों का पालन करते हुए जो आमसभा समय-समय पर पारित करें, उसके तथा संस्था के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए भूमि, भवन, वाहन या अचल चल सम्पत्तियां मोल लेना, प्राप्त करना, पट्टे पर लेना, गिरवी रखना, किराए पर देना या अपने पास रखना, बेचना, पट्टे पर देना व अन्य संबंधित कार्य करना उक्त कार्य संचालक मण्डल के अनुमोदन उपरांत ही सम्पन्न किये जा सकेंगें।

42(2). संस्था के समस्त वैतनिक कर्मचारियों की नियुक्ति, उनको अधिकारों व कार्य आवंटित

करना, दण्डित, पदोन्न करना, उनसे आवश्यक प्रतिभूति लेना, उनकी योग्यताएं व सेवा शर्ते

निर्धारित करना।

42(3). आम सभा द्वारा स्वीकृत बजट के अंदर खर्च करना।

42(4) वये सदस्यों को सदस्यता प्रदान करना और उनसे अंश स्वीकृत करना तथा सदस्यों के सदस्यता, अंश स्वीकृत या अंश वापिसी संबंधी करना और उनका स्वीकृत या अस्वीकार करना। पत्रों पर विचार

42 (5). संस्था के काम काज संबंधी शिकायतों की सूचना और उनका निराकरण करना।

42(6). संस्था की ओर से लोन लेना और यह तय करना कि लोन दस्तावेजों पर संस्था की ओर से कौन हस्ताक्षर करेगा। 42(7). सदस्यों के त्याग-पत्र पर विचार कर स्वीकार करना और इसी प्रकार निष्कासन पर

निर्णय करना।

42 (8). अमानत प्राप्त करना।

42(9). प्रबंधक के कार्यों की जांच करना और यह देखना कि संस्था के हिसाब के या अन्य रजिस्टर ठीक ढंग से रखे जाते हैं।

42(10) जो वैधानिक कार्यवाही या वाद संख्या की और से था उनके किसी अधिकारी/कर्मचारी

के विरुद्ध संख्या के कारोबार के संबंध में हो उनमें पैरवी करना समझौता करना या बाद

पापिस लेना तथा संस्था की ओर से पैरवी करने के लिए संस्था को किसी संचालक/कर्मचारी/ या बाहरी वकील को अधिकृत करना 42(11) पंजीयक एवं सहकारी अंकेक्षक को संस्था के निरीक्षण हेतु कागजात व रजिस्टर प्रस्तुत करना, उसके अंकेक्षण तथा निरीक्षण दीप का पालन करना, पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत

करना तथा प्रतिवेदन और उत्तरों को आमसभा में प्रस्तुत करना।

42(12) संख्या की वार्षिक आय व्यय पत्रक बनवाना और आगामी वर्ष के लिए आय-व्यय का पत्रक बनाकर आमसभा में प्रस्तुत करना। 42(13) पंजीयक द्वारा अंकित अकेक्षण शुल्क आदेश प्राप्ति के 15 दिन के अंदर शासकीय

कोषालय में जमा करवाना।

42(14) संस्था की ओर से केन्द्रीय सहकारी बैंक के अंश क्रय करना, वापस करना, आवश्यक हस्ताक्षर करना।

42 (15) अधिनियम की धारा 44 के अनुसार पंजी का विनियोजन करना। 42(16) अधिनियम की धाराओं के तहत निर्वाचित सदस्यों में से अन्य संस्थाओं के लिए

प्रतिनिधि का निर्वाचन करना। 42(17). संचालक मण्डल के निर्वाचन सदस्यों में से अन्य संस्थाओं के लिए प्रतिनिधि का

निर्वाचन करना।

42 (18). प्रत्येक वित्तीय वर्ष 31 मार्च के अंत में संस्था के वित्तीय पत्रक तैयार करदो माह

के भीतर पंजीयक को प्रस्तुत करना। 42(19). संचालक मण्डल के सदस्यों के त्याग पत्र देने पर संचालक मण्डल में उन पर विचार

करना एवं इसी अनंसार स्वीकृत या अस्वीकृत करना।

42(20) संस्था के कारोबार के संचालन के संबंध में अधिनियम, नियम तथा इन उपविधियों को दृष्टिगत रखते हुए संचालक मण्डल के अनुमोदन पर पूरक नियम बनाना और आमसभा से अनुमोदन के पश्चात उन कार्य करना।

42(21) ऋण के प्रार्थना पत्रों का निणर्य करना। ऋण स्वीकृत करना तथा ऋण की वसूली करना। ऋण की किश्तें न आने पर कारण मालूम करना एवं वसूली की वैधानिक कार्यवाही

करना।

42 (22). प्रत्येक सहकारी वर्ष के अन्त में संस्था के सदस्यों की सूची तैयार कराकर प्रकाशित करवाना, जिसमें सदस्यों का वर्ग जैसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक वर्ग व महिला वर्ग का उल्लेख सदस्य के नाम के समक्ष दर्शाया जायेगा। ऐसी सूची संस्था के एवं वित्तदायी संस्था के कार्यालय के सूचना पटल पर लगाई जायेगी।

42(23), लेकहित में भण्डार की गतिविधियों/विपणन सुविधाओं को नागरिकों को उपलब्ध

कराना।

42(24) संस्था की उपलब्धियों में आवश्यकतानुसार संशोधन करवाना। -42(25). संख्या के गठन के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अन्य सभी कार्यवाहीयां करना।

42 (26) संचालक मण्डल संख्या के हित में प्रबंधक केशियर / लेखापाल/विधिसलाहकार नियुक्ति करेंगे, इनके कार्य करने पर भत्ता/मानदेय दिया जायेगा।

का

42 (27). यह देखना कि भण्डार के वेतन भोगी कर्मचारी अपने कर्त्तव्यों का पालन ठीक से

कर रहे है तथा भण्डार की दुकान पर स्टॉक एवं सम्पत्ति ठीक प्रकार एवं ठीक दशा में रखी

जाती है।

42 (28). संस्था के कार्यों के सुचारू रूप से संचालन करने के लिए कमेटी के सदस्यों में काम का विभाजन करना एवं संस्था के समस्त अथवा कुछ अधिकारियों को अपने समस्त अथवा कुछ अधिकार सौंपना

42(29). संस्था के प्रबंधक एवं अन्य कर्मचारियों से प्रतिभूति लेना जो पंजीयक द्वारा निर्धारित मान से कम न हो।

42(30) अन्य कर्तव्य तथा अधिकार अधिनियम एवं नियमों के उपबंधों के अनुसार होगे। 42(31) प्रबंध समिति के सदस्य साधारण, व्यवहार कुशल होने के नाते संस्था का सब कार्य लगन से संचालित करेंगे एवं उस हानि के लिये उत्तरदायी होंगे जो अधिनियम, नियम तथा उपविधियों के प्रावधान के विरुद्ध कार्य करने में संस्था को हो।

42(32). संस्था के गठन के समय पदस्य संचालक मण्डल के पास अध्यक्ष/उपाध्यक्ष/प्रबंध महानिदेशक/संचालक / सचिव / प्रबंधक का पद सुरक्षित रहेगा।

उपविधि क्रमांक (42) (ब)

प्रबंध समिति अपने अधिकारों मे कोई भी अधिकार (क्रमानुसार 1,2,4,6,7,8,9,10,14, 15, 16, 17, 19, 20, 24 को छोड़कर) अध्यक्ष या प्रबंधक को सौप सकेगी। किन्तु संचालक मण्डल द्वारा प्रदत्त अधिकारों के तहत अध्यक्ष/प्रबंधक द्वारा किए गए कार्यों का विवरण संचालक मण्डल की बैठक में पुष्टि हेतु रखना आवश्यक होगा।

उपविधि क्रमांक (42) (स)

यह सब कार्यवाही जो कि संचालक मण्डल की बैठक में प्रस्तुत हुई और जिसके संबंध में चर्चा पर निर्णय हुआ हो, कार्यवाही पुस्तिका में लिखी जावेगी, कार्यवाही विवरण प्रबंधक द्वारा लिखी जायेगी और उस पर अध्यक्ष तथा अन्य उपस्थित सदस्यों के हस्ताक्षर बैठक के तत्काल बाद निर्णय/ प्रस्ताव के विवरण के ठीक नीचे लिए जायेंगे। कार्यनीह पुस्तिका भण्डार के प्रबंधक की अभिरक्षा मेंरहेगी।

43 उपविधि क्रमांक (43) प्रबंधक की शक्तियों एवं कृत्य :

प्रबंधक संस्था की प्रबंध समिति व अध्यक्ष के सामान्य नियंत्रण पर काम करेगा। उसके कर्त्तव्य तथा अधिकार निम्नलिखित होंगे

पंकेश के अनुरूप आवश्यकता 43(1). को और संकेत कर्मचारीयों के काम की निगरानी करना एवं उसक

43(2)पावतियों, रसीदें कमर्स बैंक, अन्य दावेज तैयार करना पर संचालक के

हस्ताक्षर कराना।

43(3). संख्या की ओर से सभी पत्र व्यवहार करना अध्यक्ष की संगति से आगसभा, संचालक की बैठक बुलाना संचालक के निर्णयों की उपविधियों के अनुसार सूचना देगा।

43(4) संचालक मण्डल की बैठक में उपस्थित रहना तथा उनकी कार्यवाही, पुस्तिका लिखना कार्यवाही विवरण के नीचे उपस्थित सदस्यों (संचालक मण्डल क) हस्ताक्षर कराना

43(5), संख्या के व्यापारिक स्कंध की जांच करना एवं समय-समय पर भौतिक सत्यापन 43(6) प्रबंध समिति की स्वीकृति के अनुसार आकस्मिक व्यय करना।

43(7) प्रतिवर्ष 30 अप्रैल तक गत वर्ष के आय-व्यय व वार्षिक पत्रक तैयार कराना और 31 मार्च तक उपविधियों/नियमों से निर्धारित अधिकारी को भेजना।

43(8). रजिस्टरों की प्रतिलिपियों की आवश्यकता पड़ने पर प्रकाशित करना।

43(9). आहिट या अन्य अधिकारियों की निरीक्षण दीप के उत्तर तैयार कर संचालक मण्डल के

समक्ष रखना।

43(10) बजट प्रावधानों के अनुसार संचालक द्वारा दिए गए अधिकारों अनुसार व्यय करना। 43(11). संस्था द्वारा एकत्रित या प्राप्त समस्त राशियां समिति के बैंक खातों में जमा कराना।

43 (12). यह सब कार्यवाही जो कि संचालक मण्डल द्वारा सौंपे जायें।

44 उपविधि क्रमांक (44) अध्यक्ष व प्रबंधक का दायित्व :

44(1). अध्यक्ष और वैतनिक प्रबंधक संस्था की नगद रकम या सम्पत्ति का किसी भी प्रकार का दुरूपयोग करने और उसे हड़प लेने के लिए अथवा संस्था के कामकाज में हुई वित्ती हानि के लिये उत्तरदायी होंगे।

44(2), अध्यक्ष और वैतनिक, प्रबंधक ऐसे विवरण और विनिमय ब्यौरों को नियमित रूप से भेजने के लिए उत्तरदायी होंगे जो पंजीयक शासन या संबंधित प्राधिकारी द्वारा समय-समय पर निर्धारित किये जाते वे लेखा परीक्षा निरीक्षण दीपों के संस्था को प्राप्त होने के तारीख से 45 दिन के अंदर निराकरण करेंगे।

45 उपविधि क्रमांक (45) सदस्यों के हितों के विरुद्ध कार्य करने के लिए और कर्मचारियों के कर्तव्य पूरा न किये जाने के लिए शास्तियाँ : म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 की धारा 74 में उल्लेखित कृत्य जो कि अपराध की श्रेणी में आते हो, के लिए दोष सिद्ध पाये जाने पर धारा 75 के अनुसार शास्तियाँ आरोपित की जा सकती है। संबंधित को उनके विरुद्ध लगाये गये आरोपों को अस्वीकार/ गलत सिद्ध किये जाने अथवा शारित के निर्णय के विरुद्ध अपील करने का

अधिकार अधिनियमों के प्रावधानों के अनुसार होगा।

46 उपविधि क्रमांक (46) लेखा परीक्षकों की नियुक्ति/कृत्य, लेखा परीक्षा के संचालन की प्रक्रिया : संस्था के ऑडिट संचालन हेतु पंजीयक म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 की धारा 58 के अनुसार कार्यवाह कर सकेगा।

47 उपविधि क्रमांक (47) संस्था की ओर से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और वाद दायर करने और अन्य विधिक कार्यवाही में बचाव करने के लिए किसी अधिकारी या अधिकारियों को प्रधिकार : म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 के प्रावधानों के अनुसार संस्था द्वारा किये जाने वाले सामान्य पत्र व्यवहारों, जानकारी, प्रपत्रों पर प्रबंधक द्वारा हस्ताक्षर किये जायेंगे अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजो पर समिति अध्यक्ष हस्ताक्षर कर सकेंगे। कानूनी वाद / अनुबंधों पर संचालक मण्डल द्वारा नामांकित अधिकारी/सदस्य द्वारा कार्यवाही की जा सकेंगी।

48 उपविधि क्रमांक (48) :

48(1). संस्था केन्द्रीय सहकारी अधिकोष में चालू बचत अमानत खोल सकेगा। यदि ऐसा अधिकोष न हो तो कमेटी द्वारा स्वीकृत किसी अन्य अधिकोष में ऐसे खाता खोल सकती हैं। संस्था द्वारा प्राप्त की गई सभी रकमें उक्त खातों में जमा की जायेंगी।

48(2), संस्था के आकस्मिक व्यय के लिए प्रबंधक रुपये 2000/- तक अपने पास रख सकेगा।

49 उपविधि क्रमांक (49) :

49(1). संख्या से केवल उसके ही सदस्यों को ऋण दिया जावेगा, किसी सदस्य को ऋण लेने की आवश्यकता होने पर यह अपना प्रार्थना पत्र प्रबंधक के पास भेजेगा और उस प्रार्थना-पत्र ममें लिखेगा कि ऋण किस कार्य हेतु कितना और किस अवधि के लिये चाहिये, और ऋण किस प्रतिभूति पद पर दिया जावेगा। ऋण का प्रार्थना-पत्र स्वीकार अथवा अस्वीकार करने का अधिकार समिति को होगा।

49(2). सदस्य को घोषणा-पत्र देना होगा कि उसके द्वारा अन्य किसी संस्था से ऋण नही लिया गया है।

49(3)अधिकतम 60 माि होगी। कार्यकारिणी/ समितिको पदये हुए की वापसी की अवधि निर्धारित करने का अधिकार होगा की के साथ रूपये 100/- (सी) मासिक अनिवार्य अमल की भी जमा करनी होगी। ऋण की का देव संस्था के क होती होगी। यदि किसी भी प्रकार का हुआ

49(4) संस्था द्वारा अपने सदस्यों से अमानत के तारण तथा अन्य ऋणों पर प्रचारित दरसे दो प्रतिशत अधिक ध्यान दिया जायेगा, व्याप सिद्धांत से लिया सीमाओं के भीतर की ब्याज दर में फेरबदल करने का अधिकार कार्यकारिणी समिति को होगा जिस कार्य के लिए दिया गया है यह उसी होगा। यदि यह अन्य कार्य में व्यय किया जायेगा तो कार्यकारिणी समिति सम्पूर्ण की कोल कर सकेगी और ऐसे ऋण की पर देने की तारीख से साधारण के अतिरिक्त तीन नये पैसे प्रति रुपया, प्रतिवर्ष की दर से ब्याज भी लिया जायेगा।

49 (5) कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी समिति को अधिकार होगा कि समाधान कारक कारण से किरत समय पर जमा न हो सकती हैं तो ऋणपाने की निर्धारित अवधि से अधिक दो किस्तें, पक्ष सकें, परन्तु ऐसा करना प्रतिभूतिदार (जमानतदार) की स्वीकृति के बिना संभव नही हो सकेगा, साथ ही यदि किसी किश्त बढ़ाने से संस्था को कोई देना समय पर न किया जा सकता हो, तो किश्त नही बढ़ाई जा सकेगी। अनाधिकृत रूप से दी गई किश्त की रकम पर साधारण ब्याज के अतिरिक्त तीन नये पैसे प्रति रूपया प्रतिमाह के हिसाब से दण्ड ब्याज लिया जायेगा।

49 (6). यदि किसी सदस्य के प्रतिभूतिदार की मृत्यू हो जो अथवा कार्यकारिणी समिति का यह मत हो कि यह प्रतिभूति रहने के लिए अयोग्य हो गया है, अथवा तरण में दी हुई सम्पत्ति अपर्याप्त हो गई हैं, तो वह उक्त सदस्य को दूसरी प्रतिभूति देन के लिए तारण बढ़ाने के लिये सूचना देगी, यदि इस प्रकार सूचना में दी हुई अवधि पर यह दूसरा प्रतिभूति न देवें तो उस प्रतिभूति पर अथवा तारण पर दिया हुआ सम्पूर्ण ऋण मय ब्याज के 30 दिन की अवधि में वापिस करना होगा।

49 (7) प्राण की समय पर वसूली करने का दायित्व कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी समिति का होगा, समिति का कर्त्तव्य होगा कि वह कालातीत शेष ऋण की वैधानिकता रीति से वसूली करने की कार्यवाही कालातीत होने के दिनोंक से 6 माह के अन्दर शुरू कर देवे अथवा ऋण की वापसी 6 माह 12 माह 18 माह 24 माह 30 माह 36 माह होगी एवं ऋण गृहीता की सुविधानंसार संचालक मण्डल द्वारा समय सीमा तय की जायेगी। सभी परिस्थितियों में संचालक मण्डल का निर्णय सर्वोपरि होगा।

48 (8). संस्था द्वारा सदस्यों को दी गई ऋण राशि की वसूली हेतु संस्था द्वारा अभिकर्ताओं की नियुक्ति की जायेगी। जिनके द्वारा दैनिक / मासिक वसूली की जावेगी जिसके बदले में मासिक कमीशन प्रदान किया जावेगा।

49(9) सदस्यों को सदस्यों द्वारा संस्था में जमा अमावत एव लये गये अंशों में से जो भी

अधिक हो दस गुणा तक ऋण राशि प्रदान की जा सकेगी जिसमें सदस्यों से दो प्रतिभूतिदार (जमानतदार) जो कि संख्या के सदस्य हो जिनके लिये विशालक मण्डल द्वारा आयेंगे जिसकी पूर्ति अणगृहीता द्वारा की जाये। सदस्यों को ऋण राशि देने के लिये सदस्यों से कार्यवाही शुल्क एवं क्लि

की चूक होने पर दंड व्याज भी लिया जायेगा। जो संचालक मण्डल द्वारा तय किया जायेगा। 50 उपविधि क्रमांक (50) अनिवार्य तथा अन्य अमानतें

संस्था द्वारा अपने सदस्यों से अनिवार्य तथा अन्य अमानतें जमा कराने एवं ऋण संबंधी नियम बनाकर रजिस्ट्रार से अनुमोदन कराकर प्रभावशील करना होगा। प्रत्येक सदस्य को इस नियमों के अनुसार राशि रुपये 100/- (एक सौ ) संस्था में अनिर्वाय तथा अन्य अमानती के रूप में जमा करना होगी। ऐसी अमानतों पर समय-समय पर कार्यकारिणी/प्रबंधकारिणी समिति द्वारा निर्धारित ब्याज दर से संस्था द्वारा सदस्यों को ब्याज देय होगा।

51 उपविधि क्रमांक (51) वे शर्ते जिन पर संस्था गैर सदस्यों से व्यवहार करेगाः

सामान्यतः संस्था गैर सदस्यों से व्यवहार नही करेगा परन्तु लोकहित में संस्था उसके पास उपलब्ध कृषि, रोजगार, औद्योग एवं अन्य जानकारी संबंधी जानकारियों या उत्पाद असदस्यों को भी उपलब्ध करा सकेगी।

52 उपविधि क्रमांक (52) वे शर्ते जिन पर संस्था अन्य सहकारी सोसाटियों से सहयुक्त हो सकेगी :

संस्था म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 की धारा 1- एक के अनुसार अन्य संस्थाओं से सहयुक्त हो सकेगी। इस बाबत आवश्यक व्यवसाय में शर्तें समय-समय पर आवश्यकतानुसार संचालक मण्डल या अधिकृत किये जाने पर अध्यक्ष द्वारा तय की उपविधि क्रमांक (52) वे शर्ते जिन पर संख्या सहकारी संस्थाओं से भिन्न संगठनों से व्यवहार कर सकेगी

संस्था अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु संस्थाओं से भिन्न संगठनों से व्यवहार कर सकेगी। इस बाबत आवश्यक प्रक्रिया व्यवहार को देखते हुए संचालक मण्डल या अधिकृत किये जाने पर अध्यक्ष द्वारा तय की जा सकेगी।

53 उपविधि क्रमांक (53) अधिकार, यदि कोई हो, जो सोसायटी किसी अन्य सोसायटी या अन्य परिसंघ को प्रदत्त कर सके और वे परिस्थितियाँ जिनके अधीन इन अधिकारो का प्रयोग संघ/संघों द्वारा किया जा सकेगा : संख्या किसी अन्य सहकारी संस्था अथवा परिसंघ को अपने उद्देश्यों की पूर्ति के पालन में व्यवसायिक हितों बावत् अधिकार मण्डल द्वारा निर्धारित प्रक्रिया अनुसार प्रदान कर

सकेगी। 54 उपविधि क्रमांक (54) परिसमापन के अधीन निधियों के व्यजन रीति :

संख्या के कम से कम तीन बचाई सदस्यों द्वारा ज परिसमापन का आदेश जारी कर सकेगा. इस प्रकार के आदेश में उस प्रयोजन के लिए एक समापक नियुक्त कर सकेगा और उसका पारिश्रमिक जियत कर सकेगा और किसी भी ऐसे पर पंजीयक व्यक्ति को जो समापक के रूप में नियुका किया गया से, किसी भी समय हदा भी सकेता और उसके स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा। इस प्रकार की गई नियुक्ति की सूचना लिखित मे संख्या को सूचित की जायेगी। समापक म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 के प्रावधानों के अनुसार कार्यवाहियों करेगा ।।

55 उपविधि क्रमांक (55) संस्था के लिए लेखा कर्म :

संस्था का लेखा वर्ष 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधि का होगा। 56 उपविधि क्रमांक (56) सदस्य की दशा में शेयरों तथा हति का नाम निर्देशित

के नाम अंतरण : किसी सदस्य की मृत्यु की दशा में उसके शेयरों तथा हितों का अंतरण संबंधी कार्यवाही म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 की पास 46 के अनुसार की जा सकेगी।

57 उपविधि क्रमांक (57) संस्था के विघटन की प्रक्रिया :

किसी भी समय जबकि संस्था के 75 प्रतिशत से अधिक सदस्य लिखित में ऐसा प्रस्ताव करेंगे, जो कि संस्था के संचालक मण्डल द्वारा अनुमोदित किया गया हो, द्वारा संख्या के विघटन की प्रक्रिया आरंभ हो सकेगी। 75 प्रतिशत से अधिक के बहुमत से सदस्य पंजीयक को संस्था को विघटित मान्य करने का आवेदन कर सकेंगे तथा पंजीयक द्वारा इस निमित कोई अधिकारी नामांकित किया जा सकेगा। जो सुनिश्चित करेगा कि विघटित हो चुकने का आदेश पारित करने पर संस्था की अपनी सभी प्रकार की देवताओं का दुकारा करने के बाद बधी शेष निधियों को किसी सहकारी बैंक था जहाँ पर संख्या का बैंक में खाता हो, में जमा करायेगा तथा सदस्यों की आमसभा उपविधियों अनुसार बुलाकर सदस्यों के 2 तिहाई बहुमत से निर्णय करायेगा कि संस्था की चल अचल सम्पत्तियों के निपटान / विक्रय से प्राप्त राशियों को नामांकित अधिकारी संस्था के बैंक खाते में जमा करायेगा। इसी प्रकार सदस्यों की ओर लंबित राशियों को प्राप्त करके बैंक खाते में जमा करायेगा। उक्त कार्यवाहियाँ पूर्ण हो जाने पर वह अथवा प्रतिवेदन, पूर्ण निधियों का विरिण देते हुए पंजीयक को देगा जो कि ऐसा प्रतिवेदन प्राप्त होने के बाद संस्था को विघटित घोषित करेगा तरक्षा अधिकारी के माध्यम से संस्था की निधियों को उनकी अंशपूँजी के आधार पर सदस्यों को बांट सकेगा।

58 उपविधि क्रमांक (58) संस्था क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों के स्वा सहायता समूहों का गठन और उनके लिए शिक्षा/प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करना:

संस्था के संचालक मण्डल अध्यक्ष/उपाध्यक्ष द्वारा पारित/ जारी किसी आदेश/निर्णय के सिद्ध संबंधित द्वारा ओश/सूचना प्राप्ति के दिनॉक से 30 दिन के अन्दर उप पंजीयक के समक्ष पूर्ण विवरण / प्रमाणों के साथ अपील की जा सकती हैं।

59 उपविधि क्रमांक (59) अपील :

संस्था के संचालक उपाध्यक्ष समझने पर इसके अधिकार वाले व्यक्ति एवं आवश्यक प्रशिक्षण मार्गदर्शन व सहायता प्रदान कर सकेगा तथा उपविधि क्रमांक 21 के अनुसार राशियाँ विशेष रहने पर वित्तीय सहायता प्रदान करके उनके लिए शिक्षण कार्यक्रमों को संचालित कर सकेगी

60 उपविधि क्रमांक (60) प्रबंध महानिदेश व अन्य प्रबंधक हेतु अनिवार्यताएं :

60(1) संचालक मण्डल संख्या हेतु एक प्रबंध महानिदेशक व अन्य प्रबंधकों को नियुका फरेगी उसे वेतन, भत्ते/पारिश्रमिक दिया जायेगा। संस्था के उद्देश्यों को देखते हुए संचालक मण्डल, एक प्रबंध महानिदेशक व अन्य प्रबंधकों को नियुक्ति हेतु आवश्यक शैक्षणिक यमाताएं कार्य अनुभव बादल मार्गदर्शक निर्देश प्रदान कर सकेगी।

60(2), प्रबंध महानिदेशक व अन्य प्रबंधकों के पद पर केवल उसी व्यक्ति का नियुक्ति की जा सकेगी जो

  1. न्यूनतम स्नातक शिक्षा या समतुल्य शैक्षणिक योग्यता का धारक हो। 2. किसी अन्य सहकारी संस्था के संचालक मण्डल का सदस्य न हो।
  2. किसी शासकीय/सहकारी संस्था से हटाया / बास्ति न किया गया हो।
  3. उसके पास प्रबंधन या लोक प्रशासन का एक वर्ष का पाठ्क्रम डिप्लोमा धारी हो ।
  4. यह कम्प्यूटर शिक्षा का डिप्लोमा धारी हो।
  5. उसे कम्प्यूटर में Ms Office, Word, Exell, powerpoint, & Tally VB. Net And Internet आदि का अच्छा ज्ञान हो।
  6. वह कम्प्यूटर में हिन्दी एवं इंग्लिश में टाइपिंग में दक्ष हो। 8. संख्या के उद्देश्य पूर्ति में मदद करें।
  7. उसे किसी अन्य संस्था प्रबंधन का कम से कम 3 वर्षो का अनुभव प्राप्त हो।
  8. संस्था के कागजी कार्यवाही करने में दक्ष हो। 11. किसी बैंकित अद्योपतन के अपराध के लिए सजा न हुई हो।
  9. दिवालिया घोषित न किया गया हो। 13. वैधानिक रूप से अनुबंध करने के लिए सक्षम हो।
  10. नेतृत्व के गुणों से पूर्ण हो।

61 उपविधि क्रमांक (61) अमानतें तथा ऋण लेना व ब्याज दरें :

61(1). प्रबन्धकारिणी समिति जमा रकम के तरीके को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के सदस्यों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों से रकमें उधार लेने के लिए सक्षम होगी। परन्तु इस प्रकार उधार रकम पर दी जाने वाली ब्याज की दरें किसी भी हालत में उस सहकारी केन्द्रीय बैंक अपने द्वारा दी गई रकम पर मिलने वाले ब्याज की दर से अधिक नहीं हो जिस क्षेत्र में यह संस्था आती हो।

61(2) प्रव्यकारिणी समितिको म.प्र. वित्त निगमा औद्योगिक संस्थाओं से भी स्थानों उधार लेने के लिये होगी। परन्तु इस प्रकार उपर की जाने वालों के लिये पंजीयक सहकारी समितियों की पूर्व अनुमति करना आवश्यक है।

62 उपविधि क्रमांक (62) वित्त प्रदायी बैंक व अन्य संस्थाओं से संबंध – केन्द्रीय सहकारी बैंक

62(1) यह संस्था संबंधित रहेगी जो उनकी आर्थिक सहायता देने वाली संस्था होगी।

62(2). जिला सहकारी संघ की भी यह संख्या सदस्य होगी।

63 उपविधि क्रमांक (63) (अ)हिसाब के तथा अन्य रजिस्टर –

हिसाब की पुस्तकें तथा अन्य रजिस्टर सहकारी सोसाठी अधिनियम/नियम तथा सहकारी संस्थाओं के पंजीयक की आज्ञा के अनुसार रखे जायेंगे, इनके अतिक्ति संस्था जो रजिस्टर तथा पत्रक रखना आवश्यक समझे ये भी रखे जायेंगे।

उपविधि क्रमांक (63) (ब) सामान्यताः निम्नलिखित रजिस्टर रखना अनिवार्य होगा

  1. रोकड़ बही, 2. खाता वही, 3. व्यक्तिगत खाता बही, 4. सदस्य पंजी, 5. हिस्से और हिस्सेदारी पूँजी, 6. निक्षेप पंजी, 7. वार्षिक साधारण सभा बैठक पंजी, 8. प्रबंधकारिणी सभा बैठक पंजी. 9. प्रबंधकारिणी कार्यवाही पुस्तिका 10. सदस्यता हेतु आवेदन पंजी, 11. कच्चे माल की पंजी. 12. तैयार माल की प्राप्ति पंजी 13. छूट दावा पंजी, 14 सदस्यों के वैध उत्तराधिकारी के मनोनयन की पंजी, 15. उत्पादन बिक्री पंजी, 16. मजदूरी पंजी, 17. निरीक्षण पंजी, 18. आवक-जावक पंजी, 19. प्रबंधको का दैनिक कार्य व्रत 20 अन्य पंजी जो आवश्यक हो और अभिलेख के लिए आवश्यक हो ।

64 उपविधि क्रमांक (64) संस्था की मुद्रा :

संस्था की एक संयुक्त मुद्रा होगी जो अध्यक्ष/प्रबंधक के पास रहेगी। उस लिखतम पर जिस पर यह मुद्रा लगाई जायेगी समिति के अध्यक्ष तथा सचिव या समिति के एक सदस्य के हस्ताक्षर होगे जिनको समिति ने इस संबंध में अधिकार दिया हो।

65 उपविधि क्रमांक (65) विवाद :

विवाद जो संख्या की रचना प्रबंध या कारोबार के संबंध में मप्र सहकारी संस्था विधान की धारा 64 के अंतर्गत हो निर्माण के लिए सहकारी संस्थाओं के पंजीयक को प्रस्तुत करना होगें जो उक्त विधान तथा उसके अंतर्गत नियमों के अनुसार निर्णय करेंगे।

66 उपविधि क्रमांक (66) संसोधन :

शिवाय व्यापक सम्मेलन में उपस्थित सदस्यों को 3/4 बहुमत के इन उपविधियों में से किसी भी उपविधि का संसोधन नहीं हो सकेगा। सम्मेलन बुलाने के सूचना पत्र में योजित संशोगन लिखा जायेगा और सूचना पत्र कम से कम चौदह दिन पहिले दिया जायेगा ऐसा संशोधन ऐसे समय तक व्यवहार में न आ सकेगा जबकि सहकारी संख्याओं के पंजीयक उसकी स्वीकृति करके उसकी रजिस्टरी न कर दें।

67 उपविधि क्रमांक (67) सूचना पत्र की तामीली

उपधयों में बताया गया है कि किसी भी को लाना सदस्य रजिस्टर में हुआ हो 68 उपविधि क्रमांक (68) विधियाँ : लो संख्या के

68(1). यह संख्या नेपाल केन्द्रीय सहकारी बैंक से संबंधित रहेगी जो संस्थाको आर्थिक सहायता देने वाली संस्था होगी।

68(2). संस्था म.प्र. सहकारी सोसायटी अधिनियम, 1960 के अतर्गत राज्य शासन पंजीयक द्वारा दिये गये निर्देशों का पालन करने के लिए संस्था करेगी।

69 उपविधि क्रमांक (69) कर्मचारियों के नियम व सेवा शर्ते :

पंजीयक के अनुमोदन के अधीन संस्था कर्मचारियों की नियुक्ति सेवा, शर्तों, प्रवास, भत्ता, छुट्टी निवृत्तिवेतन या सामान्य भविष्य निधि इत्यादि तथा प्रबंध समिति के सदस्य को देव प्रयास भत्ते आदि के संबंध में नियम बनायेगी।

70 उपविधि क्रमांक (70) घाटे का दायित्व व प्रबंध ।

संचालक मण्डल के सदस्य, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, प्रबंधक इत्यादि जिनको संस्था के संचालक के संबंध में अधिकार है, व्यवहार कुशल व्यक्ति के समान सब काम चिन्ता सं व सावधानी से करेंगे और उस हानि व घटोत्तरी के लिए उत्तरदायी होगे जो कि सहकारी संस्था विधान, उसके अन्तर्गत नियम और इन उपविधियों के विरुद्ध काम करने से संस्था को हुई हो। किसी वर्ष में घाटा होने की दशा में संस्था की प्रबंध समिति घाटे के कारणों को संस्था की साधारण सभा में प्रस्तुत करेगी। साधारण सभा परीक्षण कर घाटे की पूर्ति के लिये आवश्यक निर्देश प्रबंध समिति को देगी।

71 उपविधि क्रमांक (71) कर्मचारियों की रक्षा निधि :

संस्था के लिये आवश्यक होगा कि अपने कर्मचारियों तथा कामगारों के लिए भविष्य रक्षानिधि का निर्माण करें।

72 उपविधि क्रमांक (72) पंजीकृत पता व संस्था का नाम संप्रदर्शन :

में वर्णित अनुरूप म.प्र. सहकारी सोसायटी नियम, 1962 के नियम 22(1) के प्रावधानों के अनुसार कार्यवाही कर संचालक मण्डल संस्था का पता पंजीयक को प्रेषित करेगा। नियम: संस्था पंजीकृत पते में प्रत्येक परिवर्तन की सूचना संचालक मण्डल द्वारा पंजीयक को तत्काल दी जावेगी। पंजीकृत पते में प्रस्तावित परिर्तन पंजीकृत करने के उपरांत ही माना जावेगा।

संस्था अपने पंजीकृत कार्यालय जहाँ-जहाँ यह कारेबार करता है, वहाँ संस्था द्वारा जारी की गई समस्त सूचनाओं एवं अधिकरिक प्रकाशनों में, अपनी समस्त संविदानों पर कारोबारी पत्रों पर, माल के लिए आदेशों में, बीजक, लेखाओं के विवरण पर औध समस्त कारोबारी

पत्रों पर संस्था का नाम पंजीकृत कार्यालय का पता और मध अधिनियम, 1960 के अधीन है, असे गी सहकारी सोसायटी

73 उपविधि क्रमांक (73) ईकाई स्थापना :

संख्या पंजीयक की अनुमति के बिना संस्था की कोई शाखा कार्यक्षेत्र से बाहर स्थापित नहीं करेगा।

74 उपविधि क्रमांक (74) दस्तावेजों का निष्पादन :

रसीदों को छोड़कर संस्था की ओर से निष्पादित सारे भार-पत्रों (चार्जिस) या अन्य लिखित पर संस्था के प्रतिनिधि के रूप में अध्यक्ष, उपध्यक्ष, प्रबंधक और संचालक मण्डल के क अन्य सदस्य के हस्ताक्षर रहेंगे। प्रबंध समिति के अधिकार प्राप्त कर प्रबंधक रसीदों पर हस्ताक्षर करेंगे।

75 उपविधि क्रमांक (75)

(अ) भवन व सम्पत्ति :

अपने निर्धारित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्था को जिन कार्यालय, छायरियों (शेड्स) और गोदामों की आवयकता हो उन्हें यह पंजीयक की पूर्व मन्जूरी से बना सकेगा या किराये पर ले सकेगा तथा इस प्रयोजन के लिए भूमि प्राप्त करेगा।

(ब) संपरीक्षा :

सेसायटी रजिस्टार द्वारा अनुमोदित किये गये पैनल में से सहकारी सोसायटी के साधारण

निकाय द्वारा नियुक्त किये गये संपरीक्षक अथवा संपरीक्षक फर्म द्वारा लेखाओं की संपरीक्षा

करायेंगी तथा संपरीक्षा शुल्क का भुगतान करेगी जो पंजीयक द्वारा विहित किया गया हो।

लेखे संपरीक्षाओं की संपरीक्षा के लिये पत्र संपरीक्षक तथा संपरीक्षक फर्म की न्यूनतम अर्हता तथा अनुभव द्वारा विहित किया जायेगा।

लेखाओं की संपरीक्षा 31 मार्च को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष की जिससे संबंधित लेखे हैं समाप्ति के 6 माह के भीतर करवायेगी। लेखाओं का विवरण तथा संपरीक्षा रिपोर्ट रजिस्टार को प्रस्तुत की जायेगी।

किसी भी प्रकार की त्रुटि होने पर सुधार के लिये वापस किया जायेगा या विशेष संपरीक्षा

का ओदश दिया जा सकेगा।

76 उपविधि क्रमांक (76) विवरणिया :

प्रत्येक सोसायटी उसके किसी अधिकारी/कर्मचारी को इस बात का विनिर्दिष्ट उत्तरावित्व निर्धारित करेगी कि वह ऐसे अभिलेख, रजिस्टर, लेखा पुरिकाये बनाये रखे और इसे रजिस्टर को प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के 6 माह के भीतर प्रस्तुत करेंगे जो निम्नानुसार होगे

  1. उसके क्रियाकलापों की वार्षिक रिपोर्ट। 2. उसकी लेखाओं के संपरीक्षित विवरण।
  1. सहकारी सोसायटी के साधारण निकाय द्वारा तथा अनुमोदित अतिशेष व्ययन के प्लान। 4. सहकारी सोसायटी की उपविधियों की संशोधित सूची अगर कोई हो।
  2. साधारण सम्मिलन आयजनक रने की तारीख के संबंध में घोषणा तथा निर्वाचन कराना

जब अपेक्षित हो। 6. प्रत्येक सोसायटी अधिनियम की धारा 56 (2) के अनुसार प्रतिवर्ष 30 सितंबर के पूर्व प्रस्तुत की जाने वाली विविरणी के साथ रजिस्टार द्वारा नियत राशि का प्रक्रिया शुल्क के रूप में भुगतान चालान से करेंगे। 7. अधिनियम के उपबंधों के अधीन राजिस्टार द्वारा अपेक्षित अन्य कोई जानकारी।

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